Saturday, June 19, 2021

धर्मांतरण




 2 दिन पहले एक मित्र से बात हुई बेचारे काफी दुखी दिखाई दे रहे थे. आकर बैठे बैठते ही बोले यह क्या करवा रखा है आपने. हमने पूछा क्या हुआ बोले पड़ोस के मोहल्ले में एक मुस्लिम लड़की ने धर्मांतरण कर के एक हिंदू से शादी कर ली. (मेरी तबीयत ऐसी वाक़े हुई है की हर मसले पर सबसे पहले अपनी ही गलती ढूंढता हूं) उनकी बात सुनकर अनायास ही मुंह से निकल पड़ा जब हम एक कलमा गो (मुस्लिम) को अपनी बहन बेटी देते हुए इसलिए कतराएंगे कि वह हमारी जाति का नहीं है या जाति ऊंची या नीची है तो यह मौजज़े खुदा हमको दिखाएगा ही.


हम अपनी जिंदगी में कितने ही ऐसे लड़कों को जानते हैं जो अखलाक (व्यवहार) और सीरत में, यहां तक कि घर कारोबार में भी बहुत अच्छे होते हैं फिर भी हम कभी अपनी बहन बेटी उनसे ब्याहने के बारे में नहीं सोचते क्योंकि वो हमारी बिरादरी के नहीं है या बिरादरी में ऊंच-नीच का फ़र्क़ है.

फिर हम अपनी बहन बेटी को ऐसे लोगों को सौंपते हैं जिनके सीरत और अखलाक (व्यवहार) हमारी बेटी को क्या हमें खुद अता पता नहीं होते....

मनकूल

साभार: जाहिद भाई
ब्लॉग: islamicleaks 

Friday, June 18, 2021

ईद उल फित्र :-




 ईद उल फित्र :-


ईद आने वाली है , "ईद उल फित्र"

यह क्या है ? क्युँ है ? कब से ईद मानाने की शुरुआत हुई ? आईए समझते हैं।

दरअसल , मुसलमानों की अब तक की सबसे अधिक कमी यह रही कि उन्होंने अपने धर्म की छोटी छोटी बारीक बातों को अपने तक ही सीमित रख दिया।

कल एक हिन्दू दोस्त से बात हो रही थी , बोला ज़ाहिद भाई , "ईद इस बार भी गयी" , यह "दो मई दीदी गयी" की तर्ज़ पर किया गया तंज़ था।

मुझे एहसास हुआ कि वह "ईद उल फित्र" का फिर अर्थ ही नहीं जानता।

मैंने उससे पूछा "ईद उल फित्र" का अर्थ और भाव पता है ? बोला हाँ , वही "मीठी ईद" , और दूसरा "बकरा ईद" मतलब "नमकीन ईद"।

मैंने दिल में सोचा , यह जागरुकता फैलाई है कौम ने ?

तो आईए समझते हैं कि "ईद उल फित्र" है क्या ? उसका मूल उद्देश्य क्या है ?

दरअसल , वैसे तो सभी धर्म के ही धार्मिक त्योहारों का मूल भाव "सामाजिक समानता और समरसता" है। पर ईद का मूल उद्देश्य ही उत्सव से अधिक "सामाजिक , समानता और समरसता" है।

"ईद उल फित्र" का अर्थ हुआ , ईद अर्थात "बार-बार लौटकर आना" और फित्र का अर्थ हुआ "नाश्ता"। तो इस तरह "ईद उल फित्र" का अर्थ हुआ "दावत का बार बार लौट कर आना" , और चुंकि रमज़ान के 30 रोज़े के मुकम्मल होने की खुशी में "ईद" होती है इसलिए इसका भाव हुआ "खुशियों की दावत का लौट कर आना"।

मगर ठहरिए , यह तो अरबिक शब्द का हिन्दी में अनुवाद हुआ , "ईद उल फित्र" का पूरा भाव क्या है ? इसमें सिर्फ अपने लिए "खुशियों की दावत का लौट कर आना" नहीं है बल्कि गरीब , मिस्कीन , फकीर से लेकर अपने गरीब और मजबूर नाते रिश्तेदार तक की "खुशियों की दावत का लौट कर आना" यदि आप हैसियत वाले हैं तो आपकी ज़िम्मेदारी है।

