Tuesday, August 25, 2020

MUHABBAT KI HAQEEQAT





मुहब्बत
मुहब्बत निहायत बेश बहा फितरी जज़्बा है, ये जज़्बा दबाया भी जा सकता है, इसका रुख भी मोड़ा जा सकता है, इसीलिए इस जज्बे को मुहज्ज़ब बनाना निहायत ज़रूरी है,
अल्लाह ताला ने इंसान में ये जज़्बा इसलिए पैदा फरमाया ताकि इंसान की ज़िन्दगी के अंधेरे मुहब्बत की रोशनी में छुप जाएं, वह ज़माना और ज़िन्दगी के तूफ़ानों में साबित कदम रहें और अपने फराएज को दिलजमई और खुश अस्लूबी से अंजाम दे सके ,
अल्लाह ताला का बहुत बड़ा अहसान है के उसने इंसान के लिए खुद अपनी ही ज़ात ए आली को मरकज ए मुहब्बत ठहरा लिया और ऐलान फरमाया के ईमान वाले वही लोग हैं जो मेरे ही जमाल ए बे मिसाल पर रिझ गए हैं और सबसे ज़्यादा मुझ ही से मुहब्बत करते हैं,
ये सदा ए मुहब्बत हमारे सलफ ने सुनी तो हर तरफ से कट कर महबूब ए हकिकी ही के हो गए, उन्होने अपना दिल रब ए जुल ज़लाल को दे दिया, जब वह अल्लाह के हो गए तो अल्लाह भी उनका हो गया,
यूं उनकी दुनिया ही बदल गई, उनकी रातें अल्लाह की याद में बसर होने लगी और दिन को वह घोड़ों कि पीठ पर बैठ कर मैदान ए जिहाद में फतुहात के झंडे गाड़ने लगे,
अल्लाह ताला की मुहब्बत ने उन्हें ऐसी ताकत वा दिलेरी वा दानाई अता कर दी के सारी दुनिया उनके घोड़ों के टापों से गूंजने लगी,
वह सहरा ए अरब से फतह के परचम लहराते हुए निकले तो यूरोप में स्पेन , एशिया में समरकंद , और कदीम हिन्दुस्तान के शहर मुल्तान तक फैल गए,
उनके मुकाबले में हमारी क्या हालात है ??
अफसोस !! हमारे दिल अपने खालिक वा मालिक की याद से ख़ाली हो गए,
हमारा महबूब, माबूद, मशजूद और मकसूद ही बदल गया,
हम रब ए जुल ज़लाल के बजाए दौलत, हुकूमत और औरत के पुजारी बन गए, आमाल ए बद का तूफ़ान उठा तो नतीजों का रुख भी बदल गया,
कल तक हमारी फतूहात का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं लेता था, आज हम खुद अपने घर की हिफाज़त तक नहीं कर सकते, तागुती ताकतें हमारी बस्तियों में घुस आयी हैं, ज़ुल्म वा सितम के शोले भड़क रहें हैं, हमारे आशियाने सुलग रहें हैं,
और हमारे कलमा गो भाइयों बहनों और बच्चों का कतल ए आम किया जा रहा है,
सांपों और बिच्छू को अपने बिलों में अमन नसीब है मगर मुसलमान के लिए कोई जाए अमान नहीं, हर जगह मुसलमान की पिटाई हो रही है, ये सब कुछ क्या है ??
क्या ये अल्लाह रब्बुल इज्ज़त से बेवफ़ाई और गैर अल्लाह से मुहब्बत का नतीजा नहीं है ???
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Monday, August 24, 2020

MUHABBAT SIRF ALLAH KE LIYE





मुहब्बत सिर्फ अल्लाह के लिए !!

हमें पैदा करने वाला रब ए ज़ुल ज़लाल सब हसीनों से बड़ कर हसीन वा जमील है, उस जैसा खूबसूरत कोई नहीं, ये उसी के बेमिसाल हुस्न कि छोटी सी करिश्मा शाज़ी है के उसने ये कायनात बनाई तो उसके हर हिस्से को हुस्न के जलवा आराईयों से मामूर कर दिया,

क्या आप नहीं देखते के हमारे चारों तरफ हुस्न के जलवे मौजूद हैं ??

यहां चांद सितारों से सजा हुआ आसमान है !!

कहीं पहाड़ों की बर्फ पोश चोटियां है !!

कहीं आबशारों का नगमा है !!

कहीं झूमते हुए सर सब्ज जंगल , कहीं फूल है, कहीं तितलियां है, कहीं जुगनू है,

ये खूबसूरत कायनात बनाकर अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इंसान के दिल वा नज़र को ज़ौक जमाल आशनाई भी अता फरमाया है,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Sunday, August 23, 2020

HADITH E RASOOL KA MUNKIR KAAFIR HAI




हदीस ए रसूल का मुनकिर काफ़िर है,

" तेरे रब की कसम ! ये लोग उस वक़्त तक ईमानदार नहीं हो सकते जब तक के वह अपने इख्तिलाफ में आपको हाकिम तस्लीम ना करें, फिर आपके फैसले पर अपने दिलों में तंगी भी महसूस ना करें और पूरे तौर पर उस फैसले को तस्लीम ना कर लें "

( क़ुरआन अल निसा आयात 65 )

अब देखिए आप ने जो भी फैसले फरमाए वह बहरहाल किताब अल्लाह में मजकूर नहीं, लेकिन उन फैसलों को मानना और फरमा बरदारी को असल ईमान कहा गया है,

इससे ये भी साफ हुआ के कुरानी आहकाम की वहीं ताबीर काबिल ए हुज्जत है जो मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वल्लम ने पेश फरमाई, लिहाज़ा आपके फैसले या आपकी ताबीर से इंकार ईमान से हटने की तरह है

" जो लोग अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ्र करते हैं और चाहते हैं के अल्लाह और उसके रसूलों के दरमियान तफरीक डालें और कहते हैं कि हम एक को तो मानते हैं और दूसरे को नहीं मानते और कुफ्र और ईमान के बीच में एक राह निकालने का इरादा रखते हैं, यही लोग पक्के काफ़िर हैं "

(क़ुरआन अल निसा आयात 150-151 )

ऐसा मालूम होता है कि ये आयात खास मुनकरीन ए हदीस के लिए ही नाजिल हुई है, क्यूंकि हमने ऐसा कोई खास नहीं देखा जो अल्लाह को ना माने मगर उसके रसूल को मानता हो,

