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Wednesday, August 11, 2021

आजकल एक मश्हूर नारा चल रहा है - 'मेरा जिस्म मेरी मर्ज़ी'

 



आजकल एक मश्हूर नारा चल रहा है - 'मेरा जिस्म मेरी मर्ज़ी'

हालांकि किसी भी इंसान की मर्ज़ी उसके जिस्म पर नहीं चलती

इंसान मुंह से खाता और बोलता है, नाक से सांस लेता और सूंघता है, कान से सुनता, आँख से देखता है, हाथ से चीज़ों को पकड़ता है, और पाँव से चलता है

दुनिया के लगभग हर इंसान के पास ये अंग होते हैं
लेकिन दुनिया का कोई भी इंसान इन अंगों के ऊपर अपनी मर्ज़ी नहीं चला सकता, इनके फंक्शन को नहीं बदल सकता

दुनिया का कोई भी इंसान नाक से नहीं देख सकता, आँख से नहीं सुन सकता, पाँव से सूंघ नहीं सकता, वो अपनी मर्ज़ी से एक अंग के फंक्शन नहीं बदल सकता उनकी औकात हि नही जो अपने हि जिस्म के अंग के कामो को अपने मन मानी मर्जी से चला सके मैं ईकरा अर्श खान कानपुरी पुरे रुये जमी पर जितने भी इंसान है उन सब को खुली चुनौती और चैलेंज दे रही हु अगर तुम सब मिल भी जाओ और सब मिल कर भी इस नेजामे कुदरत में किसी एक अंग के साथ भी उलट फेर कर के दिखा दो पूरे जिस्म की तो बात ही बहुत दूर है

इंसान के जिस्म पर उसकी मर्ज़ी नहीं चलती अगर चलती है तो कोई भी इंसान अपने उपर आयी मौत को रोक कर अपनी उम्र बढ़ा कर दिखाए औकात से जादा बड़ कर बोल देना बेशक आसान होता है लेकिन जब करने कि बारी आती है तो पता चलता है कि कौन कितना पानी में है कहने को तो सब लाखो करोडो़ कि बात करते हैं जैसे वो किसी बादशाह के बेटे हो और शाहनशाही खुद्दारी गुरुर घमंड भी ऐसा होता है जैसे वो इतना पावर फुल ताकतवर है कि उसे कभी किसी कि कोई जरुरत ही नहीं पडे़गी औकात और गुरुर घमंड का तब पता चलता है जब उसके मुसीबत पर उसके रवैईये से खुद उसी के रिश्तेदार दोस्त एहबाब उसका साथ नही देते और बात करते हैं अपनी जिंदगी अपने जिस्म और अपने मर्जी से जिने कि

सच तो ये है मर्ज़ी सिर्फ अल्लाह की चलती है इंसान तो बस एक मिट्टी का खिलौना है और वो अपनी मूर्खता का परिचय दुनिया को कराता है जाहीलाना जुम्ला बोल कर मेरा जिस्म और मेरी मर्जी अल्लाह की कुदरत को मत आजमाना भूल कर भी वर्ना कही तुम्हारे जिस्म मे जान तो रहेगी लेकिन तुम अपने ही बिस्तर से उठने लायक नही रहोगे और तुम्हारे जिंदगी का सहारा एक मामूली सा इंसान हि होगा इस लिए रब के इस्लाम के खिलाफ जाने कि भूल कर भी कोशीश मत करना कुर्आन हदीस को 💕 लगा कर पढ़े और उस पर अमल करने कि कोशीश करेंगे तो हर परेशानी दुःख दर्द बिमारी से महफूज रहोगे इंशा अल्लाह

#ईकरा_अर्श_खान_कानपुरी 🌹🤲🌹

Tuesday, August 10, 2021

मर्द ही ज़ालिम क्यों ??

 



तस्वीर का दूसरा रुख


मर्द ही ज़ालिम क्यों ??

