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Wednesday, February 23, 2022

मेरा तजुर्बा है के हिंदुस्तान के तहरीकी मुजाहिदीन जिसके लिए भी नारे बाज़ी करते हैं उसे खतम करके ही दम लेते हैं,

 



मेरा तजुर्बा है के हिंदुस्तान के तहरीकी मुजाहिदीन जिसके लिए भी नारे बाज़ी करते हैं उसे खतम करके ही दम लेते हैं,


जैसे सद्दाम हुसैन, खलीजी जंग में ये लोग सद्दाम हुसैन के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे थे बाद में उसकी लुटिया डुबो दी,

लीबिया का साथ दिया , उसे भी बरबाद कर दिया ,

मुर्सी के हक में नारे बाजी की वह अल्लाह को प्यारे हो गए ,

सीरिया की आवाम के हक में बोलने लगे , उन्हे मुल्क छोड़कर दरबदर होना पड़ा,

इस लिए अच्छा है ये लोग सऊदी अरब के खिलाफ ही रहें,

साभार: शैख अब्दुल्लाह मुस्ताक

नोट : जो दिन रात अरबों की तबाही की तमन्ना और आरज़ूये करते हैं उन लोगों को भी फलस्तीन की फिक्र हो रहा है,

Blog: Islamicleaks 


Tuesday, February 22, 2022

मदखली, मदखली, मदखली !!!,

 



जबसे हमने जमात "इख्वानुल मुस्लिमीन मिस्र" और उसकी दूसरी शक्ल फलस्तीन में " हमास" और उसकी तीसरी शक्ल बर्रे सगीर में " जमात ए इस्लामी", और खुसुसन हमारी जमात अहले हदीस (सलाफी) में से जो जमात ए इस्लामी के रहनुमाओं से मुतास्सिर हैं जिनके पिछले दिनों मैंने नाम भी लिए , उन इख्वानियों की जिस दिन से मैंने पकड़ शुरू की है और उनकी दुम पर पांव रखा है तो उसी दिन से उनकी चीखें निकल रहीं हैं,


मदखली, मदखली, मदखली !!!,

और मेरे हल्के से एक आलिम ए दीन ने फेसबुक पर पोस्ट लिख डाली के ,"जनाब ये लोग मदखली हैं जो उलेमा इजरायल के खिलाफ जिहाद यानी हमला का ऐलान नहीं कर रहे ,"

मेरा इनबॉक्स भरा पड़ा है, के जनाब आप हमास की मुखालिफत करते हैं वह तो मजलूमों की हिमायत कर रही है ,क्या आप जिहाद के मुनकिर हैं ??

आज से पच्चीस साल पहले भी हमें मुनकर ए जिहाद कहा गया था ,जब हमने लोगों को ये समझाया के " कश्मीर का जिहाद खालिस वतनियत का जिहाद है, कश्मीर बनेगा पाकिस्तान का नारा गलत है, पहले पाकिस्तान में तो इस्लाम नाफिज कर लो"

जब हमने ये बात लोगों को समझाना शुरू की तो जवाब में हमें मुंकर ए जिहाद कहा गया ,

अजीब बात ये है आज हमें मदखली कहने वाले वह लोग ही हैं जो कल को कश्मीर की लड़ाई को ऐन जिहाद कहा करते थे लेकिन जब हमारी मेहनत से जब उन्हें तागूत की समझ आई और इस बात का शाऊर हुआ के कुफफार के खिलाफ होने वाली हर लड़ाई जिहाद नहीं बन सकती जब तक के उसमे वह तमाम शरायत मौजूद ना हो जो इस्लाम के मुताबिक होनी चाहिए ,

लेकिन अफसोस ! आज फिर वही लोग हमारे मद्दे मुकाबिल हैं,इंशा अल्ला! अल्लाह से उम्मीद है के अल्लाह उन्हे इस मसले में भी समझ अता फरमाएगा,

मदखलियत

अब हम आते हैं इस बात की तरफ के मदखलियत क्या है, तारीफ तो वह होती है जो दुश्मन भी करे , तो हमारे मुखालिफ तारीफ क्या करते हैं ,उनके मुताबिक सादा अल्फाज़ में आप मदखाली उलेमा की तारीफ ये समझें

" जो उलेमा हुकमरानों के खिलाफ खुरूज को नाजायेज समझते हैं इल्ला ये के वह कुफ्र करें "

अब हम आते हैं अपने असल मौजू की तरफ, क्या हमारे 57 मुस्लिम मुमालिक के जो हुक्मरान हैं अगर वह अपने किसी कमजोरी की वजह से इजरायल पर हमला नहीं कर सकते और उनके यहां जो उलेमा हैं वह उनकी कमजोरी को देखते हुए खामोश हैं, या दूसरे अल्फाजों में वह इख्वानियों की तरह खुरुज नहीं कर रहे तो क्या ये उलेमा मदखली हैं ??

मेरा हर शक्श से सवाल है क्या हर मसला का हल हमला करना ही है कुछ मौके ऐसे होते हैं के जब ताकत न हो तो फिर दुआ ही करनी चाहिए, ये अक्लमंदी नहीं होती के आप अपनी ताकत का मवाजाना (Estimate) ही ना करें और मुखालिफ से भिड़ जाएं, और मैं ये बात अपनी तरफ से नहीं कह रहा हूं शरियत में इसका सबूत मौजूद है,

नबी ए करीम मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हज़रत आसिम बिन साबित की इमारत में दस अफ़राद का काफिला जासूसी की खातिर मक्का की तरफ भेजा , जिनमे से एक सहाबी हज़रत खुबैब बिन अदी भी थे, वाकया तफसील काफी लंबा है लेकिन मैं मुख्तसर बयान करूंगा के जब इन अशहाब रसूल को पकड़ा गया तो हज़रत आसिम बिन साबित ने अल्लाह से दुआ की, " ए अल्लाह हमारी गिरफ्तारी की खबर अल्लाह के रसूल को पहुंचा दे"

हज़रत आसिम तो मौके पर ही शहीद कर दिए गए और हज़रत खुबैब बिन अदि को मक्का में जाकर फरोख्त कर दिया गया,और फिर कुफ्फार ए मक्का ने बड़े ही दर्दनाक तरीके से हज़रत खूबैब बिन अदी को शहीद कर दिया,

इस वाकए में हमारे लिए एक नसीहत है, मदीना में रियासत भी कायम हो चुकी थी और ये वाक्या गज़वा उहूद के बाद का है और अल्लाह के रसूल को उनके दस सहाबा किराम की सुरत ए हाल से आगाह भी कर दिया गया था , लेकिन फिर भी अल्लाह के रसूल उनकी मदद के लिए क्यों न पहुंचे ,

आपने मस्जिद नबावी में अपने सहाबा किराम को इस वाकए का बताकर अपने अशहाब से सिर्फ दुआ का ही क्यों कहा , आपने सिर्फ दुआ ही की ( आज अगर हम दुआ का कहे तो मदखली ठहरें)
अल्लाह के रसूल ने कुफ्फार मक्का की इसी तरह ईजा रसानियों का आठ साल का इंतजार क्यों किया !!

अगर आज हम ये बात कहें के इजरायल पर हमला करने से पहले हम मुसलमान एक हों , हम ताकत हासिल करें,असलहा खरीदें जैसा के कुरआन कहता है के واعدو لھم ما استطاعتم (जिस तरह के इस वक्त हुकूमत ए सउदी का सालाना दिफाई बजट पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है , वह ताकत हासिल करने की कोशिश कर रहें हैं ,इंशा अल्लाह अल्लाह उन्हे एक ना एक दिन जरूर कामयाबी अता फरमाएगा)

कुफ्फार के मुकाबले मतलूबा ताकत हासिल करने से पहले अगर दुआएं करना मदखलियत है, तो मेरा सवाल उन हजरात से है के ," ए अल्लाह के रसूल हज़रत खुबैब बिन अदी और आसिम बिन साबित की मदद को क्यों ना पहुंचे हालांकि आसिम बिन साबित ने अल्लाह से दुआ भी की थी के हमारी मजलूमियत हमारी गिरफ्तारी की खबर अल्लाह के रसूल तक पहुंचा दे ,

और अल्लाह के रसूल को अल्लाह ने खबर भी दे दी थी लेकिन अल्लाह के रसूल अपने प्यारे सहाबियों की मदद को ना पहुंच सके थे, इस वाक्य में हमारे लिए एक नसीहत छुपी है के जज़्बात में नहीं आना चाहिए बदला लेने के लिए मुनासिब वक्त का इंतजार करना चाहिए , अभी फिलहाल दुआओं का वक्त है ,आप दुआएं करें

और जिन भाइयों को अल्लाह ने ताकत दी है उन्हे हम रोकते नहीं वह इजरायल जाएं और मजलूमीन की मदद करें, वह हमसे बेहतर होंगे इंशा अल्लाह,

लेकिन अगर वह भी हमारे साथ इधर ही बैठे हैं, सारा दिन अपना कारोबार कर रहें हैं, तो मेरा उनसे मशवरा है ज्यादा बातें करने की बजाए वह अपने फलस्तीन भाइयों के लिए दुआएं जरूर करें...

