Tuesday, July 7, 2020

SAJDA E TAAZEEMI AUR TAUHEED





मेरे एक भाई ने जब मेरी कुछ पोस्ट देखी क़ब्र परस्ती को लेकर तो कहने लगे जनाब हम क़ब्र पर सजदा नहीं करते सिर्फ ताजीमी सजदा करते हैं यानी सर झुकाते है, मतलब वैसा सजदा नहीं होता जैसा नमाज़ में होता है,

तो इस सिलसिले में में बस इतना कहना चाहूंगा कि क्या कभी उन्होंने इसाई को ईसा वा उनकी मां मरयम की मूर्ति के आगे कभी सजदा करते देखा है ??

क्या कभी यहूदियों को माबद ए सुलेमानी में (हैकल) में सजदा करते देखा है ?? नहीं ना
या किसी हिन्दू को राम की मूर्ति के आगे सजदा करते देखा है ?? नहीं ना

बल्कि वो ताजीम में सर झुकाते हैं, जब वो ताज़ीमी सजदा करके मुशरिक हुए फिर आप वही ताजिमी सजदा क़ब्र पर करके मुस्लिम कैसे हो सकते हैं ??
UmairSalafiAlHindi
IslamicLeaks

Monday, July 6, 2020

SHADI KE BAAD LADKIYAN IMAN KI HALAAWAT KYUN KHO DETI HAIN ??





शादी के बाद लड़कियां ईमान की हलावत क्यूं खो देती हैं ??

एक खातून ने शेख अल्लामा नसीरुद्दीन अल्बानी रहमहुल्लाह से पूछा के शेख मोहतरम शादी के पहले मैंने नमाज़ और रोज़े की बहुत पाबंद थी, क़ुरआन मजीद की तिलावत करने में लज्जत महसूस होती थी लेकिन अब मुझे इन चीज़ों में ईमान की वो हलावत नहीं मिल पाती,

शेख अल्बानी ने पूछा :- " मेरी मुस्लिम बहिन मुझे ये बताओ अपने शौहर के हुकूक अदा करने और उसकी बात मानने का आप किस कद्र एहतेमाम करती हो ?"
वो खातून हैरत से कहने लगी :-" शेख मोहतरम में आपसे क़ुरआन कि तिलावत , नमाज़ और रोज़े को पाबंदी और अल्लाह की फर्माबरदारी के बारे में पूछ रही हूं और आप मुझसे मेरे शौहर के बारे में पूछ रहें हैं "

शेख नसीरुद्दीन अल्बानी में फ़रमाया :-" मेरी बहिन ! कुछ औरतें इसलिए ईमान की हलावत, अल्लाह की फरमा बरदारी की लज्जत और इबादत पर लुत्फ का असर महसूस नहीं कर पाती क्यूं कि रसुलल्लाह मुहम्मद (sws) ने फ़रमाया :- "
( ولا تجد المرأة حلاوة الإمان حتى تودي حق زوجها)

यानी कोई भी औरत उस वक़्त तक ईमान कि हलावत नहीं पा सकती जब तक वो अपने शौहर के हुकूक अदा ना करे "
( सही तरघीब हदीस 1939)
UmairSalafiAlHindi
Islamicleaks

Sunday, July 5, 2020

RIZQ KI BHAAG DAUD






हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद राजियलाह से मर्फुअन मरवी है के नबी ए करीम मुहम्मद (sws) ने फ़रमाया :-" जो चीज़ तुम्हे जन्नत के करीब कर सकती थी मैंने तुम्हे उसका हुकम दे दिया, और जो चीज़ तुम्हे आग के करीब कर सकती थी उससे मना कर दिया,
रूह ए कुदस ( जिबरील ) ने मुझे बताया है के कोई नफस उस वक़्त तक नहीं मरेगा जब तक अपना रिज्क मुकम्मल ना कर ले, इसलिए अल्लाह से डरो, और अच्छे अंदाज़ से तलब करो, और रिज्क में ताखीर ( देरी) तुम्हे अल्लाह ताला की नाफर्मानी पर ना उभारे, क्यूंकि अल्लाह ताला के पास जो कुछ है उसकी इता अत के जरिए ही हासिल किया जा सकता है "

( सिलसिला तुस सहीहा हदीस 1012 )
UmairSalafiAlHindi

Saturday, July 4, 2020

ZARF





एक बच्चे ने समुंदर पर अपना जुता खो दिया तो उसने रेत पर लिख दिया कि ए समुंदर तू चोर है ।

कुछ ही फासले पर एक शिकारी ने समुंदर में जाल फेका और बहुत सारी मछलियों का शिकार किया तो उसने खुशी के आलम में रेत पर लिख दिया की सेखावत के लिए इस समुंदर की मिसाल दी जाती है ।

एक नौजवान ने समुंद में गोता लागाया और वो गोता उसका आख़िरी गोता साबित हुआ ।
वही रेत पर बैठी उस नौजवान की माँ ने लिखा कि ए समुंदर तू कातिल है ।

एक बूढ़े शख्श को समुंदर ने मोती तोहफे में दिया जिसे पाकर वो बूढ़ा बहुत ख़ुश हुआ और उसने ख़ुशी के आलम में रेत पर लिखा की ए समुंदर तू करीम है ।
तभी एक बड़ी लहर आयी उसने सबका लिखा मिटा दिया ।
पता चला कि लोगो की बातों पर कान मत धरो , जो जहा से देखता है अपने ज़र्फ़ के मुताबिक उतना ही बोलता और सोचता है ।
शहबाज़ रशादी ।

Friday, July 3, 2020

ITNI SAFAAI KYU DETE HO TUM ?







इतनी सफाई क्यों देते हो तुम?

बड़ी घिन्न आती है जब तुम खुद को "विक्टम" दिखाकर सफाई देने लगते हो, तुम एक चीज़ की सफाई दोगे तब तक ये दूसरा झूठा मुद्दा खोज लाएंगे, इस तरह तुम सफाई देने में ही उलझ जाओगे,

ये वक़्त सफाई देने का नहीं बल्कि अपनी आर्थिक और सामाजिक हालात को बदलने का है, और अपनी सही धार्मिक पहचान बनाने का,

भारत में सबसे ज़्यादा जोक सिखों पर बनते है लेकिन क्या कभी देखा है उन्हें सफाई देते, जब दिल्ली में एक सिख भाई पर पुलिस ने ज़ुल्म किया तो पूरी दिल्ली की सिख बिरादरी ने थाने में घुसकर पुलिस वाले की पिटाई की, यही हाल जाट और गुर्जरों का है,
आज सिख कौम अपनी आर्थिक स्थिति की वजह से मजबूत है, और उसकी सियासी पहचान भी है, और धार्मिक पहचान भी कायम है,

मुसलमान अपनी आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करके वैसी ही इज्ज़त और ताकत पा सकता है जैसे दूसरी कौम पा रही हैं,
क्या हमारे पास पैसों और संसाधनों की कमी है ?? नहीं हरगिज़ नहीं ??

जो कौम गली गली बारावफात में पांच पांच लाख के गेट बनवा दे, और करोड़ों रुपए इन गेटों पर फूंक दे जुलूस के नाम पर करोड़ों लाखों रुपए बर्बाद करके, शादियों के नाम पर लाखों रुपए की फिजूल खर्ची करने के बाद भी, करोड़ों वा अरबों रुपए की खाल का कारोबार सिर्फ बकरा ईद पर कर लें, और अरबों रुपए की जकात निकाल दे, ईद में नए कपड़ों से नाम से हर एक आदमी 2-2 नए सूट बनाए,
दरगाहों पर आस्था के नाम अरबों लूटा दे, मुशायरों, इजतेमे और जलसों के जरिए करोड़ों फूंक दे, मैं नहीं मानता ऐसी कौम आर्थिक तौर पर कमजोर है,
कमजोर है जो सिर्फ हमारी हैरत !!!
UmairSalafiAlHindi

Thursday, July 2, 2020

HAMFAR AUR LAWRENCE OF ARABIA








हैमफर और लॉरेंस ऑफ अरबिया,

दानिशमंदों की बासी कड़ी में फिर उबाल आया है, फरमाते हैं के ( आल ए सऊद और वाहबियत ) की अंधी तकलीद में लोग हैमफर और लॉरेंस ऑफ अरबिया के इंकेशाफ तक भूल जाते हैं..