जब भी दहेज की बात आती है तो मर्दों को बुरी तरह लताड़ा जाता है, उन्हे बेगैरत और ना जाने क्या क्या कहा जाता है,

अपने यहां की बात करूं तो यहां एलानिया डिमांड तो नहीं की जाती मगर दहेज की ख्वाहिश सब करते हैं लेकिन हकीकत ये भी है के मर्दों को अगर दहेज की ख्वाहिश होती है तो जरूरी चीजों की होती है,

मगर हम लड़कियां...?? जरूरत से कई गुना ज्यादा सामान खरीदती हैं, शादी की शॉपिंग ऐसे करते हैं जैसे दो तीन नस्लों को दुकानों के चक्कर से निजात दिलाना हो, किसी तरह की क्रॉकरी, कपड़ों और ज्वेलरी का कोई सेट ना छूटे, कोई डिजाइन रह ना जाए,

एक लड़की दूसरी लड़की को देखकर , एक औरत दूसरी औरत को देखकर सामान खरीदते खरीदते अंबार लगा देती है,

शादी के मौकों पर जूता छिपाई, द्वार छिकाई और ना जाने कौन कौन सी रस्म में, किसका हाथ है ?? मर्दों का !!! मुझे तो नज़र नहीं आता!!

जब बॉक्स से सामान निकाल कर एक दो रूम भर दिए जाते हैं तो उसकी कंपनी चैक करने और ब्रांडेड और गैर ब्रांडेड का लेबल लगाने क्या मर्द जाते हैं ??

दहेज पर ताना कसने वाले अक्सर हमारी हम सनफ ही होती हैं तो फिर औरत से हमदर्दी और मर्द जालिम क्यों ?? सच कहूं तो इन रस्मों में मर्दों से ज़्यादा हमारी हिस्सेदारी है,

आखिर में मैं ये कहना चाहूंगी के जो लोग दहेज़ सिर्फ इसी को समझते हैं जो डिमांड की जाए और अगर डिमांड ना किया जाए तो बाप भाई कहते हैं के," हम अपनी बेटी बहन को खुशी से दे रहें हैं"

अगर कोई अपनी बहन बेटी को कुछ दे रहा है तो खास शादी के मौके पर क्यों ?? क्या शादी के बात उनका अपनी बेटी बहन से ताल्लुकात खतम हो जाते हैं ??

तुम चाहो तो अपने बेटियों को सातों जमीन सोना भरकर दो मगर नुमाइश करके गरीबों की झोंपड़ीयों में इज़ाफा क्यों करते हो ??

और मैं समाज से ये भी पूछना चाहूंगी के जब बेटी बहन को साजो सामान " खुशी से " दिया जाता है ताकि वह ससुराल में तानो का शिकार ना हो तो जब वही बहन बेटी विरासत जो की उसका हक़ है उसका मुतालबा करती है तो उनकी गर्दनें छुरियों की नोक पर क्यों रख दी जाती हैं ??

अगर वह ज़बरदस्ती अपना हक ले ले तो इस पर मायके के दरवाज़े क्यों बंद कर दिए जाते हैं ?? क्या उस वक्त बहन बेटी की खुशी प्यारी नहीं होती ??

साभार : बहन सबा यूसुफजई Saba Yosuf Zai
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com

Thursday, July 8, 2021

ताल्लुकात की भी चाबियां होती हैं,

 



ताल्लुकात की भी चाबियां होती हैं,


जैसे तरस रवैए वाली चाबी, जिसे आप ताले में घुमाते रह जाएं, और फिर थक हारकर छोड़ दें, और अचानक कोई आए और तहममुल, प्यार, एतमाद से झट ताला खोल जाए तो आप हैरान रह जाते हैं,

बिल्कुल इसी तरह कुछ चाबियां हमारी जिद, मनफी सोच और नफरत से आलुदा हो जाती हैं, और फिर वो किसी ताल्लुक की बहाली के काम नहीं आती,

और कुछ ताले भी जैसे कभी ना माफ करने की कसम खाए जंग आलूदा हो चुके होते हैं, और कभी कभी तो चाबियां मुट्ठी में दिल पसीज के रह जाती हैं,

क्योंकि ताले बदल चुके होते हैं, और जब दिल के ताले पर मुहर लग जाए तो फिर वह कभी नहीं खुलता ,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks 

Monday, July 5, 2021

औरत जब तांजिया कहती है के , " आपको तो बस एक ही काम की मुहब्बत है "

 



औरत जब तांजिया कहती है के , " आपको तो बस एक ही काम की मुहब्बत है "


