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Saturday, February 12, 2022

आपको क्या लगता है पगड़ियों की इज्ज़त हमेशा औरत ही चुकाती है ?

 



आपको क्या लगता है पगड़ियों की इज्ज़त हमेशा औरत ही चुकाती है ?
आपको लगता है मुहब्बत सिर्फ औरत ही करती है ?
आपने कभी मुहब्बत में हारा हुआ मर्द नहीं देखा, आखिर मर्द जो ठहरा !!! शिकस्त को चेहरे पर नहीं लाता दुख को आंखों से नहीं बहाता ,

जिम्मेदारियों के बोझ से निढाल अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी शिकस्त को खामोशी से कुबूल करके उस ज़ख्म को सीने में दबा देता है, यहां तक के मुहब्बत का ज़ख्म नासूर बनकर उसको वक्त से पहले बूढ़ा करके कब्र तक ले जाता है

साभार: बहन अनम

Sunday, February 6, 2022

महिला सम्मान और इस्लाम

 




महिला सम्मान और इस्लाम

महिला सम्मान के खातिर हज्जाज बिन यूसुफ ने जो अपने दौर में एक जबरदस्त जरनैल था जिससे मुजरिम कांपते थे, उसने अपने भतीजे मुहम्मद बिन कासिम को साथ हज़ार लश्कर के साथ हिंद भेजा और भतीजे कासिम ने हज्जाज़ बिन यूसुफ की ख्वाहिश पूरी की और उस मुसलमान महिला हो राजा दाहिर के चंगुल से आजाद कराया,

ये तो थी एक मुस्लिम महिला के सम्मान की बात, क्या आप जानते हैं स्पेन में किस महिला के सम्मान के खातिर तारिक बिन जियाद ने स्पेन में रॉडिक की हुकूमत को धूल चटा दी थी,

वो महिला थी राजा रादरिक के गवर्नर जूलियन की बेटी फ्लोरिडा जो ईसाई थी,

याद रहे दोनो लश्कर कुशी का हुक्म का परवाना हज्जाज बिन यूसुफ के नाम है, जो बनू उमय्या के वक्त के बसरा वा कुफा का गवर्नर था, और आज के लिब्बू वा चलांडू कहते है औरतों को इस्लाम सम्मान नहीं देता

Monday, January 31, 2022

लोगों की शादियों में सैकड़ों लोग शामिल होते हैं

 



लोगों की शादियों में सैकड़ों लोग शामिल होते हैं, लोगों के इंतेकाल में सैकड़ों लोग शामिल होते हैं लेकिन जब वो जिंदगी के किसी मोड़ पर परेशानियों से घिर जाता है तब उसका साथ देने के लिए दो चार लोग होते हैं जिनसे समस्या हल नहीं होती, अगर यही शादी में बारात के रूप में या रिश्तेदारों के रूप में जो भीड़ आती है ये लोग रक्तदान या ईलाज के वक्त हॉस्पिटल में क्यों नही आते, थाने चौकी के मसलों के वक्त या माली तौर पर परेशानी के वक्त सपोर्ट क्यों नही करते, ये रिश्तेदारों की भीड़ सिर्फ़ शादी में मुर्ग मुसल्लम खाने के लिए ही है क्या ?

अगर लोग अहद कर लें कि हम परिवार में जिस भी निकाह में शामिल होंगे उनका तमाम जिंदगी ख्याल रखेंगे किसी भी दिक्कत परेशानी में साथ खड़े रहेंगे तो बहुत से लोगों की बहुत सी परेशानियां दूर हो सकती है, एकता में सबकी भलाई है अपने परिवार व रिश्तेदारों से बनाकर रखें एकजुट रहें नही तो आज जो लोग परेशानियों में मुब्तिला हैं वैसी परेशानी आपको भी घेरेगी।
हमारे घर परिवार के लोग ही हमे बचपन से अपने लोगों से नफरत करना सिखाते हैं अगर हम अपने परिवार की बातों को इग्नोर करके अपने नबी की बातों को मानना शुरू कर दें तो सबकी जिंदगी और आखिरत दोनो बन जाएगी।
In Sha Allah

Thursday, January 27, 2022

वो कहने लगी, ये बताओ मुहब्बत मासूम होती है या चालाक ??