साभार: शैख अब्दुल खालिक भट्टी
हिंदी तर्जुमा محمد عمیر انصاری
Blog: Islamicleaks 

Monday, February 21, 2022

ख्वारिज और रवाफिज का अहले सुन्नत वल जमात के साथ खूनी खेल,




 ख्वारिज और रवाफिज का अहले सुन्नत वल जमात के साथ खूनी खेल,


काजी अयाज़ रहमतुल्लाह अपनी किताब " तरतीब उल मदारिक 5/303 " में लिखते है,

राफज़ी हुकूमत बनी उबैद के ज़माने कैरवान के अहले सुन्नत वल जमात बहुत ही परेशान कुन हालात से गुज़र रहे थे, छुप छुप कर जिंदगी गुजारते थे, राफजियों ने हुसैन अल आमी नामी शख्स को इस बात के लिए मुकर्रर कर रखा था के वह भरे बाज़ार में सहाबा किराम रिजवानुल्लाह को गाली दे, कभी कभी वो नबी ए अकरम मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को भी गाली देता ,सहाबा के नाम शराब की दुकानों कर लटकाए जाते , अगर अहले सुन्नत वल जमात का कोई फर्द हरकत भी करता तो उसकी गर्दन मार दी जाती,

उस ज़माने में जेनाता नामी कबाइल में एक शख्स था जिसकी कुन्नियत अबू यजीद थी, आबिद वा जाहिद था लेकिन ख्वारिज़ के सबसे शदीद फिरका सफरियाह से ताल्लुक रखता था , उसने अपनी जमात को लेकर राफज़ियो के खिलाफ मुहाज खोल दिया ,जब अहले सुन्नत वल जमात ने देखा तो उन्होंने इस खारीजी का साथ दिया क्योंकि ख्वारिज़ अहले सुन्नत वल जमात के नजदीक मुसलमान थे जबकि रवाफिज़ बिल्खुसूस बनी उबैद के रवाफिज़ काफिर थे,

चुनाँचे कैरवान के फुकहा , सुलहा , ऐम्मा वगेरह सभी ने रवाफिज़ की हुकूमत के खात्में के लिए ख्वारिज़ का साथ दिया , जंग की तैयारी शुरू हो गई , अबू यजीद खारजी की कयादत में लोग रवाफिज़ से मुकाबले के लिए निकले , अहले सुन्नत वल जमात के उलेमा वा फुकहा जिहाद का झंडा संभाले हुए थे, अल्लाह रब्बुल इज्जत उन्हे कामयाबी देता रहा , और आखिर में जब महदविया नामी शहर में रवाफिज़ का मुहासिरा कर लिया गया तो अबू यजीद खारजी ने देखा के अब तो हमारी हुकूमत बन्नी तय है, चुनांचे उसने अपनी खारजियत का असली चेहरा जाहिर कर दिया ,

अपनी खास फौज के कहा के," जब तुम रवाफिज़ से मुकाबला आराई के लिए जाना तो उलेमा ए कैरवान का साथ छोड़कर वापस चले आना ताकि रवाफिज़ उनसे अच्छी तरह बदला ले सकें, और ऐसा ही हुआ , रवाफिज़ ने चुन चुनकर कैरवान के उलेमा वा फुकहा और अहले सुन्नत वल जमात के अफ़राद को कत्ल कर दिया और खारीज़ी खबीस बैठकर मज़े लेता रहा "

ये काज़ी अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह का बयान था जिसे मैंने निहायत ही इख्तेसार के साथ बयान किया है, आज के दौर में कोई सोचता है के खारजी राय रखने वाले रवाफिज़ के साथ मिलकर बैतुल मुकद्दस फतह कर लेंगे तो ये उनकी भूल है, बैतुल मुकद्दस ज्यों का त्यों रहेगा बस अहले सुन्नत का वहां से सफाया हो जाएगा ,

ख्वारिज़ और रवाफिज़ दोनों का इजातकरदा (Founder) एक ही है और वह अब्दुल्लाह बिन सबा है, इसलिए दोनों के दिल आपस में मिलते हैं

فاعتبروا يا أولى الأبصار

साभार: अबू अहमद कलीमुद्दीन यूसुफ ( जामिया इस्लामियां मदीना मुनाववारा)
हिंदी तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Friday, February 18, 2022

दीफा करें मगर कितना ??

 



दीफा करें मगर कितना ??


मैने मुलाहिजा किया के सोशल मीडिया में सय्यद मौदूदी के मुरीद और पैरोंकार इनका दिफा बिलकुल वैसे ही करते हैं जैसे एक मुकल्लिद अपने इमाम का और एक मुरीद अपने पीर का , हालांकि सय्यद मौदूदी ने जो गलत कहा उसी पर नक़द किया जाता है, जो उन्होंने अच्छा किया उसका इंकार नहीं,

दरअसल गलती के नताइज़ का एतबार होता है, चुनांचे उन्होंने अकल वा सेल्फ स्टडी को मेयार बनाकर तारीख वा हदीस,तफसीर और सियासत शरीया में जो ठोकरें खाई हैं, और रवाफिज़ के ताईन जो खारिजी रवैया अपनाया है उम्मत पर इसके बहुत भयानक नताइज सामने आए हैं, चुनांचे उसे एक्सपोज करना और नौजवान ए उम्मत को इससे आगाह करना हर वाकिफ कार मुखलिस मुसलमान पर वाजिब है,

दूसरे ये के मुरीदान ए मौदूदी से गुजारिश है के उमूमी दिफा के बजाए उन लोगों का ताक्कुब करें जो बेजा नक़द करते हैं, क्योंकि उमूमी दिफा सिर्फ किताबुल्लाह, सुन्नत ए रसूल और सहाबा का किया जाता है बाकी किसी का नहीं, चुनांचें इनके इलावा किसी उम्मती का उमूमी दिफा वही करता है जो उसका मुरीद , मुकल्लिद या अंध भक्त होता है, और वह अपनी महबूब शख्सियत को अल्लाह, रसूल या कमसे कम सहाबा के दर्जे में कर रखा होता है,

नोट: अगर ये उसूल जेहन में रहेगा तो हम दिफा शख्सियत में कभी नहीं भटक सकते , चुनांचे हम पर वाजिब है के हम किताब वा सुन्नत और सहाबा का उमूमी दिफा करें क्योंकि कुरआन पाक में उन सबकी तादील, सिकाहत और इन पर कुल्ली एतमाद की सर्टिफिकेट मौजूद है, रहे बाकी लोग तो उनका दिफा उसी कद्र जायज है जिस कद्र उस पर किसी किस्म का ज़ुल्म हुआ हो ,

साभार: डॉक्टर अजमल मंजूर मदनी
तर्जुमा : Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Wednesday, January 26, 2022

ख्वारिज के दिल में हज़रत अमीर मुआवीया का बुग्ज था तो हज़रत अली से भी बुग्ज में मुब्तिला हो गए और हज़रत अली को शहीद कर दिया ,

 



ख्वारिज के दिल में हज़रत अमीर मुआवीया का बुग्ज था तो हज़रत अली से भी बुग्ज में मुब्तिला हो गए और हज़रत अली को शहीद कर दिया ,

तो पता चला जिस तरह आग और पानी इकट्ठा नहीं हो सकते उसी तरह एक दिल में हज़रत मुआविया का बुग्ज और हजरत अली से मुहब्बत इकट्ठी नहीं हो सकती,

सबाइयों ने हज़रत मुआविया से बुग्ज रखा तो उन्ही सबाईयों ने हज़रत हसन को जहर देकर शहीद किया और हज़रत हुसैन को कूफा बुलाकर शहीद किया ,

तारीख गवाह है जिसके दिल में हज़रत मुआविया का बुग्ज रहा उसके दिल में हज़रत अली की मुहब्बत आ ही नहीं सकी,

Thursday, January 13, 2022

बर्रे सगीर में तहरीकी और तबलीगी सूफी हमेशा से सऊदी अरब के खिलाफ रहें हैं

 