तो हकीकत में आप उसी साख को काट रही होती हैं जिसपे उसका आशियाना होता है, यही एक मुहब्बत है जो वह अपनी मां और बहन से नहीं कर सकता , और यही मुहब्बत एक मियां बीवी के दरमियान पुल की हैसियत रखती है,

ये कोई ऐब नहीं के जिसका ताना दिया जाए, संजीदगी से गौर किया जाए तो इस रिश्ते के इलावा औरत से मर्द का ताल्लुक क्या है ?? यही वह अमल है जिससे वह मौदत (Term) वा रहमत Generate होती है, जिसका हवाला अल्लाह ने कुरआन में दिया है,

[ وَمِنْ آيَاتِهِ أَنْ خَلَقَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَاجًا لِّتَسْكُنُوا إِلَيْهَا وَجَعَلَ بَيْنَكُم مَّوَدَّةً وَرَحْمَةً ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ۔ (الروم ـ 21)

"और अल्लाह की निशानियों में से ये भी है के उसने तुम्हारी जिंस से बीवियां बनाई ताकि तुम उनसे सुकून पाओ और रखी तुम्हारे दरमियान मौदत और रहमत, इसमें बड़ी निशानियां हैं गौर वा फिक्र करने वाले लोगों के लिए "

इसी जिंसी ताल्लुक की मौदत और रहमत की कुव्वत से इंसान खम ठोक कर हर रिश्ते के सामने खड़ा हो जाता है, पैदा करनें वाली मां, एक प्लेट में खाकर साथ पलने वाली बहनों और पालने वाले बाप की आंखों में आंखें डालकर बीवी का दिफा करता है,जो औरत जिंसी तौर पर शौहर को दूर कर देती है वह दरअसल बहुत बड़ी गलती करती है

अपने बनाओ सिंगार, अपनी आदत और मायेनी खेज़ जुमलेबाजी के जरिए शौहर के जिंसी जज्बे को मुश्ताअल और वर्किंग पोजीशन में रखने वाली ही कामयाब बनती है, यही एक रिश्ता है, दूसरी, तीसरी बीवी का रिश्ता रोकने का ,

नशे को जबतक करीब तरीन दुकान से नशा दस्तयाब रहता है वह कभी दूर की दुकान पर नहीं जाता , इसको रसूल अल्लाह मुहम्मद सल्लालाहु अलैहि वसल्लम ने एक ही जुमले में अदा फरमा दिया ,

" जब शौहर उसको देखे तो वह उसको खुश कर दे"

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks

Thursday, June 17, 2021

काफिर के हुकूक (Rights)

 



काफिर के हुकूक (Rights)


जो लोग काफिर का मतलब नहीं जानते वो काफिर लफ्ज़ को गाली समझते हैं, इसकी सच्चाई को जानने के लिए जरूरी है के हम इसके मतलब को जाने ,

काफिर लफ्ज़ कुफ्र से बना है जिसका माना है:

" छिपाना, इंकार करना, क्योंकि काफिर या मुर्तद अपनी अक्सरियत को छिपाता है और उसका इंकार करता है इसलिए उसे काफिर कहा जाता है"

हदीस में आया है,

" हर शख्स अपनी अक्सरियत पर पैदा किया जाता है,फिर उसके मां बाप उसको ईसाई बना देते है या यहूदी बना देते हैं या मजूसी बना लेते हैं"

(बुखारी 1359, मुस्लिम 2658)

यहां अक्सरियत से मुराद तौहीद ( अल्लाह को एक जानना) है जिसकी तरफ इस्लाम बुलाता है, बल्कि इस्लाम ही वह चीज है जिसपर बच्चा पैदा होता है, फिर उसके मां बाप अलग अलग धर्म या अफकार के होते हैं वैसा ही बच्चा बन जाता है,

काफिर या तो मुसलमानो के मुल्क में होगा या मुसलमान उस मुल्क में होंगे जहां ज्यादातर लोग गैर मुस्लिम होंगे , दोनो हालातों में काफिर की जान उसके माल और उसके माल की हिफाजत करना मुसलमानों पर जरूरी है,

एक सही हदीस में आता है,

" जिसने किसी जिम्मी ( काफिर जो मुस्लिम मुल्क में रह रहा हो) को कत्ल किया जन्नत उसके लिए हराम है"

