ISLAMIC LEAKS
Har Ibteda Se Pehle Har Inteha Ke Baad, "ZAAT-E-NABI Buland Hai "ZAAT-E-KHUDA" Ke Baad, Dunya Main Ehtraam Ke Qabil Hain Jitne Log, Main Sabko Manta Hun, Magar ,"MUHAMMAD-MUSTAFA{sall’Allaahu ta’aalaa alaihi wa’sallam} Ke Baad..
Saturday, October 17, 2026
आल ए सऊद का इतिहास
Sunday, March 1, 2026
ईरान... आखिर अरबों को ही क्यों निशाना बनाया?!
काबिल-ए-ज़िक्र (खास) बात यह है कि यह जनाब 'इख्वानी विचारधारा' (Muslim Brotherhood thought) के सक्रिय व्यक्ति हैं। यह शायद पहली बार हो रहा है कि उनकी कोई बात इतनी तर्कसंगत और सही महसूस हो रही है। अगर इसी विचारधारा को मानने वाले भारतीय उपमहाद्वीप (برصغیر - India/Pakistan/Bangladesh) के लोगों की सोच से इनका मुकाबला किया जाए, तो वाकई बड़ा अफ़सोस होता है।
ईरान ने अरबों को ही निशाना क्यों बनाया?
हाल ही में कई अरब लोग इस बात पर सोच-विचार कर रहे हैं कि आखिर ईरान ने अपनी बमबारी का रुख सिर्फ अरब देशों और जॉर्डन की तरफ ही क्यों रखा? जबकि उसके पड़ोस में तुर्की, अज़रबैजान और पाकिस्तान जैसे गैर-अरब (Non-Arab) देश भी हैं, जहाँ अमेरिकी सैन्य ठिकाने (Military Bases) मौजूद हैं, लेकिन ईरान ने उन्हें कुछ नहीं कहा।
आखिर अरब ही क्यों निशाना बने? अगर ईरान सुरक्षा या मिलिट्री का बहाना बनाता है, तो वही बात उन दूसरे पड़ोसी देशों पर भी लागू होती है जिन्हें ईरान ने छोड़ दिया। गौर करने वाली बात यह भी है कि ईरान के हमलों ने सिर्फ फौजी ठिकानों को नहीं, बल्कि रिहायशी इलाकों (Civilian areas) को भी नुकसान पहुँचाया।
इस नफरत की वजह क्या है?
इस सवाल का जवाब ईरान के हुक्मरानों की सोच में छिपा है। इसके पीछे "फारसी राष्ट्रवाद" (Persian Nationalism) और "फिरकापरस्ती" (Sectarianism) का वो मेल है जो अरबों के खिलाफ एक पुरानी नफरत रखता है। यह नस्ली भेदभाव (Racism) इतना गहरा है कि ईरान अपने ही संप्रदाय के अरब लोगों को भी नहीं बख्शता।
इतिहास गवाह है कि 1979 के इंकलाब के बाद से इस शासन ने अपने एजेंडे के लिए अरबों का इस्तेमाल किया और उन्हें युद्ध की आग में झोंक दिया—चाहे वो शाम (Syria) हो, लेबनान हो, यमन हो या इराक। यहाँ तक कि इराक में पवित्र मजारों और बाजारों में होने वाले धमाकों में भी अरबों का ही खून बहा।
धोखा और सियासत
हकीकत तो यह है कि अरब देशों ने पूरी कोशिश की कि अमेरिका को इस इलाके में सैन्य कार्रवाई से रोका जाए ताकि शांति बनी रहे। ईरान इन कोशिशों को जानता था, लेकिन बदले में उसने क्या दिया? उसने अपने मिसाइलों का रुख हमारे शांत देशों की तरफ कर दिया। यह सरासर "एहसान फरामोशी" और पुरानी दुश्मनी निकालने जैसा है। शाम से लेकर यमन और बहरीन तक, ईरान का दोहरा रवैया किसी से छिपा नहीं है।
ऐ अल्लाह! तू जालिमों को पकड़—चाहे वो ताकत के नशे में चूर बड़ी ताकतें हों, यहूदी (Zionists) हों या वो लोग जो मुसलमानों के लिए बुरा इरादा रखते हैं।
Wednesday, February 4, 2026
स्विट्ज़रलैंड में बच्चों का गोश्त खाने वाला फ़व्वारा!!
स्विट्ज़रलैंड में बच्चों का गोश्त खाने वाला फ़व्वारा!!
Wednesday, February 23, 2022
मेरा तजुर्बा है के हिंदुस्तान के तहरीकी मुजाहिदीन जिसके लिए भी नारे बाज़ी करते हैं उसे खतम करके ही दम लेते हैं,
मेरा तजुर्बा है के हिंदुस्तान के तहरीकी मुजाहिदीन जिसके लिए भी नारे बाज़ी करते हैं उसे खतम करके ही दम लेते हैं,
जैसे सद्दाम हुसैन, खलीजी जंग में ये लोग सद्दाम हुसैन के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे थे बाद में उसकी लुटिया डुबो दी,
लीबिया का साथ दिया , उसे भी बरबाद कर दिया ,
मुर्सी के हक में नारे बाजी की वह अल्लाह को प्यारे हो गए ,
सीरिया की आवाम के हक में बोलने लगे , उन्हे मुल्क छोड़कर दरबदर होना पड़ा,
इस लिए अच्छा है ये लोग सऊदी अरब के खिलाफ ही रहें,
साभार: शैख अब्दुल्लाह मुस्ताक
नोट : जो दिन रात अरबों की तबाही की तमन्ना और आरज़ूये करते हैं उन लोगों को भी फलस्तीन की फिक्र हो रहा है,
Blog: Islamicleaks
Tuesday, February 22, 2022
मदखली, मदखली, मदखली !!!,
जबसे हमने जमात "इख्वानुल मुस्लिमीन मिस्र" और उसकी दूसरी शक्ल फलस्तीन में " हमास" और उसकी तीसरी शक्ल बर्रे सगीर में " जमात ए इस्लामी", और खुसुसन हमारी जमात अहले हदीस (सलाफी) में से जो जमात ए इस्लामी के रहनुमाओं से मुतास्सिर हैं जिनके पिछले दिनों मैंने नाम भी लिए , उन इख्वानियों की जिस दिन से मैंने पकड़ शुरू की है और उनकी दुम पर पांव रखा है तो उसी दिन से उनकी चीखें निकल रहीं हैं,
मदखली, मदखली, मदखली !!!,
और मेरे हल्के से एक आलिम ए दीन ने फेसबुक पर पोस्ट लिख डाली के ,"जनाब ये लोग मदखली हैं जो उलेमा इजरायल के खिलाफ जिहाद यानी हमला का ऐलान नहीं कर रहे ,"
मेरा इनबॉक्स भरा पड़ा है, के जनाब आप हमास की मुखालिफत करते हैं वह तो मजलूमों की हिमायत कर रही है ,क्या आप जिहाद के मुनकिर हैं ??
आज से पच्चीस साल पहले भी हमें मुनकर ए जिहाद कहा गया था ,जब हमने लोगों को ये समझाया के " कश्मीर का जिहाद खालिस वतनियत का जिहाद है, कश्मीर बनेगा पाकिस्तान का नारा गलत है, पहले पाकिस्तान में तो इस्लाम नाफिज कर लो"
जब हमने ये बात लोगों को समझाना शुरू की तो जवाब में हमें मुंकर ए जिहाद कहा गया ,
अजीब बात ये है आज हमें मदखली कहने वाले वह लोग ही हैं जो कल को कश्मीर की लड़ाई को ऐन जिहाद कहा करते थे लेकिन जब हमारी मेहनत से जब उन्हें तागूत की समझ आई और इस बात का शाऊर हुआ के कुफफार के खिलाफ होने वाली हर लड़ाई जिहाद नहीं बन सकती जब तक के उसमे वह तमाम शरायत मौजूद ना हो जो इस्लाम के मुताबिक होनी चाहिए ,
लेकिन अफसोस ! आज फिर वही लोग हमारे मद्दे मुकाबिल हैं,इंशा अल्ला! अल्लाह से उम्मीद है के अल्लाह उन्हे इस मसले में भी समझ अता फरमाएगा,
मदखलियत
अब हम आते हैं इस बात की तरफ के मदखलियत क्या है, तारीफ तो वह होती है जो दुश्मन भी करे , तो हमारे मुखालिफ तारीफ क्या करते हैं ,उनके मुताबिक सादा अल्फाज़ में आप मदखाली उलेमा की तारीफ ये समझें
" जो उलेमा हुकमरानों के खिलाफ खुरूज को नाजायेज समझते हैं इल्ला ये के वह कुफ्र करें "
अब हम आते हैं अपने असल मौजू की तरफ, क्या हमारे 57 मुस्लिम मुमालिक के जो हुक्मरान हैं अगर वह अपने किसी कमजोरी की वजह से इजरायल पर हमला नहीं कर सकते और उनके यहां जो उलेमा हैं वह उनकी कमजोरी को देखते हुए खामोश हैं, या दूसरे अल्फाजों में वह इख्वानियों की तरह खुरुज नहीं कर रहे तो क्या ये उलेमा मदखली हैं ??
मेरा हर शक्श से सवाल है क्या हर मसला का हल हमला करना ही है कुछ मौके ऐसे होते हैं के जब ताकत न हो तो फिर दुआ ही करनी चाहिए, ये अक्लमंदी नहीं होती के आप अपनी ताकत का मवाजाना (Estimate) ही ना करें और मुखालिफ से भिड़ जाएं, और मैं ये बात अपनी तरफ से नहीं कह रहा हूं शरियत में इसका सबूत मौजूद है,
नबी ए करीम मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हज़रत आसिम बिन साबित की इमारत में दस अफ़राद का काफिला जासूसी की खातिर मक्का की तरफ भेजा , जिनमे से एक सहाबी हज़रत खुबैब बिन अदी भी थे, वाकया तफसील काफी लंबा है लेकिन मैं मुख्तसर बयान करूंगा के जब इन अशहाब रसूल को पकड़ा गया तो हज़रत आसिम बिन साबित ने अल्लाह से दुआ की, " ए अल्लाह हमारी गिरफ्तारी की खबर अल्लाह के रसूल को पहुंचा दे"
हज़रत आसिम तो मौके पर ही शहीद कर दिए गए और हज़रत खुबैब बिन अदि को मक्का में जाकर फरोख्त कर दिया गया,और फिर कुफ्फार ए मक्का ने बड़े ही दर्दनाक तरीके से हज़रत खूबैब बिन अदी को शहीद कर दिया,
इस वाकए में हमारे लिए एक नसीहत है, मदीना में रियासत भी कायम हो चुकी थी और ये वाक्या गज़वा उहूद के बाद का है और अल्लाह के रसूल को उनके दस सहाबा किराम की सुरत ए हाल से आगाह भी कर दिया गया था , लेकिन फिर भी अल्लाह के रसूल उनकी मदद के लिए क्यों न पहुंचे ,
आपने मस्जिद नबावी में अपने सहाबा किराम को इस वाकए का बताकर अपने अशहाब से सिर्फ दुआ का ही क्यों कहा , आपने सिर्फ दुआ ही की ( आज अगर हम दुआ का कहे तो मदखली ठहरें)
अल्लाह के रसूल ने कुफ्फार मक्का की इसी तरह ईजा रसानियों का आठ साल का इंतजार क्यों किया !!
अगर आज हम ये बात कहें के इजरायल पर हमला करने से पहले हम मुसलमान एक हों , हम ताकत हासिल करें,असलहा खरीदें जैसा के कुरआन कहता है के واعدو لھم ما استطاعتم (जिस तरह के इस वक्त हुकूमत ए सउदी का सालाना दिफाई बजट पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है , वह ताकत हासिल करने की कोशिश कर रहें हैं ,इंशा अल्लाह अल्लाह उन्हे एक ना एक दिन जरूर कामयाबी अता फरमाएगा)
कुफ्फार के मुकाबले मतलूबा ताकत हासिल करने से पहले अगर दुआएं करना मदखलियत है, तो मेरा सवाल उन हजरात से है के ," ए अल्लाह के रसूल हज़रत खुबैब बिन अदी और आसिम बिन साबित की मदद को क्यों ना पहुंचे हालांकि आसिम बिन साबित ने अल्लाह से दुआ भी की थी के हमारी मजलूमियत हमारी गिरफ्तारी की खबर अल्लाह के रसूल तक पहुंचा दे ,
और अल्लाह के रसूल को अल्लाह ने खबर भी दे दी थी लेकिन अल्लाह के रसूल अपने प्यारे सहाबियों की मदद को ना पहुंच सके थे, इस वाक्य में हमारे लिए एक नसीहत छुपी है के जज़्बात में नहीं आना चाहिए बदला लेने के लिए मुनासिब वक्त का इंतजार करना चाहिए , अभी फिलहाल दुआओं का वक्त है ,आप दुआएं करें
और जिन भाइयों को अल्लाह ने ताकत दी है उन्हे हम रोकते नहीं वह इजरायल जाएं और मजलूमीन की मदद करें, वह हमसे बेहतर होंगे इंशा अल्लाह,
लेकिन अगर वह भी हमारे साथ इधर ही बैठे हैं, सारा दिन अपना कारोबार कर रहें हैं, तो मेरा उनसे मशवरा है ज्यादा बातें करने की बजाए वह अपने फलस्तीन भाइयों के लिए दुआएं जरूर करें...
साभार: शैख अब्दुल खालिक भट्टी
हिंदी तर्जुमा محمد عمیر انصاری
Blog: Islamicleaks
Monday, February 21, 2022
ख्वारिज और रवाफिज का अहले सुन्नत वल जमात के साथ खूनी खेल,
ख्वारिज और रवाफिज का अहले सुन्नत वल जमात के साथ खूनी खेल,
काजी अयाज़ रहमतुल्लाह अपनी किताब " तरतीब उल मदारिक 5/303 " में लिखते है,
राफज़ी हुकूमत बनी उबैद के ज़माने कैरवान के अहले सुन्नत वल जमात बहुत ही परेशान कुन हालात से गुज़र रहे थे, छुप छुप कर जिंदगी गुजारते थे, राफजियों ने हुसैन अल आमी नामी शख्स को इस बात के लिए मुकर्रर कर रखा था के वह भरे बाज़ार में सहाबा किराम रिजवानुल्लाह को गाली दे, कभी कभी वो नबी ए अकरम मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को भी गाली देता ,सहाबा के नाम शराब की दुकानों कर लटकाए जाते , अगर अहले सुन्नत वल जमात का कोई फर्द हरकत भी करता तो उसकी गर्दन मार दी जाती,
उस ज़माने में जेनाता नामी कबाइल में एक शख्स था जिसकी कुन्नियत अबू यजीद थी, आबिद वा जाहिद था लेकिन ख्वारिज़ के सबसे शदीद फिरका सफरियाह से ताल्लुक रखता था , उसने अपनी जमात को लेकर राफज़ियो के खिलाफ मुहाज खोल दिया ,जब अहले सुन्नत वल जमात ने देखा तो उन्होंने इस खारीजी का साथ दिया क्योंकि ख्वारिज़ अहले सुन्नत वल जमात के नजदीक मुसलमान थे जबकि रवाफिज़ बिल्खुसूस बनी उबैद के रवाफिज़ काफिर थे,
चुनाँचे कैरवान के फुकहा , सुलहा , ऐम्मा वगेरह सभी ने रवाफिज़ की हुकूमत के खात्में के लिए ख्वारिज़ का साथ दिया , जंग की तैयारी शुरू हो गई , अबू यजीद खारजी की कयादत में लोग रवाफिज़ से मुकाबले के लिए निकले , अहले सुन्नत वल जमात के उलेमा वा फुकहा जिहाद का झंडा संभाले हुए थे, अल्लाह रब्बुल इज्जत उन्हे कामयाबी देता रहा , और आखिर में जब महदविया नामी शहर में रवाफिज़ का मुहासिरा कर लिया गया तो अबू यजीद खारजी ने देखा के अब तो हमारी हुकूमत बन्नी तय है, चुनांचे उसने अपनी खारजियत का असली चेहरा जाहिर कर दिया ,
अपनी खास फौज के कहा के," जब तुम रवाफिज़ से मुकाबला आराई के लिए जाना तो उलेमा ए कैरवान का साथ छोड़कर वापस चले आना ताकि रवाफिज़ उनसे अच्छी तरह बदला ले सकें, और ऐसा ही हुआ , रवाफिज़ ने चुन चुनकर कैरवान के उलेमा वा फुकहा और अहले सुन्नत वल जमात के अफ़राद को कत्ल कर दिया और खारीज़ी खबीस बैठकर मज़े लेता रहा "
ये काज़ी अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह का बयान था जिसे मैंने निहायत ही इख्तेसार के साथ बयान किया है, आज के दौर में कोई सोचता है के खारजी राय रखने वाले रवाफिज़ के साथ मिलकर बैतुल मुकद्दस फतह कर लेंगे तो ये उनकी भूल है, बैतुल मुकद्दस ज्यों का त्यों रहेगा बस अहले सुन्नत का वहां से सफाया हो जाएगा ,
ख्वारिज़ और रवाफिज़ दोनों का इजातकरदा (Founder) एक ही है और वह अब्दुल्लाह बिन सबा है, इसलिए दोनों के दिल आपस में मिलते हैं
فاعتبروا يا أولى الأبصار
साभार: अबू अहमद कलीमुद्दीन यूसुफ ( जामिया इस्लामियां मदीना मुनाववारा)
हिंदी तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks
Sunday, February 20, 2022
अमीरुल मोमिनीन खलीफा अब्दुल मालिक इब्ने मरवान -
अमीरुल मोमिनीन खलीफा अब्दुल मालिक इब्ने मरवान -
"हज़रत अमीर मुआविया रज़ि० की औलाद में यज़ीद के सिवा कोई खलीफा नहीं हुआ। लेकिन वो तमाम खलीफा जो यज़ीद के बाद तख़्त नशीं हुए अमीर मुआविया रज़ि० के खानदान बनी उमैया से ही ताल्लूक रखते थे,(बाप के बाद बेटे वाला झूठ हज़रत मोआविया र०अ० के दुश्मन ख़ारजी राफ़ज़ियों ने फैलाया)
अब्दुल मालिक 39 साल की उम्र में तख़्त पर बैठा, वो मदीने के बड़े आलिमों में गिना जाता था।
अब्दुल मालिक एक बहादुर शख्स था, उसे शुरुआत में कई बगावतों का सामना करना पड़ा। इन बग़ावतों में सबसे बड़ी बग़ावत खारज़ियों ने की जिनका मरकज़ इराक और ईरान था।
खारज़ियों ने कई साल तक बग़ावत को ज़ारी रखा, और आख़िर में मुहल्लब बिन अबी सफ़रह की कोशिशों से, जो अपने ज़माने के सबसे बड़े सिपहसालार थे, ये बग़ावतें कुचल दी गई और पूरी सल्तनत में अमन क़ायम किया।
अपने इन्हीं कामों की वजह से अब्दुल मालिक खानदान बनी उमैया का बानी समझा जाता है।
शुमाली अफ्रीका को भी अब्दुल मालिक के ही दौर में दोबारा फतह किया गया।
ये काम एक सिपहसालार "मूसा बिन नासिर" ने अंजाम दिया, जो 79 हिज़री में शुमाली अफ्रीका के हाकिम (गवर्नर) बनाए गए थे।
मूसा ने न सिर्फ शुमाली अफ्रीका को फतह किया बल्कि उन्होंने वहां इस्लाम की तब्लीक़ भी की।
उनके दौर में पूरा शुमाली अफ्रीका मुसलमान हो गया।
अब्दुल मालिक के ही दौर में इस्लामी समुंद्री फ़ौज़ की तरक्की हुई और उन्होंने तूनीस में एक जहाज बनाने का कारखाना क़ायम करवाया।
अब्दुल मालिक के दौर का सबसे बड़ा काम येरुशलम में कुब्बतुस - सखरा (गोल्डन गुम्बद) की तामीर करवाना है।"
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