इसको किए बिना आप ""ईद उल फित्र" मनाने का हक नहीं रखते।

आप पूरे रमज़ान भूखे प्यासे इसलिए रहे क्युँकि आप गरीब मजबूरों और लाचारों की भूख प्यास महसूस कर सकें। जब उनकी भूख प्यास महसूस होगी तब आपके अंदर उनकी मदद करने का जज़्बा पैदा होगा।

इसी जज़्बे को और मज़बूत करके आपको और हमको "ज़कात और फितरा" का हुक्म दिया गया है। जो आपको "ईद उल फित्र" की नमाज़ और "खुशियों की दावत का लौट कर आने" के पहले चुकाना है। जिससे वह गरीब , मिस्कीन , फकीर से लेकर गरीब और मजबूर दोस्त और नाते रिश्तेदार तक भी "खुशियों की दावत को लौट सकें"।

यह आपकी ज़िम्मेदारी है , इसीलिए "ज़कात" को इस्लाम के 5 फर्ज़ में से एक बनाया गया है और इसका ज़िक्र नमाज़ के साथ 17 बार कुरान में आया है , बल्कि जब जब नमाज़ का हुक्म हुआ तब तब "ज़कात" का भी हुक्म हुआ है।

ज़कात , अपनी कमाई और ज्वेलरी के मुल्य का 2•5% या चालीसवाँ हिस्सा होता है , ज्वेलरी का स्टैन्डर्ड डिडक्शन अर्थात न्युनतम सीमा 52 तोला चांदी या इसके मुल्य का सोना होता है जिसकी डीटेल वाल पर है। हालाकि ज़कात आप पूरे साल भी अदा कर सकते हैं पर रमज़ान में इसके निकालने पर 70 गुना पुण्य है।

अब आप जो "खुशियों की दावत को लौट रहे हैं" तो इसकी गारंटी भी आपको लेनी है कि उस दिन गरीब , मिस्कीन , फकीर भी आपकी तरह अच्छी दावत कर सकें , इसके लिए "फितरे" की व्यवस्था है "फितरा" मतलब "नाश्ता"। अर्थात आपको गरीब , फकीर और मिस्कीन के उस दिन के नाश्ते का इंतज़ाम ईद की नमाज़ के पहले करना होता है।

स्पष्ट है कि सेवईं या नाश्ता वगैरह ईद की नमाज़ के बाद ही होता है , इसलिए इस्लाम ने यह व्यवस्था बनाई कि खुद नाश्ता करने के पहले गरीब , फकीर और मिस्कीन के नाश्ते का इंतज़ाम करो।

फितरा होता कितना है ? इसका भी ज़कात की तरह एक गणितीय आधार है। हुज़ुर सल्ल्लाहो अलैहेवसल्लम के वक्त में तौल की एक इकाई "सआ" थी जो आज की तौल इकाई का 2 किलो 600 ग्राम होती है। यद्धपि कुछ लोग इसे 1 किलो 650 ग्राम मानते हैं , पर अधिक हो तो बेहतर है।

तो ईद की नमाज़ के पहले मुसलमान को 2 किलो 600 ग्राम अनाज की कीमत के बराबर पैसा गरीब , फकीर , बेवा और मिस्कीन को बाँटना होता है।

इसमें भी एक कंडीशन उभरती है , अनाज आप अपनी हैसियत के मुताबिक चुनें , जिनके पास माल कम हो वह गेहूँ के 2•6 किलो का मुल्य के बराबर , और अधिक हो तो चावल , चना , और अधिक धनवान हैं तो खजूर , और अधिक धनवान हैं तो काजू , किशमिश।

इसमें भी एक कंडीशन उभरती है , आप इन सबकी उसी गुणवत्ता के आधार पर दाम तय करें जो इनकी गुणवत्ता आप स्वयं खाते हैं।