बल्कि कुरआन में भी बता दिया गया है

" अल्लाह तुमको इससे नहीं रोकता की तुम उन लोगों के साथ अच्छा सुलूक करो,और उनके साथ हक बात करो जिन्होंने तुमसे दीन के मामले में जंग नहीं किया , और ना तुम्हे तुम्हारे घर से निकाला, बेशक अल्लाह हक का फैसला करनेवालों को पसंद करता है"

(कुरआन सुरह मुम्ताहिना आयत 


इसलिए की मुसलमान ना तो काफिर के दुश्मन हैं और ना सारे काफिर मुसलमानो के दुश्मन है, मुसलमानों का फर्ज है की वे जिस मुल्क में रहें उसकी तरक्की की तरफ पूरा ध्यान दें और बड़ चढ़कर हिस्सा लें और सबसे बड़ी बात ये है की मुसलमान अल्लाह के दीन इस्लाम के पैरोकार हैं, इसलिए उनको चाहिए के अपने बर्ताओ से और अपनी जबान से वे इस्लाम का सही इल्म पेश करें,

कुरआन में है,

" तुम एक बेहतर उम्मत हो, तुमको लोगों के सामने लाया गया है, तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान लाते हो"

(कुरआन सूरह आल ए इमरान आयत 110)

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Wednesday, June 2, 2021

बाप : औलाद की कश्मकश में




 बाप : औलाद की कश्मकश में


जवानी में इन्सान बाप को शक की निगाह से देखता रहता है जैसे बाप को हमारे मसाइल, तकलीफों या ज़रूरतों का एहसास ही नहीं, ये नए दौर के तक़ाज़ों को नहीं समझता !!

कभी कभी हम अपने बाप का मावज़ाना भी करना शुरू कर देते हैं जैसे के

" इतनी मेहनत हमारे बाप ने कि होती, कुछ बचत की होती या कुछ बनाया होता तो आज हम भी !!! फलां की तरह आलीशान घर में रह रहे होते और बड़ी गाड़ी में घूम रहे होते"

कहां हो ??
कब आओगे ??
ज़्यादा देर ना करना !!!

इस जैसे सवाल इंतेहाई फ़िज़ूल और फालतू लगते हैं ,

बाप का ये कहना के स्वेटर तो पहना है कुछ और भी पहन लो सर्दी बहुत है, इन्सान सोचता है कि ओल्ड फ़ैशन की वजह से वालिद को बाहर की दुनिया का अंदाज़ा नहीं,

अक्सर औलादें अपने बाप को एक ही मेयार पर रखती हैं, घर, गाड़ी, प्लॉट, बैंक बैलेंस, कामयाबी और फिर अपनी नाकामियो को बाप के खाते में डाल कर खुद सुरखरू हो जाते हैं, और कहते हैं के हमारे पास भी कुछ होता तो अच्छे स्कूल में पढ़ते या कारोबार करते,

इसमें शक नहीं औलाद के लिए आइडियल भी उनका बाप ही होता है लेकिन कुछ बातें जवानी में समझ नहीं आती या हम समझने की कोशिश नहीं करते , इसलिए के तब हमारे सामने दुनिया ही सब कुछ होती है और इस दुनिया से मुकाबले का भूत सवार होता है,

जल्द से जल्द सब कुछ पाने कि जुस्तुजू में हम कुछ खो भी रहें होते हैं जिसका एहसास हमें बहुत देर से होता है,

बहुत सी औलादें वक्ति महरूमियों का पहला ज़िम्मेदार अपने बाप को क़रार देकर हर चीज़ से बरी हो जाती है,

साहब !! वक्त तो गुज़र ही जाता है, अच्छा भी और बुरा भी और इतनी तेज़ी से गुजरता है के इन्सान पलक झपकते माजी की कहानियों को अपने इर्द गिर्द मंडराते देखना शुरू कर देता है,

जवानी, पढ़ाई, नौकरी, शादी, औलाद और फिर वही स्टेज वहीं किरदार जो निभाते हुए हर लम्हा अपने बाप का चेहरा आंखों के सामने आकर,

बाप की हर सोच,एहसास, फिक्र , परेशानी, शर्मिंदगी और अजियत को हम पर खोल कर रख देता है!!

