Thursday, September 24, 2020

SACCHE HOTE HAIN BACCHE




सच्चे होते हैं बच्चे !

ये एक शामी बच्ची है, फोटोग्राफर उसकी मुश्किल हालात की तस्वीर लेने उसके करीब हुआ उस नन्ही शामी बच्ची ने हाथ में लिया हुआ रोटी का टुकड़ा उसे पकड़ाने की कोशिश की, वह समझ रही थी दुनिया में मारे इस फोटोग्राफर को भी मेरी तरह वही भूख़ सता रही होगी जो एक अरसे से उनके खैमों को गिरफ्त में ले चुकी है,

शाम के अलवी नुसैरी कातिलों ने जिस अंदाज़ से 80 फीसद आबादी का क़त्ल ए आम किया है एक खुंचुका दास्तान है

सच्चे होते हैं बच्चे !!

तर्जुमा : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com

Wednesday, September 23, 2020

TALAQ DENE KA HAQ MARDON KO HI KYON HAI AUR MUNKAR E HADITH KE SHOSHE (PART 5)




तलाक देने का हक मर्दों को ही क्यों है और मुनकर ए हदीस के शोशे - (किस्त 5)

शरीयत इस्लामिया में तलाक एक बुरी चीज है इसीलिए अल्लाह ने मियां बीवी के इख्तेलाफात की सूरत में मियां बीवी को एक हुक्म तज्वीज़ करने का हुक्म दिया है कि वह इमकानी हद तक उनके इख्तेलाफ़ात दूर कर दे , और उन में सुलाह करा दें, अगर इख्तेलाफात दूर ना हो सके तो आखरी हक तलाक मर्द को दिया गया है ,लेकिन मुनकर साहब फरमाते हैं कि

"लेकिन अगर सालसी बोर्ड (सुलह कराने वाली संस्था) की कोशिशें नाकाम रही और वह इस नतीजे पर पहुंचे कि उनकी बाहिमी रिफाकत मुमकिन नहीं, तो वह अपनी रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करेंगे (और अगर उन्ही को आखरी फैसला का इख्तियार होगा तो खुद ही फैसला कर देंगे) इस तरह मुवाहेदा (निकाह) खतम हो जाएगा"

जवाब:

देखा आपने के इस मफ़क्किर ए क़ुरआन ने बिना दलील मर्द से हक तलाक़ को छीन कर अदालत को सौंप दिया है, या फिर दूसरी सूरत यह बतलाइए है कि इस हक तलाक में मियां बीवी दोनों बराबर के हकदार हैं,

अब देखिए इन दोनों बातों की तरदीद के लिए कुरान की आयत काफी है , अल्लाह का इरशाद है

فَاِنۡ طَلَّقَہَا فَلَا تَحِلُّ لَہٗ مِنۡۢ بَعۡدُ حَتّٰی تَنۡکِحَ زَوۡجًا غَیۡرَہٗ

"अगर वह (शौहर) उस (औरत को तीसरी) तलाक दे दे तो उसके बाद जब तक औरत किसी दूसरे शख्स से निकाह ना करें उस पहले (शौहर) पर हलाल ना होगी" (क़ुरआन अल बकरा आयात 230)

देखिए इस आयत में طَلَّقَہَا वाहिद मुज़कर गायब का सेगा इस्तेमाल हुआ है, लिहाजा तलाक देने वाली अथॉरिटी ना अदालत हो सकती है ना समाज और ना ही बीवी को इस मामले में शरीक बनाया जा सकता है,

यह अदालत का शोशा इसलिए छोड़ा गया है कि इस्लाम में औरतों को भी खुला का हक दिया है, लेकिन यह चूंकि अदालत के जरिए ही हो सकता है ,

लिहाज़ा मर्द औरत के हुकूक में बराबरी का हक पैदा करने की खातिर अदालत को इस में ला घुसेड़ा गया है, या फिर मर्द औरत में बराबर का हिस्सेदार क़रार देने से इस बराबरी की कोशिश की जा रही है

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Tuesday, September 22, 2020

MARDON KA AURAT KO SAZA DENE KA IKHTIYAR AUR MUNKAR E HADITH KI JIHAALAT (PART 4)

मर्दों का औरतों को सज़ा देने का इख्तियार और मुंकरे हदीस की हठधर्मिता (किस्त 4)
अब इस आयत के तीसरे टुकड़े पर आते हैं
وَ الّٰتِیۡ تَخَافُوۡنَ نُشُوۡزَہُنَّ فَعِظُوۡہُنَّ وَ اہۡجُرُوۡہُنَّ فِی الۡمَضَاجِعِ وَ اضۡرِبُوۡہُنَّ ۚ فَاِنۡ اَطَعۡنَکُمۡ فَلَا تَبۡغُوۡا عَلَیۡہِنَّ سَبِیۡلًا
"और जिन औरतों से तुम्हें सरकशी का डर हो उन्हें समझाओ, सोने की जगहों में उनसे अलग रहो और मारो, फिर अगर वे तुम्हारी बात मानने लगें तो बिला वजह उन पर हाथ चलाने के बहाने तलाश न करो " ( क़ुरआन अल निशा आयात 34)
अब इस हिस्सा आयत की तफसीर में मुनकर साहब ने जो पॉइंट पेश फरमाए आए हैं वह ये है :
1- बात मियां बीवी की नहीं हो रही है बल्कि समाज के आम मर्दों और औरतों की हो रही है यानी समाज के मर्द समाज की औरतों को रिज्क मुहैया करें ,
2- उसके बाद भी अगर औरतें अपने खुसूसी फरायेज से बिना परेशानी सरकशी अख्तियार करें, जैसा कि आजकल बाज़ मगरिबी मुल्कों में हो रहा है कि औरतों ने मर्द बनने की चाहत में बिला मकसद अपना फरायेज़ को छोड़ दिया जिससे नस्ल ए इंसानी का सिलसिला ही रुक जाता है, तो समाज ऐसा इंतजाम करके उनको समझाएं ,
3- अगर औरतें समझाने पर बाज़ ना आए तो फिर उन्हें उनके ख्वाबगाह में छोड़ दिया जाए, यह एक किस्म की नजरबंदी की सजा होगी ,
4- और अगर औरतें इस पर भी बाज़ ना आए तो फिर उन्हें अदालत की तरफ से बदनी सजा भी दी जा सकती है,
जवाब
देखा आपने एक आयत के चंद इकट्ठे और मजबूत अल्फाज को अपने मन से कभी तो समाज की तरफ मोड़ दी जा रही है, तो कभी अदालत की तरफ,
1- यहां सवाल ये पैदा होता है कि
فَعِظُوۡہُنَّ
की तशरीह आखिर समाज कि तरफ क्यूं है ?? अदालत की तरफ क्यूं नहीं ?? और
وَ اضۡرِبُوۡہُنَّ
की तशरीह समाज को छोड़ अदालत की तरफ क्यूं चली गई ??
2- अगर समाज के आम मर्द समाज कि आम औरतों को रिज्क मुहैय्या करने लगें तो इससे ज़्यादा बेहयाई की और क्या सूरत हो सकती है जबकि उस हसूल ए रिज्क का मकसद भी बकौल मुंकर साहब ने औरतों कि अंदरूनी सलाहियतें को नशों नुमा बना देना है,
3- فَعِظُوۡہُنَّ
"के तहत अब समाज पर एक और ज़िमेदारी ये भी आ पड़ी है के वह ऐसी सरकश औरतों को समझाया करे जो मर्द बनने की चाहत में अपने अहम फराएंज छोड़ देती है क्यूंकि उससे नसल ए इंसानी रुक जाती है,"
लेकिन मूंकरे साहब की ये बात भी अक्ल और मुशाहिदे के खिलाफ है, यूरोप की औरतें ,मर्द इस लिहाज से बनती हैं कि वह मर्दों में अज़ादाना इख्तेलात रखती है, लेकिन जहां तक उनके फाराएंज मनसबी पूरा करने का ताल्लुक है तो वह निकाह भी ज़्यादा करती है, ला तादाद हरामी बच्चे भी पैदा होते हैं, ऐसे हरामजादे बच्चे प्राइवेट या सरकारी तहवील में परवरिश भी पाते रहते हैं, नसल ए इंसानी भी बदस्तूर चलती रहती है, और रुकती भी नहीं , तो फिर इस मंतक का क्या फायदा ??
4- औरतों को उनकी ख्वाबगाह में छोड़ने का मतलब " नजरबंदी " भी क्या खूब मज़ाक है,
मगर सवाल ये है के ये नजरबंदी करेगा कौन ?? समाज या हुकूमत ?? क्यूंकि यहां मियां बीवी का तो लफ्ज़ ही नहीं है,
अपने बयान कि खुद तरदीद!!
ताज्जुब की बात ये हैं के खुद मुनकर साहब ने मफ़हूम उल क़ुरआन में وَ اہۡجُرُوۡہُنَّ فِی الۡمَضَاجِعِ
का मतलब ये लिखा है,
"तो अगला कदम ये होना चाहिए के उनके शौहर उनसे अलहेदगी इख्तियार कर लें और इस नफसियाती असर से उनमें ज़हनी तब्दीली पैदा करने की कोशिश करें " (मफ़हूम उल क़ुरआन जिल्द 1 पेज 179)
गोया मफ़हूम उल क़ुरआन कि इस वज़ाहत ने आपके सब किए कराए पर पानी फेर दिया,
जब ये साबित हो गया के यहां बात बीवी और शौहर की है तो मालूम हुआ के,
1- शौहर ही अपनी बीवी को रिज्क देने के ज़िम्मेदार हैं, ना की आम समाज के आम मर्द समाज कि आम औरतों को,
2- قٰنِتٰتٌ
से मुराद बीवीयो का शौहरों के लिए फरमाबरदार होना है,
3- نُشُوۡزَ
का मतलब शौहर की हुकम उदूली और शरकशी है, ना की औरत के अपने जिंसी फराइयेज से सरकशी,
4- فَعِظُوۡہُنَّ وَ اہۡجُرُوۡہُنَّ , وَ اضۡرِبُوۡہُنَّ ۚ
में जमा मुज़ककर सब तशरीह शौहरों की तरफ मुड़ती हैं, यानी सरकशी की सूरत में वही उन्हें नसीहत करें, फिर उनसे हमबिस्तर होना छोड़ दें, फिर भी अगर बाज़ ना आए तो मार भी सकते हैं,
5-وَ اہۡجُرُوۡہُنَّ فِی الۡمَضَاجِعِ
का मतलब शौहरों का औरतों से हमबिस्तर ना होना है, ना की समाज या हुकूमत का उन्हें नजरबंद करना,
6- रिवायत वा अहले सुन्नत तफसीर में जो कुछ दर्ज है वह सब ठीक है,
साभार : Umair Salafi Al Hindi

Monday, September 21, 2020

AURAT KI FARMABARDARI AUR MUNKIREEN E HADITH KE WASWASE (PART 3)





औरत की फर्माबारदारी और मूंकीरीन ए हदीस की वस्वसे ( किस्त 3)

अब इस आयत के दूसरे हिस्से की तरफ आते हैं

فَالصّٰلِحٰتُ قٰنِتٰتٌ حٰفِظٰتٌ لِّلۡغَیۡبِ بِمَا حَفِظَ اللّٰہُ ؕ

" जो नेक बीवियां है तो वह मर्दों कि फर्माबरदार हैं और मर्दों कि गैरमौजूदगी में अल्लाह की हिफाज़त में अपने माल वा आबरू की हिफाज़त करती हैं " (क़ुरआन अल निसा आयात 34)

इस टुकड़े पर मुनकर ए हदीस के प्वाइंट मुलाहिजा फरमाइए
فَالصّٰلِحٰتُ
1- मर्दों के मालों से औरत की जरूरत ए ज़िन्दगी पूरी होगी और उनकी सलाहियतें नशो नुमा (उभर) पाएंगी,

قٰنِتٰتٌ

2- वो अपनी सलाहियत को ज़रूरत में लाएं जिसके लिए वह खास सलाहियत पैदा की गई है

حٰفِظٰتٌ لِّلۡغَیۡبِ بِمَا حَفِظَ اللّٰہُ

3- यानी जब अल्लाह के कानून ने इस तरह औरतों की हिफाज़त ( परवरिश) का सामान पहुंचा दिया के वह उस चीज की हिफाज़त कर सकें जो पोशीदा तौर पर उनको सौंपी गई है, ( यानी भ्रूढ़ की हिफाज़त)

तो ये है वो तफसीर और तर्जुमा जो मुनकर ए हदीस ने किया है ये आपको किसी भी अहले सुन्नत की किताब में नहीं मिलेगा चाहे वो उर्दू में हो या अरबी में , नाही ये किसी रिवायत में मिल सकता है,

इस हद तक मुनकर साहब की ये बात यकीनन दुरुस्त है, अब सवाल ये रह जाता है कि क्या उनकी ये तशरीह भी सही है या नहीं ??

तो समझ लीजिए तशरीह भी यकीनन गलत है, और उसकी वजह ये हैं,

1- प्वाइंट नंबर एक में ज़रूरियात ए ज़िन्दगी के पूरे होने से जो सलाहियतों के नशोनुमा पाने को लाज़िम क़रार दिया गया है, ये उसूल गलत है और अक्ल के भी खिलाफ
فَالصّٰلِحٰتُ

औरतों की एक मुस्तकल और अलग सिफत है जिसका ज़रूरियात ए ज़िन्दगी के पूरा होने और ना होने से कोई ताल्लुक नहीं है, ऐसी औरत भी सालेह हो सकती है जिसकी ज़रूरियात भी पूरी नहीं हो रहीं हो, ऐसी औरत जिसकी ज़रूरियात ए ज़िन्दगी पूरी हो रही हैं वह मुफसिदः भी हो सकती है,

قٰنِتٰتٌ

2- पर बहेस करते हुए मुनकर साहब ने खुद लुगत उल क़ुरआन ने आखिरी नतीजा ये पेश किया है के इब्न उल फारस ने इसके बुनियादी मतलब " इताआत करना " और मुनज्जीद में इसका मतलब ये लिखा है

"इताआत करना कमाल खामोशी के साथ, नमाज़ में खड़ा होना, खुदा ताला के आगे खुसू वा खुजु करना,"

लिहाज़ा मुंकर साहब का ये माना के " अपनी सलाहियत को उभारना " उनका जाती तर्जुमा है जो सिर्फ मौके की मुनासिबत के लिहाज से कर लिया गया है,

3- अल्लाह का मतलब " अल्लाह का कानून" करना भी आपके अक्ल के घोड़े दौड़ाने की तरफ इशारा कर रहा है क्यूं ये माना लूगत (Dictionary) में कहीं नहीं है,

4- भ्रूढ़ के लिए क़ुरआन ने हर मकाम पर हमल का लफ्ज़ इस्तेमाल किया है, फिर आखिर में इस मकाम पर गायब का लफ्ज़ लाने की क्या वजह थी ??

ये तफसीर फरमाने के बाद मुनकरे साहब ने एक और नुक्ता पैदा किया है के है सिफात

فَالصّٰلِحٰتُ قٰنِتٰتٌ حٰفِظٰتٌ

क़ुरआन में सुरा अहजाब आयात 33 में मर्दों और औरतों के लिए एक बराबर बयान फरमाई हैं, तो अगर "कानितात" का मतलब औरतों को मर्दों का फर्माबारदार लिया जाए तो क्या फिर " कानितीन " का मतलब ये होंगे के मर्द भी औरतों कि फर्माबार्दारी करें ??

जवाब:

अब देखिए इस मकाम पर मुंकारे साहब ने वो आयात नकल नहीं फरमाई , और इस मकाम पर " कानीतीन" और " कानीतात " यानी मर्दों और औरतों का मुती वा फर्माबार्दार होने का ताल्लुक अल्लाह ताला से है, लेकिन यहां पहले मर्दों का ज़िक्र चल रहा है, लिहाज़ा इस मकाम पर कानीतात का मतलब मर्दों कि फरमाबरदार बीवियां ही हो सकता है,

यहां अगर इस मकाम पर कानीतीन के लफ्ज़ भी मौजूद होते तो मुनकर साहब का मकसद पूरा हो सकता था !!

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com

Sunday, September 20, 2020

MARD KI AURAT PAR HAKIMIYAT AUR MUNKIREEN E HADITH KE WASWASE (PART 2)




मर्द की औरत पर हाकीमियत और मुनकिरीन ए हदीस के वसवसे (किस्त 2)

क़ुरआन में है

اَلرِّجَالُ قَوّٰمُوۡنَ عَلَی النِّسَآءِ بِمَا فَضَّلَ اللّٰہُ بَعۡضَہُمۡ عَلٰی بَعۡضٍ وَّ بِمَاۤ اَنۡفَقُوۡا مِنۡ اَمۡوَالِہِمۡ ؕ فَالصّٰلِحٰتُ قٰنِتٰتٌ حٰفِظٰتٌ لِّلۡغَیۡبِ بِمَا حَفِظَ اللّٰہُ ؕ وَ الّٰتِیۡ تَخَافُوۡنَ نُشُوۡزَہُنَّ فَعِظُوۡہُنَّ وَ اہۡجُرُوۡہُنَّ فِی الۡمَضَاجِعِ وَ اضۡرِبُوۡہُنَّ ۚ فَاِنۡ اَطَعۡنَکُمۡ فَلَا تَبۡغُوۡا عَلَیۡہِنَّ سَبِیۡلًا

" मर्द औरतों पर हाकिम है इसलिए के अल्लाह ताला ने कुछ को कुछ पर फजीलत दी है और इसलिए भी कि वह अपने माल से (बीवी बच्चों पर) खर्च करते हैं, पस नेक औरतें वह है जो फरमाबरदार हैं और मर्द की गैरमौजूदगी में अल्लाह की हिफाजत में माल वा आबरू की हिफाजत करती हैं, और जिन औरतों से तुम्हें नाफरमानी का डर है तो उन्हें समझाओ उन्हें बिस्तर से अलग कर दो और उन्हें मारो फिर अगर वफा बरदार बन जाए तो उनको तकलीफ देने का कोई बहाना ना ढूंढो"

इस आयत में अल्लाह ताला ने मर्दों के हाकिम होने की इन पहलुओं पर रोशनी डाली है,

1- मर्द के औरत पर कव्वाम या हाकिम होने की दो वजह फरमाई है गईं है, एक यह के मर्दों को औरतों पर (जिस्म वा कुव्वत) फजीलत हासिल है ,और दूसरे इसलिए के बीवी बच्चों पर खर्च की जिम्मेदारी मर्दों के जिममें डाली गई है

2- नेक औरतों की भी दो खूबी बयान की गई है ,एक यह कि वह मर्दों की फरमाबरदार होती हैं दूसरे मर्द की गैरमौजूदगी में अपनी अस्मत की हिफाजत करती हैं ,

3- और नाफरमान औरतों के लिए तीन इकदामात बतलाए गए हैं यानी पहले उन्हें जबानी समझाएं ,अगर बाज ना आए तो उनसे अलग हो जाएं जानी बिस्तर अलग कर ले , अगर फिर भी बाज ना आए तो उनको मारकर दुरुस्त करें फिर अगर वह बाज़ आ जाएं तो सब बातें छोड़ दें और उन्हें तकलीफ ना दें,

इस पूरी आयात में मर्दों कि औरतों पर हाकिमियत का ज़िक्र है और इस आयत का हर एक हिस्सा दूसरे की भरपूर ताएद करता है, अब ये बातें इस मफ़हूम में मुनकर ए हदीस को कैसे गवारा हो सकती है ??

लिहाज़ा इस आयत की तशरीह से अलग मुनकरों ने दर्ज ज़ेल प्वाइंट पेश करके दिल का घुबार हल्का किया है,

1- ये तर्जुमा बिल्कुल गलत है,
2- अरबी की तफसीर भी गलत है, क्यूंकि वह रिवायत की ताएद में लिखी गई थी,
3- और रिवायत भी सब गलत हैं , (अगर ये सही होती तो रसूल अल्लाह को चाहिए था के एक मस्तनद नुस्खा उम्मत के हवाले कर जाते, जैसा के क़ुरआन हवाले कर गए थे,)

लिहाज़ा इस आयत का मफ़हूम या तर्जुमा या तफसीर चाहे किसी भी ज़ुबान में हो, और ये रिवायत जो पेश करती हैं सब कुछ गलत है,

इस तरदीद के बाद मुनकर ए हदीस ने जो सही मफ़हूम पेश फरमाया उसके प्वाइंट ये हैं,

1- इस आयत में बात मियां बीवी की नहीं , बल्कि समाजी आम मर्दों और आम औरतों कि हो रही है,

اَلرِّجَالُ عَلَی النِّسَآءِ

2- के माने मर्द ने औरत को रोज़ी मुहय्या की , और ये मर्द की ज़िम्मेदारी है, इसमें फजीलत की कोई बात नहीं,

"فَضَّلَ اللّٰہُ بَعۡضَہُمۡ عَلٰی بَعۡضٍ"

3- के माने एक कि दूसरे पर फजीलत है, मर्द की औरत पर और औरत की मर्द पर, मर्द अपने दायरे कार के लिहाज से अफजल और औरत अपने दायरे कार से अफ़ज़ल है,

इस तरह के प्वाइंट से मुनकर ए हदीस अपने चेलों को खुश कर देते हैं,

तजज़िया :

1- अगर सब तरजुमे, तफसीर और रिवायत गलत है तो आपकी इस तशरीह की सेहत की क्या दलील है ??

2- लुग्वी लिहाज़ से भी क़व्वाम का माना रिज्क मुहैया करने वाला नहीं बल्कि कायम रहने या रखने वाला है, अल्लाह का इरशाद है,

وۡنُوۡا قَوّٰمِیۡنَ بِالۡقِسۡطِ
" हमेशा इंसाफ पर कायम रहो "

3- और कौन किस पर अफजल है इस बात का जवाब इसी आयत में हैं

اَلرِّجَالُ قَوّٰمُوۡنَ عَلَی النِّسَآءِ

के साथ ही
بِمَا

आया है जो एक तो इस वजह को बयान कर रहा है और दूसरे ये वज़ाहत कर रहा है के ये फजीलत मर्दों को हासिल है और औरतों पर हासिल है,

4- फजीलत की दूसरी वजह अल्लाह ताला ने ये बताई है कि मर्द औरत की जरिया ए मूआस का वसीला है,

मुनकर ए हदीस ये भी कहते हैं कि अगर ये समझ लिया जाए कि कमाने वालों को खाने वालों पर फजीलत होती है तो अमीर लोग वा मफ़क्किर वा आलिम लोगों पर किसानों को हमेशा फजीलत होनी चाहिए, क्यूंकि ये लोग अनाज पैदा नहीं करते,

गौर फ़रमाया आपने !! अकल परस्ती इंसान को कहां से कहां ले जाती है, किसान अपनी फसल का नकद पैसा वसूल करके अपना अनाज बेच देता है, जब उसने पूरा गल्ला बेच दिया तब काहे की फजीलत रह गई, यही हाल मजदूर का है, लेकिन शौहर खर्च के बदले बीवी से क्या लेता है??

जैसी ज़रूरत मर्द को औरत की है वैसी ही ज़रूरत औरत को मर्द की है, जिंसी ख्वाहिशात मर्द और औरत को दोनों एक जैसी होती है, अब मर्द का औरत पर खर्च करना फजीलत नहीं तो और क्या है ??

और इस फजीलत की असल वजह ये है के औरत अगर्चे मालदार हो और शौहर गरीब हो तब भी खर्च की जिम्मदारियां मर्द ही के जिम्मे रहेंगी, इल्ला ये के औरत अपनी खुशी और रजामंदी से कुछ खर्च करे, और ये उसका एहसान होगा

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Saturday, September 19, 2020

AURAT KI PAIDASH AUR FITNA MUNKIREEN E HADITH (PART 1)





औरत की पैदाइश और मुनकिरीन ए हदीस

औरत की पैदाइश के बारे में कुरआन में लिखा है

یٰۤاَیُّہَا النَّاسُ اتَّقُوۡا رَبَّکُمُ الَّذِیۡ خَلَقَکُمۡ مِّنۡ نَّفۡسٍ وَّاحِدَۃٍ وَّ خَلَقَ مِنۡہَا زَوۡجَہَا
وَ بَثَّ مِنۡہُمَا رِجَالًا کَثِیۡرًا وَّ نِسَآءً ۚ

" ए लोगों ! हमने तुम्हे एक जान से पैदा किया, फिर उससे उसकी बीवी बनाई, फिर उन दोनों से बहुत से मर्द और औरत फैला दिया " (क़ुरआन अल निसा आयात 1)

इस आयात में एक जान से मुराद आदम है, और एक जान से उनकी बीवी हव्वा हैं, फिर उन दोनों के मिलाप से तमाम इंसान पैदा हुए,

लेकिन मुंकर ए हदीस " एक जान" से मुराद वह पहला जरासीम (Germs) मुराद लेते हैं जो समुंदर के किनारे की काई में आज से अरबों साल पहले पैदा हुआ था, और

"خَلَقَ مِنۡہَا زَوۡجَہَا"

से मुराद उस जरासीम का दो टुकड़ों में बट जाना है, फिर उन दोनों टुकड़ों के मिलाप से अल्लाह ने बहुत सी खलकतें फैला दी

इस अक्ल खयाल से मुनकर ए हदीस ने तो साबित कर दिखाया के पैदाइश के लिहाज से मर्द और औरत दोनों की हैसियत एक जैसी है,

मगर हमें अफसोस है के ये तो विज्ञान और अक्ल के भी खिलाफ है, क्यूंकि

1- आज भी जरासीम की पैदाइश का सिलसिला उसी तरह चल रहा है के एक जरासीम के दो टुकड़े हो जाते हैं, फिर उन दोनों मेसे हर एक के दो, और ये सिलसिला आगे लगातार चलता रहता है, उनमें मिलाप होता ही नहीं,

2- क़ुरआन ने लफ्ज़ जौज़ का इस्तेमाल किया है, यानी आगे नसल ए इंसानी तवालुद वा तनासुल (Reproductive Organs) के वास्ते से बड़ी है, लिहाज़ा इन दो टुकड़ों से किसी पर भी एक दूसरे के जौज़ का लफ्ज़ इस्तेमाल नहीं हो सकता,

इन वजूहात की बिना पर मुनकर ए हदीस की बहैसियत पैदाइश मर्द वा औरत की एक जैसी हैसियत साबित करने की दलील दुरुस्त नहीं है,

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com