बर्रे सगीर में तहरीकी और तबलीगी सूफी हमेशा से सऊदी अरब के खिलाफ रहें हैं, उसे आल ए सुलूल, यहूदियों का एजेंट, और ना जाने क्या क्या खिताब से नवाजते हैं,

ये आज मुहम्मद बिन सलमान की तब्दीली की बात नहीं हैं बल्कि जबसे सऊदी अरब कायम है तबसे उन्होंने सऊदी अरब के खिलाफ मुहाज़ आराई कर रखी है,आप मौलाना अब्दुल माजिद दर्याबादी रहमतुल्लाह की किताब सफरनामा हिजाज़ पढ़िए सऊदी आवाम और उलेमा को कैसा जाहिल और हुक्काम को नाअहल बावर कराने की कोशिश की है,

सलमान नदवी जैसे हजारों उलेमा के सऊदी अरब के मुताल्लिक अफकार किसी से पोसीदा नहीं हैं, लेकिन सउदी अरब अपने यहां कुछ करे तो हिंदुस्तान के सूफिया तो सूफिया अपने आपको वसीउल कल्ब समझने वाले तंग नजर अहले हदीस हजरात भी सउदी अरब को खारजा और दाखिला पॉलिसी समझाने लगते हैं,

आप अपनी फिक्र कीजिए सऊदी अरब को अपने बारे में जो बेहतर लग रहा है कर रहा है, ऐसा तो नहीं होगा ना के आप जमात के नाम पर हुकूमत के खिलाफ बात भी कीजिए , नाम दीजिए जमात अल अहबाब का काम कीजिए बुग्ज वा अनाद वाला और फिर हुकूमत कोई कारवाही भी ना करे, अपनी आवाम को मुतनबबेह भी ना करे,

साभार: डॉक्टर अब्दुल्लाह मुश्ताक 

Thursday, June 24, 2021

शुमाल सीरिया का इलाका है जहां नहर फुरात बहती है,

 



शुमाल सीरिया का इलाका है जहां नहर फुरात बहती है, ये उन चार नहरों में से एक है जिन्हे जन्नती नहर कहा जाता है, इसकी शुरुआत तुर्की का इलाका है, तुर्की उर्दुगानी हुकूमत ने सीरिया की सियासी अब्तरी और तबाही का फायदा उठाते हुए नहर पर डैम बना लिया और पानी को रोक दिया , सीरियाई लोग बूंद बूंद को तरस रहे हैं,

अल्लाह हिदायत दे... आमीन
साभार: डॉक्टर अजमल मंजूर मदनी
Blog: islamicleaks

Tuesday, June 15, 2021

इतिहास के पन्नों से

 




इतिहास के पन्नों से

ये तस्वीर 11 दिसंबर 2002 की है जब जॉर्ज बुश तैयब एरडोगन से मीले थे हैरत की बात ये है की उस वख्त एरडोगन सत्ता में नही बल्कि विपक्ष मे अध्यक्ष थे
25 फरवरी 2003 को एरडोगन की पार्टी सब के उम्मीद के उलट 363 सीट के साथ बहुमत से जीत जाती है और सिर्फ पांच दिन बाद 1मार्च 2003 को तुर्की की संसद मे अमेरिका की इराक पर चढ़ाई के समर्थन मे बिल आता और पास होता है

फिर अमेरिका ने अपने 62 हज़ार सैनिक, 250 लड़ाकू विमान और 65 हेलीकॉप्टर तुर्की में स्थित नाटो सैनिक अड्डे इंक्रिलिक मे भेजे जो यूरोप का सबसे बाद नाटो का सैनिक अड्डा है तुर्की में जिसे आज भी अमेरिका सीरिया, लीबिया इराक मे बम्बारी के लिए इस्तेमाल करता है

ये ज़रूरी था क्यो की अमेरिका को कुवैत छोड़ कर सारे अरब मुल्को ने सैन्य अड्डा या अपनी ज़मीन किसी भी तरीके से इराक के खिलाफ इस्तेमाल करने देने से साफ मना कर दिया था लेकिन कुवैत अकेला काफी नही था तुर्की मे एरडोगन के समर्थन की वजह से अब इराक दो तरफ से घेरा गया था

साथ ही एरदोगान ने अमेरिका को अपनी तुर्की सेना का परांजर झील बेस भी इस्तेमाल के लिए दे दिया और साथ ही 5000 तुर्की सैनिको को तुर्की इराक बार्डर पर तैनात कर दिया