अर्थात आपके घर में गेहूँ ₹30 प्रति किलो वाला खाया जाता है तो आप 2•600 ग्राम ×30 अर्थात ₹78/= प्रति व्यक्ति , चावल ₹100 वाला खाया जाता है तो 2•600×100= ₹260 प्रति व्यक्ति , काजू ₹1000 वाला खाया जाता है तो 2•600×1000= ₹2600 प्रति व्यक्ति।

यद्धपि फितरा 5 फर्ज़ में शामिल नहीं पर वाजिब ज़रूर है। यदि आप अपनी "खुशियों की दावत को लौट रहे हैं" तो इसकी नमाज़ के पहले फितरा अदा करते हैं तो आपकी "ईद उल फित्र" का असल मकसद पूरा हो जाता है।

यही आपकी असल "ईद उल फित्र" होती है।

रमजान इस्लामिक कैलेंडर का नौवां महीना होता है। रमजान को 'कुरआन का महीना' भी कहा जाता है, रमज़ान के इसी महीने में भूखे प्यासे हुज़ूर सल्ल्लाहो अलैहेवसल्लम पर कुरान उतारी गयी।

पहली "ईद उल-फ़ित्र" सल्लल्लाहो अलैसेवसल्लम हज़रत मुहम्मद ने सन 624 ईसवी में जंग-ए-बदर के बाद मनाया।

तो ज़कात और फितरा , ईद की नमाज़ के पहले , गरीब और ज़रूरतमंद में बाँट दीजिए , तभी आपकी "ईद उल फित्र" मुकम्मल होगी।

ईद चौराहे पर डीजे बजा कर "तम्मा तम्मा लोगे" पर नाचने और झूमने से मुकम्मल नहीं होगी। जकात और फितरा बाटने से मुकम्मल होती है, और इसको मुकम्मल करने लिए लाॅकडाऊन हो या ना हो फर्क नहीं पड़ता।

Thursday, June 17, 2021

काफिर के हुकूक (Rights)

 



काफिर के हुकूक (Rights)


जो लोग काफिर का मतलब नहीं जानते वो काफिर लफ्ज़ को गाली समझते हैं, इसकी सच्चाई को जानने के लिए जरूरी है के हम इसके मतलब को जाने ,

काफिर लफ्ज़ कुफ्र से बना है जिसका माना है:

" छिपाना, इंकार करना, क्योंकि काफिर या मुर्तद अपनी अक्सरियत को छिपाता है और उसका इंकार करता है इसलिए उसे काफिर कहा जाता है"

हदीस में आया है,

" हर शख्स अपनी अक्सरियत पर पैदा किया जाता है,फिर उसके मां बाप उसको ईसाई बना देते है या यहूदी बना देते हैं या मजूसी बना लेते हैं"

(बुखारी 1359, मुस्लिम 2658)

यहां अक्सरियत से मुराद तौहीद ( अल्लाह को एक जानना) है जिसकी तरफ इस्लाम बुलाता है, बल्कि इस्लाम ही वह चीज है जिसपर बच्चा पैदा होता है, फिर उसके मां बाप अलग अलग धर्म या अफकार के होते हैं वैसा ही बच्चा बन जाता है,

काफिर या तो मुसलमानो के मुल्क में होगा या मुसलमान उस मुल्क में होंगे जहां ज्यादातर लोग गैर मुस्लिम होंगे , दोनो हालातों में काफिर की जान उसके माल और उसके माल की हिफाजत करना मुसलमानों पर जरूरी है,

एक सही हदीस में आता है,

" जिसने किसी जिम्मी ( काफिर जो मुस्लिम मुल्क में रह रहा हो) को कत्ल किया जन्नत उसके लिए हराम है"

बल्कि कुरआन में भी बता दिया गया है

" अल्लाह तुमको इससे नहीं रोकता की तुम उन लोगों के साथ अच्छा सुलूक करो,और उनके साथ हक बात करो जिन्होंने तुमसे दीन के मामले में जंग नहीं किया , और ना तुम्हे तुम्हारे घर से निकाला, बेशक अल्लाह हक का फैसला करनेवालों को पसंद करता है"

