शब ए ग़म को कहके अलविदा, बाद ए सबा का इंतज़ार किया जाए।
रास्ते हैं खोय से , फिर कैसे इनका ऐतबार किया जाय।
हर्फ हर्फ सींच कर , जो बनाए गए लफ्ज़ मुहब्बत के,
वो किताबों की जेबाईश नहीं, इस बात का इकरार किया जाए।
साभार: Umair Salafi Al Hindi
Har Ibteda Se Pehle Har Inteha Ke Baad, "ZAAT-E-NABI Buland Hai "ZAAT-E-KHUDA" Ke Baad, Dunya Main Ehtraam Ke Qabil Hain Jitne Log, Main Sabko Manta Hun, Magar ,"MUHAMMAD-MUSTAFA{sall’Allaahu ta’aalaa alaihi wa’sallam} Ke Baad..
शब ए ग़म को कहके अलविदा, बाद ए सबा का इंतज़ार किया जाए।
तमाम तर चाहतें कुरबान जिस पर, वही चाहत मांगी गई।
वक़्त ऐ कुबुलियत था, अल्लाह से अल्लाह की मुहब्बत मांगी गई।
ना और कोई आरज़ू, ना मजीद ख्वाहिश रही बाक़ी
हर्फ ए आखिर में हुआ सवाल तो तहज्जुद की आदत मांगी गई।
देखकर यूं मुसाफतें लम्बी,
थोड़ा थोड़ा करते करते अच्छा खासा बाट दिया।