06 मार्च 2003 को अमेरिका के रक्षा सेक्रेटरी कॉलिन पॉवेल (जो फ़ोटो मे दूसरी तरफ है) उन्होने प्रेस को बताया तुर्की और एरदोगान का धन्यवाद करते हुए की तुर्की को 8 बिलियन डॉलर का तुरंत भुगतान किया गया है साथ ही रक्षा आविष्कारो के लिए 24 बिलियन डॉलर बहोत ही कम ब्याज दर पर दिया गया है

आज बहोत से भाई उसी एरडोगन को जो अभी कोरोना मे भी इज़राइल को मदद भेजा था उसे अमीर उल मोमिनीन दुनिया का सबसे अच्छा मुस्लिम हुक्मरान वगैरह बोलते है जब की ऐसा बोला जाता है की उसने बहोत आवाज़ उठायी है लेकिन नज़र ऐसा आता है जितना उसने आवाज़ उठायी उतनी इज़राइल और अमेरिका की हिम्मत बढ़ी क्यो की
आज तक 75 सालो में इज़राइल ने अपना राजधानी जेरुसलम को बोलने की हिम्मत नही की अमेरिका ने पहली बार अपना दूतावास जेरुसलम शिफ्ट किया इज़राइल के सबसे खतरनाक जान माल का नुकसान करने वाली बम्बारी गाज़ा में दो बार हो गयी एरडोगन के ही राज में हुई

सोचने वाली बात है की हम हर दूसरी छोटी छोटी बात पर अमेरिक इज़राइल की साज़िश ढूंढते है लेकिन शायद असली साज़िश यहूद नासरा ऐसी खेलते है की हम को बज़ाहिर वो बहोत आकर्षित करती है और ये सोच कर वो ऐसा खेल खेलते है की हमारा उस पर ध्यान भी जाए तो सकारात्मक रूप मे और हम फालतू चीज़ों मे साज़िशें ढूंढते रह जाए।

Sunday, June 13, 2021

इस्राएलियों ने फलस्तीन पर पूरी शिद्दत से हमला कर दिया है, अब किधर गए हिज़्बुल्लाह के गीदड़??

 



इस्राएलियों ने फलस्तीन पर पूरी शिद्दत से हमला कर दिया है, अब किधर गए हिज़्बुल्लाह के गीदड़??


मक्का व मदीना पर मिज़ाइल डागने वाले हुथी शिया जिनका नारा है अल मौत उल इजराइल??

कहाँ गया राफ़ज़ी शैतान ईरान जो दिन में चार पाँच बार इजराइल को धमकियां लगाता है??

कहाँ गए हशद अल शाबी मजूस?

कहाँ गए हमासी चूहे ??

कहाँ गए बलवान तुर्क पहलवान ?

कहां गए अरब बहारिया के इख़्वानी क़ातिल?

इसरायल के खिलाफ शियाँ उल शैतान की सब गीदड़ भाबकियाँ सिर्फ खोखले दावे ही हैं,

फ़लस्तीन में इस वक़्त सैंकडों अस्करी और सियासी तंजीमें मौजूद हैं जो इस मुद्दे की तिजारत करती हैँ और ईरान और टर्की के इशारे पर नाचती हैं, ये अस्करी तंजीमें कभी भी इस्राइली फौज के सामने नहीं आती सिर्फ मज़लूम फलस्तीनियों को सामने लाती है,

लाखों फ़लस्तीनी इस्राएल में नौकरी करते हैं, इख़्वानी पार्टियों से मिलकर नेतन्याहू इजराइल पर हुकूमत करता है,

खुलासा: मसला फ़लस्तीन तमाम मुसलमानों का दीनी मसला है लिहाज़ा दीन पर अमल करके हम अल्लाह की मदद और ताकत के मुस्तहिक़ बनें,

अब तक कि रिपोर्ट के मुताबिक 22 मासूम फ़लस्तीनी नागरिक मारे जा चुके हैं जिसमे 9 बच्चे है और 7 इसरायली घायल हुए हैं,

Saturday, June 12, 2021

फ़यलक अल क़ुद्स या कुद्स फोर्सेज




 फ़यलक अल क़ुद्स या कुद्स फोर्सेज जैसे कातिल, अहले सुन्नत मुजरिम क़ासिम सुलेमानी ने बनाया था फलस्तीन कि हिफाज़त के नाम पर, लेकिन ज़िन्दगी भर इराक़ व शाम के अहले सुन्नत का क़त्ल करता रहा, कभी फ़लस्तीन नहीं गया , क्या इस वक़्त भी इराक़ी मुसलमानों का ही क़त्ल करेगा या फ़लस्तीन भी कभी आएगा ??