 


वो कहने लगी, ये बताओ मुहब्बत मासूम होती है या चालाक ?? मैं उसके इस सवाल से हैरान रह गया , पता नहीं क्यों वह हर बार मेरा इम्तिहान ले लेती थी,

मैंने बहुत सोच कर जवाब दिया , देखो मुहब्बत बहुत सयानी और चालाक होती है, वह हंसने लगी और बोली, " नहीं सरकार ! मुहब्बत बहुत ही भोली और मासूम होती है , कब किससे हो जाए "

मैंने लंबी सांस ली और बोला ," देखो मुहब्बत के बारे में हर किसी की अजीब मन्तक है, कोई कहता है मुहब्बत एक बार होती है, और कोई कहता है इंसान को भटकने से ही महबूब हासिल होता है, "

पता है , कभी सोचना !!

मुहब्बत किसी यूनिवर्सिटी की लड़की को किसी जमादार से क्यों नहीं होती ?? मुहब्बत कभी किसी पढ़े लिखे लड़के को किसी भिकारन से क्यों नहीं होती ??

अच्छा ये सोचना , मुहब्बत किसी डॉक्टर या किसी अफसर को किसी बेवा या जिस्मफरोश औरत से क्यों नहीं होती जिसका कोई सहारा नहीं होता ?? तुमने कभी देखा है कितने मुहब्बत के दावेदार मुहब्बत को अंजाम तक पहुंचाते हैं,

अच्छा चलो , ये बताओ तुमको कभी किसी अनपढ़ गंवार मजदूर से मुहब्बत क्यों नहीं हुई ??

पता है, हर शख्स देखभाल कर ही अपना महबूब चुनता है , ये अब कहने की बातें हैं के मुझे शक्ल से कोई सरोकार नहीं,

आजकल की मुहब्बत में दर्जे हैं, और ये सच है के मुहब्बत कभी अपना दर्जा छोड़कर किसी दूसरे निचले दर्जे वाले से नहीं होती, हां हालात वा वाकयात का फर्क जरूर आ सकता है, वह ऐसे के एक अमीर लड़का एक खूबसूरत भिकारन से दो नंबरी इश्क करेगा , लेकिन सिर्फ अपने मतलब की हद तक और इस दौर में हर शख्स ही मुहब्बत के नाम पर औरत जात को भिकारन बना देता है लेकिन कुछ लोग सच्ची मुहब्बत करते हैं, लेकिन वहां पर औरत जात धोका दे जाती है,

इसी तरह दूसरी तरफ एक हुस्न परस्त लड़की एक खुबरू नौजवान से बीस नंबरी तक बड़ा महकता इश्क करेगी लेकिन वह इश्क सिर्फ वक्त गुजारी टाइमपास ही होगा, और ये वो हकीकत है जो कभी इश्क आशिकी के फसानों में कम और इस हकीकत में ज्यादा मिलेगी,

ये भी होता है के किसी को बिना देखे उसके लहजे से आवाज से,उसके अंदाज से हो जाती है मुहब्बत लेकिन, ए मेरे इश्क ! ये बात भी सच है के जब परदे उठते हैं तो ये मुहब्बत के नब्बे फीसद केस हवा में तहलील हो जाते हैं,

कहीं अब्बा नहीं मानता तो कहीं मुआशरा !!

बस, ए मेरे इश्क एक बात हमेशा याद रखना , या तो किसी के होना , या फिर किसी के ना होना ,और जिसके होना ,फिर उसके या अपने होने तक बस उसके ही होकर रहना , अगर तुम्हारा चाहने वाला अपना लहजा बदल ले तो उसकी खुशी की खातिर उससे दूर हो जाना ,

क्योंकि जब लहज़ा बदल जाए तो वजाहत कैसी ??

मनकूल

तर्जुमा :Umair Salafi 

Saturday, August 14, 2021

आज कल बड़े पैमाने मुस्लिम लड़कियां गैर मुस्लिम लड़कों के साथ भाग रही है




 आज कल बड़े पैमाने मुस्लिम लड़कियां गैर मुस्लिम लड़कों के साथ भाग रही है क्योंकि उनके साथ जॉब कर रही है, स्कूल कॉलेज में पढ़ रही है तो गलत माहौल मिला हुआ है नमाज़ छोड़ कर कुफ्र कर रही है अलग अब ये तो बंद नहीं किया जा सकता इसलिए माहौल चेंज करने के लिए अब वक्त आ गया है कि औरतों को मस्जिद में एंट्री दिया जाए (पहले बड़े शहरों के कुछ मस्जिद से शुरुआत हो), वहाँ उसके तालीम का भी प्रबंध हो उसे सब सही गलत बताया जाए, मिम्बर से इन मसलों पर बयान हो


अब वक्त आ गया है कि औरतों को मस्जिद में एंट्री दिया जाए (पहले बड़े शहरों के कुछ मस्जिद से शुरुआत हो), वहाँ उसके तालीम का भी प्रबंध हो उसे सब सही गलत बताया जाए. अब लड़कियाँ सब जगह जा ही रही है सिवाय मस्जिद के

अबू हुरैरा ने कहा कि: मर्दों के लिए सबसे आला दर्जे की सफ पहली है, और सबसे कमतर दर्जे की सफ आखरी सफ है, और औरतों के लिए सबसे बेहतरीन साफ आखरी सफ है और उनके लिए सबसे कमतर दर्जे की सफ पहली सफ है। (सहीह मुस्लिम ८८१)

इस सिलसिले में एक और हदीस है:
“सहल बिन साद ने रिवायत की: मैं ने देखा कि एक मर्द, बच्चों की तरह, अपने कम कपड़ों को, कपड़े की कमी की वजह से, अपनी गर्दनों के गिर्द बांधे हुए अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पीछे, नमाज़ अदा कर रहा था। मुनादी लगाने वालों में से एक ने कहा: ऐ मस्तुरात अपने सर नहीं उठाएं जब तक मर्द (उन्हें) अपना सर ना उठा लें।
(सहीह मुस्लिम: 883)

एक दूसरी हदीस, जिससे औरतों को मस्जिदों में जाने की इजाज़त साबित होती है:
सलीम ने इसकी रिवायत अपने बाप (अब्दुल्लाह बिन उमर) से की है, कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया कि: जब औरतें मस्जिद में जाने के लिए इजाज़त तलब करें, तो उन्हें मना मत करो।
(सहीह मुस्लिम:884)

एक और हदीस से इस मसले का तस्फिया होता है:
इब्ने उमर ने रिवायत की: औरतों को रात में मस्जिद में जाने की इजाज़त दो। उनके बेटे ने जिनका नाम वाकिद है कहा कि: तो वह फसाद पैदा करेंगी। (रावी) ने कहा: उन्होंने उन (बेटे) के साइन पर थपकी मारी और कहा कि: मैं तुम से अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीस ब्यान कर रहा हूँ, और तुम कहते हो: नहीं!
(सहीह मुस्लिम: 890)

अब्दुल्लाह (बिन उमर) की बीवी जैनब ने रिवायत की: अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हम से कहा: जब तुममें से कोई मस्जिद आए तो, उसे खुशबु नहीं लगानी चाहिए।
(सहीह मुस्लिम: 893)

उपरोक्त सभी हदीसें इस बात की तस्दीक करती हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने महिलाओं को मस्जिदों में जाने की इजाज़त दी है। तथापि मस्जिदों में जाना उनके लिए आवश्यक नहीं किया गया था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने केवल इतना कहा कि, अगर कोई औरत मस्जिद में नमाज़ अदा करना चाहती है तो रात में भी उसे ऐसा करने से नहीं रोका जाना चाहिए। महिलाओं को यह कहा गया था कि जब वह मस्जिद में जा रही हों तो, खुशबु ना लगाएं।

अपनी औरतों को मस्जिद में जाने की इजाजत दो तुम तो जुमा का खुतबा सुन कर नसीहत हासिल कर लेते हो पर तुम्हारी औरतें इसे गुमराह रहती है जिससे वह दीन (शरीयत इस्लाम) से दूर होती चली जाती है

जिस तरह से मस्जिद ए नबवी में और सउदी अरब मुख़्तलिफ़ मस्जिदो मे औरतों का इंतजाम मर्दों से सेपरेट है उसी तरह से हमे भारत में भी करना चाहिए तब औरतों का हक अदा होगा और वह दीन से करिब आएगी इंशॉल्लाह

Wednesday, August 11, 2021

आजकल एक मश्हूर नारा चल रहा है - 'मेरा जिस्म मेरी मर्ज़ी'

 



आजकल एक मश्हूर नारा चल रहा है - 'मेरा जिस्म मेरी मर्ज़ी'

हालांकि किसी भी इंसान की मर्ज़ी उसके जिस्म पर नहीं चलती

इंसान मुंह से खाता और बोलता है, नाक से सांस लेता और सूंघता है, कान से सुनता, आँख से देखता है, हाथ से चीज़ों को पकड़ता है, और पाँव से चलता है

दुनिया के लगभग हर इंसान के पास ये अंग होते हैं
लेकिन दुनिया का कोई भी इंसान इन अंगों के ऊपर अपनी मर्ज़ी नहीं चला सकता, इनके फंक्शन को नहीं बदल सकता

दुनिया का कोई भी इंसान नाक से नहीं देख सकता, आँख से नहीं सुन सकता, पाँव से सूंघ नहीं सकता, वो अपनी मर्ज़ी से एक अंग के फंक्शन नहीं बदल सकता उनकी औकात हि नही जो अपने हि जिस्म के अंग के कामो को अपने मन मानी मर्जी से चला सके मैं ईकरा अर्श खान कानपुरी पुरे रुये जमी पर जितने भी इंसान है उन सब को खुली चुनौती और चैलेंज दे रही हु अगर तुम सब मिल भी जाओ और सब मिल कर भी इस नेजामे कुदरत में किसी एक अंग के साथ भी उलट फेर कर के दिखा दो पूरे जिस्म की तो बात ही बहुत दूर है

इंसान के जिस्म पर उसकी मर्ज़ी नहीं चलती अगर चलती है तो कोई भी इंसान अपने उपर आयी मौत को रोक कर अपनी उम्र बढ़ा कर दिखाए औकात से जादा बड़ कर बोल देना बेशक आसान होता है लेकिन जब करने कि बारी आती है तो पता चलता है कि कौन कितना पानी में है कहने को तो सब लाखो करोडो़ कि बात करते हैं जैसे वो किसी बादशाह के बेटे हो और शाहनशाही खुद्दारी गुरुर घमंड भी ऐसा होता है जैसे वो इतना पावर फुल ताकतवर है कि उसे कभी किसी कि कोई जरुरत ही नहीं पडे़गी औकात और गुरुर घमंड का तब पता चलता है जब उसके मुसीबत पर उसके रवैईये से खुद उसी के रिश्तेदार दोस्त एहबाब उसका साथ नही देते और बात करते हैं अपनी जिंदगी अपने जिस्म और अपने मर्जी से जिने कि

सच तो ये है मर्ज़ी सिर्फ अल्लाह की चलती है इंसान तो बस एक मिट्टी का खिलौना है और वो अपनी मूर्खता का परिचय दुनिया को कराता है जाहीलाना जुम्ला बोल कर मेरा जिस्म और मेरी मर्जी अल्लाह की कुदरत को मत आजमाना भूल कर भी वर्ना कही तुम्हारे जिस्म मे जान तो रहेगी लेकिन तुम अपने ही बिस्तर से उठने लायक नही रहोगे और तुम्हारे जिंदगी का सहारा एक मामूली सा इंसान हि होगा इस लिए रब के इस्लाम के खिलाफ जाने कि भूल कर भी कोशीश मत करना कुर्आन हदीस को 💕 लगा कर पढ़े और उस पर अमल करने कि कोशीश करेंगे तो हर परेशानी दुःख दर्द बिमारी से महफूज रहोगे इंशा अल्लाह

#ईकरा_अर्श_खान_कानपुरी 🌹🤲🌹

Saturday, August 7, 2021

जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदते हैं,

 



जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदते हैं,


दो औरतें काज़ी इब्न अबी लाइली की अदालत में पहुंच गईं, ये अपने वक्त के मशहूर वा मारूफ काज़ी थे,

काज़ी ने पूछा ," तुम दोनो में से किसको पहले बात करनी है?" उन में से बड़ी उम्र वाली औरत ने दूसरी से कहा तुम अपनी बात काज़ी साहब के आगे रखो,

वह कहने लगी काज़ी साहब ये मेरी फूफी है मैं इसे अम्मी कहती हूं चूंकि मेरे वालिद के इंतकाल के बाद इसी ने मेरी परवरिश की है यहां तक कि मैं जवान हो गई,

काज़ी ने पूछा इसके बाद ?? वह कहने लगी फिर मेरे चाचा के बेटे ने मंगनी का पैगाम भेजा इन्होने उनसे मेरी शादी कर दी, मेरी शादी को कई साल गुजर गए अजदावाजी जिंदगी खूब अच्छी चल रही थी, एक दिन मेरी ये फूफी मेरे घर आई और मेरे शौहर को अपनी बेटी से दूसरी शादी की ऑफर कर ली साथ ये शर्त रख ली के पहली बीवी (यानी मैं) का मामला फूफी के हाथ में सौंप दे , मेरे शौहर ने कुंवारी से शादी के चक्कर में शर्त मान ली, मेरे शौहर की दूसरी शादी हुई, सुहागरात को मेरी फूफी मेरे पास आई और मुझसे कहा," तुम्हारे शौहर के साथ मैंने अपनी बेटी ब्याह दी है तुम्हारे शौहर ने तुम्हारा मामला मेरे हाथ सौंप दिया है मैं तुझे तेरे शौहर की वकालत करते हुए तलाक देती हूं "

काज़ी साहब मेरी तलाक हो गई,

कुछ दिनों बाद मेरी फूफी का शौहर सफर से थक हारे पहुंच गया वह एक शायर और हुस्न परस्त इन्सान थे, मैं बन संवर कर उनके सामने बैठ गई और उनसे कहा, " क्या आप मुझसे शादी करेंगे ?? उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा , उसने फौरन हां कर ली, मैंने उनके सामने शर्त रख दी के आपकी पहली बीवी ( यानी मेरी फूफी) का मामला मेरे हाथ सौंप दें , उसने ऐसा ही किया,

मैने वकालत का हक इस्तेमाल करते हुए फूफी को तलाक दे डाली और फूफी के पहले शौहर से शादी कर ली,

काज़ी ने हैरत से कहा," फिर !!"

वह कहने लगी काज़ी साहब कहानी अभी खतम नहीं हुई, कुछ अरसे बाद मेरे इस शौहर का इंतकाल हुआ , मेरी ये फूफी विरासत का मुतालबा करते पहुंच गई मैंने इससे कहा के , " मेरे शौहर ने तुम्हे अपनी जिंदगी में तलाक दी थी अब विरासत में तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं है,"

झगड़ा तवील पकड़ा इस दौरान मेरी इद्दत भी गुजर गई, एक दिन मेरी ये फूफी अपनी बेटी और दामाद (मेरा पहला शौहर) को लेकर मेरे घर आई और विरासत के झगड़े में मेरे इस पहले शौहर को सालिस (Arbitrator) बनाया , उसने मुझे कई सालों बाद देखा था , मर्द अपनी पहली मुहब्बत नहीं भूलता है, चुनांचे मुझसे यूं मिलकर उसकी पहली मुहब्बत ने अंगड़ाई ली मैंने उनसे कहा ," क्या फिर मुझसे शादी करोगे ??" उसने हां कर ली,

मैने उनके सामने शर्त रख ली के अपनी पहली बीवी ( मेरी फूफी की बेटी) का मामला मेरे हाथ में दें, उसने ऐसा ही किया , मैने अपने पहले शौहर से शादी कर ली और उसकी बीवी को शौहर की वकालत करते हुए तलाक दे दी,

काज़ी इब्न अबी लाइली सर पकड़ कर बैठ गए , फिर पूछा के ," इस केस में अब मसला क्या है ??"

मेरी फूफी कहने लगी," काज़ी साहब क्या ये हराम नहीं के मैं और मेरी बेटी दोनों की ये लड़की तलाक करवा चुकी है फिर मेरा शौहर और मेरी बेटी का शौहर भी ले उड़ी, इसी पर बस नहीं दोनो शौहरों की विरासत भी अपने नाम कर ली "

काज़ी इब्न अबी लाइली कहने लगे ," मुझे तो इस केस में हराम कहीं नजर नहीं आया, तलाक भी सही है, वकालत भी जायज है,तलाक के बाद बीवी पहले शौहर के पास दोबारा जा सकती है बशर्ते के दरमियान में किसी और से उसकी शादी हो कर तलाक या शौहर फौत हुआ हो, तुम्हारी कहानी में भी ऐसा ही हुआ है "

इसके बाद काज़ी ने खलीफा मंसूर को ये वाकया सुनाया , खलीफा हंस हंस कर लोटपोट हो गए और कहा के ," जो कोई अपने भाई के लिए गड्ढा खोदेगा ,खुद उसी गड्डे में गिरेगा , ये बुढिया तो गड्डे की बजाए गहरे समुंदर में गिर गई "
كتاب :جمع الجواهر في - الحُصري

साभार: फिरदौस जमाल
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Saturday, July 24, 2021

हम कहां से नापाक हो रहे हैं ??

 



हम कहां से नापाक हो रहे हैं ??


ये सवाल खुसुसन नफसानी ख्वाहिश शहवत के बारे में पूछा गया था,

अल्लाह ताला ने इंसान को इसी तरह से डिजाइन किया है के ये उसकी जिस्मानी जरूरत है, अल्लाह ताला ने ये ज़रूरत जानवरों में भी रखी है, जानवर इस में किसी भी तरह की तमीज नहीं करता , मगर इंसान को इसे कंट्रोल करने का हुक्म दिया है, इंसान को हुक्म दिया है के वह हलाल तरीके से इस ज़रूरत को पूरा करे, निकाह करे,

लेकिन समाज में अब जानवरों का सा बिगाड़ देखने को मिलता है, हमने ऐसी खबरें भी देखीं जब बेटी बाप से महफूज़ नहीं थी और बहन भाई से ना बच सकी, जब हलाल तरीके से ज़रूरत पूरी करने के बजाए हर औरत को शहवत की नज़र से देखा जाने लगा,इनको हम भेड़िया नहीं कहेंगे क्योंकि भेड़िया वह अकेला जानवर है जो अपनी जोड़ी के इलावा किसी के साथ भी ताल्लुक कायम नहीं करता,

अब ये नापाकी कहां से आ रही है ?? ये बहुत छोटे छोटे सुराखों से दाखिल होकर हमारी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा बनी है, पता है कैसे ??

पहले दिल की समझ नहीं थी तो बुराई देखकर दिल मुंह को भी नहीं आता था , अब ज़रा दिल खुला है तो सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हुए किसी लड़की का जिस्म दिखाती तस्वीर भी सामने से गुजरे या बेहयाई फैलाते " खुले ज़ेहन" के लोगों के पोस्ट देखें तो मैं वह पेज या ग्रुप छोड़ देती हूं ,क्योंकि ये ही वो छोटे छोटे सुराख हैं जहां से नापाकी दाखिल होती है,

शहवत वह लावा है जिसे फटने को बस एक जरा सी सहूलियत चाहिए होती है और वह जरूरत इंटरनेट ने पूरी कर दी है, तजससुस इंसान के खमीर में है, जब बारह चौदह साल की बच्ची या बच्चा को मालूम होता है के ये भी कोई लज्जत है तो वह उसे और ज़्यादा जानने की कोशिश करता है और जानते जानते एक दिन वह खुद उसका हिस्सा बन जाता है, फिर ये लावा नेकियां करने से नहीं बुझता ,

क्या आपने कभी सुना है के किसी लावे को बारिश ने बुझा दिया है ?? नहीं सुना होगा , लावे को तो एक दिन फटना ही है,लेकिन अगर फटना ही है तो क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें ?? नहीं बल्कि इसके ऊपर एक मजबूत इमारत बनाए के अगर लावा फट भी जाए तो किरदार की दीवारें ना गिरें, ज़लजले से किरदार तबाह ना हो, समझ रहें हैं ?? यानी अब अगर आपकी शहवत को सहूलियत मयस्सर आ चुकी है तो क्या हम किरदार की इमारतें मज़बूत कर सकते हैं ?? हम सब जानते हैं हमारी जिंदगी में कौन से सुराख हैं जहां से बेहयाई और नापाकि दाखिल हो रही है, तो क्या उनसे बचने के लिए हमने कोई तदबीर की ?? वह ग्रुप, वह पेज ,वह नोवेल , वह ड्रामा, वह फिल्म, वह वेबसाइट, वह साथ, वह दोस्ती, जो आपको गुनाह करने पर मजबूर करती है, क्या आपने उसे छोड़ा ??

अच्छा मुझे बताएं एक सुराख से आपने सांप निकलते देखा तो क्या दोबारा उस पर हाथ रखेंगे ?? नहीं ना !! क्योंकि जान का खतरा लाहक है,

तो प्यारे लोगों ! बेहयाई के ये सुराख भी ऐसे ही खतरनाक सांप लिए हुए हैं जो आपकी ईमान को निगल जाएगी, आपका ईमान बहुत कीमती है, आपकी जान/नफ्स बहुत कीमती है,

वह जान जिसके बदले में जन्नत मिलना थी, जिसके बदले में अल्लाह की मुलाकात और दीदार रब मयस्सर आना है, उस जान की कीमत हमने बहुत थोड़ी पाई, यानी उस कीमती जान के बदले हमने म्यूजिक, शहवत, झूट जैसे गुनाहों को खरीद लिया जिनकी लज़्जत यकीनन फानी है, अल्लाह ताला ख़ुद कहता है,

" जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही खरीदी , उनकी तिजारत उनके लिए नफामंद ना हुई और उन्होंने थोड़ी कीमत पाई"

ये दो आयतों का मफहूम है, यानी हिदायत को छोड़कर गुमराही खरीद लेना इंतेहाई सस्ता सौदा है,