बिना किसी तम्हीद के मुद्दे पर आते हैं , दुश्मन ए तौहीद की इस बकवास का मुझ समेत लाखों लोग जवाब दे चुके हैं, मगर इन क़ब्र परस्टों की जिहालत और हटधर्मी का ये आलम है के तस से मस नहीं होते, ये इनका मुवाहिदीन से बुग़ज़ नहीं है तो क्या है, ना तो हमफर की इंकेशाफ़ पर लिखी गई किताब पढ़ी और ना ही लॉरेंस ऑफ अरबिया की, और ना ही उनमें दर्ज मालूमात की तहकीक की, मगर ईमान ऐसे ले आए जैसे ये आयात ए क़ुरआनशरीफ़ हो, खैर तहकीक से इन्हें क्या लेना देना ?? इनका मकसद तो सिर्फ और सिर्फ रब की तौहीद को नीचा दिखाना है ,

सबसे पहले हमफर के नाम पर आते हैं, मुहक्किकीन वा अशाब ए इल्म ये बखूभी जानते हैं के हमफरे के इंकेशाफात नरी बकवास और झूट का पुलिंदा है, बस,

अच्छी तरह अक्ल रखने वाला शख्स भी अगर ये किताब पढ़ ले तो उसे एक थर्ड क्लास नॉवेल से ज़्यादा अहमियत ना दे, मगर क्या कीजिए ! बुगज़ ए तौहीद के मार से इस किताब के लफ्ज़ वा लफ्ज़ को वहीं मानते हैं,
सच ये है के हमफर एक फर्जी किरदार है और उसे गढ़ने वाला एक कौम परस्त और सूफी तुर्क मुसन्निफ अय्यूब साबिरी पाशा है !!

यहां ये बात वाजेह रहे के इस किताब में आल ए सऊद का कोई ज़िक्र नहीं है, इस किताब में सिर्फ शेख़ उल इस्लाम इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब के खिलाफ प्रोपगंडा किया गया है, वह भी भोंडे तरीन अंदाज़ में,

इस पूरी किताब के रद के लिए यही काफी है के हमफरे अपनी किताब में दावा करता है के वह 1713 में शेख उल इस्लाम मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब से बसरा में मिला !! बाकौल उस के उस वक़्त शेख़ एक तालिब ए इल्म थे और अरबी के इलावा फारसी और तुर्क ज़बान पर भी उबूर रखते थे, इस किताब में हमफरे ये भी कहता है के मेरे बहकाने से शेख शराब भी पीने लगे, और मेरे ही कहने से शेख ने 2 औरतों से मुता भी किया था ! इसके अलावा और भी बहुत कुछ है मगर हकीकत जानने वालों के लिए यही काफी है,

अगर ये दुश्मन ए तौहीद अक्ल से पैदल ना होते तो इस बकवास की तहकीक करके हकीकत जान जाते लेकिन कब्रपरस्त होने के लिए जाहिल होना शर्त है, अब आएं और सच देखें :

शेख उल इस्लाम मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब 1703 ईसवी में पैदा हुए और जो सन हमफरे उनकी मुलाकात की लिखता है उसमे तो उनकी उम्र 9 या 10 साल बनती है, अब बताया जाए एक 9-10 साल का बच्चा वह सब कैसे कर सकता है जो हमफरे कह रहा है ??
जबकि हमफरे की किताब से ज़ाहिर होता है कि 1713 ईसवी में शेख जवान मर्द थे जोकि सफेद झूठ है...! अब जब इस किताब की बुनियाद ही झूट है तो बाकी किताब का क्या करना, बाक़ी तो कुछ बचता ही नहीं ...!

अब आते हैं लॉरेंस आफ अरबिया की किताब की तरफ, जैसा कि मैंने शुरुआत में ही कहा था के ना तो खुद इन फर्जी दानिशवरों ने कभी ये किताब पढ़ी है और ना ही उन्होंने इसकी तहकीक की तौफीक हुई,
कर्नल थोमंस एडवर्ड लॉरेंस अल मारूफ लॉरेंस आफ अरबिया की पूरी किताब में ना तो आल ए सऊद का ज़िक्र है और ना ही शेख उल इस्लाम मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब का, जबकि शेख उल इस्लाम लॉरेंस ऑफ अरबिया की पैदाइश से 96 साल पहले ही वफात पा चुके थे,