बाप की कभी कभी बिला वजह खामोशी, कभी पुराने दोस्तों में बैठकर बेवजह कहकहे लगाना, कभी अच्छे कपड़ों को नापसन्द करके पुराने कपड़ों को फख्र से पहनना, खानों में अपनी सादगी पर फख्र करना या कभी कभी सर झुकाए अपने छोटे छोटे कामों में मगन होने की वजह , कभी बिगैर वजह थकावट के बहाने सर ए शाम बत्ती बुझा कर लेट जाना या फिर नज़रें झुकाए इंतेहाई महवियत से डूबकर क़ुरआन की आयतों को विर्द करना,

ये सब हमें समझ तो आना शुरू हो जाता है लेकिन बहुत देर हो चुकी होती है,

जब हम खुद रातों को जाग जाग कर दूसरे शहरों में गए बच्चों पर आयत उल कुर्सी के दायरे फूंकते है, जब हम सर्दी में वजू करते हुए अचानक सोचते हैं के बेटे से पूछ ही लें के बेटा आप के यहां गरम पानी आता है ??

जब कहर की गर्मी में रूम कूलर की ठंडक बदन को छूती है तो पहला एहसास दिल वा दिमाग़ मे हलचल से मचाता है वह ये के

"कहीं औलाद गर्मी में तो नहीं बैठी "

जवान औलाद के मुस्तकबिल , शादियों की फिक्र , हज़ार ताने बाने जोड़ता बाप थक हार कर अल्लाह और उसके पाक कलाम में पनाह ढूंढ ता है तब याद आता है के हमारा बाप भी एक एक हर्फ , एक एक आयत पर रुक रुक कर बच्चों की सलामती , खुशी, बेहतर मुस्तकबिल की दुआएं ही करता होगा ,

हर नमाज़ के बाद उठे कपकपाते हाथ अपनी दुआओं को भूल जाते होंगे हमारी तरफ हमारे बाप भी एक एक बच्चे को नम आंखों से अल्लाह की पनाह में देता होगा ,

सर ए शाम कभी कभी कमरे की बत्ती बुझा कर इस फिक्र की आग में जलता होगा के मैंने अपनी औलाद के लिए बहुत कम किया ,

औलाद को बाप बहुत देर से याद आता है, इतनी देर से के हम उसे छूने ,महसूस करने , उसकी हर तल्खी, अज़ियत और फिक्र का इज़ाला करने से महरूम हो जाते हैं,

ये एक अजीब एहसास है जो कुछ वक्त के बाद अपनी असल शक्ल में हमें बेचैन ज़रूर करता है, लेकिन ये हकीकत जिन पर बर वक्त अया हो जाएं वहीं खुशकिस्मत औलादें होती है,

औलाद होते हुए हम समझते हैं के बाप का छूना, प्यार करना , दिल से लगाना, ये तो बचपन की बातें हैं मगर जब खुद बाप बनते हैं तो यकीन करें आंखें भीग जाती हैं के पता नहीं के बाप ने कितनी दफा दिल ही दिल में हमें छाती से लगाने को बाज़ू खोले होंगे ??
प्यार के लिए उसके होंठ तड़पे होंगे??

और हमारी बेबाक जवानियों ने उसे ये मौका नहीं दिया होगा !!!

हम जैसे दरमियाने तबके के सफेद पोश लोगों की हर ख्वाहिश, हर दुआ , हर तमन्ना, औलाद से शुरू होकर औलाद पर ही खतम हो जाती है,

लेकिन कम ही बाप होंगे जो ये एहसास अपनी औलाद को अपनी ज़िन्दगी में दिला सके हों,

ये एक छुपा हुआ मीठा सा दर्द है जो बाप अपने साथ ही ले जाता है,

औलाद के लिए बहुत कुछ करके भी कुछ ना कर सकने की एक खालिश आखिरी वक्त तक एक बाप को बेचैन रखती है,

और ये सब बहुत शिद्दत से महसूस होता है जब हम बाप बनते हैं, बुढापे की दहलीज पर कदम रखते है तो बाप के दिल का हाल जैसे कुदरत हमारे दिलों में मुंतकल कर देती है,

औलाद अगर बाप के दिल में अपने लिए मुहब्बत को खुली आंखों से वक्त पर देख ले तो शायद उसे यकीन हो जाए के दुनिया में बाप से ज़्यादा औलाद का कोई दोस्त नहीं होता,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com 

Thursday, May 20, 2021

मर्द जब रोता है !!


 


मर्द जब रोता है !!


मैंने कहीं सुना था के मर्द जब रोता है तो वो मगरमच्छ के आंसू होते है, लेकिन मुझे लगता है के मर्द जब रोता है तो वो कुर्ब की इंतेहा पर होता है, कुछ तो उसने ज़रूर खोया होगा जिसे उसने बहुत संभाल कर रखा होगा,

कोई तो ऐसा ख्वाब होगा जो उसकी आंखों से टूट कर बिखरा होगा ,

कोई तो ऐसा दुख होगा जो दिल के टुकड़े टुकड़े करके रूह तक को लहूलुहान कर गया होगा,

कौन कहता है मर्द को दर्द नहीं होता, मर्द मजबूर नहीं होता,

कसूर औरत का नहीं होता, कभी कभी मर्द की तबाही में औरत का ही हाथ होता है, मर्द भी इंसान होता है फरिश्ता नहीं !!

कभी दुख से तड़पते मर्द की सुर्ख अंगारों सी दहकती आंखों में ज़रूर झांकना, और देखना मर्द दुख में कितना तन्हा होता है,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com

Tuesday, April 6, 2021

ज़िन्दगी भी इसी खेल की तरह ही

 



होटल पर बैठे एक शख्स ने दूसरे से कहा, " ये होटल पर काम करने वाला बच्चा इतना बेवकूफ़ है के मैं 500 और 50 का नोट रखूंगा तो ये पचास का नोट ही उठाएगा "


और साथ ही बच्चे को आवाज़ दी और दो नोट सामने रखते हुए बोला , " इन मेसे ज़्यादा पैसे वाला नोट उठा लो"

बच्चे ने पचास का नोट उठा लिया , दोनों ने कहकहा लगाया और बच्चा वापस अपने काम में लग गया,

पास बैठे शख़्स ने उन दोनों के जाने के बाद बच्चे को बुलाया और पूछा तुम इतने बड़े हो गए हो तुमको पचास और पांच सौ के नोट में फर्क नहीं पता , ये सुनकर बच्चा मुस्कुराया और बोला," ये आदमी अक्सर किसी ना किसी दोस्त को मेरी बेवकूफी दिखाकर एन्जॉय करने के लिए ये काम करता है, और मैं पचास का नोट उठा लेता हूं वह खुश हो जाते हैं और मुझे पचास रुपए मिल जाते हैं, जिस दिन मैंने पांच सौ का नोट उठा लिया उस दिन से ये खेल भी खतम हो जाएगा और मेरी आमदनी भी"

ज़िन्दगी भी इसी खेल की तरह ही है हर जगह समझदार बनने की ज़रूरत नहीं होती, जहां समझदार बनने से अपनी ही खुशियां मूतासिर होती हों वहां बेवकूफ़ बन जाना ही समझदारी है,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Thursday, March 18, 2021

दहेज़ और विरासत

 



दहेज़ और विरासत


दहेज़ इसलिए लेना और देना के मिरास नहीं मिलेगी बिल्कुल गलत है, मगर दहेज पर बात करते वक्त मीरास को गोल कर जाना इससे भी बड़ी धांधली है,

और हमारे अक्सर दाइयों का यही हाल है, दहेज पर खूब बोलेंगे मगर मीरास पर या तो नहीं बोलेंगे या बहुत कम क्योंकि खुद उनके घरों में भी खुद मीरास का रिवाज नहीं है

जबकि मीरास ना देना दहेज देने से कहीं ज्यादा संगीन और जुर्म है, मगर जिस जोश वा खरोश से दहेज पर बात होती है मीरास पर नहीं होती, मीरास देने से भले दहेज का लेन देन खतम ना हो, मगर इस पर ना सिर्फ असर पड़ेगा बल्कि इससे बच्ची को मानवी और मादी तौर से बहुत ताकत मिलेगी जो उसको काम आयेगी,

