Thursday, July 22, 2021

कर्मों की वजह से सबसे बढ़ कर घाटा उठाने वाले




 उनसे कहो, "क्या हम तुम्हें उन लोगों की ख़बर दें, जो अपने कर्मों की वजह से सबसे बढ़ कर घाटा उठाने वाले हैं?

ये वे लोग हैं जिनकी दुनियावी ज़िदगी की सारी दौड़ धूप सीधे रास्ते से भटकी रही और ये लोग यही समझते हैं कि वे बहुत अच्छा कर्म कर रहे हैं |

- सूरह : कहफ, आयत : 103,104

हकिकत मे इंसान अपने रब का बहोत बड़ा ना शुक्रा है और उसको सब्र नही होती उसके रिज्क पर जिससे वो खसारा घाटा नुक्सान उठाने वालो मे शामिल हों जाता है

Wednesday, July 21, 2021

दरगुजर

 



हर किसी को हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता,

बहुत सी जगह पर वाकई दिल बड़ा करना पड़ता है, दरगुजर करना पड़ता है, हर कोई नहीं समझता आपको, और हर किसी को आप समझा नहीं सकते,

Umair Salafi Al Hindi

Tuesday, July 20, 2021

औरत जिस रूप में भी आपकी ज़िंदगी में शामिल है उसकी कद्र करो,

 



एक खूबसूरत तहरीर


कहते हैं के शादी के बाद औरत का चेहरा और जिस्मानी हालत बताती है के उसके शौहर ने उसे किस हालत में रखा हुआ है, वह औरतें कभी बूढ़ी नहीं होती जिनके शौहर उन पर जान छिड़कते हैं,

शादी से पहले लड़की मुनासिब शक्ल सूरत की होती है जो पहन ओढ़ कर अच्छा लगती है, मगर शादी के बाद शौहर की तवज्जोह, मुहब्बत और इज़्ज़त औरत के चेहरे को ऐसा निखारती है के वह मजीद खूबसूरत होती चली जाती है,

शादी के दस बीस साल बीत जाने के बाद भी औरत खूबसूरत और कम उम्र लग सकती है के देखने वाले दंग रह जाएं और ज़ौजैन की किस्मत पर रश्क करते ना थकें, लोग हमेशा औरत को इल्जाम देते हैं के वह अपना ख्याल नहीं रखती जिसका शौहर ही उसे इज्जत वा अहमियत ना देता हो तो वह भला किसके लिए सजे संवरे,

कहते हैं के औरत को तुम जैसा कहोगे वह वैसा ही बनती चली जायेगी, उसे बदसूरत और फूहड़ कहोगे तो वही बनती चली जायेगी और उसे खूबसूरत और सलीकामंद कहोगे तो वह खुदबखुद वैसी ही बनती चली जायेगी,

नबी ए करीम मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम फरमाते हैं," तुम में से सबसे बहतरीन शख्स वह है जो अपनी औरत के साथ सबसे बेहतर सुलूक करे "

औरत इतनी अजीम है, अशरफुल मखलूक है, इस हद तक नाजुक मिजाज़ है के फूल उसे राज़ी और खुश कर देता है, और एक लफ्ज़ उसे मार देता है,

तो बस ए मर्दों ख्याल रखो औरत तुम्हारे दिल के नजदीक बनाई गई है ताकि तुम अपने दिल में उसको जगह दो,

औरत अपने बचपन में अपने बाप के लिए बरकत के दरवाज़े खोलती है, अपनी जवानी में अपने शौहर का ईमान मुकम्मल करती है, और जब मां बनती है तो जन्नत उसके कदमों के नीचे होती है,

औरत जिस रूप में भी आपकी ज़िंदगी में शामिल है उसकी कद्र करो,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Monday, July 19, 2021

जवाल ऐसे नहीं आता !!

 



जवाल ऐसे नहीं आता !!


हज़रत उमर फारूक ने चौदह पैबंद के साथ अपने दौर के सुपर पावर ईसाइयत के सबसे मुकद्दस शहर येरूशेलम की तारीख का रुख बा ज़ोर ए ताकत बदल दिया था,

आइए बर्रे सगीर में मुगलिया सल्तनत के दौर ए जवाल पर नज़र डालिए,

बहादुर शाह ज़फ़र का दस्तरख्वान मुलाहिजा फरमाइए,

चावलों मे :

यखनी पुलाओ, मोती पुलाओ, नुक्ति पुलाओ , नूरमहली पुलाओ, किशमिश पुलाओ, नरगिस पुलाओ, मुज़फर पुलाओ, फालसाई पुलाओ, आबी पुलाओ, सुनहरी पुलाओ, रुपहली पुलाओ, मुर्ग पुलाओ, बीजा पुलाओ, अनानास पुलाओ, कोफ्ता पुलाओ, बिरयानी पुलाओ, सालिम बकरे का पुलाओ, बोंट पुलाओ, खिचड़ी, शवाला ( गोश्त में पकी हुई खिचड़ी) और काबुली जाहिरी,

सालनों में उम्मीद है मेरी तरह आपने ये नाम भी ना सुनें होंगे,

कलियह, दो प्याजा, हिरण का कोरमा, मुर्ग का कोरमा, मछली, बैगन का भरता, आलू का भरता, चने की दाल का भरता, बैगन का दलमाह, करेलों का दलमह , बादशाह पसंद करेले, बादशाह पसंद दाल, सीख कबाब, शामी कबाब, गोलियों के कबाब, तीतर के कबाब, बटेर के कबाब, नुक्ती कबाब, खताई कबाब, और हसीनी कबाब शामिल होते थे,

रोटियों की ये इकसाम शायद आपने इंटरनेट पर भी ना देखी हों,

चपातियां, फुल्के, पराठे, रोगनी रोटी, खमीर रोटी, गावदीदा, गावो ज़बान, कुलचा, घोसी रोटी, बादाम की रोटी, पिस्ते की रोटी, चावल की रोटी, गाजर की रोटी, मिस्री की रोटी, नान, नान गुलज़ार, नान तिनकी, और शीर माल,

मीठे की तरफ नज़र डालिए,

मुतंजन, जर्दा, कद्दू की खीर, गाजर की खीर, कांघनी की खीर, याकूती, नम्स, रवे का हलवा, गाजर का हलवा, कद्दू का हलवा, मलाई का हलवा, बादाम का हलवा, पिस्ते का हलवा , रंगतरे का हलवा,

मुरब्बे इन किस्मों के होते थे,

आम का मुरब्बा, सेब का मुरब्बा, अमले का मुरब्बा, तरंज का मुरब्बा, करेले का मुरब्बा, रंगतारे का मुरब्बा, लींबू का मुरब्बा, अनानास का मुरब्बा, कटहल का मुरब्बा, ककरैंडा का मुरब्बा, बांस का मुरब्बा,

मिठाइयों की किस्म ये थी,

जलेबी, इमरती, बर्फी, फीनी, कलाकंद, मोती पाक, बालूशाही, दर बहिश्त, अंदरसे की गोलियां, सोहन हलवा, हब्शी हलवा, हलवा गोंद का , हलवा पीढ़ी का , लड्डू मोतीचूर के, मूंगे के, बादाम के, पिस्ते के, मलाती के, लौजैन मूंग की, दूध की, पिस्ते की, बादाम की, जामुन की, रंगतारे की, फालसे की, पेठे की मिठाई और पिस्ता मग्जी,

ये मजेदार और रंगारंग खाने सोने और चांदी के बर्तन, रकाबों, तश्तरियों और पियालियों में सजे और मुश्क, ज़ाफरान और केवड़ों की खुशबू से महका करते थे, चांदी के वर्क अलग से झिलमिलाते थे, खाने के वक्त पूरा शाही खानदान मौजूद होता था,

(इंतजार हुसैन की किताब " दिल्ली जो एक शहर था" से लिया गया है)

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks 

Sunday, July 18, 2021

अब भूल गई उम्मत,





मिसवाक जैसी सुन्नत अब भूल गई उम्मत,

सिगरेट बीड़ी शौक से अब पी रही है उम्मत,

जोहरा की थी जो सुन्नत वह भूल गई उम्मत,
बेपर्दा होकर शौक से अब घूम रही उम्मत,

रातों की मस्तियों में मज़ा लेती है उम्मत,
वक्त फज्र के होते ही सो जाती है उम्मत,

कुरआन की तिलावत को अब भूल गई उम्मत,
हाथों में मोबाइल को लिए रहती है उम्मत,

अजकार, दुआ , सब भूल गई उम्मत,
गानों में मगन रहती है दिन रात अब उम्मत,

मस्जिद की अज़ान सुनकर जाती नहीं उम्मत,
दरगाहों में, बाज़ार में मेलों में पहुंच जाती है उम्मत,

सरकार की सुन्नत को अब छोड़ रही उम्मत,
फैशन को बड़े शौक से अपना रही है उम्मत,

तस्बीह से उंगली से दुआ पढ़ रही थी उम्मत,
हर वक्त मोबाइल में मशगूल है अब उम्मत,

मनकूल

साभार: Umair Salafi Al Hindi

Blog: Islamicleaks 

Saturday, July 17, 2021

"मैं नमाज़ पढ़ना शुरू करती हूं फिर छूट जाती है

 



"मैं नमाज़ पढ़ना शुरू करती हूं फिर छूट जाती है, कभी बहुत अच्छा लगता है, कभी नमाज़ सुकून देती है मगर थोड़े ही वक्त बाद बेजारियत हो जाती है, नमाज़ बोझ लगती है, मुझे अपना भारी वजूद नमाज़ के लिए उठाना मुश्किल लगता है,"


वह बहुत थके हुए लहज़े में कह रही थी, मुझे लग रहा था बात करते करते उसका सांस फूल रहा है, वह मुझे ज़ाहिरी नहीं बातिनी तौर पर थकी हुई महसूस हुई,

" नज़र का पर्दा करती हो ??" मैंने नरमी से उसे देखते हुए उससे सवाल किया , उसने हैरत से मेरी तरफ देखा , इस बात की शायद उसे तवक्को नहीं थी,

" नज़र का पर्दा?? " मैं... मैं.. तो नकाब करती हूं खुद, मैं समझी नहीं... नज़र के परदे का क्या ताल्लुक नमाज़ से...?? अल्फ़ाज़ बेतरतीब थे...

मैं मुस्कुरा दी, " ताल्लुक तो है, बहुत गहरा है" बुरी नज़र शैतान के जहरीले तीरों में से एक तीर है जो इंसान के दिल में उतर जाता है, पर्दा करना तो बहुत आसान है मगर नज़र का पर्दा कुछ मुश्किल है, जब निगाह पाक नहीं रहती ना तो इबादतों में लज्जत जाती रहती है,

जब निगाह पाक नहीं रहती तो सोच भी पाक नहीं रहती, और जब सोच खराब तो नियत खराब , और अमाल का दारोमदार तो है ही नियतों पर, तुम्हे पता है ??

इंसान जो सोचता है, देखता है, जो सुनता है वह उसके दिल पर असर रखता है, हम क्या देखते हैं, क्या सुनते हैं, क्या बात करते हैं ,कभी सोचा है ?? तुम खुद तो पर्दा करती हो तो क्या हर वह नामहरम जो तुम्हारी नज़र को अच्छा लगे , उसे पहली नज़र के बाद अपनी नफ्स की तस्कीन के लिए कितनी बार देखती हो के वह किस कदर खूबसूरत है ??

फेसबुक पर कोई गैर मुनासिब तस्वीर , कोई वीडियो, कोई बात, जब कोई नहीं देख रहा होता , तन्हाई में, मगर सिर्फ अल्लाह !! तो क्या एक बार इस पर रुकती हो ?? कभी कोई फिल्म, कोई गाना जिसमे नामहरम तो खैर छोड़ो...हमारी अपनी सनफ का भी पर्दा पूरा नहीं होता, बेख्याली में देख लेती हो ??

और फिर नमहरम हमारे इर्द गिर्द के मर्द तो नहीं है ना... ये जो टीवी पर आने वाले एक्टर्स, मॉडल, जिनकी गायबाना मुहब्बत में हम गिरफ्तार होते हैं , उन्हे गौर से देखते हैं, उनकी बॉडी, ड्रेसिंग, और लुक्स की तारीफ, ये सब नज़र का पर्दा खतम करने के बाद ही हो पाता है,

तो तुम सोचो, मैं नहीं कह रही इसका जवाब मुझे दो, अपना मुहासबा करो, इसका जवाब अपने दिल को दो, अगर इसका जवाब " हां " में आए तो समझ जाओ ये नज़र की ख्यानत तुमसे तुम्हारी इबादत की लज्जत छीन रही है, दिल को सियाह कर रही है,

ज़िना सिर्फ एक तरह का तो नहीं होता , अगर हाथ से कुछ गलत छुआ तो वो हाथ का ज़िना, ज़बान से गंदी बात कहीं तो ज़बान का ज़िना, आंखों से कुछ हराम देखा तो वह आंख का ज़िना है, नज़र की बेपरदगी दिल में ऐसा सुराख कर देती है के जिससे हमारे दिल का नूर बहता जाता है, और फिर जो लोग नज़र का पर्दा नहीं करते उनकी नमाजे उनपर भारी हो जाती हैं, अगर वह नमाज़ पढ़ भी लें तो बेदिली से पढ़ते हैं, दिल नहीं लगता , बोझ सा रहता है दिल पर , तो क्या तुम नज़र का पर्दा करती हो ??

अगर "नहीं" तो आज से अहद कर लो के करोगी, जब कभी गलती से कुछ गलत देख भी लो, अगर कभी तुम्हारा नफ्स तुम्हारे ईमान पर हावी भी हो जाए तो फौरन इस्तगफार कर लिया करो, अल्लाह की तरफ रुजू कर लिया करो , फिर तुम देखना नमाज़ों का लुत्फ , इबादतों की लज्जत और दिल का सुकून, सब तुम्हे अता कर दिया जाएगा,

और एक और बात, सुकून नमाज़ में रखा गया है के कुरआन खुद कहता है के ," बेशक अल्लाह के जिक्र से दिलों को सुकून हासिल है "

अब अगर किसी को वो सुकून महसूस नहीं होता ना , तो उसे एक मिसाल से समझो, एक बीमार सख्स है, उसको आप उसके पसंदीदा खाना लाकर दो वह नहीं खाएगा, अब वह कहे की खाने में वह लज़्ज़त नहीं है ये तो कोई बात नहीं है ना, खाने में लज्जत है, खाना वही है, मगर उसका मादा बीमार है,

इसी तरह सुकून इबादत में रखा गया है लेकिन जिसको नहीं मिलता उसे समझ जाना चाहिए के उसका दिल बीमार है, और उस दिल की सेहतयाबी का नज़र की हिफाजत से बहुत गहरा ताल्लुक है,

मैंने तहम्मुल से अपनी बात मुकम्मल करके उसकी जानिब देखा , जो बात मैने खुद एक अरसे की कोशिश, बेचैनी और अजतराब के बाद समझी थी वह उस तक पहुंचा दी थी, मुझे जवाब की जरूरत नहीं रही थी, उसकी आंखों की चमक मेरे लिए काफी थी....,

मनकूल

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks 

Friday, July 16, 2021

रसूल अल्लाह मुहम्मद (sws) के साथ ऐसी मुहब्बत करना अहले ईमान पर फ़र्ज़ है जो अल्लाह के इलावा बाक़ी तमाम मुहब्बतआे पर भारी हो,

 



रसूल अल्लाह मुहम्मद (sws) के साथ ऐसी मुहब्बत करना अहले ईमान पर फ़र्ज़ है जो अल्लाह के इलावा बाक़ी तमाम मुहब्बतआे पर भारी हो,


क्यूंकि अल्लाह ताला ने फरमाया:

" ए नबी ! कह दो कि अगर तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे , तुम्हारे भाई, तुम्हारी बीवी, तुम्हारे रिश्तेदार, तुम्हारा वह माल जो तुमने कमाया है, तुम्हारा कारोबार जिसके मंदा पड़ जाने का तुम्हे डर है, तुम्हे अल्लाह और उसके रसूल (sws) और अल्लाह की राह में जिहाद से ज़्यादा महबूब है तो फिर इंतज़ार करो यहां तक की अल्लाह का फैसला आ जाए (और याद रखो) अल्लाह ताला ऐसे ना फरमानों को राह नहीं दिखाता "

(क़ुरआन अल तौबा आयत 24)

साभार: Umair Salafi Al Hindi