(कुरआन सुरह मुम्ताहिना आयत 


इसलिए की मुसलमान ना तो काफिर के दुश्मन हैं और ना सारे काफिर मुसलमानो के दुश्मन है, मुसलमानों का फर्ज है की वे जिस मुल्क में रहें उसकी तरक्की की तरफ पूरा ध्यान दें और बड़ चढ़कर हिस्सा लें और सबसे बड़ी बात ये है की मुसलमान अल्लाह के दीन इस्लाम के पैरोकार हैं, इसलिए उनको चाहिए के अपने बर्ताओ से और अपनी जबान से वे इस्लाम का सही इल्म पेश करें,

कुरआन में है,

" तुम एक बेहतर उम्मत हो, तुमको लोगों के सामने लाया गया है, तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान लाते हो"

(कुरआन सूरह आल ए इमरान आयत 110)

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Wednesday, June 16, 2021

मुनकीरुल हदीस ( Hadith Rejectors) के बातिल तावीलात के खिलाफ अहले ईमान का क्या रवैया होना चाहिए

 



मुनकीरुल हदीस ( Hadith Rejectors) के बातिल तावीलात के खिलाफ अहले ईमान का क्या रवैया होना चाहिए


लम्हा ए फिक्रिया है उन लोगो के लिए जिनके सामने अल्लाह के रसूल की सही हदीस आ जाती है तो वो उसको मानने के बजाए उसमे छेड़छाड़ और हीले बाजी करते हैं और बातिल तावीलात करते हैं,

हज़रत अबू सईद अल हसन बिन अहमद बिन यजीद रहिमहुल्लाह (328 हिजरी) के पास एक आदमी आया और पूछा , " क्या हड्डी से इस्तिंजा जाएज है ??"

उन्होंने फरमाया," नहीं"

उसने पूछा ," क्यों ?"

उन्होंने फरमाया," क्योंकि अल्लाह के रसूल ने फरमाया है की ये तुम्हारे भाई जिन्नों की खुराक है"

उसने पूछा ," इंसान अफ़ज़ल है या जिन्न?"

उन्होंने फरमाया," इंसान !"

उसने कहा," पानी के साथ इस्तिंजा क्यों जाएज़ है जबकि वो इंसान की खुराक है"

रावी (अबू अल हुसैन अल तिब्सी) कहते हैं के अबू सईद रहिमहुल्लाह ने हमला करके उस आदमी की गर्दन दबोच ली और उसका गला घोंटते हुए फरमाने लगे,

" जिनदीक (बेदीन, गुमराह) ! तू अल्लाह के रसूल का रद करता है"

अगर मैं उस आदमी को ना बचाता तो वो उसे कत्ल कर देते ,

(जिम्मुल कलाम वा अहलाहु 1258 सनद सही)

(मकालात शैख जुबैर अली जई रहिमहुल्लाह जिल्द 2 पेज 557-568)

उस इंसान ने शरियत का मजाक उड़ाना चाहा था इसी लिए हज़रत अबू सईद रहिमहुल्लाह इतना गुस्सा हो गए थे,

वो कहना चाहता था के जिन्न जो के इंसानों से कम अफ़ज़ल है उनकी खुराक से इस्तिंजा जायज नहीं है लेकिन इंसान जो जिन्न से अफ़ज़ल है उनकी खुराक (पानी) से इस्तिंजा जायेज़ कैसे हुआ???

ये अमल सिर्फ मुनकिरीन ए हदीस लोगों का ही हो सकता है, अहले ईमान का तर्ज़ ए अमल तो ये होता है के जब उसके सामने सही हदीस आ जाती है तो वो कहता है

" आमन्ना सद्दकना" ( हमने सुना और इताअत्त की) चाहे वो बात उनके अकल में आए या नहीं ना आए"

अल्लाह हम सबको कुरआन वा हदीस से मुहब्बत करने वाला बना से...आमीन

अल्लाह ताला फरमाता है के ," ईमान वालों का कौल तो ये है के जब उनको इस लिए बुलाया जाता है के अल्लाह और उसके रसूल उनमें फैसला कर दें तो वो कहते हैं के हमने सुना और मान लिया , यही लोग कामयाब होने वाले हैं"

(कुरआन सूरह अल नूर आयत 51)

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Tuesday, June 15, 2021

इतिहास के पन्नों से

 




इतिहास के पन्नों से

ये तस्वीर 11 दिसंबर 2002 की है जब जॉर्ज बुश तैयब एरडोगन से मीले थे हैरत की बात ये है की उस वख्त एरडोगन सत्ता में नही बल्कि विपक्ष मे अध्यक्ष थे
25 फरवरी 2003 को एरडोगन की पार्टी सब के उम्मीद के उलट 363 सीट के साथ बहुमत से जीत जाती है और सिर्फ पांच दिन बाद 1मार्च 2003 को तुर्की की संसद मे अमेरिका की इराक पर चढ़ाई के समर्थन मे बिल आता और पास होता है

फिर अमेरिका ने अपने 62 हज़ार सैनिक, 250 लड़ाकू विमान और 65 हेलीकॉप्टर तुर्की में स्थित नाटो सैनिक अड्डे इंक्रिलिक मे भेजे जो यूरोप का सबसे बाद नाटो का सैनिक अड्डा है तुर्की में जिसे आज भी अमेरिका सीरिया, लीबिया इराक मे बम्बारी के लिए इस्तेमाल करता है

ये ज़रूरी था क्यो की अमेरिका को कुवैत छोड़ कर सारे अरब मुल्को ने सैन्य अड्डा या अपनी ज़मीन किसी भी तरीके से इराक के खिलाफ इस्तेमाल करने देने से साफ मना कर दिया था लेकिन कुवैत अकेला काफी नही था तुर्की मे एरडोगन के समर्थन की वजह से अब इराक दो तरफ से घेरा गया था

साथ ही एरदोगान ने अमेरिका को अपनी तुर्की सेना का परांजर झील बेस भी इस्तेमाल के लिए दे दिया और साथ ही 5000 तुर्की सैनिको को तुर्की इराक बार्डर पर तैनात कर दिया

06 मार्च 2003 को अमेरिका के रक्षा सेक्रेटरी कॉलिन पॉवेल (जो फ़ोटो मे दूसरी तरफ है) उन्होने प्रेस को बताया तुर्की और एरदोगान का धन्यवाद करते हुए की तुर्की को 8 बिलियन डॉलर का तुरंत भुगतान किया गया है साथ ही रक्षा आविष्कारो के लिए 24 बिलियन डॉलर बहोत ही कम ब्याज दर पर दिया गया है

आज बहोत से भाई उसी एरडोगन को जो अभी कोरोना मे भी इज़राइल को मदद भेजा था उसे अमीर उल मोमिनीन दुनिया का सबसे अच्छा मुस्लिम हुक्मरान वगैरह बोलते है जब की ऐसा बोला जाता है की उसने बहोत आवाज़ उठायी है लेकिन नज़र ऐसा आता है जितना उसने आवाज़ उठायी उतनी इज़राइल और अमेरिका की हिम्मत बढ़ी क्यो की
आज तक 75 सालो में इज़राइल ने अपना राजधानी जेरुसलम को बोलने की हिम्मत नही की अमेरिका ने पहली बार अपना दूतावास जेरुसलम शिफ्ट किया इज़राइल के सबसे खतरनाक जान माल का नुकसान करने वाली बम्बारी गाज़ा में दो बार हो गयी एरडोगन के ही राज में हुई

सोचने वाली बात है की हम हर दूसरी छोटी छोटी बात पर अमेरिक इज़राइल की साज़िश ढूंढते है लेकिन शायद असली साज़िश यहूद नासरा ऐसी खेलते है की हम को बज़ाहिर वो बहोत आकर्षित करती है और ये सोच कर वो ऐसा खेल खेलते है की हमारा उस पर ध्यान भी जाए तो सकारात्मक रूप मे और हम फालतू चीज़ों मे साज़िशें ढूंढते रह जाए।

Monday, June 14, 2021

उम्मत पूछ रही है, कहां है सलाहुद्दीन ? कहां है सलाहुद्दीन??जो फलस्तीन को आज़ाद करवाए,




 उम्मत पूछ रही है, कहां है सलाहुद्दीन ? कहां है सलाहुद्दीन??जो फलस्तीन को आज़ाद करवाए,


उस दौर में सलाहुद्दीन की राह में दो रोड़े थे एक शिया (फातिमी) और दूसरा इक्खवानी+शिया+सुन्नी जुम्मन (अब्बासी)

सबसे पहले सलाहुद्दीन ने इन गद्दारों से निपटा क्योंकि यही लोग पीछे से उसके महाज़ को नुकसान पहुंचाते थे, एक बार तो सलाहुदीन बैत अल मकदिस के मुहासरे में इनकी गद्दारी की वजह से रोने लगा था , और बीच में ही मुहासरा तोड़कर वापस लौट गया और इनकी ईंट से ईंट बजाकर दोबारा फलस्तीन पहुंचा और इस्लाम का झंडा बुलंद किया ,

इसके बाद सलाहउद्दीन ने अपनी अलग हुकूमत कायम की जिसे अय्यूबी सलतनत के नाम से याद किया गया जो शाम से लेकर मिस्र तक फैली हुई थी,

आज भी वही सूरत ए हाल है, सलाहुद्दीन की कौम कुर्द की नसल कुशी ईरान और तुर्की कर रहें हैं ताकि इस कौम में दोबारा सलाहुद्दीन पैदा न हो

यकीन न हो तो तारीख पढ़कर देखो

साभार: Umair Salafi Al Hindi
blog: islamic leaks 

Sunday, June 13, 2021

इस्राएलियों ने फलस्तीन पर पूरी शिद्दत से हमला कर दिया है, अब किधर गए हिज़्बुल्लाह के गीदड़??

 



इस्राएलियों ने फलस्तीन पर पूरी शिद्दत से हमला कर दिया है, अब किधर गए हिज़्बुल्लाह के गीदड़??


मक्का व मदीना पर मिज़ाइल डागने वाले हुथी शिया जिनका नारा है अल मौत उल इजराइल??

कहाँ गया राफ़ज़ी शैतान ईरान जो दिन में चार पाँच बार इजराइल को धमकियां लगाता है??

कहाँ गए हशद अल शाबी मजूस?

कहाँ गए हमासी चूहे ??

कहाँ गए बलवान तुर्क पहलवान ?

कहां गए अरब बहारिया के इख़्वानी क़ातिल?

इसरायल के खिलाफ शियाँ उल शैतान की सब गीदड़ भाबकियाँ सिर्फ खोखले दावे ही हैं,

फ़लस्तीन में इस वक़्त सैंकडों अस्करी और सियासी तंजीमें मौजूद हैं जो इस मुद्दे की तिजारत करती हैँ और ईरान और टर्की के इशारे पर नाचती हैं, ये अस्करी तंजीमें कभी भी इस्राइली फौज के सामने नहीं आती सिर्फ मज़लूम फलस्तीनियों को सामने लाती है,

लाखों फ़लस्तीनी इस्राएल में नौकरी करते हैं, इख़्वानी पार्टियों से मिलकर नेतन्याहू इजराइल पर हुकूमत करता है,

खुलासा: मसला फ़लस्तीन तमाम मुसलमानों का दीनी मसला है लिहाज़ा दीन पर अमल करके हम अल्लाह की मदद और ताकत के मुस्तहिक़ बनें,

अब तक कि रिपोर्ट के मुताबिक 22 मासूम फ़लस्तीनी नागरिक मारे जा चुके हैं जिसमे 9 बच्चे है और 7 इसरायली घायल हुए हैं,