इख़्वानी हमासी चुहे फरयाद अरबों से करते हैं और शुक्रिया ईरान का करते हैं, आखिर हिज़्बुल्लाह और क़ुद्स फोर्सेज और हशद अश शाबी को आवाज़ क्यों नहीं देते ??

क्या उन्हें सिर्फ सुन्नी मुसलमानों को क़त्ल करने के लिए जन्म दिया गया है ??

Friday, June 11, 2021

फलस्तीन में आज भी सऊदी शहीदों की कब्रें मौजूद हैं, तुर्की और ईरानी कितने शहीद हुए ??








 फलस्तीन में आज भी सऊदी शहीदों की कब्रें मौजूद हैं, तुर्की और ईरानी कितने शहीद हुए ??

1948 के अंदर जंग ऐन अल खफर जिसमे 8300 सऊदी फौजियों ने 31600 यहूदी फौजियों की मुजाहिमत और मुकाबला किया , सऊदी फौजियों ने मुसलसल 4 दिन इजरायली फौजियों के मुहासिरे और तसादुम के दौरान जुर्रातमंदी से जंग लड़ी और साबित कदम रहे जिसके नतीजे में बिलाखिर साऊदी फौजी ये जंग जीते और 476 यहूदी फौजियों को कैदी बनाया और इस जंग में 1784 फौजी शहीद हुए ,
और दूसरी तरफ तुर्की वह पहला इस्लामी मुल्क था जिसने इजरायल के कयाम को 1949 में कुबूल किया था , ईरान तुर्की के बाद दूसरा मुल्क था जिसने 1951 में इजरायल को आजाद स्टेट माना था ,
जब अरब फौजें उसके कयाम से इंकार कर रही थी और फलस्तीन की आजादी के लिए अपनी जान वा माल और सब कुछ कुर्बान कर रही थी, जबकि उस वक्त तुर्की और ईरान इजरायल के साथ उसकी तरक्की इकतेसाद और असलहे की डील कर रहे थे,
आज भी ईरान ने 200 इजरायली कंपनियां काम कर रहीं हैं और 3000 से ज्यादा यहूदी ईरान में रहते हैं, नेज तुर्की और इजरायल जिस तरह दोस्त बनकर रह रहें हैं कोई दोनों में फर्क ही नहीं कर पाएगा

Wednesday, June 9, 2021

सबसे पहले ये समझ लीजिए कि हमास का मतलब पूरा फिलिस्तीन नहीं है

 



सबसे पहले ये समझ लीजिए कि हमास का मतलब पूरा फिलिस्तीन नहीं है हरगिज़ नहीं है। फिलिस्तीन की 80% आबादी आज भी मिस्र, जॉर्डन, तुर्की, लेबनान, सीरिया और सऊदी अरब में मुहाजिर बनकर रह रही है। बड़ी तादाद को इन मुल्कों की नेशनैलिटी भी मिल चुकी है। इन मुहाजिरीन में हमास का हामी शायद ढूंढने से भी ना मिले।

अब आइये फिलिस्तीन..
यहां भी गाज़ा स्ट्रिप और वेस्ट बैंक, दो जगह फिलिस्तीनी आबादी है वेस्ट बैंक में हमास का हामी चुहिया का बच्चा भी नहीं मिलेगा। यहां यासिर अराफात के इंतकाल के बाद वजूद में आए अल फतह की ऑटोनॉमी हुकूमत है जो इस्राइल के ज़ेरे इंतज़ाम चलती है इससे पहले गाज़ा स्ट्रिप और वेस्ट बैंक, दोनों जगह फिलिस्तीन अथॉरिटी बनाकर PLO की ऑटोनॉमी हुकूमत हुआ करती थी। अल फतह और हमास कैसे वजूद में आए और इनमें आपसी खानाजंगी किन मुद्दों पर चली, इस पर बाद में किसी पोस्ट पर विचार कर लेंगे।