साभार : फाखरा वहीद
तरजुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks 

Tuesday, July 20, 2021

औरत जिस रूप में भी आपकी ज़िंदगी में शामिल है उसकी कद्र करो,

 



एक खूबसूरत तहरीर


कहते हैं के शादी के बाद औरत का चेहरा और जिस्मानी हालत बताती है के उसके शौहर ने उसे किस हालत में रखा हुआ है, वह औरतें कभी बूढ़ी नहीं होती जिनके शौहर उन पर जान छिड़कते हैं,

शादी से पहले लड़की मुनासिब शक्ल सूरत की होती है जो पहन ओढ़ कर अच्छा लगती है, मगर शादी के बाद शौहर की तवज्जोह, मुहब्बत और इज़्ज़त औरत के चेहरे को ऐसा निखारती है के वह मजीद खूबसूरत होती चली जाती है,

शादी के दस बीस साल बीत जाने के बाद भी औरत खूबसूरत और कम उम्र लग सकती है के देखने वाले दंग रह जाएं और ज़ौजैन की किस्मत पर रश्क करते ना थकें, लोग हमेशा औरत को इल्जाम देते हैं के वह अपना ख्याल नहीं रखती जिसका शौहर ही उसे इज्जत वा अहमियत ना देता हो तो वह भला किसके लिए सजे संवरे,

कहते हैं के औरत को तुम जैसा कहोगे वह वैसा ही बनती चली जायेगी, उसे बदसूरत और फूहड़ कहोगे तो वही बनती चली जायेगी और उसे खूबसूरत और सलीकामंद कहोगे तो वह खुदबखुद वैसी ही बनती चली जायेगी,

नबी ए करीम मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम फरमाते हैं," तुम में से सबसे बहतरीन शख्स वह है जो अपनी औरत के साथ सबसे बेहतर सुलूक करे "

औरत इतनी अजीम है, अशरफुल मखलूक है, इस हद तक नाजुक मिजाज़ है के फूल उसे राज़ी और खुश कर देता है, और एक लफ्ज़ उसे मार देता है,

तो बस ए मर्दों ख्याल रखो औरत तुम्हारे दिल के नजदीक बनाई गई है ताकि तुम अपने दिल में उसको जगह दो,

औरत अपने बचपन में अपने बाप के लिए बरकत के दरवाज़े खोलती है, अपनी जवानी में अपने शौहर का ईमान मुकम्मल करती है, और जब मां बनती है तो जन्नत उसके कदमों के नीचे होती है,

औरत जिस रूप में भी आपकी ज़िंदगी में शामिल है उसकी कद्र करो,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Saturday, July 17, 2021

"मैं नमाज़ पढ़ना शुरू करती हूं फिर छूट जाती है

 



"मैं नमाज़ पढ़ना शुरू करती हूं फिर छूट जाती है, कभी बहुत अच्छा लगता है, कभी नमाज़ सुकून देती है मगर थोड़े ही वक्त बाद बेजारियत हो जाती है, नमाज़ बोझ लगती है, मुझे अपना भारी वजूद नमाज़ के लिए उठाना मुश्किल लगता है,"


वह बहुत थके हुए लहज़े में कह रही थी, मुझे लग रहा था बात करते करते उसका सांस फूल रहा है, वह मुझे ज़ाहिरी नहीं बातिनी तौर पर थकी हुई महसूस हुई,

" नज़र का पर्दा करती हो ??" मैंने नरमी से उसे देखते हुए उससे सवाल किया , उसने हैरत से मेरी तरफ देखा , इस बात की शायद उसे तवक्को नहीं थी,

" नज़र का पर्दा?? " मैं... मैं.. तो नकाब करती हूं खुद, मैं समझी नहीं... नज़र के परदे का क्या ताल्लुक नमाज़ से...?? अल्फ़ाज़ बेतरतीब थे...

मैं मुस्कुरा दी, " ताल्लुक तो है, बहुत गहरा है" बुरी नज़र शैतान के जहरीले तीरों में से एक तीर है जो इंसान के दिल में उतर जाता है, पर्दा करना तो बहुत आसान है मगर नज़र का पर्दा कुछ मुश्किल है, जब निगाह पाक नहीं रहती ना तो इबादतों में लज्जत जाती रहती है,

जब निगाह पाक नहीं रहती तो सोच भी पाक नहीं रहती, और जब सोच खराब तो नियत खराब , और अमाल का दारोमदार तो है ही नियतों पर, तुम्हे पता है ??

इंसान जो सोचता है, देखता है, जो सुनता है वह उसके दिल पर असर रखता है, हम क्या देखते हैं, क्या सुनते हैं, क्या बात करते हैं ,कभी सोचा है ?? तुम खुद तो पर्दा करती हो तो क्या हर वह नामहरम जो तुम्हारी नज़र को अच्छा लगे , उसे पहली नज़र के बाद अपनी नफ्स की तस्कीन के लिए कितनी बार देखती हो के वह किस कदर खूबसूरत है ??

फेसबुक पर कोई गैर मुनासिब तस्वीर , कोई वीडियो, कोई बात, जब कोई नहीं देख रहा होता , तन्हाई में, मगर सिर्फ अल्लाह !! तो क्या एक बार इस पर रुकती हो ?? कभी कोई फिल्म, कोई गाना जिसमे नामहरम तो खैर छोड़ो...हमारी अपनी सनफ का भी पर्दा पूरा नहीं होता, बेख्याली में देख लेती हो ??

और फिर नमहरम हमारे इर्द गिर्द के मर्द तो नहीं है ना... ये जो टीवी पर आने वाले एक्टर्स, मॉडल, जिनकी गायबाना मुहब्बत में हम गिरफ्तार होते हैं , उन्हे गौर से देखते हैं, उनकी बॉडी, ड्रेसिंग, और लुक्स की तारीफ, ये सब नज़र का पर्दा खतम करने के बाद ही हो पाता है,

तो तुम सोचो, मैं नहीं कह रही इसका जवाब मुझे दो, अपना मुहासबा करो, इसका जवाब अपने दिल को दो, अगर इसका जवाब " हां " में आए तो समझ जाओ ये नज़र की ख्यानत तुमसे तुम्हारी इबादत की लज्जत छीन रही है, दिल को सियाह कर रही है,

ज़िना सिर्फ एक तरह का तो नहीं होता , अगर हाथ से कुछ गलत छुआ तो वो हाथ का ज़िना, ज़बान से गंदी बात कहीं तो ज़बान का ज़िना, आंखों से कुछ हराम देखा तो वह आंख का ज़िना है, नज़र की बेपरदगी दिल में ऐसा सुराख कर देती है के जिससे हमारे दिल का नूर बहता जाता है, और फिर जो लोग नज़र का पर्दा नहीं करते उनकी नमाजे उनपर भारी हो जाती हैं, अगर वह नमाज़ पढ़ भी लें तो बेदिली से पढ़ते हैं, दिल नहीं लगता , बोझ सा रहता है दिल पर , तो क्या तुम नज़र का पर्दा करती हो ??

अगर "नहीं" तो आज से अहद कर लो के करोगी, जब कभी गलती से कुछ गलत देख भी लो, अगर कभी तुम्हारा नफ्स तुम्हारे ईमान पर हावी भी हो जाए तो फौरन इस्तगफार कर लिया करो, अल्लाह की तरफ रुजू कर लिया करो , फिर तुम देखना नमाज़ों का लुत्फ , इबादतों की लज्जत और दिल का सुकून, सब तुम्हे अता कर दिया जाएगा,

और एक और बात, सुकून नमाज़ में रखा गया है के कुरआन खुद कहता है के ," बेशक अल्लाह के जिक्र से दिलों को सुकून हासिल है "

अब अगर किसी को वो सुकून महसूस नहीं होता ना , तो उसे एक मिसाल से समझो, एक बीमार सख्स है, उसको आप उसके पसंदीदा खाना लाकर दो वह नहीं खाएगा, अब वह कहे की खाने में वह लज़्ज़त नहीं है ये तो कोई बात नहीं है ना, खाने में लज्जत है, खाना वही है, मगर उसका मादा बीमार है,

इसी तरह सुकून इबादत में रखा गया है लेकिन जिसको नहीं मिलता उसे समझ जाना चाहिए के उसका दिल बीमार है, और उस दिल की सेहतयाबी का नज़र की हिफाजत से बहुत गहरा ताल्लुक है,

मैंने तहम्मुल से अपनी बात मुकम्मल करके उसकी जानिब देखा , जो बात मैने खुद एक अरसे की कोशिश, बेचैनी और अजतराब के बाद समझी थी वह उस तक पहुंचा दी थी, मुझे जवाब की जरूरत नहीं रही थी, उसकी आंखों की चमक मेरे लिए काफी थी....,

मनकूल

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks