Tuesday, February 16, 2021

अजीब लोग थे वह तितलियां बनाते थे,

 



अजीब लोग थे वह तितलियां बनाते थे,

समुंदरों के लिए मच्छलिया बनाते थे।

मेरे कबीले में तालीम का रिवाज ना था,
मेरे बुजुर्ग मगर तख्तियां बनाते थे।

वहीं बनाते थे लोहे को तोड़कर ताला
फिर उसके बाद वही चाबियां बनाते थे।

फ़िज़ूल वक्त में वह सारे शीशा गर मिलकर ,
सुहागनों के लिए चूड़ियां बनाते थे।

मेरे गांव में दो चार हिन्दू दर्जी थे,
नमाजियों के लिए टोपियां बनाते थे

Monday, February 15, 2021

TAWEEZ AUR DHAAGA

 



कई साल पहले की बात है, मैं मस्जिद नबवी में हज के मौसम में कब्र रसूल के पास दावती काम पर मामूर था, एक हाजी साहब के बाज़ू पर एक तावीज़ बंधी हुई देखी, बात चीत से पता चला के उनका ताल्लुक मुंबई या उसके आस पास के इलाकों से है, और वो खुद एक मेडिकल डॉक्टर है, उम्र बहुत ज़्यादा नहीं थी बिल्कुल जवान लग रहे थे,

मैंने कहा :-" हाजी साहब ये क्या है ??"

कहने लगे:-" तावीज है किसी बुजुर्ग आलिम ने दिया है, मैंने उन्हें समझाना शुरू किया के ये एक शिर्किया अमल है और शरीयत में मना है,"

मगर अकीदत में वो इस कद्र अंधे हो चुके थे के कोई बात उनके पल्ले नहीं पड़ रही थी मेरी कोई बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे, उनसे काफी दरख्वास्त की के इसे उतार फेंके लेकिन नतीजा सिफर

बिलाखिर मैंने कहा के या तो आप अपनी मर्ज़ी से इसे उतार दें या मुझे ज़बरदस्ती इंतजामिया के हवाले करके इसे उतारने की ज़रूरत पड़ेगी,

जब उन्हें लगा कि मै ज़िद पर हूं तो कुछ नरम पड़े और बिल आखिर उन्होंने वो तावीज उतार दी, फिर मैंने समझाना शुरू किया और कहा के हाजी साहब आपको क्या लगता है इस तावीज में क्या लिखा होगा ??

कहने लगे:-" कोई अच्छी दुआ वगेरह ही होगी ??"

मैंने कहा :-" कई सालों का मेरा तजुरबा ये कहता है के यकीनन इसमें कोई शिर्किया या अक्ल के खिलाफ हराम या मकरूह चीज़ ही लिखी होगी , आप तो इसे कितनी अकीदत से लटकाए हुए हैं लेकिन हो सकता है के ये कोई आपकी आख़िरत बर्बाद करने वाला समान हो,"

कहने लगे:- " मुझे अपने आलिम पर भरोसा है इसमें ऐसा कुछ नहीं होगा "

मैंने कहा:- "चलिए इसे खोलकर ही देखते हैं"

वह पहले तो उसे खोलने के लिए राज़ी ही ना हुए , लेकिन बिलआखिर मान गए , जब उसे खोला गया तो उनके होश उड़ गए ,

जो कुछ लिखा था उसे बताने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी के उनकी आखिरत के लिए वह कितना संगीन था,

मेरी ड्यूटी रात की थी और फजर से कुछ पहले तक जारी रहती थी,

दूसरे दिन वह मुझे ढूंढते हुए मेरे पास आ गए , अब उनके पास सवालात के अंबार थे, मैं इत्मीनान से उन्हें जवाब देता रहा ,

अब उनकी रात की नींद कहीं गायब हो गई थी,जबतक मदीना में रहे अक्सर वा बेशतर पूरी रात मेरे साथ लगे रहे , जिस दिन मदीना से रूखसत हो रहे थे काफी देर तक मुझसे लिपट कर रोते रहे , और कहते रहे के :-" आपने मेरी दुनिया बदल दी, तौहीद की अहमियत और नेमत अब मुझे समझ में आई है, मुझे अब रोशनी मिल गई है "

पता नहीं मेरा ये भाई आज कहां है, अल्लाह से दुआ है जहां कहीं भी हो उन्हें और हमें तौहीद वा सुन्नत पर बाक़ी रखे , और हम सब की वफात ईमान की हालत में हो, और कयामत के दिन हम सबको नबिय्यीन, सिद्दीकीन, शुहादा वा सालिहीन के साथ उठाए...

आमीन

साभार: शेख फारूख अब्दुल्लाह नारायणपुरी
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hind

Sunday, February 14, 2021

"अम्र बिल मारूफ नही अनिल मुंकर् "

 



"अम्र बिल मारूफ नही अनिल मुंकर् "

क़ुरआन में जहां कहीं भी दावत ओ तबलीग़ के लिए लफ्ज़ आएं हैं वहां आपको
"अम्र बिल मारूफ नही अनिल मुंकर् " का हुकम मिलेगा।
अम्र बिल मारूफ से मुराद अच्छे कामों का हुकम, और अनिल मुनकर से मुराद बुराई से रोकना,
ये अल्लाह का ऐसा कानून है जो सब ईमान वाले मर्द और औरत पर वाजिब है के अच्छाई का हुकम दें और बुराई से रोकें,
किसी भी जमात, पार्टी, फिर्का की दावती सरगर्मी को जांचने के लिए इस पैमाने पर फिट होना बहुत ज़रूरी है के वो जमात इस फरीजे को अंजाम दे रहें हैं या नहीं??
हम समाज को देखकर समझ सकते हैं कि आज बुराइयों का बोलबाला है चाहे वो दीनदार पढ़ी लिखी फैमिली हो या अनपढ़ फ़ैमिली सब लोग रस्म में जाहिलियत में डूबे हुए हैं,
निकाह सादगी से मस्जिद मे करके अच्छे काम की दावत दी लेकिन शाम होते ही 200-300 बारातियों के साथ बारात ले जाकर बुराई को फरोग देते हैं, इसी तरह और भी रस्में निभाकर अपने हिन्दू आबा वा अजदाद के होने का सबूत दे देते हैं, क्या यही है असल तबलीग़
बाप गया हुआ है तबलीग़ के लिए दूसरे शहर और यहां बेटा पड़ोस की लड़की भगा लाया,
घर के बगल मे शिर्क हो रहा है और बाप बेटा मस्जिद में दीन और ईमान की बात कर रहें हैं, मुसलमानों होश में आओ तबलीग़ के असल मतलब को समझो,
हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लहु अलैहि वसल्लम ने सिर्फ बुराई से रोकने पर ही मुसीबत उठाई लोगों ने पत्थर फेंके, अबू लहब ने ऊंट कि ओझडी आपके ऊपर डाली, क्यों ??
क्यूंकि आपने उनसे बुराई को छोड़ने को दावत दी,
खैर कोई बात किसी से ढकी छुपी नहीं है कि आज तबलीग़ की क्या हालत है चाहे वो तब्लीग़ी जमात का हाल हो या कोई और जमात का लगभग हर जमात की यही हाल है,
और ये बात भी याद रखिए जब तक ये फरीजा पूरी तरह अंजाम नहीं दिया जाएगा, दीन पर दुनिया भारी पड़ती रहेगी, और हमारा समाज पस्ती की गहराइयों में पहुंच जाएगा,
अल्लाह ताला का फरमान है:
" तुम खैर उम्मत हो जिसे लोगों की इसलाह और रहनुमाई के लिए बरपा लिया गया है, तुम भलाई का हुकम देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो"
(सूरह आल ए इमरान आयत 110)
जबतक हम बुराई से नहीं रुकेंगे या रोकेंगे तब तक तबलीग़ का काम नमुकम्मल ही रहेगा।
अल्लाह से दुआ है के हमें सही तरीके से तबलीग़ की तौफीक़ अता फरमाए...आमीन
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Saturday, February 13, 2021

EK ZIDDI LADKI

 




वह ज़िद्दी लड़की थी और ऐसे ही हार मानने वाली नहीं थी उसे पता चला था के उसके दोस्त को अपने अब्बा जी से डांट पड़ी है, क्यूंकि लॉकडाउन के दौरान उसके घरवालों को उनके ताल्लुक का पता चल गया था, उसने डरते हुए वहीं मानूस सा नंबर डायल किया , आगे से भारी और अजनबी आवाज़ में हैलो कहा गया।

उसने अपनी हिम्मत जमा की और दो टूक बात करने का फैसला किया ,

"सलामुन अलैकुम अंकल ! मुझे आपसे ही बात करनी है,अंकल मैं वहीं लड़की बोल रही हूं जिसके साथ ताल्लुक पर कल आपने अपने बेटे की दुर्गत बनाई है, अंकल वह आपका बेटा है, आपको उसकी पसंद का ख्याल करना चाहिए , अंकल हम एक दूसरे को पसंद करते है और बहुत अच्छी ज़िन्दगी साथ में गुज़ार सकते हैं, अंकल प्लीज़ एक बार अपने फैसले पर गौर करें "

एक ही सांस में उसने सारी बात कह दी , दूसरी तरफ थोड़ी देर खामोशी छाई रही, फिर जवाब आया:

" जी नताशा बेटा ! आप सही कह रही हो, मुझे भी अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, जल्द ही हम आपके घर रिश्ता लेकर आएंगे "

धीमे लेहजे में जवाब आया जिसकी वह बिल्कुल तवाक्को नहीं कर रही थी,

" जी अंकल शुक्रिया ! लेकिन मेरा नाम नताशा नहीं हिना है "

लेकिन मेरे बेटे का ताल्लुक तो नताशा से है, उसने खुद भी यही नाम बताया है, जो चैट पढ़ी थी उसमे भी यही नाम था, और कश्मीर वाली विडियो आपने भेजी हुई थी उसमे भी तो ये बार बार कह रहा था के नताशा बर्फ ना फेंकों, कैमरे में पानी चला जाएगा "

दूसरी तरफ से गहरी खामोशी छा गई,

वह सोच रही थी के वह तो कभी उसके साथ कश्मीर नहीं गई, ऐसी कोई विडियो भी नहीं बनाई,

यही सोचते हुए उसने कॉल काट दी के उस कमबख्त का किसी और से भी ताल्लुक है, और ये रोंग नंबर लड़के के बाप ने उसके दिमाग में डाल दिया,

कॉल कटते ही लड़के के अब्बा जी मुस्कुराए और ये कहते हुए मोबाइल रख दिया के बाप बाप ही होता है,

मेरे बेटे तेरी शादी वहीं लगेगी जहां मैं चाहूंगा, फिर सफाइयां देते रहना के ये नताशा कौन है,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com

Friday, February 12, 2021

क्या बेवा औरत का दिल नहीं होता ??




 क्या बेवा औरत का दिल नहीं होता ??

मैं आपको एक औरत का किस्सा सुनाता हूं और आप पढ़ कर बताएं क्या बेवा को शादी नहीं करनी चाहिए ??
एक औरत ने मुझे बताया के उसकी 4 बेटियां हैं और शौहर की मौत हो चुकी है,
कहने लगी मैं निकाह की ज़रूरत महसूस करती हूं क्यूंकि मैं अकेली बहुत डरती हूं, और फिर घर और बाहर की हर ज़िम्मेदारियां हैं मुझ पर है, जब घर से बाहर निकलती हूं तो लोग अजीब नज़रों से देखते हैं,
मैं चाहती हूं के निकाह कर लूं, ताकि मेरी जिम्मेदारियां भी कम हो जाएं, और लोगों की नज़रों से भी महफूज़ हो जाऊं ,ताकि हर किसी के दिल में ये हो के ये अब बेवा नहीं बल्कि फलां की बीवी है,
कहने लगी मेरी शादी में सबसे ज़्यादा मेरे भाई रुकावट बन रहे हैं, भाई कह रहें हैं अब क्या करोगी शादी करके ?? हम मौजूद हैं तुम्हारा ख्याल रखने को,
मेरा जवाब तो ये है,
सबसे पहली बात ये है के बेवा या तलाक याफ़्ता की शादी का अल्लाह ने हुकम दिया है, अल्लाह से बढ़कर हकीम जात किसकी हो सकती है,
दूसरी बात ये है के कोई भाई किसी बहन का सारी ज़िन्दगी सहारा नहीं बन सकता ,
तीसरी बात: मियां बीवी को अल्लाह ने एक दूसरे का लिबास कहा है,
जिस तरह लिबास पूरी ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी है उसी तरह ये रिश्ता भी इन्सान की पूरी ज़िन्दगी की ज़रूरत है,
मुझे ऐसे भईयों पर ताज्जुब है जो खुद तो चार शादियों की ख्वाहिश रखते हैं, लेकिन बहन से कहते हैं :-" तुम्हे अब शादी की क्या ज़रूरत है "
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Thursday, February 11, 2021

MUSALMANO KE JAAT BIRAADRI KA FITNA

 




मुस्लिम समाज में कुरैशी अपनी लड़की पठान से नहीं ब्याहता, पठान अपनी लड़की कुरैशी से नहीं ब्याहता।


ये दो उदाहरण हैं मात्र लेकिन हालात पूरे मुस्लिम समाज के येही हैं।

अब इस जातिवाद के दुष्परिणाम नहीं जानना चाहेंगे आप?

जो मुस्लिम समाज अपने लड़के-लड़कियों को आपस में नहीं ब्याहता उसी समाज के लड़के-लड़की भंगी/चमार/जाट/कोली इत्यादि... से ब्याह रचा लेते हैं।

दूसरा काला सच इसका ये है कि अपवाद को छोड़कर दूसरे धर्म में ब्याही उन मुस्लिम लड़कियों से वैश्यावृत्ति कराई जाती है।

पाँच ऐसी ही लड़कियाँ जोकि अलग-अलग प्रांत की हैं उनसे मैं खुद मिल चुका हूँ, कारण वोहि बताती हैं लव-मैरिज। भागकर शादी की और अब वैश्यावृत्ति कर के जीवन-यापन कर रही हैं।

शुरुआती माह या अधिक से अधिक एक वर्ष कुशल-मंगल गुजरता है।
उसके बाद हर तरह की यातनाएँ दी जाने लगती हैं क्योंकि अब लड़की का न परिवार है और न वो सक्षम इसलिए हर यातना को सहती है।

लड़का मित्रों से सहवास तो कराता ही है वैश्यावृत्ति भी कराता है उस लड़की से। और ये करना उसकी मजबूरी क्योंकि लड़की स्वीकार लेती है कि उसने ये जीवन स्वेच्छा से चुना है।

इसमें सारा दोष उस लड़की का ही नहीं है, इस मुस्लिम समाज का भी है, उस अना का भी है जो जातिवाद का रुप ले चुकी है जिसकी बलि चढ़ती है लड़की।

Arshad Qureshi भाई के वाल से

वेश्यावर्ती में लिप्त 2 लड़कियों से में भी सुन चुका हूं अन्य धर्म के लड़कों से शादी की और उन्होंने पहले उन्हें प्रताड़ित करना शुरू किया फिर घर से निकाल दिया उन्हें ना लड़की के परिवार ने स्वीकारा और लड़के वाले तो भगा ही चुके थे, एक ने बताया लड़का उस लड़की को लेकर अलग अकेले रहता था, जब लड़के का मन भर गया तो दोस्तों से शारीरिक संबंध बनवाये और वेश्यवर्ती के लिए दबाव डाला, आखिर में लड़की को यह सब करना पड़ा

Ahmed Zidaan भाई का कामेंट्स

बड़े ही अफसोस की बात है, हालांकि इस्लाम में जातिवाद नहीं है लेकिन हम इस्लाम को उतना ही मानते हैं जो मेरे मतलब का हो , अल्लाह हिफाज़त फरमाए हम सबकी

रिपोस्ट 

Wednesday, February 10, 2021

पैसा कयामत के दिन ले लेना

 



एक शख्स अपना एक वाकया बयान करता हुआ कहता है के :-" मैंने एक दिन दुकान से ऑर्डर पर कुछ सामान मंगवाया, जब ड्राइवर सामान घर लेकर के पहुंचा तो मैंने उसका शुक्रिया अदा करते हुए सामान अपने हाथ में लिया और उससे कुछ मज़ाक करना चाहा, चुनंचे मैं बेगैर पैसे अदा किए घर की तरफ बढ़ा और दरवाज़ा खोलकर के अंदर जाने लगा , इतने में ड्राइवर कहने लगा :-" भाई आप पैसा देना भूल गए ??"


मैंने इरादा ए मज़ाक से जवाब दिया :-" पैसा कयामत के दिन ले लेना "

उसने मुझे ऐसा जवाब दिया के मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं, उसने बैगैर किसी तमहीद के कहा :-" भाई ! यकीन मानो आज का हिसाब क़यामत के हिसाब से बहुत आसान है "

ये वाकया बयान करने वाला शख्स खुद कहता है :-" अल्लाह की कसम! मैं कई दिन तक उसकी इस बात को जब भी याद करता मेरा दिल कांपने लगता

इसलिए मेरे भाइयों ! आज दुनिया में अपने हिसाब को चुका देना कल कयामत के दिन अल्लाह के सामने हिसाब देने से बहुत आसान है,

अपना मुहासबा कीजिए
आपने किसी के साथ बुरा किया है ?
किसी के साथ ज़ुल्म किया है ??
किसी को तकलीफ दी है ??
किसी का दिल तोड़ा है ??
किसी का माल नाहक ग़ज़ब किया है ??

यकीन मानो आज दुनिया का हिसाब कयामत के हिसाब से बहुत आसान है ,

अरबी से मनकूल

साभार: Umair Salafi Al Hindi