अब आइये गाज़ा स्ट्रिप..
यहां फिलिस्तीन की सबसे बड़ी आबादी करीब 16 लाख बसती है ये एवरेज आठ किलोमीटर चौड़ी और 45 किलोमीटर लम्बी मुख्तसर सी साहिली पट्टी है। गाज़ा में हमास का गढ़ है और मुकम्मल कन्ट्रोल भी है लेकिन यहां भी हमास को 100% सपोर्ट नहीं है अलबत्ता चूंकि हमास ताक़त और गुंडई के ज़ोर पर ग़ालिब है इसलिए इसके मुखालिफ आवाज़ें दब जाती हैं।

कहने का मतलब ये है कि कुछ लोग हमास का मतलब पूरा फिलिस्तीन समझते हैं वो ग़लती पर हैं और प्लास्टिक गाज़ियों ने अन्दर की सच्चाई लोगों को कभी बताई ही नहीं।

Muhammad Shaheen

Tuesday, June 8, 2021

ये तो एक खेल खेल रहें हैं,

 



शैख अल्लामा रबी बिन हादी मदखली से सवाल किया गया था के क्या ये जिहाद हैं के एक शख्स यहूदी को पत्थर मारता है और वह जवाब में बीसियों अफ़राद को कत्ल कर देते हैं,


जवाब:

"हरगिज़ जिहाद नहीं है, ये तो एक खेल खेल रहें हैं, और शरियत में इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती ,"

और मजीद इस सवाल के जवाब में फरमाया:

" फुकाहा किताब उल जिहाद को इसलिए किताबुल ईमान किताबुल इल्म और किताबुल तहारह के बाद में लिखते हैं ताकि जिहाद करने वाले शक्श को पहले इल्म हो के जिहाद कैसे करना है और किस वक्त करना है और जिहाद कब फर्ज होता है"

और आखिर में उन्होंने फरमाया:" जिहाद के बारे में वो उलेमा फतवा दे रहें हैं जिन्हे तहारत के मसाइल का इल्म नहीं"

और एक जगह उन्होंने इस बात की भी वजाहत की है के ," फलस्तीनियों का अपना रहन सहन और सिकाफत तो यहूदियों जैसी है, पहले वह खुद तो इस्लाम की तरफ लौटें और फिर हमारी बहनें नंगे सर और बगैर पर्दा के यहूदी फौजियों के सामने एहतेजाज कर रही होती हैं ये कौनसा इस्लाम है अल्लाह हमें सही इस्लाम को समझ अता फरमाए"

साभार: शैख अब्दुल खालिक भट्टी
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks

Monday, June 7, 2021

इज़राइल इतना ताकतवर है कि उसने तमाम अरब मुल्कों की मिलीजुली फ़ौजों को अकेले हर दिया था

 



असल में लोग ये समझते हैं कि इज़राइल इतना ताकतवर है कि उसने तमाम अरब मुल्कों की मिलीजुली फ़ौजों को अकेले हर दिया था ,जबकि ये बिल्कुल झूठा प्रोपेगंडा है क्योंकि ये जंग अरब और इज़राइल के बीच नहीं थीं बल्कि अरब vs इज़राइल + युएस +यूके + फ्रांस + कनाडा + आस्ट्रेलिया + वेस्टर्न युरोप थी ,इज़राइल के पास युएस +यूके + फ्रांस के जदीद हथियार थे इन मुल्कों के बजट से निकला पैसा था CIA + MI6 + SDECE जैसी दुनिया की कुख्यात इंटेलिजेंस एजेंसियों के एजेंट और उनकी पूरी मशीनरी थी ,ऐसे में अरब बेचारे क्या कर सकते थे ,


ये दौर जदीद टेक्नोलॉजी का है एक अकेला बंदा टेक्नोलॉजी के दम पर एक हज़ार पर भारी पड़ सकता है ,इसलिए मैं इन जंगों में हार जाने पर अरबों को नहीं कोसता बल्कि उनकी लीडरशिप की तारीफ़ करता हूं कि वो ये जानते थे कि उनका मुकाबला सिर्फ़ इज़राइल से नहीं बल्कि जदीद टेक्नोलॉजी से लैस पूरी वेस्टर्न दुनिया से था उसके बावजूद उन्होंने लड़ने की हिम्मत दिखाई थी ,उनकी जगह हम बर्रे सग़ीर के तुर्रम खां होते तो कभी इतनी हिम्मत ना दिखा पाते बस चिल्ल पों मचाकर गुलामी कुबूल कर लेते ...


Syed Asman Mustafa Kazmi की पोस्ट✍️