शादी के बाद ये शाऊर ही के बाप का जो कुछ है वह भाइयों की तरह मेरा भी है लड़की को बहुत ताकत देता है,

जितने लोग इस वक्त दहेज़ के खिलाफ तवे पर बैठ गए हैं, उनकी तादाद के यहां ना सिर्फ मिरास का चलन आम नहीं है, बल्कि मीरास पर दहेज से कम लिखते और बोलते भी हैं, असल में ये अमल बहुत तकलीफ़देह है,

अगर हम वाकई अपनी बच्चियों को मज़बूत बनाना चाहते हैं तो ना सिर्फ उनके पूरे हुकूक की अदायेगी करें बल्कि बच्चों को शुरू से ही ये एहसास दिलाएं के," घर में सब बराबर हैं, सबके हुकूक हैं, और ये हुकूक शादी के बाद खत्म नहीं हो जायेंगे, "

वरना अगर बाप कामयाब है तो बच्चे उसकी दौलत से जिंदगी भर जो फायदा उठाते हैं बच्चियां उसका जरा सा भी फायदा नहीं उठाती, और अमूमन शादी के बाद तो महमान की तरह आती जाती है, उसके सामने दहेज की क्या हैसियत है ??

और अब तो बच्चों की शादी में बच्चियों से कम खर्च भी नहीं होता , ये मसला सिर्फ दहेज या मिरास का नहीं है, इसके कई समाजी हुदूद हैं और ये एक लम्बे जद्दोजहद का हामिल है,

मीरास बच्ची के लिए रीढ़ की हड्डी है, आखिर इसी पर तो बच्चे खड़े होते होते और पूरी जिंदगी फायदा उठाते हैं?? तो बच्ची का क्या कसूर है ??

वही घर जो बाप बनाकर जाता है, जब बच्ची ससुराल से आती है तो उसमे एक कमरा मुश्किल से पाती है, उसका सामान किसी कमरे में पड़ा होता है, वह कहीं और सोती है, लगता है जैसे किसी दूसरे के घर में आ गई है, ऐसी बेचारगी और कमजोरी में अगर ससुराल में जुल्म हो तो वह किसके सहारे पलट कर देखेगी ??

यहीं उसकी हिम्मत हार जाती है और वह टूट कर बिखर जाती है और कभी कभी खतरनाक कदम उठा लेती है, अगर उसकी पीठ मजबूत हो तो ना सिर्फ ससुराल में उसकी हैसियत पर फर्क पड़ेगा बल्कि किसी परेशानी से निपटने में मददगार होगा ,

दहेज से मीरास का वाकई बराहे रास्त ताल्लुक नहीं है, क्योंकि मीरास तो बच्ची का हक है जो इस्लाम ने उसे दिया है जबकि दहेज रस्म वा रिवाज है जिसके एहकाम वा हालात जगह के ऐतबार से बदलते रहते हैं,

वह भला मीरास की फर्जियत और उसकी हैसियत तक कब और कैसे पहुंच पाएगा !!

अगर कोई दहेज पर कम बोले और मीरास पर ज्यादा बोले तो वह माजूर हो सकता है, बल्कि ये माकूल भी है, मगर कोई दहेज पर खूब लंबी लंबी तकरीर करे, पोस्टें चिपकाता फिरे मगर मीरास पर ना के बराबर लिखे बोले तो वह माजूर नहीं है,

जब बात बच्ची को ज़ुल्म से बचाने की हो रही है तो मीरास पर गुफ्तगू ज़रूरी है, क्योंकि दहेज से बड़ा जुल्म ये है, वैसे भी दहेज का नुकसान बाप और भाइयों को होता है, जबकि मीरास का बच्ची को, यही गुफ्तगू का असल मकसद है, और यहीं पर ताल्लुक साफ हो जाता है,

इसलिए दहेज पर गुफ्तगू करते वक्त हम मीरास ना भूलें, अगर मकसद बच्ची को फायदा पहुंचाना, उसके हुकूक अदा करना और उसे भी बच्चों की तरह मजबूत रखना है,

अलबत्ता मीरास के बहाने दहेज कभी दुरुस्त नहीं हो सकता !!

साभार: डॉक्टर वसीम मुहम्मदी
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks