शाहज़ादा अब्दुल अज़ीज़ बिन सलमान के ऐतिहासिक शब्द:
"कोई भी हमारी ताकत को तोड़ नहीं सकता। हम एक ऐसे फीनिक्स (अंका) पक्षी की तरह हैं जो हर बार राख से दोबारा उठ खड़ा होता है।"
सऊदी अरब वाकई एक अद्भुत देश है।
आज से लगभग दो सौ साल पहले, इब्राहिम पाशा मिस्र से उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य की सेना लेकर आया। उसने छह महीने तक Diriyah को घेरे रखा, फिर उसे तबाह व बर्बाद कर दिया, वहां के लोगों पर कहर ढाया और उसे जलाकर यह समझा कि अब सब कुछ खत्म हो गया है।
आज उस्मानी साम्राज्य इतिहास की किताबों में सिमट चुका है, मोहम्मद अली पाशा का परिवार 1952 में सत्ता से खत्म हो गया, जबकि वही Diriyah जिसे उन्होंने जलाया था, आज एक ऐतिहासिक स्थल बन चुका है जहां जाने के लिए लोग बाकायदा टिकट बुक करवाते हैं।
इसके बाद आल-ए-सऊद रियाज़ से निकलकर कुवैत चले गए। लोगों ने कहा कि अब उनका अंत हो चुका है, अब वे कभी वापस नहीं आएंगे। लेकिन सिर्फ दस साल बाद
अब्दुल_अज़ीज़ आल-ए-सऊद चालीस आदमियों के साथ वापस आए, एक ही रात में रियाज़ को फतह किया और फिर पूरे जज़ीरातुल अरब (अरब प्रायद्वीप) को एकजुट करके एक राज्य की स्थापना की।
शरीफ हुसैन ने कहा था कि मैं अरबों का बादशाह हूं, लेकिन आखिरकार साइप्रस में नजरबंदी (निर्वासन) की हालत में उसका अंत हुआ। अब्दुल नासिर ने दक्षिण से सऊदी अरब को गिराने के लिए यमन में सत्तर हजार सैनिक भेजे, लेकिन खुद यमन से परास्त होकर निकला।
सद्म हुसैन ने कहा था कि कुवैत इराक का उन्नीसवां प्रांत है, लेकिन इसके लगभग दस साल बाद वह एक गड्ढे में छुपा हुआ मिला।
गद्दाफ़ी ने वली अहद (क्राउन प्रिंस) शाहज़ादा अब्दुल्लाह को कत्ल करवाने की कोशिश की, लेकिन कुछ साल बाद खुद उसे एक नाले के पाइप में छुपा हुआ पकड़ लिया गया।
यह तो बाहरी दुश्मनों की कहानी है। अब अंदरूनी मोर्चे की बात भी सुन लीजिए।
1979 में जुहैमान ने हथियारों के साथ मस्जिद-ए-हरम पर कब्जा कर लिया। उसने दावा किया कि इमाम महदी उसके साथ हैं और सऊदी सत्ता का अंत हो चुका है। लेकिन लगभग डेढ़ महीने बाद उसे मौत की सजा दे दी गई।
ओसामा बिन लादेन ने धर्म के नाम पर लगभग बीस साल तक सऊदी सत्ता को गिराने की कोशिश की। उसने रियाज़, अल-खोबर और यान्बु में धमाके करवाए, रमजान के महीने में लोगों को कत्ल किया, लेकिन आखिरकार उसकी लाश समंदर में फेंक दी गई।
फिर आईएसआईएस (दाएश) आई, जिसने खिलाफत कायम करने के दावे किए, लेकिन उसका अंजाम भी इन सबसे ज्यादा तेजी से सामने आया। फिर 'अरब स्प्रिंग' (अरब क्रांति) का दौर आया।
2011 में एक के बाद एक देश की सरकारें गिर रही थीं। पश्चिमी मीडिया दिन गिन रहा था और कह रहा था कि अब सऊदी अरब की बारी है। अमेरिकी अखबारों और रिसर्च संस्थानों में उदारवादी (लिबरल) विश्लेषक लिख रहे थे कि सऊदी व्यवस्था एक साल भी नहीं चल सकेगी। ओबामा प्रशासन ने अपने सहयोगियों को एक-एक करके अकेला छोड़ दिया।
लेकिन फिर क्या हुआ?
ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यमन और सीरिया के हालात आप सबके सामने हैं। और जिस सऊदी_अरब के बारे में कहा जा रहा था कि अब उसकी बारी है, वह इन दस बरसों के बाद पहले से ज्यादा मजबूत होकर सामने आया। उसने विजन 2030 की शुरुआत कर दी, जबकि उसके आलोचक अब भी उसके आसन्न अंत पर लेख लिख रहे थे।
इनमें से कुछ आज तक हर साल वही लेख लिखते हैं, बस तारीख बदल देते हैं!
यह सब राज्यों, संगठनों और मीडिया के स्तर पर होने वाली बातें हैं। लेकिन आम लोगों का रवैया भी कुछ अलग नहीं है।
सऊदी अरब समृद्धि हासिल करे तो लोग ईर्ष्या करते हैं। उस पर कोई मुसीबत आए तो खुशियां मनाते हैं। वह निर्माण और प्रगति करे तो उसे गिराने की कोशिश करते हैं, और जब वह अपनी रक्षा में कार्रवाई करे तो कहते हैं कि उसने हद पार कर दी है।
खुदा की कसम! मैं ये बातें घमंड में नहीं कह रहा हूँ। इतिहास आपके सामने है, खुद पढ़ लीजिए।
इस रियासत को इसके वजूद के पहले दिन से लेकर आज तक जिस किसी ने तोड़ने और मिटाने की कोशिश की, वह खुद ईंधन बन गया, लेकिन सऊदी अरब बाकी रहा।
और सिर्फ बाकी ही नहीं रहा, बल्कि आज यह इस क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जी-20 का सदस्य है और एक ऐसा देश है जिसके हितों और फैसलों को पूरी दुनिया अहमियत देती है।
यही बात सऊदी ऊर्जा मंत्री शाहज़ादा अब्दुल अज़ीज़ बिन सलमान ने रियाज़ में दुनिया भर के ऊर्जा मंत्रियों के सामने कही:
"कोई भी हमारी ताकत को तोड़ नहीं सकता। हम एक ऐसे फीनिक्स (अंका) पक्षी की तरह हैं जो हर बार राख से दोबारा उठ खड़ा होता है।"
इसलिए आज जो लोग सऊदी अरब से ईर्ष्या करते हैं, उस पर खुशियां मनाते हैं या उसके खिलाफ साजिशें रचते हैं, वे पहले नहीं हैं और यकीनन आखिरी भी नहीं होंगे।
और अंजाम वही होगा जो उनसे पहले आने वालों का हुआ।
✍️ अदील अहमद आज़ाद