Friday, February 18, 2022

दीफा करें मगर कितना ??

 



दीफा करें मगर कितना ??


मैने मुलाहिजा किया के सोशल मीडिया में सय्यद मौदूदी के मुरीद और पैरोंकार इनका दिफा बिलकुल वैसे ही करते हैं जैसे एक मुकल्लिद अपने इमाम का और एक मुरीद अपने पीर का , हालांकि सय्यद मौदूदी ने जो गलत कहा उसी पर नक़द किया जाता है, जो उन्होंने अच्छा किया उसका इंकार नहीं,

दरअसल गलती के नताइज़ का एतबार होता है, चुनांचे उन्होंने अकल वा सेल्फ स्टडी को मेयार बनाकर तारीख वा हदीस,तफसीर और सियासत शरीया में जो ठोकरें खाई हैं, और रवाफिज़ के ताईन जो खारिजी रवैया अपनाया है उम्मत पर इसके बहुत भयानक नताइज सामने आए हैं, चुनांचे उसे एक्सपोज करना और नौजवान ए उम्मत को इससे आगाह करना हर वाकिफ कार मुखलिस मुसलमान पर वाजिब है,

दूसरे ये के मुरीदान ए मौदूदी से गुजारिश है के उमूमी दिफा के बजाए उन लोगों का ताक्कुब करें जो बेजा नक़द करते हैं, क्योंकि उमूमी दिफा सिर्फ किताबुल्लाह, सुन्नत ए रसूल और सहाबा का किया जाता है बाकी किसी का नहीं, चुनांचें इनके इलावा किसी उम्मती का उमूमी दिफा वही करता है जो उसका मुरीद , मुकल्लिद या अंध भक्त होता है, और वह अपनी महबूब शख्सियत को अल्लाह, रसूल या कमसे कम सहाबा के दर्जे में कर रखा होता है,

नोट: अगर ये उसूल जेहन में रहेगा तो हम दिफा शख्सियत में कभी नहीं भटक सकते , चुनांचे हम पर वाजिब है के हम किताब वा सुन्नत और सहाबा का उमूमी दिफा करें क्योंकि कुरआन पाक में उन सबकी तादील, सिकाहत और इन पर कुल्ली एतमाद की सर्टिफिकेट मौजूद है, रहे बाकी लोग तो उनका दिफा उसी कद्र जायज है जिस कद्र उस पर किसी किस्म का ज़ुल्म हुआ हो ,

साभार: डॉक्टर अजमल मंजूर मदनी
तर्जुमा : Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Thursday, February 17, 2022

डेविड सेलबॉर्न पश्चिमी दुनिया का मशहूर लेखक है, उसने एक किताब लिखी थी the loosing battle with islam,





 डेविड सेलबॉर्न पश्चिमी दुनिया का मशहूर लेखक है, उसने एक किताब लिखी थी the loosing battle with islam,

इस किताब में उसने लिखा के पश्चिमी दुनिया इस्लाम से हार रही है, उसने हार के कई कारण गिनाए हैं, जिसमे इस्लाम के मज़बूत फैमिली सिस्टम को भी एक कारण बताया है,
पश्चिमी दुनिया मे फैमिली सिस्टम तबाह हो चुका है, जिसके नतीजे में पूरा पश्चिमी समाज तबाह होने के कगार पर पहुंच चुका है, पश्चिमी दुनिया मे फैमिली सिस्टम इस बुरी तरह से तबाह हो चुका है के वहां की पोलिटिकल पार्टियां फैमिली सिस्टम को बचाने का वादा अपने इलेक्शन में करती है, ऑस्ट्रेलिया में तो 'फैमिली फर्स्ट' नाम से एक पोलिटिकल पार्टी तक बना ली गयी थी, फैमिली सिस्टम को बचाना वेस्टर्न वर्ल्ड का सबसे बड़ा मुद्दा है क्योंकि अगर फैमिली नही बचेगी तो समाज भी देर सवेर ध्वस्त हो जाएगा,
पश्चिमी विचारक ये बात बहुत अच्छी तरह से जानते है के पूरी दुनिया मे सिर्फ इस्लाम और मुस्लिम सोसाइटी ही ऐसी बची है जहां फैमिली सिस्टम बचा हुआ है और इस्लाम एक ऐसा इको सिस्टम डेवलप करता है जहां फैमिली सिस्टम फलता फूलता है,
यही वजह है के डेविड सेलबॉर्न जैसे लेखक ये कहने पर मजबूर हो जाते हैं के इस्लाम के मज़बूत फैमिली सिस्टम की वजह से पश्चिम देर सवेर इस्लाम से हार जाएगा
मलाला यूसुफजई को वेस्ट ने खड़ा किया है तो अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल भी करेगा, और करता रहता है,
मलाला हों या उसके समर्थक हों, उन सबका टारगेट इस्लाम और मुस्लिम समाज मे मौजूद मज़बूत फैमिली सिस्टम को तोड़ना और खत्म करना है, शादी बियाह पर दिया गया मलाला का हालिया बयान उसी सिलसिले की कड़ी है
मलाला और उनके समर्थक
दरअसल सभ्यताओं की जंग में पश्चिम के प्यादे हैं, उनके एजेंट हैं, जो सभ्यताओं की जंग में पश्चिम की हारती हुई बाज़ी को जीत में बदलने के लिए फड़फड़ा रहे है