लॉरेंस ऑफ अरबिया की किताब में अगर ज़िक्र मिलता है तो शरीफ ए मक्का यानी उस्मानी सल्तनत हिजाज़ के गवर्नर हुसैन बिन अली अल हाशमी का के जिस ने लॉरेंस आफ अरबिया के साथ मिलकर हुकूमत बरतानिया की शह पर खिलाफत ए उस्मानिया से बगावत की, और ये शरीफ मक्का सूफी मजहब से था, उस ही जिंदीक के लिए अल्लामा इकबाल ने फ़रमाया था के
हाशमी बेचता है नमूस ए दीन मुस्तफा,
मिल रहा है ख़ाक ओ खून में तुर्कमान सख्त कोश,

इस्लाम से इस गद्दारी के सिले में ना सिर्फ शरीफ मक्का को हिजाज़ का बादशाह बनाया गया बल्कि उसके बेटे फैसल को शाम और अब्दुल्लाह को जॉर्डन का बादशाह भी बना दिया गया, जॉर्डन का मौजूदा बादशाह अब्दुल्लाह दोम उसी का पोता है,
जबकि शरीफ मक्का के दूसरे बेटे फैसल की बादशाहत शाम में 2 साल बाद फ्रांस के क़ब्जे ने खतम कर दी, जबकि ताज बरतानिया ने अपने इस चहेते को वहां से निकाल कर इराक़ का बादशाह बना दिया, फैसल पर इस खास इनाम वा इकराम की वजह ये है कि उसमानियों के खिलाफ बगावत का असल किरदार यही फैसल था, इस मर्दूड के लिए अल्लामा इकबाल ने फ़रमाया था के
क्या खूब अमीर फैसल को सनोसी ने पैग़ाम दिया,
तू नाम ओ नसब का हिजाजी था फिर दिल का हिजाजि बन गया ।

इस तमाम अरसे में आल ए सऊद तो अपने वतन नजद से दूर कुवैत में जिला वतनी काट रहे थे, ये वाज़ह रहे के नजद और हिजाज़ दो अलग अलग इलाके है, और उनके हाकिम भी अलग थे, नजद इन्हीं से आल ए सऊद ने 1921 में छीना, जबकि आल ए रशीद ने नजद का इलाका आल ए सऊद से 1890 में उस्मानियों की मदद से छीना था,

1921 में जब उस्मानी हर तरफ से शिकस्त का सामना कर रहे थे और नजद के आल ए रशीद ने भी 1920 में उसमानियो से बगावत कर के आजादी का ऐलान कर डाला तो तब जा कर आल ए सऊद ने नजद पर चढ़ाई की,
उसके बाद आल ए सऊद ने 1924 में हिजाज़ पर कब्ज़ा किया, जबकि शरीफ मक्का 8 साल पहले ही उसमानियो से बगावत कर चुका था, और हिजाज़ में कोई एक उस्मानी या तुर्क फौजी बाक़ी ना रहा था, और जिस वक़्त आल ए सऊद हिजाज़ में दाखिल हुए उस वक़्त खिलाफत ए उस्मानिया के टूटे हुए पूरा एक साल बीत चुका था..
मुस्तफा कमाल ने 1923 में खिलाफत का बाब बंद कर डाला था, के जिस पर अल्लामा इकबाल ने फ़रमाया था के :

चाक कर दी तुर्क नादान ने खिलाफत की कबा
सादगी मुस्लिम की देख औरों की अय्यारि भी देख,

आखिर में मेरी तमाम क़ब्रपरस्टों और दुश्मन ए तौहीद से दरख्वास्त है के जो कुछ आप पढ़ें या सुने, उस सच ना मान लिया करें, तहकीक किया करें, मुवाहीदीन की दुश्मनी और तौहीद रही से नफ़रत में अंधे मत हो जाएं...
साभार: मौलाना अजमल मंजूर मदनी
तर्जुमा: UmairSalafiAlHindi

Wednesday, July 1, 2020

AAKHIRAT KI ZINDAGI





मगर तुम लोग दुनिया की ज़िन्दगी को तरजीह देते हो,
हालाँकि आख़िरत बेहतर है और बाक़ी रहनेवाली है।

( क़ुरआन अल आला 16- 17)