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Wednesday, January 20, 2021

ATEET KE JHAROKHE SE




 गांधी जी 31 मार्च को दिल्ली आ गए पहला जुमला जो उन्होंने मुझ से कहा वो ये था के तक़सीम अब वाक़ई ख़तरा बन गयी है, वल्लभ भाई और जवाहर लाल नेहरू ने तो शायद हथियार डाल दिए हैं तुम्हारा क्या ख़याल है तुम भी बदल गए हो या मेरा साथ दोगे

मैं ने जवाब दिया - मैं जैसा पहले तक़सीम का मुख़ालिफ़ था अब भी हूँ बल्कि मैं तो कहूँगा के तक़सीम का जितना सख़्त मुख़ालिफ़ मैं अब हूँ इतना पहले कभी नहीं था मगर मैं इस बात से बेहद परेशान हूँ के जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने हार मान ली है या जैसा आपने फ़रमाया हथियार डाल दिया है अब मुझे जो उम्मीद है आपसे है अगर आपने इस्तक्लाल के साथ तक़सीम की मुखालिफत की तो हम अब भी बच सकते हैं लेकिन आप भी दब गए तो मुझे डर है के हिंदुस्तान तबाह हो जाएगा |
गांधी जी ने कहा - अगर कांग्रेस तक़सीम को तस्लीम करेगी तो मेरी लाश को रौंध कर करेगी जब तक मेरे जिस्म में जान है मैं तक़सीम पर कभी राज़ी नहीं होऊंगा और अगर मेरा बस चला तो कांग्रेस को भी राज़ी नहीं होने दूंगा
उसी रोज़ बाद में गांधी जी माउन्ट बेटन से मिले दूसरे दिन उनकी फिर मुलाक़ात हुई, 2 अप्रैल को वो एक बार फिर मिले |
पहली मुलाक़ात से वापसी के फ़ौरन बाद सरदार पटेल गांधी जी के पास आए और दो घंटे से ज़्यादा तखलिए में गुफ्तगू करते रहे मुझे कुछ इल्म नहीं के उन दोनों के बीच क्या बातें हुई
लेकिन मैं जब उसके बाद गांधी जी से मिला तो मुझे अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सदमा पहुंचा मैंने देखा गांधी जी भी बदल गए हैं अभी वो खुल्लम खुल्ला तक़सीम का समर्थन तो नहीं कर रहे थे लेकिन उनकी मुखालिफत में पहली जैसी गर्म जोशी नहीं थी
उससे भी ज़्यादा हैरानी और दुःख मुझ को इस बात से हुआ की अब वो भी वही दलीलें पेश करने लगे थे जो मैं सरदार पटेल की ज़बानी सुन चुका था, तक़रीबन दो घंटे तक मैं उनकी मिन्नत समाजात करता रहा लेकिन कोई असर नहीं हुआ |
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(मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की किताब
"इंडिया विन्स फ्रीडम" से)
~Md Iqbal

Monday, December 7, 2020

KUFR KUFR KHELTE RAHEN

 





कुफ्र , कुफ्र खेलते रहें,

आप यही कर सकते हैं, लेकिन गलती तुम्हारी नहीं है, बदकिस्मती से आप लोग जानते ही नहीं के " बहिस्ती ज़ेवर" और " अरवाह सलासा" जैसी तीसरे दर्जे की मस्लकी किताबें पढ़ने वालों को इल्म वा शाऊर जैसे बड़े मौजूआत पर फतवे नहीं देना चाहिए !! वरना यही होता है के सीरत उन नबी सल्ललाहू अलैहि वसल्लम वसल्लम के आलमी मुकाबले में चोटी की किताब उलेमा वा मुफक्किरीन के दरमियान बेहतरीन मुकाम हासिल करने वाली सीरत की मेयारी किताब " अर रहीक उल मकतूम" खुमार ए जुहद के देसी आस्ताने पर " गैर मेयारी" ठहरती है और गिरते मसलक को बचाने की मुकद्दस मार्केटिंग में आप कुफ्र कुफ्र खेलते हैं,
वैसे आप खुश हो सकते हैं , आपका फतवा कल्चर बदतर मकाम ए बुलंद तक पहुंच गया है जहां आप अपने जाहिल भक्तों पर बसूरत ए फतवा ये पाबंदी लगाने में कामयाब हो चलें हैं के इन बेचारों को कौन कौन सी मुकद्दस मसलकी किताबें पढ़नी चाहिए और उन्हें क्या नहीं पढ़ना चाहिए,
मिल्लत की बदकिस्मती है , अकेले तकलीद का मसलकी जबर क्या कम था के अब फतवा के जरिए आम लोगों के पढ़ने पढ़ाने पर पाबंदी लगाई जा रही है ताके बेचारे तकलीदी पापाईयत और मठाधेसियत की मसलकी दुकान के जाहिल मुहरे बनें रहें , मसलक का बिजनेस वा कारोबार चलता रहे,
सुधार जाओ अभी वक़्त है,

Sunday, November 29, 2020

अाज कुछ लोग अहले हदीस को सऊदी रियाल खोर का ताना देते हैं,

 



अाज कुछ लोग अहले हदीस को सऊदी रियाल खोर का ताना देते हैं,


लेकिन उन्हें मालूम नहीं के अभी एक सदी नहीं गुजरी, अहले हदीस सऊदी अरब को चन्दा जमा करके दिया करते थे, मुश्किल वक़्त में काम आना और नेकी के कामों में तावून करना कोई ऐब वाली बात नहीं, लेकिन रियालखोर कहना छोड़ दें, वरना अल्लाह को जवाब देना बहुत महंगा पड़ेगा

Tuesday, November 24, 2020

तौहीद की कद्र पूछनी है तो उनसे पूछो


 


तौहीद की कद्र पूछनी है तो उनसे पूछो ! जो शिर्क की बस्तियों से निकल कर तौहीद की बुलंदियों पर आए,
काबा के रब की कसम ! तुम ज़िन्दगी के आखिरी लम्हात तक खुदा का शुक्र करते रहो, तो उसके किये हुए इनाम का शुक्र अदा नहीं कर सकते के अल्लाह ने तुम्हे अपनी तौहीद का अलंबरदार बनाया है,
खता कारों ! एक दिन आयेगा के तौहीद वाले को अपनी तौहीद की गैरत आयेगी,
कहेगा अपने फरिश्तों को के जाओ, मुझसे अपने बंदों का जहन्नुम में जलते हुए देखना गवारा नहीं किया जाता, जिन्होंने मेरे साथ कभी शिर्क नहीं किया,
फरिश्ते कहेंगे अल्लाह ये बड़े गुनाहगार थे, इन्होंने बड़े जुर्म किए,
अल्लाह फरमाएगा बड़े बड़े जुर्म किए मगर मेरे साथ शिर्क तो नहीं किया था !!
फरिश्ते कहेंगे अल्लाह ये जलकर खाक हो चुके उनकी हड्डियां कोयला हो गई है, उनके चमड़े जल गए हैं, उनके चेहरे बदल गए हैं, उनके जिस्मों में बाल नहीं रहा !!
अल्लाह इनको जहन्नुम से निकाल कर किया करेंगे !!
अल्लाह पाक फरमाएगा :- मुझे मेरी खुदावंदी कि कसम ! मैं इनको जन्नत की नहरों में गोते दे दे कर इस तरह कर दूंगा जिस तरह माँ के पेट से आज ही फूंलो की तरह पैदा हुए हैं,
इन्होंने मेरे साथ किसी को शरीक नहीं किया और मैंने इनको रुसवा ना करने का फैसला कर रखा है,
आज जितनी बीमारियां हैं हमारे मुल्क की, हमारे अफ़राद की, हमारी कौम की , हमारी मिल्लत की,
इन सारी बीमारियों की असल जड़ शिर्क है,
(अल्लामा एहसान इलाही ज़हीर , कुरआन वा सुन्नत कांफ्रेंस सियालकोट 29 फरवरी 1987)
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Thursday, November 5, 2020

गुमनाम अहले हदीस

 गुमनाम अहले हदीस

काज़ी अब्दुल नबी गंगोही (1583 ईसवी) :शाह वलीउल्ला मुहद्दस देहलवी मरहूम से तकरीबन दो सदी पहले एक अहले हदीस आलिम का ज़िक्र
क़ाज़ी अब्दुल नबी बिन शेख अहमद बिन शेख अब्दुल कुद्दूस गांगोही अरज़ ए हिन्द के नामूर आलिम थे,
इमाम अबू हनीफा की औलाद ए अमजद में से थे, अकबर के ज़माने में सदर उल सुदूर के मनसब पर थे, काज़ी सहाब में शुरुआत में अपने ऐतराफ के उलेमा से इस्तीफादा किया उसके बाद कई बार हिजाज़ ए मुकद्दस का सफर किया और लंबे समय तक मक्का मुकररमा वा मदीना मुनव्वरा में मुकीम रहे, हिजाज़ के कीबार उलेमा से हदीस का इल्म हासिल किया,
काज़ी साहब का आबा वा अजदाद मसलक ए तस्सव्वुफ (सूफी) से वाबस्ता थे
समा और रक्स की महफिलें सजाते थे, वहदत उल वजूद के पुरजोर हामी थे लेकिन काज़ी साहब हदीस की तहसील के बाद मसलक मुहद्दीसीन पर कायम हो गए और अपने बाप दादा के तरीके की मुखालिफत की, उनके बाप ने जवाज़ ए समा में रिसाला लिखा उन्होंने रद में रिसाला लिखा,
मौलाना हकीम अब्दुल हई हुसैनी उनके हालात में लिखते हैं
’’ثم سافر إلی الحرمین الشریفین وسمع الحدیث بھا عن الشیخ شھاب الدین أحمد بن حجر المکي وعن غیرہ من المحدثین، وتردد إلی الحجاز غیر مرۃ، وصحب المشایخ مدۃ طویلۃ حتی رسخ فیہ مذھب المحدثین، فرجع إلی الأھل والوطن وخالفھم في مسألۃ السماع والتواجد ووحدۃ الوجود والأعراس وأکثر رسوم المشایخ الصوفیۃ ونصر السنۃ المحضۃ والطریقۃ السلفیۃ واحتج ببراھین ومقدمات، فخالفہ والدہ وأعمامہ فأوذی في ذات اللّٰہ من المخالفین، وأخیف في نصر السنۃ حتی انھم أخرجوہ من الأھل والوطن‘‘ ( نزہۃ الخواطر ص: ۳۸۰)
" फिर हरमैन शरीफैन का सफर किया और वहां शेख शहाबुद्दीन अहमद बिन हज़र मक्की और दीगर मुहद्दीसीन से हदीस की समा अत की, कई बार हिजाज़ का सफर किया और लंबे अरसे तक वहां के मशैख की सोहबत में रहे यहां तक के मसलक मुहद्दीसीन में मुनसलिक हो गए, फिर अपने घर वा वतन वापस लौटे और मसला समा वा तवाजीद, वहदत उल वजूद, आरास, अक्सर रस्म ओ मसाईख सूफिया के मुखालिफ हो गए, दालायेल वा सबूत के साथ सुन्नत खालिस और तरीका सलाफिया के लिए डट गए, उनके वालिद और चाचा उनके मुखालिफ हो गए, मुखालिफ ने उन्हें अल्लाह की राह में बहुत तकलीफ़ पहुंचाई , नुसरत सुन्नत की वजह से उन्हें बहुत डराया गया यहां तक के उन्हें घर वा वतन से निकाल दिया गया "
( नुजहत उल खवातिर पेज 380)
फिर वक़्त ने पलटा खाया, उनके इल्म की शोहरत जलालुद्दीन अकबर तक पहुंची, 941 हिजरी में बादशाह अकबर ने उन्हें हिन्दुस्तान के सदर उल सुदूर के मनसब पर बिठा दिया, पूरे हिन्दुस्तान की मजहबी कयादत अब उनके पास थी, मुल्क के तमाम उलेमा वा काज़ी उनके मातहत थे, इस मनसब पर जो ताकत वा उरूज़ उन्हें हासिल हुआ वा ना उससे पहले किसी को हासिल हुआ और ना ही उनके बाद किसी को मिला, एक अरसा बाद अकबर के ज़हनी खयालात में इंकलाब ए अज़ीम बरपा हुआ, दीन ए हक से वह फिर गया और उलेमा ए हक से बेज़ार,
उसकी गुमराह फिक्र की राह में काजी साहब सबसे बड़ी रुकावट थे, उसी दौरान के अहम वाकया पेश हुआ, मथुरा के काज़ी अब्दुर्रहीम ने सदर अस सुदूर की खिदमत में ये इस्तेगासा भेजा के मथुरा के मुसलमान एक मस्जिद तामीर करना चाहते थे उसके लिए उन्होने एक जगह का इंतजाम भी कर लिया था और इमारती समान भी वहां रख दिया था के एक सरकश वा बा असर हिन्दू ब्राह्मण ने वह तमाम समान उठा लिया और उस मस्जिद की जगह पर एक मंदिर तामीर शुरू कर दी, मैंने जब बाज़ पुर्स की तो उसने लोगों के सामने रसूल अल्लाह की तौहीन का इरतेकाब किया, इस्लाम और मुसलमानों के लिए सख्त अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किए, मामला संगीन था,
दरबार ए अकबर तक भी ये बात पहुंची ये बात साबित हो गई के इस हिन्दू ने रसूल अल्लाह की तौहीन की थी, उसे जेल में डाल दिया गया , उलेमा के दो गिरोह हो गए, एक ने जुर्माने और मौत से कम की सजा पर रजामंद हुए, काज़ी साहब शरीयत की रू से मौत की सजा देने पर रजामंद थे,
उन्होंने कई बार अकबर से उस मौत कि सजा देने की इजाज़त तलब की, अकबर की हिन्दू रानियां और दरबार कर खुशामदी उलेमा क़ाज़ी साहब के सख्त मुखालिफ थे और हिन्दू ब्राह्मण की रिहाई चाहते थे, अकबर ने साफ लफ़्ज़ों में कतल की इजाज़त नहीं दी मगर हर बार यही कहा के शरई सज़ाओं का फैसला आपसे ताल्लुक रखते हैं और इस तरह वा मामले को टालता रहा, बिला आखिर काजी साहब ने ब्राह्मण के कतल का फैसला सुना दिया, ये सुनकर बादशाह अकबर को सख्त गुस्सा आया, चापलूस उलेमा ने काज़ी साहब के खिलाफ अकबर को खूब भड़काया , ये भी कहा गया के शेख अब्दुल नबी इमाम अबू हनीफा की औलाद में से हैं और इमाम अबू हनीफा का मसलक ये है के इस्लामी हुकूमत के मातहत जिम्मी (गैर मुस्लिम) अगर रसूल अल्लाह मुहम्मद (sws) की तौहीन करे तो उसका ये काम अहद शिकनी और अब्रा ए ज़िम्मा का बा अस नहीं बनता और ये बात फिकाह हनाफी की कुतुब में सराहत के साथ मौजूद है, हैरत है कि काज़ी अब्दुल नबी ने अपने आबा वा अज दाद के मसलक से इन्हेराफ क्यूं किया ??
अकबर के दिल में मज़हबी बेज़ारी के जो जज़्बात परवान चढ़ रहे थे वह एक दम उभर कर सामने आ गए, मूल्ला मुबारक और दीगर दुनिया परस्त उलेमा की तरकीब वा मशवरे से अकबर ने इजतेहाद का दावा किया और अपने इजतेहाद पर ज़बरदस्ती उलेमा से फतवे लिखवा लिया,
काज़ी अब्दुल नबी को भी ज़बरदस्ती पकड़ कर लाया गया और उनसे दस्तखत करवाया गया, भरे दरबार में उनकी बेइज्जती की गई, अकबर ने दीन ए अकबर पैदा कर लिया लेकिन उसे काज़ी सहाब से बार बार मुखालिफत और रोज़ रोज़ की मुखासिमत (विरोध) का सामना था, तंग आकर उसने काजी साहब को मक्का मुकररामा चले जाने का हुकम दिया, उस ज़माने में हुक्मरान बतौर सजा भी मुखालिफ को हरमैन भेजा करते थे,
काजी साहब कुछ अरसा वहां रहे फिर रजब 989हिजरी को बादशाह की इजाज़त के बिना हिन्द से हिजरत कर गए, उनकी वफात का वाकया बहुत अफसोस नाक है,
एक रिवायत के मुताबिक अकबर ने उन्हें मुहासबा वा बाज़ पूर्स के लिए अपने वज़ीर राजा टोडरमल के हवाले कर दिया था जिसने उन्हें जेल में डाल दिया और शदीद तकलीफ पहुंचाई जिनको सहन ना कर सकने की वजह से काज़ी साहब 991 हिजरी मुताबिक (1583ईसवी) में वफात पा गए,
दूसरी रिवायत के मुताबिक अकबर ने उनका मामला अबू फजल के सुपुर्द कर दिया वह पहले से ही उनसे दुश्मनी वा खुन्नस रखता था उसने उनको बंदी बना लिया और जिस्मानी तकलीफ दी और आखिर में गला घोंटकर क़त्ल कर दिया,
(मुंतखब तवारीख 433-435, अल नूरुल साफिर 496-495, तज़किरा उलेमा ए हिन्द पेज 325-327, नजहतुल ख्वातिर पेज 380, बज़्म तैमूरी या पेज 93-94, फ़ुकुहा ए हिन्द 3/629)
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Friday, October 30, 2020

जंग ए आज़ादी 1857 में वहाबियों का हिस्सा

 


जंग ए आज़ादी 1857 में वहाबियों का हिस्सा


ख्वाजा हसन निजामी लिखते हैं

" दौरान ए हंगामा में एक जमात वाहबियान टोंक से अाई और शिकायत की के नवाब ने कुछ माली इमदाद नहीं की, वहाबी और कई मकामात से भी आए थे, बख्त खान खुद भी वहाबी थे, बख्त खान ने सरफराज अली को पेशवाए मुजाहीदीन मुकर्रर किया था, और वही उनकी सरपरस्ती करते थे, बख्त खान के आते ही वहाबियों की कसीर तादाद आकर शामिल हो गई थी, उन वहाबियों ने एक ऐलान छपवा कर शाए करवाया था जिसमें तमाम मुसलमानों को जिहाद के लिए मुसलाह हो कर जिहाद में आने की दावत दी गई थी, और लिखा था के अगर वो नहीं आएंगे तो उनके अयाल वा अतफाल बर्बाद हो जाएंगे, ये ऐलान बहादुर शाह के ऐलान से ज़्यादा फसीह नहीं था, वहाबी मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों मसलन जयपुर, भोपाल, झांसी, हिसार से आए थे, मगर जिन मकामात से वह आए थे तफसीलन ना याद रख सका अलबत्ता मिर्ज़ा मुगल के दफ्तर में तफसील मौजूद थीं "

(बहादुर शाह का मुकद्दमा पेज 263)

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog:Islamicleaks.com

Sunday, September 27, 2020

JUNG E AZAADI ME ULEMA E AHLE HADITH




जंग ए आजादी में उलेमा ए अहले हदीस
اَلَّذِینَ آمَنُوا وَھَاجَرُوا وَجَاھَدُوا فِی سَبِیلِ اللّٰہِ بِاَموَالِھِم وَاَنفُسِھِم اَعظَمُ دَرَجَةً عِندَ اللّٰہِ وَاُولٓئِکَ ھُمُ الفَائِزُونَ

"जो लोग ईमान लाए और हिजरत की और जिहाद किया राह ए खुदा में अपने मालों और जानो के साथ उनके लिए अपने रब के पास बहुत बड़े दर्जे है और ये कामयाब है"
(क़ुरआन अल तौबा )

नबी ए करीम मुहम्मद (sws) ने फ़रमाया:

" सुबह या शाम एक दफा राह ए खुदा में निकलना दुनिया से बेहतर है " ( सही बुखारी)
दुनिया में जब कोई कौम गुलाम हो जाती है तो बद किस्मती से उस कौम के ज़ेहन वा फिक्र की परवाज़ रह जाती है और उसके हर चीज पर गुलामी की मोहर लग जाती है, इसलिए गुलाम कौम के अफ़राद अपने आकाओं की रविश पर चलना उनके तर्ज मुआशिरत को अपनाना और उनकी हर बात की जी हुजूरी करना अपना फारिजा बना लेते हैं और उस पर फख्र करते हैं,
हिन्दुस्तान पर अंग्रेज़ हुकूमत,
हिन्दुस्तान जहां के लोग आराम वा सुकून की ज़िन्दगी बसर कर रहे थे लेकिन अंग्रेज़ ऐसी साजिशी वा शातिर कौम ने उनके लिए चैन वा सुकून की सांस लेना दूभर कर दिया और उनकी ज़िंदगी अजीरन करने के लिए तरह तरह की तदबीर अख्तियार की अंग्रेज़ अपने मकर वा फरेब के जरिए हिन्दुस्तान पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे थे , औरंगज़ेब की वफात के बाद मुल्क की अवाम खुद आपस में लड़ने लगी अंग्रेज़ ने उस इख्तेलाफ वा इतेशार का खूब फायदा उठाया और नवाब सिराजुद्दौला को शिकस्त दे कर पहले बंगाल पर कब्ज़ा किया और कुछ दिनों बाद ही मद्रास वा कलकत्ता पर भी कब्ज़ा कर लिया और हुकूमत करना शुरू कर दिया फिर धीरे धीरे पूरे हिंदुस्तान पर 1865 में कब्ज़ा कर लिया इसलिए हिन्दुस्तानियों को इस काले दिन को देखने पर मजबूर होना पड़ा,
हमारा खून भी शामिल है तजईयुं ए गुलिस्तां में।
हमें भी याद कर लेना चमन में जब बहार आए।
हिन्दुस्तान की तारीख में अहले हदीस का वजूद बहुत ही पुराना है यही वह लोग थे जिन्होंने हर दौर में बातिल के हर रेले के सामने बांध बांधा,
वह बिजली का कड़का था या सूरत हादी।
ज़मीन हिन्द की जिसने सारी हिला दी।
जंग आजादी में उलेमा ए अहले हदीस
हिन्दुस्तान का वह इंकलाबी दौर जो जंग ए आजादी से वाबस्ता है तंग नज़री और तास्सुबात का चस्मा उतारकर खुले दिमाग के साथ तमाम हालात का बारीक बीनी से जाएंजा लिया जाए तो सिर्फ और सिर्फ एक जमात नज़र आएगी जिसने खुलूस और नेक जज्बे के साथ अंदरूनी ताकतों और अंग्रेज़ी ज़ुल्म के खिलाफ आजादी का अलम लहराया और पूरी सरगर्मी से जंग में शरीक रही और बिला शक वा शुबाह वह जमात, जमात अहले हदीस ही नज़र आएगी,
तारीख के सुनहरे पन्ने उलेमा ए अहले हदीस की बे मिसाल कुर्बानियों से भरपूर है, और हिन्दुस्तान की ज़मीन उनके खून से अब तक लाल जार बनी हुई है, उन्होंने अंग्रेज़ो कि मुखालिफत में अपनी जानें कुर्बान की, फासियों पर वह लटकाए गए, काला पानी भेजे गए, जेल की कैद काटी, उनकी जायदादे ज़ब्त हुई, और सारा दिन उनको भुखा प्यासा रख कर लगातार पीटा गया,
कुछ ऐसे नक्स भी राह वफा में छोड़ आए हो।
के दुनिया देखती है और तुमको याद करती है।
हिन्दुस्तान में जंग आजादी की तहरीक और उसके बानी होने का शरफ हुज्जत उल इस्लाम हज़रत शाह वलीउल्ला मुहड्डिस देहलवी को हासिल है जिन्होंने एक तरफ नाकाबिल ए फरामोश दीनी खिदमत अंजाम दी तो दूसरी तरफ सियासी मैदान में अंग्रेज़ो और मराठों के ज़ुल्म वा सितम से मुल्क को निकालने के लिए बहुत ज़्यादा कोशिशें की, उन्हीं की दरस वा तदरीस का ये असर था के शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिज देहलवी ने फिरंगी ज़ुल्मो के नीचे दबे हुए हिन्दुस्तानियों को जिहाद के लिए आमादा किया,
हजरत मौलाना शाह वलीउल्ला मुहादिस देहलवी की वफात के बाद शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहडिस देहलवी आपके जानशीन मुकर्रर हुए, उस वक़्त आपकी उम्र सिर्फ 17 साल थी ये एजाज आपको बेटे की बिना पर नहीं बल्कि अहलियत वा लियाकत की वजह से मिला उसका सबूत आपकी अज़ीम उस शान ख़िदमात हैं,
हिन्दुस्तान में जब तवायफ उल मुलुकी के नतीजे में चिटगांव से लेकर दिल्ली तक अंग्रेज़ की तूती बोलने लगा था जब गद्दार ए वतन मीर सादिक वगेरह की अंग्रेजों के साथ खूफिया साजिश के नतीजे में शहीद टीपू सुल्तान को शरफ ए शहादत हासिल हुई तो ये मर्द ए मुजाहिद 4 मई 1791 को जानबहक हो गया,
1803 में जब दिल्ली पर अंग्रेज़ का कब्ज़ा हो गया और नाजुक हालात में मुसलमान मुख्तलिफ उल ख्याल हो गए , कोई अंग्रेज़ो से जिहाद को जायज कहता कोई नाजायज,
लेकिन शाह अब्दुल अज़ीज़ के उकाबी निगाहों ने फिरंगी शातिराना चालों को भांप लिया और ये फतवा जारी किया के तमाम मुहिब्ब ए वतन का फ़र्ज़ है के गैर मुल्की ताकत से ऐलान ए जंग करके उनको मुल्क बदर किए बैगैर ज़िंदा रहना अपने लिए हराम जानें और उन्हीं की मुनज़्ज़म कयादत और मुताक़िदीन में से वह उलेमा ए अहले हदीस शामिल हुए जिन्होने अंग्रेज़ की ईंट से ईंट बजा दी और हिन्दुस्तान आजादी से शरफ याब हुआ, उनके खून से अब तक हिन्दुस्तान की दर ओ दीवार लाल रंग हैं, दरसअल आजादी हिन्द उलेमा ए अहले हदीस की ही मरहूम ए मिन्नत है,
टल ना सकते थे अगर जंग में उड़ जाते थे।
पांव शेरों के भी मैदान में उखड़ जाते थे।
सबसे पहले तहरीक को लब्बैक कहने वाले हज़रत मौलाना अब्दुल हई शाह अब्दुल अज़ीज़ के भांजे , और हज़रत मौलाना शाह इस्माईल हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ के भतीजे और हज़रत शाह इशहाक शाह अब्दुल अज़ीज़ के नवासे थे, शाह अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्लाह ने ही मौलाना शाह अब्दुल हई साहब को शेख उल इस्लाम और शाह इस्माईल को हुज्जत उल इस्लाम का लकब अता फरमाया था,
तहरीक शहीदैन जिसे हम तहरीक अहले हदीस कहते हैं से भी मौसूम कर सकते हैं के ये हिन्दुस्तान में सब से पहली इस्लामी तहरीक थी जिसे शाह इस्माइल शहीद और सय्यद अहमद शहीद ने बरपा किया था, ये तहरीक ख़ास कर अंग्रेज़ की हुकूमत का खात्मा करने और हिन्दुस्तान में खिलाफत मनहज ए नुबुव्वाह बरपा करने के लिए पैदा हुई थी, इस तहरीक ने सबसे पहले फुरूवन ला ईलाहा इल्लल्लाह का नारा लगाया ये नारा क्या था एक बांग दरा था जिसने सुना मदहोश हो गया जिस पर नजर पड़ी वह इस्लाम का खादिम बन गया, जिहाद की दावत दी गई तो उलेमा ने मस्नद ए दरस छोड़ दी, इमामों ने मस्जिदों के मुसल्ले माजूरों के हवाले कर दिए, मालदारों ने अपनी कोठियां छोड़ दी, गुलामों ने अपने आकाओं को सलाम कह दिया, लेकिन अफसोस को शाहिदैन की तहरीक कामयाबी की इतनी मंजिलें ना तय कर पाई जितनी उम्मीद थी के नाम निहाद मुस्लिम अफ़ग़ान सरदारों की गद्दारी की वजह से, फिर बालाकोट का सानहा पेश आ गया और इस राह ए हक के दोनों मुजाहिद जाम ए शहादत नोश फरमा गए, इन्ना लिल्लाही वा इन्ना इलैही राजीऊन !!
तारीख गवाह है कि जंग बालाकोट के बाद जब मुल्क पर उदासी छा गई , जमात तितर बितर हो गई, अच्छों के कदम लड़खड़ा उठे और करीब था के जिहाद का सारा काम दरहम बरहम हो जाता लेकिन अजीमाबाद पटना मुहल्ला सादिकपुर के एक फर्द ने ये गिरता हुए अलम जिहाद को ताहयात अपने सीने से लगाए रखा और हिन्दुस्तान की ज़मीन की अपने खून वा जिगर से उसकी इस अंदाज़ में आब्यारी की जिसे बयान करने के लिए इस्लामी हिन्द की पूरी तारीख इसकी मिसाल पेश करने से कासिर है, आपकी वफात के बाद आपके भाई मौलाना इनायत अली सादिकपुर ने इस फ़रीजा को संभाला, उसके बाद लश्करी कियादत मौलाना विलायत अली के फरजंद रशीद मौलाना अब्दुल्लाह अज़ीमाबादी के हाथों में अाई, उन्होंने अमीर उल मुजाहिदीन की हैसियत से 40 साल तक ख़िदमात अंजाम दी, फिर उनके बाद उनके छोटे भाई मौलाना अब्दुल करीम साहब जाननशीन मुकर्रर हुए,
फिर उनके बाद मौलाना अब्दुल्लाह साहब अज़ीमाबादी के पोते मौलाना नेमातुल्लाह अमीर उल मुजाहीदीन रहे फिर रहमतुल्लाह साहब अमीर नामजद हुए, उनके इलावा उस दौर के दूसरे मुजाहीदीन में मौलाना याहया अली अजीमाबादी, मौलाना अहमद अल्लाह सादिकपुर, मौलाना जाफर थनेसरी वगेरह का नाम आता है, जिन्हें तहरीक आजादी के सरगर्म रुकन होने के जुर्म में कालापानी की दर्दनाक साज़ाएं काटनी पड़ी,
हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है।
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा वर पैदा।
1857 ईसवी की तहरीक ए आजादी में भी अहले हदीस आलिम मौलाना इनायत अली सादिकपुर शरीक थे, उन्होंने तारीख इलाका सरहद में महाज कायम करके जंग शुरू की थी मौलाना ज़फ़र साहब थानेसरी इस हंगामे में चंद साथियों को लेकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने कि गरज से दिल्ली गए थे फिर 1857 के बाद से 1947 तक मुल्क की कोई भी सियासी तहरीक ऐसी नहीं जिसमें उलेमा ए अहले हदीस ने या उनके लोगों ने हिस्सा ना लिया हो,
मौलाना अब्दुल कादिर कसूरी
मौलाना मुहम्मद अली कसूरी
मौलाना मोहिउद्दीन कसूरी
मौलाना सय्यद मुहम्मद दावूद गजनवी
मौलाना मुहम्मद अली लखवी
मौलाना अब्दुल्लाह अहरार
मौलाना अबुल वफ़ा सनाउल्लाह अमृतसरी
मौलाना इब्राहीम मीर सियालकोट
मौलाना हाफ़िज़ मुहम्मद मुहड्डिज गोंडोलवी
मौलाना अबुल कासिम सैफ बनारसी
मौलाना अबुल कासिम मुहम्मद अली मऊ
मौलाना मुहम्मद नोमान मऊ,
मौलाना मुहम्मद अहमद मुदरिस मऊ
मौलाना हाफ़िज़ अब्दुल्लाह गाजीपुरी
मौलाना अब्दुल अज़ीज़ रहीमाबादी,
मौलाना मुहम्मद इदरीस खान बदायूंनी
मौलाना फजलुल्लाह वजीराबाद
मौलाना अब्दुल रहीम उर्फ मौलाना मुहम्मद बशीर,
वली मुहम्मद फुतुही वाला
दिल्ली में पंजाबी अहले हदीस
कलकत्ता में कपड़े और लोहे के ताजिर,
मद्रास में काका मुहम्मद उमर
बंगाल में मौलाना अब्दुल्लाह काई
मौलाना अब्दुल्लाह अल बाक़ी
मौलाना अहमद अल्लाह खान
गाजी शहाबुद्दीन , वगेरह
ऐसे नामों कि एक लम्बी फेहरिस्त ऐसे उलेमा अहले हदीस की है जिनका जंग ए आजादी मे हिस्सा लेना एक नाकाबिल ए इनकार हकीकत है,
मौलाना सय्यद अहमद शहीद और मौलाना इस्माईल शहीद की मुजाहिदाना कोशिशों ने मुसलमानों को जिहाद पर माइल किया और जंग ए आजादी का अलम लहराया, हिमालय की चोटियों और खलीज बंगाल की तराई से लोग जूक दर जूक इस अलम के नीचे जमा होने लगे, इस मूजाहिदाना कारनामा की आम तारीख मालूम हो के इन मुजाहीदीन ने सरहद पार करके सिखों का मुकाबला किया और शहीद हो गए हालांकि ये वाकिया उसकी पूरी तारीख का सिर्फ एक हिस्सा है,
मौलाना जफर साहब थनेसारी लिखते हैं के
" जब के सय्यद अहमद शहीद हज़्ज से वतन वापस आ गए तो सफर जिहाद की तैयारी में मशगूल हो गए मौलाना मुहम्मद इस्माईल शहीद और मौलवी अब्दुल हई वगेरह जिहाद के मजामीन बयान करने और तर्गीब दिलाने के लिए हिन्दुस्तान में हर जगह रवाना हुए, उस वक़्त सय्यद अहमद साहब के मकान पर तलवार वा बंदूक की सफाई और घुड़दौड़ हुआ करती थी और वह दरवेश सिपाही बन गया था तस्बीह की जगह हाथ में तलवार और फराख जुब्बा की जगह चुस्त लिबास ने ले ली, उन दिनों में जो कोई तोहफा या तहैफ आप के पास लेकर आता तो अक्सर हथियार या घोड़े होते, उन्हीं दिनों में शेख फरजंद अली साहब गाजीपुरी जमानिया से दो निहायत उम्दा घोड़े और बहुत से वर्दी के कपड़े और 40 जिल्द क़ुरआन तोहफे में लेकर आए, और सबसे अजीब तोहफा वो जो शेख साहब लेकर आए वह अमजद नामी उनका एक नौजवान बेटा था, जिसको उन्होंने मिसल हज़रत इब्राहीम खलील अल्लाह की राह ए खुदा में नज़र करने सय्यद साहब के हवाले कर दिया और कहा के इसको अपने साथ ले जाएं और तेज़ कुफ्फार से इसकी कुर्बानी कराएं, शेख फरजंद अली की ये नजर अल्लाह ने कुबूल की उनका साहब ज़ादा शेख अमजद सिखों से लड़ते हुए बालाकोट के मारके में शहीद हो गया"
ये वाक्या मैंने सिर्फ जिहाद और उसके खूलूस की सबूत के तौर पर पेश किया है इसका ये मतलब नहीं के उलेमा ए अहले हदीस सिर्फ सिखों से लड़ाई कर रहे थे, उनको हिन्दुस्तान की आज़ादी और अंग्रेजों से मुकाबला की कोई ज़रूरत ना थी जैसा कि सय्यद साहब और मौलाना इस्माईल शहीद की तहरीक जिहाद के मुताॅलिक बाज़ उलेमा की तहरीरों में ये गलतफहमी पैदा कर दी है के वह सिर्फ सिखों के खिलाफ थे सय्यद साहब अंग्रेजों से ना लड़ना चाहते थे और अंग्रेज़ी इकतेदार और तसल्लत से उनको कोई तशवीश ना थी अंग्रेज़ के कब्जे से उसी मुल्क को आज़ाद करा लेना सय्यद साहब के खतों से साफ अल्फ़ाज़ में साबित किया है के उन लोगों के खयालात बिल्कुल ग़लत हैं,
मौलाना मुहम्मद ज़फ़र ठानेसरी को अंग्रेजों ने महज इस वजह से के वह सय्यद साहब की मुताकिदीन में से थे उनको बड़ी तकलीफ दी, घर बार लूट लिया और 18 साल कालपानी की अजियत नाक सजा दी, उनकी कुर्बानियों के सामने हर शख्स का सर एहतेराम से खम हो जाता है,
शेख उल कुल मियां नज़ीर हुसैन मुहद्ददिस देहलवी जो उलेमा ए अहले हदीस के सुरखील और सरताज थे सिर्फ अहले हदीस होने की बुनियाद पर अंग्रेज़ी मुकद्दमात की लपेट में आए उनकी मकान वा मस्जिदों की तलाशी ली गई रावलपिंडी की जेल में एक साल तक नजरबंद रखे गए, दरअसल अंग्रेज़ को किसी तंजीम वा जमात से खतरा था तो वह सिर्फ अहले हदीस ही की जमात और उसके उलेमा वा मशाईख थे और इसी वजह से रावलपिंडी की जेल में मियां सहाब पर जबर किया जाता था के वह उन अराकीन अहले हदीस के नाम ज़ाहिर कर दें जो उस बागियाना तहरीक में शामिल थे मगर इस्तकलाल का पहाड़ बने रहे,
सहाफत के मैदान में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने " अल हिलाल" और " अल बलाग" के जरिए पूरे मुल्क में हिन्दुस्तानियों के दिलों को अंग्रेज़ो कि गुलामी से आज़ाद कराने की सोच बख्शी और उसी आजादी ही की खातिर मौलाना को बार बार जेल का मुंह देखना पड़ा, उन्होंने इस मुल्क को आज़ाद कराने में अपनी ज़िन्दगी वकफ़ कर दी,
गरज ये के उन अहले हदीस उलेमा ने अपनी तकरीरों, शुजातों और इल्म खुतबाओ से मुसलमानों को ख्वाब ए गफलत से झिंजोड़ा और उनमें आजादी का हौसला बेदार किया जिसके नतीजे में मुसलमानों ने अंग्रेजों की सम्राजियत का खात्मा कर दिया और अंग्रेजों को इस बात का अंदाज़ा हो चुका था के उलेमा अहले हदीस ही कौम के वो बाजू है जिनके इशारे पर हर फर्द दिल ओ जान कुरबान कर देने के लिए तैयार हो जाता है, उसने सारा अपना सम्राजी इक्तेदार कायम करते वक़्त सबसे ज़्यादा ज़ुल्म वा सितम उलेमा ए हक पर तोड़ा,
ये थे हमारे सलफ !!
ये मजमून जमीयत अहले हदीस से लिया गया है
साभार : जमीअत अहले हदीस
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi

Saturday, September 5, 2020

FIRKA WAARIYAT KYA HAI





फिरका वारियत क्या है ??

क्या क़ुरआन वा सुन्नत की दावत देना फिरका वारियत है ??

मौजूदा दौर में क़ुरआन वा सुन्नत की बात करना फिरका वारियत है ??

हरगिज़ नहीं, और यकीनन अगर क़ुरआन वा सुन्नत की दावत फिरका वारियत नहीं है तो फिर फिरका वारियत क्या है ??

आए में आपको दिखाता हूं कि दीन की खिदमत और आसानी के नाम पर शुरू होने वाली दावत वा तबलीग़ ही फिरका वारियत की असल वजह है,

2020 चल रहा है,

मेरे पैदा होने से पहले ही शिया, सुन्नी, हनफी, मालिकी, शाफई, हमबली, बरेलवी (जिनमें और फिरके भी शामिल हैं ), देवबंदी (जिनमें और फिरके भी शामिल है जैसे हयाती मामाती ), परवेजी, जमात ए मुस्लिमीन, अहले क़ुरआन, अशरी, जाफरी, इस्मैली, ज़ैदी, अलावी, बातीनी, बकताशी, कादयानी ( जो इत्तेफ़ाक़ तौर पर काफ़िर हैं, लेकिन मुसलमानों में से निकाला हुआ फर्का है) में ये उम्मत बट नहीं चुकी थी ???

अगर हिन्द वा पाक की बात करें तो मेरे पैदा होने से पहले ही भारत में 1865 में बरेलवी फिर्का बना कर बाक़ी सब को गुमराह करार दे दिया था।

मेरे पैदा होने से पहले ही 1867 में देवबंदी फिरका बना कर बाक़ी सबको गुमराह करार दे दिया गया।

मेरे पैदा होने से पहले ही उम्मत् में कई फिर्क बन चुके थे और उम्मत तकसीम हो चुकी थी और उम्मत को तकसीम करने वालों ने इस उम्मत को तकसीम कर दिया था,

और अगर आज कोई इन फिरका वारियत फैलाने वालों के खिलाफ बोल दे और उनके बातिल अकायेद को क़ुरआन वा सुन्नत से गलत साबित कर दे और लोगों को इस फिरका वारियात से निकाल कर एक अल्लाह और इसके रसूल की तरफ आने कि दावत दे तो आप लोग उसकी आवाज़ दबाने के लिए उल्टा उसी पर फिरका वारीयत का इलज़ाम लगा देते हो।

जब तक आप लोगों के दिलों से अपने फिरकों की मुहब्बत नहीं निकलेगी तब तक उन दिलों में इस्लाम की मुहब्बत पैदा नहीं हो सकती,

" और अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थामे रखो, और आपस में फर्क मत बनाओ "

(क़ुरआन अल इमरान आयात 103)

"कहीं तुम उन लोगों की तरह न हो जाना जो फ़िरक़ों और गरोहों में बँट गए और खुली-खुली साफ़ हिदायतें पाने के बाद फिर इख़्तिलाफ़ात [विभेदों] में पड़ गए। जिन्होंने ये रवैया अपनाया वे उस दिन सख़्त सज़ा पाएँगे,"

(क़ुरआन अल इमरान आयात 105)

"जिन लोगों ने अपने दीन को टुकड़े-टुकड़े कर दिया और गरोह-गरोह बन गए यक़ीनन उनसे तुम्हारा कोई वास्ता नहीं, उनका मामला तो अल्लाह के सुपुर्द है, वही उनको बताएगा कि उन्होंने क्या कुछ किया है।"

(क़ुरआन अल अनाम आयात 159)

" इब्राहीम ना यहूदी था ना ईसाई , बल्कि वह एक सच्चा मुस्लिम था और वह हरगिज़ मुष्रीकीन में से ना था "

(क़ुरआन अल इमरान आयात 67)

"इसी तरीक़े पर चलने की हिदायत उसने अपनी औलाद को की थी और इसी की वसीयत याक़ूब अपनी औलाद को कर गया। उसने कहा था कि “मेरे बच्चो, अल्लाह ने तुम्हारे लिये यही दीन [जीवन-व्यवस्था] पसन्द किया है, इसलिये मरते दम तक मुस्लिम ही रहना।”

(क़ुरआन अल बकरा आयात 132)

" ए ईमान वालों ! अल्लाह से डरो जैसा कि उससे डरने का हक है और तुम्हारी मौत सिर्फ उसी हाल पर आएं के तुम मुसलमान हो"

(क़ुरआन अल इमरान आयात 103)

जन्नत में कौन लोग जाएंगे ???

"मेरी उम्मत 73 फिर्को में बट जाएगी जिन में से जन्नत में वह जाएगा जो मेरे और मेरे सहाबा के तरीके पर होगा "

(जामे तिरमिज़ी हदीस 2641)

"मगर जो आदमी रसूल की दुश्मनी पर उतर आए और ईमानवालों के रवैये के सिवा किसी और राह पर चले, जबकि उस पर सीधा रास्ता वाज़ेह हो चुका हो, तो उसको हम उसी तरफ़ चलाएँगे जिधर वह ख़ुद फिर गया और उसे जहन्नम में झोंकेंगे जो सबसे बुरा ठिकाना है।"

(क़ुरआन अल निशा आयात 115)

अब फैसला आपके सामने है।

फिरका वारियत क्या है ??
क़ुरआन वा हदीस की दावत फिरका वारियत है या क़ुरआन वा हदीस फिरका वारियत का तोड़ है??

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com