Wednesday, February 16, 2022

बाग बहिस्त में मुझे हुक्म सफर दिया था क्यू कार कहां दराज है,अब मेरा इंतेजार कर,

 


बाग बहिस्त में मुझे हुक्म सफर दिया था क्यू

कार कहां दराज है,अब मेरा इंतेजार कर,
व्याख्या:
मुझे तूने बहिस्त से कूच का हुक्म क्यों दिया था ? तेरे हुक्म के मातहत मैं इस दुनियां में आ गया और जो काम सुपुर्द हुआ था उसमे लग गया, ये काम बहुत लंबा है और जल्द खतम नहीं हो सकता ,ना मैं इसे अधूरा छोड़ सकता हूं, अब मेहरबानी फरमा कर मेरा इंतेजार कर ,
(शरह गुलाम रसूल महर)
इकबाल कहते हैं के , ऐ खुदा ! तूने अपनी मईशत के मुताबिक हज़रत आदम को खुद जन्नत से निकाला अब तो तुझे इंतजार करना ही पड़ेगा क्योंकि जबतक " कार ए जहां " इख्तेताम पजीर ना हो,मेरी मुलाकात तुझसे नामुमकिन है, यानी जब तू ये कारखाना आलम खतम कर देगा उस वक्त मैं तुझसे मिल सकूंगा ,
वाजेह हो के इस अशहार में अल्लामा इकबाल ने इस हकीकत का इंशिकाफ किया हैं के जिस तरह इंसान खुदा से मिलने का आर्जुमंद है, खुदा भी इंसान से मिलने का तमन्नाई है, चुनांचे ज़बूर अजम में उन्होंने खुद इस हकीकत को वाज़ेह कर दिया है,
ما از خدائے گم شدہ ایم او بجستجوست
چوں ما نیاز مند و گرفتارِ آرزوست
" खुदा हमें गुम कर बैठा है और अब हमारी तलाश में है,अब गोया वह हमारी तरह नियाज़ मंद भी है और गुफ्तार ए आरजू भी"
लेकिन उसने खुद अपनी मईशत की बिना पर इंसान को एक अरसे के लिए दुनिया में भेज दिया है,अंजाम कार जब ये कारखाना दरहम बरहम हो जायेगा तो
"کل شی یرجع الیٰ اصله"
के मुताबिक इंसान फिर अपनी असल की तरफ लौट जाएगा, इस बात को इकबाल ने शायराना अंदाज में इस शेर में बयान किया है और इस मफरूजा की बिना पर के महबूब खुद हमारा मुश्ताक है,
Bagh-e-Bahisht Se Mujhe Hukam-e-Safar Diya Tha Kyun
Kaar-e-Jahan Daraz Hai, Ab Mera Intizar Kar✨
Why did You order me to quit the Garden of Eden?—
Now there is much to be done here—so just wait for me!
साभार: सबा यूसुफजई
Blog: Islamicleaks

Tuesday, February 15, 2022

किसी को जान लेना बहुत बड़ा अजाब होता है,

 



किसी को जान लेना बहुत बड़ा अजाब होता है,
चेहरे पढ़ने लगोगे तो दोस्तियां टूट जाएंगी,
नजरें पहचानोगे तो कइयों से घिन आना शुरू हो जाएगी,
और ये तो जानने की कोशिश भी ना करना के कौन कौन सी बातें लोग दिल में छिपाए बैठे हैं,

ये तो बस अल्लाह का हौसला है वह सबकुछ जानता है और खामोश रहता है,
साभार: सबा यूसुफजई

Monday, February 14, 2022

ये कतरनों का मरकज है

 



ये कतरनों का मरकज है, यहां जो कतरन बंधी हुई हैं ये हमारे समाज के ना आसूदा ख्वाहिशात हैं,अधूरे ख्वाब है,नाकाम हसरतें हैं, आधी अधूरी तमन्नाएं और मायूस दुवाएं हैं जो अकीदे की कमज़ोरी और जिहालत वा नादानी में गंदे कतरनों के साथ बांध दी गई है,

कतरने बता रही हैं के यहां अल्लाह नहीं रहता!!

ये कतरनें ये भी बता रहीं हैं के यहां बच्चे पैदा करना, शादी करवाना,कारोबार में बरकत डालना,अच्छी नौकरी का बंदोबस्त करना, रूठी बीवी मनाना,महबूब को हासिल करना, ये सब शायद अल्लाह के दायरे इख्तियार में नहीं, बल्कि ये सब कुछ इन कतरनों के जरिए मिलता है,

ये कतरनें कमीज़ फाड़ कर बनाई गई होगी, सलवार फाड़ कर बनाई गई होंगी, दुपट्टे फाड़ कर बनाई गई होंगी या चादरें फाड़ कर बनाई गई होंगी,

यही कतरनें जब कपड़े, कमीज़, सलवार, दुपट्टे या चादरों की शकल में किसी के पास थी तो उनकी मन मांगी मुरादें पूरी नहीं हो रहीं थी लेकिन जब उनकी कतरने बना कर उन्हें कहीं बांध और लटका दिया गया तो मन मांगी मुरादों में जान पड़ने लगी ??
बदकिस्मती से ये सब इस समाज में हो रहा है जो एक अल्लाह और एक अल्लाह के दायरे इख्तियार पर यकीन रखने का दावा करता है,

मेरे पास बहुत कुछ है जो मुझे बगैर मांगे मिला है, मेरे पास बहुत कुछ है जो शायद मांगने से मिला है, मेरे पास बहुत कुछ नहीं है जो मैं एक लंबे अरसे से मांग रहा हूं,

लेकिन मुझे कभी इन कतरनों में दिलचस्पी वा दिलकशी महसूस नहीं हुई क्योंकि मुझे पता है मेरी कमीज़ या सलवार से अलग होने वाली कतरन और चिथड़ों में कुछ नहीं है, वहां ना तो मेरे बच्चे हैं,ना मेरा कारोबार है,ना मेरी शादी है, ना मेरा महबूब है,और ना मेरा फायदा और नुकसान है,

मुझे मालूम है के ये सब चीजें सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह ताला के दायरे इख्तियार और उसी के कब्जे कुदरत में हैं,
ना तो मेरा अल्लाह बहरा है, ना अंधा है और ना ही बेवकूफ है जो वह मेरी जायज जरूरतें और नेक तमन्नाएं ना समझ सके,इसलिए मुरादें बिना किसी शरीक किए हुए अपनी सारी मुरादें अल्लाह से मांगें वो ही कय्यूम और जिंदा जावेद है,
यकीन करें, बेजान कतरनों और लटकते गंदे चिथड़ो से कभी किसी को कुछ नहीं मिला और ना ही कभी किसी को कुछ मिलेगा
मंकूल
साभार: Umair Salafi Al Hindi
blog: Islamicleaks

Sunday, February 13, 2022

जानते हैं !!

 



जानते हैं !!

अल्लाह से मुहब्बत को भी Revive करने की जरूरत रहती है, उस मुहब्बत को अगर बढ़ाने की कोशिश नहीं की जाए अगर उसका तजकिरा ना किया जाए,
अगर इसको दूसरों में ना बांटा जाए,
अगर उसके खातिर खुद को थकाया ना जाए,
अगर उसको पाने के लिए अपनी मर्ज़ीयां, अपनी अना , अपनी तरजीहात कुर्बान ना की जाए तो....
तो ये मुहब्बत उसी मक़ाम पर नहीं रहती फिर ये रफ्ता रफ्ता घटने लगती है, फिर ये आदत सी बनने लगती है, फिर ये फीकी पढ़ने लगती है, इसमें वो पहले की सी तड़प वा शिद्दत नहीं रहती, फिर अमाल भी बेदिल से होने लगते हैं, फिर दिल मे वो करार ,चेहरे पर वो मुहब्बत भरी मुस्कुराहट, अखलाक में वो गर्मजोशी, कोशिशों में वो इखलास बाकी नहीं रहता ,
साभार: सबा यूसुफजई
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Saturday, February 12, 2022

आपको क्या लगता है पगड़ियों की इज्ज़त हमेशा औरत ही चुकाती है ?

 



आपको क्या लगता है पगड़ियों की इज्ज़त हमेशा औरत ही चुकाती है ?
आपको लगता है मुहब्बत सिर्फ औरत ही करती है ?
आपने कभी मुहब्बत में हारा हुआ मर्द नहीं देखा, आखिर मर्द जो ठहरा !!! शिकस्त को चेहरे पर नहीं लाता दुख को आंखों से नहीं बहाता ,

जिम्मेदारियों के बोझ से निढाल अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी शिकस्त को खामोशी से कुबूल करके उस ज़ख्म को सीने में दबा देता है, यहां तक के मुहब्बत का ज़ख्म नासूर बनकर उसको वक्त से पहले बूढ़ा करके कब्र तक ले जाता है

साभार: बहन अनम