अलबत्ता ऐसे लोग जरूर होते हैं जो अल्लाह को तो मानते हैं उसके एहकाम को वाजिब उल तालीम समझते हैं लेकिन उसके रसूलों की बात को नहीं मानते,

इसी तबके में वो लोग भी आ जाते हैं जो जबानी तौर पर तो रिसालत का इकरार करते हैं, मगर अमलन इरशाद ए नबावी या अमाल रसूल को वाजिब उल इता अत या वाजिब उल इत्तिबा नहीं समझते

गोया रसूल को ना मानना चाहे हकीकन हो या इत्तेफ़ाकन इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता
ऐसे लोगों के काफ़िर होने में ज़र्रा बराबर शक की गुंजाइश नहीं।

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog : islamicleaks.com

Saturday, August 22, 2020

TAQDEER PAR IMAAN NA RAKHNA KUFR HAI




तकदीर पर ईमान ना रखना कुफ्र है


सवाल: इस्लाम में तकदीर पर ईमान ना रखना कुफ्र है यानी जो कुछ इस ज़िन्दगी में हमारे साथ होगा या हम करेंगे वो हमारी तकदीर में पहले से अल्लाह ने लिख दिया होगा , तो अगर मैं कोई गुनाह करूं तो इसमें मेरा क्या कसूर में तो अपनी लिखी हुई तकदीर की वजह से वो काम करने पर मजबूर था जो अल्लाह ने लिखा था,

जवाब : बेशक तकदीर पर यकीन ना रखने वाला मुसलमान नहीं हो सकता, लेकिन उस से पहले तकदीर और तकदीर पर यकीन रखने का मतलब समझिए

तकदीर लफ्ज़ का मतलब है कद्र ( प्रभुता ) और तकदीर पर यकीन का मतलब ये है कि हम इस बात पर यकीन रखें की अल्लाह हर शय कर कादिर है, यानी अल्लाह का प्रभुत्व की सारी सृष्टि पर है और वो जो हमारे साथ करना चाहता है हमारे साथ वैसा होता है ना कि हम जो कुछ अपने या किसी और के साथ करना चाहते हैं वैसा...

अपने या और लोगों के बारे में बहुत सी चीजों पर हमारा कोई इख्तियार नहीं होता, जैसे जन्म , मृत्यु , कोई आकस्मिक घटना या कोई आकस्मिक फायदा, ऐसी बहुत सी चीजें हमारी तकदीर का हिस्सा होती हैं

इन सब बातों में अल्लाह की प्रभुत्व को मानना इसलिए जरूरी है ताकि खुद कर अल्लाह का प्रभुत्व जान कर हैं उसके फरमा बरदार बने रहें, और गुनाह करने से खुद को बचाएं

और जहां तक सवाल है तकदीर की वजह से मजबूर होकर कोई काम करने का तो उसकी हकीकत ये है कि अल्लाह ने हमें खुद मुख्तार दी है, यानी हम जो काम करते हैं वो अपना कोई जाती फायदा देख कर ही करते हैं ना ही कोई गायबाना ताकत हमें कोई काम करने को मजबूर करती है,

यानी हम जो भी काम करते हैं अपनी मर्ज़ी से करते हैं और काम का नतीजा हमारे हक में हो ये सोच कर करते हैं,

लेकिन उसके नतीजे पर पर हमारा कोई इख्तियार नहीं होता और अल्लाह उस काम का जो चाहे वो नतीजा देता है, ये है तकदीर,

तो अपनी किसी गलत हरकत का कसूर किस्मत को देना और अपने किए का इलज़ाम अल्लाह पर लगाना इंसान की मक्कारी भरी जुर्रत के सिवा कुछ नहीं

बल्कि हदीस में तो ये आया है तकदीर के फैसलों को अल्लाह से दुआ करके टाला जा सकता है, यानी किसी को डर हो की किसी मजबूरी में उसके हाथ से कोई गलत कम ना हो जाए , तो वो बंदा अल्लाह से खूब दुआ करके उस गुनाह को यकीनन टाल सकता है,

साभार : जिया इम्तियाज़
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com

Friday, August 21, 2020

MUSLIM NAUJAWAN BLUE FILM K SHIKAAR







मुस्लिम नौजवान ब्लू फिल्मों का शिकार

दिमाग़ हिला देगी यह तहरीर

ट्रिपल एक्स फिल्में (सेक्सी, पोर्न) एक साजिश जिससे मुसलमान बे ख़बर हैं। "पोर्नग्राफी" एक बहुत पुराना नासूर है, अक्सर हम सोचते हैं कि आख़िर यह खेल शुरू कब हुआ और इसका तारीख़ी पसे मंज़र क्या है? इसके वजूद की बुनियाद क्या थी?

दोस्तों! तारीख़ में सब से पहले पोर्नग्राफी बतौर हथियार सुलतान सलाउद्दीन अय्यूबी (सन 1137 से 1193) के दौरे हुक़ूमत में हुई। इसे बतौर हथियार सब से पहले सलीबी (अंग्रेज़) बादशाहों ने इस्तेमाल किया।

कहानी कुछ यूँ है कि सलीबी हर मैदान में मुसलमान नौजवानों के हाथों शिकस्त होने से लगातार परेशांन थे। इस्लामी फौज़ सलीबी सेना पर भारी साबित हो रही थी सलिबियों की सोच की धारा उस वक़्त बदली जब डेढ़ लाख मुसलमान फौज़ ने अटलांटिक तट पर पंद्रह लाख सलिबी लड़ाकों की लाशों का ढेर लगा दिया, इस मौके पर सलीबी फौज़ का बादशाह रोनाल्ड फ़ूट फ़ूट कर रोया और एक बड़ी मीटिंग का आगाज़ हुआ। इस मीटिंग में मुस्लिम और सलीबी फ़ौजों की तुलना की गई और मालूम हुआ मुसलमान रात भर सजदों में रोते हैं और दिन भर मैदानों में ललकारते हैं उनके अंदर एक दुनियाँ आबाद है जिसे वह ईमान कहते हैं यही ईमान उन्हें दुनियाँ  के हर खौफ़ और डर और लज़्ज़त परस्ती से बहुत ऊपर उन्हें बेहतरीन शुजाअ लड़ाका बनाए रखता है, जबकि सलीबी फ़ौजें रात भर ज़िना और अय्याशी की महफिलों में और दुनियाँ की रंग रैलियों में मशगूल रहते हैं लेहाज़ा दुनियाँ छोड़ कर एक नए जहाँ का खौफ़ उन्हें शिकस्त फाश से दो चार करता है इसके अलावा दौराने जंग मुसलमान फ़ौजियों की आँखो से जो वहशत टपकती है वह सलीबी कुव्वतों पर खौफ़ तारी कर देती है इसके साथ "नारे तक़बीर" की फ़लक़ शिगाफ़ सदाए और मुसलमानों का अपनी अपनी जगह फ़ौलाद बन जाना भी सलिबियों के लिए एक मसला बन गया था...

सलिबियों की इस तारीख़ी मीटिंग में हरमन नामी (यहूदी) इंटेलीजेंस ऑफिसर भी मौजूद था। यह वह शख़्स था जिसने सलीबी तारीख़ में मुसलमानों को सब से ज़ियादा नुक़सान पहुंचाया था। यह निहायत शातिर व ज़हीन और फ़ित्नाबाज़ शख़्स था इसने मुसलमानों और सलीबी नौजवानों की नफ़सियात पर बात करते हुए कहा कि मेरी साठ सालह ज़िन्दगी का तजुर्बा है कि एक अय्याशी पसंद वजूद कभी भी ज़िन्दगी के मैदान में बेहतरीन सिपाही नहीं बन सकता ख़ुसूसन वह लोग जो सेक्स के मुआमलात में ज़ियादा दिलचस्पी रखते हैं उनकी जिस्मानी और रूहानी ताक़तें ख़त्म होकर रह जाती हैं अगर मैं मुस्लिम फ़ौज की बात करूँ तो मुसलमान फ़ौज में ऐसे नौजवानों की तादाद ज़ियादा है जो सेक्स की लज़्ज़त से अक्सर ना आशना है और जो शादी शुदा भी हैं वह भी इस चीज़ को एक हद तक आज़मा पाते हैं। तस्वीर की रेनाइयाँ और खूबसूरत नज़ारे हमेशा उनकी पहुँच से दूर रहें हैं  उन्हें मज़हब से आगे और पीछे कुछ नहीं दिखाई देता लेहाज़ा हम अगर उनमें जिस्मानी भूख को पैदा कर दें तो उनकी सोच और नज़रियात (आइडियालाॅजी) को कमज़ोर किया जा सकता है इस मिशन की क़ामयाबी की एक मिसाल वह मुसलमान बादशाह भी है जो शुरू में सुलतान अय्यूबी के साथ थे लेकिन हमारी खूबसूरत लड़कियों ने जब से उन्हें अपनी हसींन अदाओं का असीर किया है तब से वह ख़ुदा और रसूल स. को जानते ही नहीं हैं उन्हें सुलतान अय्यूबी अपना सब से बड़ा दुश्मन नज़र आता है उन मुसलमान वज़ीफ़ा ख़ोरों में से जर्नल भी शामिल हैं जिनकी हुक़ूमत बहादुरी में मैदानों के नक़्शे बदल डाला करते थे आज वह सलिबियों से निगाहें झुका कर बात करते हैं क्योंकि हम उनके अंदर औरत और जिन्सियात की रूह दाख़िल कर चुके हैं अगर यही तरीक़ा पुरे मुसलमान फ़ौज पर आज़माया जाए तो यक़ीनन हम क़ामयाब होंगें क्योंकि मुसलमान नौजवानों के लिए यह बिल्कुल नई चीज़ होगी और वह इनके लिए जुनूनी हो सकते हैं।

हरमन के इस ख़याल पर रोनाल्ड ने सवाल उठाया और उसने कहा: हम बहुत बार निहायत ख़ूबसूरत लड़कियां मुसलमान फ़ौज में दाख़िल कर चुके हैं लेकिन मुसलमान फ़ौज उन हसींन लड़कियों की तरफ़ देखने की तक़लीफ़ भी नहीं करती और आख़िर लड़कियाँ मुसलमान फ़ौज का किरदार देख कर सलीबी हिमायत छोड़ जाती हैं लेहाज़ा तुम्हारा यह मंसूबा नाकाम है।

हरमन ने फौरन जवाब पेश करते हुए कहा: हुज़ूर जब तक आप के अंदर किसी चीज़ की तस्वीर मौजूद न हो उसका होना न होना बे मानी है, हमें मुस्लिम फ़ौज में जिस्मानी दुनियाँ के तसव्वुर पैदा करने है। ऐसा तसव्वुर जो उनकी सोच में बरहना नंगी औरतों की हसींन अदाओं के साथ गर्दिश करता दिखाई दे, इसके बाद वह ख़ुद हमारे जाल में फ़स जाएंगे क्योंकि यह हमारी ईजाद होगी यही वाहिद तरीका है जिससे हम मुसलमानों को शिकस्त दे सकते हैं।

रोनाल्ड, हरमन की बात पर बहुत ज़ियादा संजिदा हो गया और सरगोशी भरे लहजे में बोला: आख़िर तुम कहना क्या चाहते हो? हरमन ने निहायत शातिराना अंदाज़ में तारीख़ का सब से भयानक मंसूबा रोनाल्ड के सामने पेश कर दिया। दुनियाँ के सामने यह आर्ट "पोर्नग्राफी" के नाम से सामने आया।

इस मंसूबे के एक साल बाद सुलतान सलाउद्दीन अय्यूबी को ख़बर मिली कि फौज़ के कुछ नौजवान रात को गाएब पाए जाते हैं और नौजवानों में अक्सर जिस्मानी गुफ्तगूं भी सुनी गई है सुलतान सलाउद्दीन अय्यूबी ने इस बात को इतना संजीदगी से लिया के ख़ुद भेस बदल कर नौजवानों का पीछा किया। यह बात आप को मालूम हो कि सुलतान अय्यूबी भेस बदलने में और आवाज़ बदलने में ख़ुद बहुत माहिर था। तारीख़ में उस के कई बार भेस बदल कर दूसरे शख़्सियत के रूप में दुश्मन से मिलने के वाक़ेआत मौजूद है यहाँ तक कि एक जंग में शिकस्त के बाद सलीबी आला अफ़सर को सुलतान के सामने पेश किया गया सुलतान ने एक अफ़सर से पूछा  रात जिस शख़्स से तुमने कहा था मैं अय्यूबी को उसकी सांस की महक से पहचान सकता हूँ तो बताओ वह कौन था? वह सलीबी अफ़सर बोला: हुज़ूर! वह एक अरबी ताजिर था जिसके ग़लत बयानी ने हमें आपके सामने ला खड़ा किया। सुलतान अय्यूबी ने मुस्कुराते हुए कहा: वह मैं ख़ुद था। वह हैरत से सुलतान सलाउद्दीन अय्यूबी को तकता रह गया...

दोस्तों! फ़ौज के कुछ नौजवानों की पुरसरार हरकतों पर सुलतान अय्यूबी ने ख़ुद उनका पीछा किया तो मालूम हुआ फ़ौजी छावनी से कुछ फ़ासले पर एक क़ाफ़िला रुका है जो बज़ाहिर मुसलमान हैं लेकिन उनके पास फ़हश नंगी औरतों की तस्वीरों के कुछ नमूने मौजूद हैं। जब सुलतान ने वह तस्वीरें देखी तो दंग रह गया। उनमें ऐसी मंज़र क़शी की गई थी के कोई भी नौजवान सेक्स के लिए जुनूनी हो सकता था। इसी दौरान सुलतान अय्यूबी को दमिश्क और मिस्र के दिगर शहरों से ख़बर मिली के शहर में फ़हश तस्वीर (सेक्सी फोटो) के क्लब खुल गए हैं जहाँ जिन्सी इश्तेआल अंग्रेज़ी तस्वीर दिखाई जाती है। नौजवान को जिंसियात की बा क़ायदा तालीम दी जाती है। साथ यह भी लिखा था कि मुसलमान नौजवान बड़ी तेज़ी से बुराई की तरफ़ माएल हो रहें हैं।

सुलतान अय्यूबी ने फ़ौरी अपनी जंगी पेश क़दमी रोकी और पोर्नग्राफ़ी के इस नासूर के ख़िलाफ़ महाज़ (मोर्चा) खोला। इस हवाले सुलतान सलाउद्दीन अय्यूबी ने एक तारीख़ी तक़रीर में कहा: हर क़ौम की ताक़त उसका अच्छा या बुरा किरदार हुआ करता है, दुश्मन हमारी असली ताक़त का अंदाज़ा लगा चुका है अब वह सामने से जंग कभी नहीं करेगा इसलिए दुश्मन अब हमारे क़ौमी किरदार पर हमलावर हुआ है क्योंकि ज़रूरी नहीं जंग मैदानों में हो, जंग सोच और रवैयों की भी होती है, जो क़ौम इस पर ग़ालिब आ जाती है वह फ़तहयाब होती है।

दोस्तों! सलीबी इंटलीजेंस (यहूदी) ऑफिसर हरमन एक निहायत ज़हीन और शातिर इंसान था। अगर आप पूरी सलीबी तारीख़ का मुतालेआ करेंगे तो आप को यह शख़्स पूरी तारीख़ में छाया हुआ नज़र आएगा, सलीबी जब हिम्मत हार चुके थे तब इस शख़्स ने उनमें जान डाल दी। इसके मंसूबे पर अमल करते हुए दुनियाँ के मशहूर मंज़र निगारों को मुहँ माँगी क़ीमत पर ख़रीदा गया उनसे ऐसी फ़हश तस्वीर क़शी करवाई गई कि देख कर नज़रें हटाना मुश्किल हो जाता था। वह सेक्स जिस पर लोग एक हद तक तवज्जो देते थे फ़िर उसे बेहद सोचने लगे, सलीबी बादशाहों ने जब अपने इस मंसूबे को सौ फ़ीसद क़ामयाब होते देखा तो अपनी किताबों में इस का तज़किरा बड़ी शान से किया अगरचे सुलतान सलाउद्दीन अय्यूबी ने इस ज़हर को मारने की पूरी कोशिश की लेकिन इस मसले का पूरी तरह ख़ात्मा न हो सका क्योंकि इस ज़हर के असर को देखते हुए हसन बिन सबाह के फ़िरके ने इसे बतौर हथियार अपनाया, सलिबियों से इस आर्ट ग्राफी की मांग की गई। यूं हसन बिन सबाह की पहाड़ों में बनाई हुई पुरसरार जन्नत में एक और हथियार का इज़ाफ़ा हुआ और इसी दौरान सुलतान बैतूल मुक़द्दस के फ़तह के बाद इस दुनियां से चल बसा।

सलीबी अपना दम ख़म खो चुके थे लेकिन उनका तैयार करदाह ज़हर "पोर्नग्राफी" मुसलसल फ़हाशी के जरासीम फैलाता रहा। यूं सदियों बीत गई, ज़माने के रंग ढंग बदल गए और कई सक़ाफ़तें आई और मिट गई...

आख़िर 18 वीं सदी का सूरज तुलु हुआ। यह वह सदी हैं जब साइंस के इल्म में इंक़लाब की फ़ज़ा पैदा होना शुरू हुई थी। 18 वीं सदी के शुरू में "पोर्नग्राफी" पर एक बार फ़िर नए अंदाज में काम शुरू हुआ। इस बार "पोर्नग्राफी" के लिए लकड़ी का इस्तेमाल हुआ। इस के अलावा दरख़्तों को भी काट छाट कर जिन्सी आज़ा की तरह बनाया गया।

फ्रांस में हुए इस तमाशे पर लोगों का हुजूम लग गया। लोग बे पनाह दिलचस्पी से लकड़ी के बने जिंसी सामान और दरख़्तों पर हुई ज़ियादती देखने को जोक दर जोक आ रहें थे और इसी वक़्त से लोगों में जिंसी आज़ाद ख़याली पैदा हुई लेहाज़ा लोगों की दिलचस्पी देखते हुए अमेरिका , फ्रांस और लंदन में "वुड पोर्नग्राफी" के छोटे छोटे पोर्न हाउस खुल गए जो एक छोटा सा जंगल होता था जिसमें पोर्नग्राफी के फ़न पुरे दरख़्तों पर बने होते थे।

दोस्तों! सन 1839 में कैमरा इजाद हुआ इस इजाद ने साइंस की दुनियाँ में एक बहुत बड़ा जादू किया वहीं यह बहुत जल्द पोर्नग्राफी का अहम हथियार बन गया। सन 1855 में पहली बार इसे पोर्नग्राफी के लिए इस्तेमाल किया गया लेकिन इस पोर्नग्राफी में मसला यह था कि कैमरा तस्वीर की तरफ़ एक कॉपी बनाता था इस तस्वीर को बहुत ज़ियादा शेयर नहीं किया जा सकता था इसलिए पोर्नग्राफी मुश्किल का शिकार हो गयी लेकिन यह मसला उस वक़्त मसला न रहा जब सन 1863 में प्रिंटर इजाद हुआ और इस इजाद के साथ ही सेक्स की तस्वीर से भरपूर प्ले कार्ड लोगों के हाथ में आना शुरू हुए। सन 1871 में जिंसी तस्वीर ब्लैक एंड वाइट रिजल्ट में पूरी शिद्दत के साथ मार्केट में आ चुकी थी। इन मार्किटों में फ्रांस के मार्केट सब से आगे थे...

फ़िर सन 1876 में वीडियो कैमरा की टेक्नोलॉजी मंज़रे आम पर आई। इस टेक्नोलॉजी में वीडियो कैमरा एक मिनट में सात तस्वीर को कैप्चर करता था फ़िर उन तस्वीरों को चरख़ा नुमा मशीन पर एक बड़े रोल बंडल की सूरत में चढ़ाया जाता फ़िर उस चरख़े को हाथ से चलाया जाता इस से तस्वीर इस तेज़ी से घूमती थी मानो ऐसा लगता था जैसे वीडियो प्ले हो रही है इसी तरीके अमल को आगे चल कर टीवी टेक्नोलॉजी में इस्तेमाल किया गया।

दोस्तों! वीडियो टेक्नोलॉजी के वजूद में आते ही यूरोपियन देशों में फ़िल्म साज़ इंडस्ट्री का शुरुआती ढांचा बनना शुरू हुआ इसके साथ ही तारीख़ में पहली बार बा क़ायदा "पोर्न इंडस्ट्रीज" का आगाज़ हुआ। पहली पोर्न फ़िल्म 1895 में रिलीज़ हुई। इसे लोमीर ब्रदर्स इंडस्ट्री ने पहली बार अवामी नुमाइश के लिए फ्रांस में पेश किया। इसका डायरेक्टर मिस्टर अल्बर्ट कोचर था। पहली पोर्न फ़िल्म सोलह मिनट की थी जिसमें एक औरत को बरहना, नंगे अंदाज़ में अदाए दिखाते हुए पेश किया गया। यह फ़िल्म निहायत मुनाफ़ा बक्श रिकॉर्ड के साथ मशहूर हुई। इसके साथ ही सेक्स की ख़्वाहिश ज़रूरत से बढ़ कर जूनून में बदल गई। यूरोप के गली कूचे में लोग बेहूदा मज़ाक और छेड़खानी करने लगे फ़िर यही चीज़ आगे चल कर यूरोपियन सक़ाफ़त (कल्चर) का हिस्सा बन गई।

19 वीं सदी के आगाज़ में कैमरा टेक्नोलॉजी में मज़ीद बेहतरी आई। मंज़र पहले से ज़ियादा साफ़ और मेयारी रिकॉर्ड होने लगे। इसके साथ ही फ्रांस और दीगर यूरोपीयन मुल्कों ने सरकारी स्तर पर पोर्न थेटर खोल दिए जहाँ पोर्न अदाकारों की पैदावर का सिलसिला शुरू हुआ। सन 1920 तक यूरोपीयन तहज़ीब पोर्नग्राफी के इस ज़हर में डूब चुकी थी। लोग सरे आम सड़कों को बेड रूम बनाए अपना शौक पूरा करने लगे, साहिल समुन्दर अय्याशी के अड्डे बन गए। मियां बीवी एक दूसरे के ज़िम्मेदारियों से भागने लगे...

सन 1970 में पोर्नग्राफी का ज़हर बर्रे सग़ीर (हिंद व पाक) में दाख़िल करने की कोशिश की गई। पहले पहल यह सिर्फ़ तस्वीर तक सीमित था। इसे वीडियो दिखाने के लिए यूरोपियन कंपनीज़ ने पाकिस्तान व हिंदुस्तान में पोर्न सिनेमा की इजाज़त चाही। इसके जवाब में सिर्फ़ इंकार ही नहीं किया गया बल्कि "पोर्नग्राफी" को बा क़ायदा एक जुर्म क़रार दिया गया।

दूसरी तरफ़ युरोपियन मुल्क़ में सेक्स वीडियो की डिमांड कम होना शुरू हुई क्योंकि एक ही सीन को हर फ़िल्म में देख कर लोग बोर होने लगे। दूसरा बज़ात इनका समाज इतना आज़ाद हो चूका था कि वीडियो देखने की ज़रूरत रोज़ बा रोज़ कम होने लगी इस सूरते हाल से परेशान होकर पोर्न इंडस्ट्री ने पोर्नग्राफी के नए अंदाज पर काम करने के बारे में सोचा। यूं पोर्न कैटेगरी प्रोजेक्ट का आगाज़ हुआ। इस पोर्न कैटेगरी प्रोजेक्ट में सेक्स को कई अक्साम में तक़सीम कर दिया गया। हर किस्म का अपना एक अलग अंदाज होता था...
अगर हम आज किसी पोर्न वेब साइट को ओपन करे तो हमारे सामने एक लिस्ट ओपन हो जाती है जिसमें सेक्स की मुख़तलिफ़ कैटगरीज़ नज़र आती है जब यह प्रोजेक्ट यूरोपीयन अवाम के सामने लाया गया तो देखने वालों में धूम मच गयी क्योंकि इस दफ़ा फ़हाशी के मंज़र पूराने तरीक़े से हट कर रिकॉर्ड किये गए थे। यह प्रोजेक्ट पोर्न इंडस्ट्री के लिए आबे हयात की सूरत इख़्तेयार कर गया क्योंकि इसकी बदौलत हर शख़्स की जिंसी नफ़सियात उभर कर सामने आई। मसलन एक शख़्स धुँआ धार जिंसी मंज़र के बजाए रिलैक्स पोर्न देखना पसंद करता है तो उसके लिए अलग कैटेगरी मौजूद होगी और यक़ीनन पाँच साल बाद रिलैक्स पोर्न देखना ही पसंद करे गा। यूं हर शख़्स के जिंसी ख़्वाहिश के मुताबिक उसे पोर्नग्राफी का नशा मिलने लगा।

आज मुसलमानों में जेहाद का जज़्बा नहीं के बराबर होने की सबसे बड़ी वजह यहीं पोर्नग्राफी की बेगैरती है। आज दुश्मने इस्लाम खासतौर पर अमेरिका, इस्राईल व ब्रिटेन और इनके टुकड़ों पर पलने वाले और आर.एस.एस जैसे ख़बीस बड़ी आसानी से इस्लामी मुक़द्दसात की तौहीन करते नज़र आ रहे हैं और मुस्लिम नौजवान अपनी बेहयाई की वजह से ख़ामोश तमाशाई बना चुप खड़ा नज़र आता हैं। 

अल्लाह तआला उम्मते मुस्लिमा को इस बेहयाई से महफूज़ रखें।
आमीन......
Cp

Thursday, August 20, 2020

MUGHAL HUKMARAN AUR MEDIA KA PROPAGANDA







मुगल हुक्मरान और मीडिया का प्रोपगंडा


जब अंग्रेज ऑक्सफोर्ड (Oxford) और कैम्ब्रिज (Cambridge) बना रहे थे उस वक़्त हमारे हुक्मरान ताज महल बना रहे थे!!!
मुस्लिम हुक्मरान और प्रोपगंडा

कुछ सालों से टेलीविजन और सोशल मीडिया में तालीम के नाम पर सफेद झूट पर मबनी प्रोग्राम चलाए जा रहें हैं और ये साबित किया जा रहा है कि जब यूरोप में यूनिवर्सिटी खुल रही थी तो मुस्लिम बादशाह ताज महल और शालीमार बाग़ बना रहे थे,

मेरी ये तहरीर मुख्तलिफ रिसर्चर और लेखकों के कालम और प्रोफेसर्स, इतिहासकार की तहकीक के उस हिस्सा पर मबनी है जो मैंने जाती तहकीक के बाद दुरुस्त पाए,

इस तहरीर में मेरे अपने अल्फ़ाज़ कम और उन लोगों के अल्फ़ाज़ ज़्यादा है,
तारीख की गवाही मैं बाद में पेश करूंगा पहले बुनियादी अक्ल का एक दर्स पेश करूं,

उन चैनल या प्रोग्राम में अगर कोई समझ बूझ वाला आदमी बैठा होता तो उसकी समझने में ये मुश्किल नहीं आती के मुस्लिम दौर के शानदार इमारात जिस अज़ीम तख्लीकी सलाहियत से तामीर को गईं, वो दो चीज़ों के बेगैर मुमकिन नहीं थी,

पहली फन ए तामीर (Art Of Architecture) की तफसीली महारत जिसमें जियोमेट्री, फिजिक्स, केमिस्ट्री और आर्किटेक्चर करने तक के उलूम शामिल होते हैं,

दूसरी किसी मुल्क के मजबूत मुआशी (Economy) और इक्तिसादी हालात (GDP) उस कद्र मजबूत हो के वहां के हुक्मरान शानदार इमारत तामीर करने का खर्च बर्दाश्त कर सकें,

मूआशी (Economic) हवाले से हिन्दुस्तान खासकर मुस्लिम दौर में और खासकर मुगलिया दौर ( अकबर - आलमगीर) में दुनिया के कुल जीडीपी (GDP) में 25 फीसद हिस्सा रखता था,

इंपोर्ट इंतेहाई कम और एक्सपोर्ट इंतेहाई ज़्यादा थी और आज माहिर मुआशियात (Economic Expert) जानते हैं के कामयाब मुल्क वह है जिसकी एक्सपोर्ट ज़्यादा और इंपोर्ट कम हो,

17वी सदी में फ़्रांसिसी Francois Bernier हिन्दुस्तान आया और कहता है के
" हिन्दुस्तान के हर कोने में सोने और चांदी के ढेर हैं, इसलिए सल्तनत ए मुगलिया हिन्द को सोने की चिड़िया कहते थे "
अब तमीरात ( Building Construction) वाले ऐतराज़ की तरफ आते हैं

फन ए तामीर ( Art Of Architecture) की जो तफ़सीलात , ताज महल, शीशमहल , शालीमार बाग, मकबरा हुमायूं, दीवान ए ख़ास वगेरह वगेरह में नजर आती है, इससे लगता है के उनके जियोमेट्री के इल्म की इंतेहा को पहुंचे हुए थे,

ताज महल की चार मीनार, सिर्फ आधा इंच बाहर की तरफ झुकाए गए ताकि भूकंप की सूरत में गिरे तो गुंबद तबाह ना हो,

मिस्री के ईंट लगाने से ये सब मुमकिन नहीं, इसमें हिसाब (Measurement) की बारीकियां शामिल हैं, पूरा ताजमहल 90 फीट गहरी बुनियादों पर खड़ा है, उसके नीचे 30 फीट रेत डाली गई के अगर भूकंप आए तो पूरी इमारत रेत में घूम सी जाए और महफूज़ रहे लेकिन इससे भी हैरान की बात ये है के इतना बड़ा शाहकार दरिया के किनारे तामीर किया गया है और दरिया किनारे इतनी बड़ी तामीर अपने आप में एक चैलेंज थी, जिस के लिए पहली बार वेल फाउंडेशन (Well Foundation) मुतारिफ कराई गई यानी दरिया से भी नीचे बुनियादें खोद कर उनको पत्थरों और मसालों से भर दिया गया,

और ये बुनियादें सैकड़ों की तादात में बनाई गई गोया ताजमहल के नीचे पत्थरों का पहाड़ और गहरी बुनीयादों का बड़ा जाल है, इसी तरह ताजमहल दरिया के नुकसान से हमेशा के लिए महफूज़ कर दिया गया
इमारत के अंदर दाखिल होते हुए इसका नजारा फरेब यानी ( Optical Illusion) से भरपूर है,
ये इमारत एक वक़्त इस्लामी , फारसी, उस्मानी ,तुर्की और हिंदी फने तामीर का नमूना है,
ये हिसाब करने के लिए, मेज़रमेंट और जियोमेट्री की बारीक तफसील मालूम होना चाहिए

प्रोफेसर इबा कोच (University Of Vienna) ने हाल ही में ताजमहल के इस्लामी ऐतबार से रूहानी पहलू वाजह (Decode) किए हैं
और भी कई राज भविष्य में सामने आ सकते हैं,

अंग्रेज़ ने तामिरात में (Well Foundation) का आग़ाज़ 19वी सदी और (Optical Illusion) का आगाज़ 20वी सदी में किया,
जबकि ताजमहल इन तरीका ए तामीर को इस्तेमाल करके 17वी में मुकम्मल हो गया था,
आज ताजमहल को मॉडर्न मशीनरी और मॉडर्न साइंस को इस्तेमाल करते हुए बनाया जाए तो 1000 मिलियन डॉलर लगने के बावजूद वैसा बन्ना लगभग नामुमकिन है,

" टाइल मोसैक " (Tile Mosaic) कला के है, जिसमें छोटी छोटी रंगीन टाइलों से दीवार पर तस्वीर बनाई जाती और दीवार को सजाया गया है,
ये कला लाहौर के शाही किले के एक किलोमीटर लंबी दीवार और मस्जिद वाजीरखान में नजर आता है, उनमें जो रंग इस्तेमाल हुए उनको बनाने के लिए आपको मौजूदा दौर में पढ़ाई जाने वाली केमिस्ट्री का गहन इल्म होना चाहिए,

यही हाल फ्रेशको पेंटिंग का है, जिनके रंग 400 साल गुजरने के बावजूद आजतक नहीं हल्के हुए,
तमाम मुगल दौर में तामीर शुदा इमारतों में टेरा कोटा ( मिट्टी को पकाने की कला ) से बने ज़ेर ए ज़मीन पाइप मिलते हैं , उनसे सीवरेज और पानी की तरसील का काम लिया जाता था, कई सदियां गुजरने के बावजूद ये अपने असल हालात में मौजूद हैं,

मुस्लिम कला तामीर का पूरा इल्म हासिल करने की कोशिश की जाए और मौजूदा दौर के विज्ञानी पैमानों पर एक निसाब (Syllabus) की सूरत तश्कील दिया जाए तो सिर्फ एक कला तामीर को मुकम्मल तौर पर सीखने के लिए पी एच डी (PHD) की कई डिग्रियां दरकार होंगी,

क्या ये सब कुछ उस हिन्दुस्तान में हो सकता था, जिसमें जिहालात का दौर ए दौरा हो और जिसके हुक्मरानों को इल्म से नफरत हो ??

ये मुस्लिम निज़ाम ए तालीम (Education System) ही था जो सबके लिए बराबर था, जहां से बैक वक़्त आलिम, अर्थशास्त्री , डॉक्टर, फिलोस्फर, हुक्मरान और इंजीनियर निकलते थे,

शेख अहमद सिरहिंदी हों या जहांगीर हो या उस्ताद अहमद लाहौरी हो, ये सब मुख्तलिफ घारानो से ताल्लुक रखने के बावजूद एक ही निज़ाम ए तालीम में परवान चढ़े, इसी लिए इन सब की सोच इंसानी फायदे के लिए थी,

आगे भी मैं मगरिबी मुसन्निफीन (Western Scholer & Researchers) की गवाही पेश करूंगा इसलिए के मेरे उन " अज़ीम" साहबान ए इल्म को किसी मुसलमान या लोकल स्कॉलर की गवाही से भी बू आती है,

Will Durand मगरिबी दुनिया के मशहूर तरीन स्कॉलर और फिलोस्फर हैं , वह अपनी किताब Story Of Civilization में मुगल हिन्दुस्तान के बारे में लिखते हैं

" हर गांव में एक स्कूल मास्टर होता था जिसे हुकूमत तनख्वाह देती थी, अग्रेजों के आने से पहले सिर्फ बंगाल में 80 हज़ार स्कूल थे , हर 400 बच्चों पर एक स्कूल होता था , उन स्कूल में 6 विषय (Subject) पढ़ाएं जाते थे , ग्रामर (Grammer) , अर्ट एंड क्राफ्ट (Art & Craft), तिब (Medical Science) ,फलसफा (Philosophy) , मंतक (Logic), और मजहबी तालीम ( Religious Education) "

उसने अपनी एक और किताब (A Case for India) में लिखा है

" मुगलों के ज़माने में सिर्फ मद्रास के इलाके में एक लाख 25 हज़ार ऐसे स्कूल थे जहां तिब्ब इल्म (Medical Science) पढ़ाया जाता और टिब्बी सहूलियत मयस्सर थी "

Major M.D Basu ने ब्रिटिश राज और उससे पहले के हिन्दुस्तान पर बहुत सी किताबें लिखी और Max Mueller के हवाले से लिखता है

" बंगाल में अंग्रेजो के आने से पहले वहां 80 हज़ार स्कूल थे "

औरगज़ेब आलमगीर के ज़माने में एक गोरा हिन्दुस्तान आया जिसका नाम Alexander Hamilton था , उसने लिखा के सिर्फ थट्टा शाहर में उलूम वा फन्न ( Art & Culture) सिखाने के 400 कॉलेज थे,

Major M.D Basu ने तो यहां तक लिखा है के

" हिन्दुस्तान के आम आदमी की तालीम यानी फलसफा, मंतक, और साइंस का इल्म एंगलिस्तान के रईसों हत्ता के बादशाह और मलिका से भी ज़्यादा होता था "
James Grant की रिपोर्ट याद रखे जाने के काबिल है, इसने लिखा
" तालीमी इदारो के नाम जायदादें वकफ़ करने का रिवाज दुनिया भर में सबसे पहले मुसलमानों ने शुरू किया "

1857 में जब अंग्रेज हिन्दुस्तान पर मुकम्मल काबिज हुए तो उस वक़्त सिर्फ रूहेलखंड के छोटे से ज़िले में 5000 उस्ताद सरकारी खज़ाने से तनख्वाह लेते थे , ये तमाम इलाके दिल्ली या आगरा जैसे बड़े शहरों से दूर इलाकों में थे,
अंग्रेज़ और हिन्दू स्कॉलर इस बात पर राज़ी है के तालीम का उरूज़ आलमगीर के ज़माने में अपनी इंतेहा को पहुंचा,

आलमगीर ने ही पहली बार तमाम धर्म के मुकद्दस मजहबी जगहों के साथ जाएदादें वकफ़ की, सरकार की तरफ से वहां काम करने वालों के लिए वजीफे (Scholership) मुकर्रर किए,
उस दौर के तीन हिन्दू स्कॉलर Sajjan Rai Khetri, Bheem Sen , Ishwar Das बहुत मशहूर हैं

सज्जन राय खेत्री ने ' खुलासा अल तवारीख" , भीम सेन ने "नुस्खा दिल्कुशा " और ईश्वर दास ने "फुतुहात आलमगीर" लिखी है,
ये तीनों हिन्दू स्कॉलर मानते हैं के आलमगीर ने पहली बार हिन्दुस्तान में तिब्ब की तालीम (Knowledge Of Medical Science) पर एक मुकम्मल निसाब (Syllabus) बनवाया और तिब्ब अकबर, मफरह उल कुलूब, तारीफ उल अमराज , मुजरबात अकबर, और तिब्ब ए नबावी जैसी किताबें तरतीब दे कर कॉलेजों में लगवाई ताकि हाई लेवल पर मेडिकल की तालीम दी जाए

ये तमाम किताबें आज के दौर में निसाब के बराबर है,
औरंगज़ेब के कई सौ साल पहले फिरोज शाह ने दिल्ली में अस्पताल कायम किए जिसे दारुल शिफा कहा जाता था,
आलमगीर ने है कॉलेज में पढ़ाने के लिए निसाबी क़ुतुब तिब्ब ए फिरोज शाही मुरत्तब करवाई, उसके दौर में सिर्फ दिल्ली में सौ से ज़्यादा अस्पताल थे,

तारिख से ऐसे हजारों गवाहियां पेश की जा सकती हैं, हो सके तो लाहौर के अनारकली मकबरा में मौजूद जिला की मर्दम शुमारी (Human Population Index) रिपोर्ट का मुलाहिजा फरमाएं, आपको हर जिला में शारह खानदानी (Literacy Rate) 80% ज़्यादा मिलेगी जो अपने वक़्त में ग्लोबल (Global) सतह पर सबसे ज़्यादा थी,
लेकिन जब अंग्रेज़ ये मुल्क छोड़ कर गया तो सिर्फ 10% थी

बंगाल 1757 में 7 या और अगले 34 बरसों में सभी स्कूल वा कॉलेज खंडर बना दिए गए,
Edmond Brook ये बात साफ तौर कर कहीं थी के

" ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगातार दौलत लूटी जिस वजह से हिन्दुस्तान बदकिस्मती की गहराई में जा गिरा "
फिर इस मुल्क को तबाह करने के लिए Lord Carnivals ने 1781 में पहला दीनी मदरसा खोला,
उससे पहले दीनी और दुनियावी तालीम की कोई तकसीम नहीं थी, एक ही मदरसे में क़ुरआन भी पढ़ाया जाता था, फलसफा भी और साइंस भी, ये तारीख की गवाहियां हैं,

लेकिन प्रोपगंडा और प्रोग्राम बनाने वाले झूट का कारोबार करना चाहे तो उन्हें ये बातिल और मरऊब निज़ाम नहीं रोकता,
मुझे दिल्ली जाने का मौका मिला है और तामीरात का मुशाहिदा किया है, आप यकीन कीजिए के उन ईमारात के शहर से निकलना एक मुश्किल काम होता है और फख्र और हैरानी होती है के उस दौर में मशीन का वजूद ना होने के बावजूद ऐसे शाहकार तामीर करना नामुमकिन लगता है,

लाहौर में मुगलिया तामीर कला पर कभी नजर डालिए, आपको इंजीनियरिंग के कारनामों पर हैरत रह जाएगी क्यूंकि जब यूरोप जब यूनिवर्सिटी बना रहा था तो यहां तामीरात आम हो चुकी थी,

लेकिन ये मौजूदा ज़ालिम निज़ाम जहां हमें अपने इआनत के लिए अपना क्लर्क बनाता है वहां हमारी अज़ीम तारीख को भी फरामोश करता है,
तहरीर का खात्मा करने के लिए बहुत कुछ है लेकिन एक सुनहरी कौल से खात्मा करूंगा,
" आज मुसलमानों कि सबसे बड़ी कमजोरी ये है के उन्हें मीडिया का प्रोपगंडा बहा के ले गया "
साभार: डॉक्टर युनूस एजाज
तर्जुमा : Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com

Wednesday, August 19, 2020

NEEM HAKEEM BAWAAL E JAAN





" नीम हकीम बवाल ए जान"

लिबरल मुसलमानों ने अरबी और उर्दू वा फारसी नाम को उतनी इज्ज़त नहीं दी जितना उनको देनी चाहिए थी,

यहीं वजह है की हमारे समाज में किसी स्कूल या हॉस्पिटल के नाम के साथ किसी मुसलमान शक्सियत या दीन या इस्लामिक या मदरसा नाम लिख जाए जाए तो उन लिबरल मुसलमान के नजर में वो बहुत हकीर होता है,

गोया उनके नजर में मुसलमानों के शिक्षा के संस्थान या अस्पताल उनको खैराती ,चंदा और जकात पर पलने वाले होते हैं इसलिए उन लिबरल मुसलमानों की नजर में उनकी कोई हैसियत नहीं होती है,

लेकिन जब हम तारिख को देखते हैं तो हमें पता चलता है कि ऐसे इस्लामिक स्कूल (मदरसा) से बड़ी बड़ी सखसियत निकली जिन्होंने मॉर्डन ज़माने में भी नाम कमाया,

मिसाल के तौर पर अली इब्न सिना का नाम आपने नहीं सुना होगा ये अपने दौर के एक बहुत बड़े हकीम थे,

हा सही कहा मैंने हकीम ! आज के हमारे लिबरल और चलंदू मुसलमान हकीम शब्द का मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं

" नीम हकीम बवाल ए जान"

अली इब्न सिना उसकी मदरसे की तालीम का हिस्सा थे ये मुस्लिम निज़ाम ए तालीम (Education System) ही था जो सबके लिए बराबर था, जहां से बैक वक़्त आलिम, अर्थशास्त्री , डॉक्टर, फिलोस्फर, हुक्मरान और इंजीनियर निकलते थे,

लेकिन जब हम इसी हकीम का नाम लैटिन या इंग्लिश में लेते हैं यानी Avicenna तो ये लोग दांत चीयार देते हैं,

Avicenna को दुनिया भर में मेडिकल साइंस का ज्ञान रखें वाले फादर आफ मॉडर्न मेडीसिन (Father Of Modern Medicine) कहते हैं और बिना इनकी किताब पढ़े MBBS लगभग नामुमकिन है,

यही मदरसे में पढ़े हैं और मदरसे को इंग्लिश में स्कूल कहते हैं बस सिर्फ भाषा का फर्क है, अगर इनसे अरबी की वजह इंग्लिश में तर्जुमा करके बताया जाए तो उसपर झट से ईमान ले आते हैं,

Avicenna की लिखी एक किताब अल कानून के बारे में बताया जाए कि उसने फलां जड़ी बूटी के बारे में लिखा गया है तो उन्हें हसी और मज़ाक लगेगा, लेकिन जब हम उस किताब का इंग्लिश में तर्जुमा करते जो अंग्रेज़ो ने "Cannon Of Medicine" के नाम से किया है,

फिर उन लिबरल मुसलमानों के लिए सिर्फ दांत चियारने के इलावा और कुछ नहीं रहता, हकीकत यही है लिबरल मुसलमानों ने अपनी दीनी शख्सियत की इज्जत ही नहीं की और गैरो ने उन्हें अपना लिया,

ये तो सिर्फ एक नाम है ऐसे सैकड़ों नाम है जिन्हे सिर्फ अरबी या उर्दू नाम होने की वजह से मुसलमानों ने नकार दिया और इसाई वा यहूदी ने उन नामों को इंग्लिश और लैटिन में बदल कर उनका नाम रोशन किया,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com
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