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Saturday, December 5, 2020

उसूल ए हदीस : किस्त 5

 



उसूल ए हदीस : किस्त 5

हदीस खबर अहाद की किस्में:

रिवायत करने वालों की तादाद अगर कम है तो ये कितनी है ? तीन या उससे कम, अगर किसी तबके में उनकी तादाद कम से कम तीन है तो उसको मशहूर , दो हैं तो अज़ीज़ , और एक हैं तो घरीब कहा जाता है,

मशहूर : उस हदीस को कहते हैं जिसमें रिवायत करने वालों कि तादाद हर तबके में कम से कम तीन हो, जैसे हदीस

إِنَّ اللَّهَ لَا يَقْبِضُ الْعِلْمَ انْتِزَاعًا
तर्जुमा: "अल्लाह इल्म को इस तरह नहीं उठालेगा के उसको बन्दों से छीन ले" (सही बुखारी हदीस 100)

इसको हज़रत आयशा, अबू हुरैरा, इब्न उमर, तीन सहाबा ने रिवायत किया है, फिर मुख्तलिफ लोगों ने रिवायत किया है,

अज़ीज़: उस हदीस को कहते हैं जिसमें रिवायत करने वालों कि तादाद हर तबके में कमसे कम दो हों, जैसे हदीस

ا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَلَدِهِ وَوَالِدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ
तर्जुमा: " तुम में से कोई सख्स साहबे ईमान नहीं हो सकता जबतक के मैं उसे उसकी औलाद, माँ बाप, और सब लोगों से ज्यादा प्यारा ना हो जाऊं " ( सुनन निसाई हदीस 5016)

इसको रसूल अल्लाह मुहम्मद सल्लालाहु अलैहि वसल्लम से हज़रत अनस , और अबू हुरैरा ने रिवायत किया है, और हज़रत अनस से कतादह और अब्दुल अज़ीज़ ने रिवायत किया है, इब्तिदाई सनद के ऐतबार से ये अज़ीज़ है ऐसे ही हज़रत अनस की सनद के ऐतबार से अज़ीज़ है,

घरीब : उस हदीस को कहते हैं जिसमें रिवायत करने वालों कि तादाद किसी तबके में कमसे कम एक हो, जैसे सही बुखारी की आखिरी रिवायत:

" كَلِمَتَانِ خَفِيفَتَانِ عَلَى اللِّسَانِ، ثَقِيلَتَانِ فِي الْمِيزَانِ، حَبِيبَتَانِ إِلَى الرَّحْمَنِ: سُبْحَانَ اللهِ وَبِحَمْدِهِ، سُبْحَانَ اللهِ الْعَظِيمِ "

इसमें अबू हुरैरा से अबू ज़र, उनसे अमारा बिन काक़ा, उनसे मुहम्मद बिन फुजैल सब एक दूसरे से मुनफराद हैं,

घरीब को फर्द भी कहा जाता है, उसकी 2 किस्में होती हैं,

घरीब मुतलक़ : वह हदीस जिसकी इब्तिदाई सनद (जिधर सहाबी मज़कूर हैं ) में घराबत पाई जाती है,

मसलन किसी एक ही सहाबी ने रिवायत किया हो, या सहाबी से किसी एक ही ताबाई ने रिवायत किया हो, जैसे हदीस:

الإيمان بضع وسبعون أو بضع وستون شعبة، فأفضلها قول لا إله إلا الله،
तर्जुमा: "ईमान की 70 साखें है और सबसे ऊंची साख ला इलाहा इल्लल्लाह है " (बुखारी)

इसमें अबू सालेह, अबू हुरैराह से मुंफराद हैं, और अब्दुल्लाह बिन दिनार, अबू सालेह से मुंफराद हैं,

घरीब नस्बी : वह हदीस जिसके दरमियान ए सनद ( तबाई , तबा ताबाई, या उसके बाद) घराबत पाई जाती हो, जैसे हदीस इब्न मसूद

قَالَ سَأَلْتُ رَسُولَ اَللَّهِ ‏- صلى الله عليه وسلم ‏-أَيُّ اَلذَّنْبِ أَعْظَمُ? قَالَ: { أَنْ تَجْعَلَ لِلَّهِ نِدًّا, وَهُوَ خَلَقَكَ.‏ قُلْتُ ثُمَّ أَيُّ?

तर्जुमा: " मैंने (अबदुल्लाह बिन मसूद ) ने अल्लाह के नबी से पूछा :- कौन सा गुनाह अल्लाह के नजदीक बड़ा है ?? तो आपने फरमाया :- अल्लाह के साथ किसी गैर को शरीक करना " (सही बुखारी हदीस 4477)

इसमें अब्दुर्रहमान बिन माहदी, इमाम थौरी से मुंफरीद हैं और इमाम थौरी वासिल बिन अहजब से मुंफरीद हैं,

बा ऐतबार ए इस्तेलाह फर्द का इत्तेलाक मुहद्दीसीन के यहां अमूमन फर्द ए मुतलक़ पर और घरीब का फर्द ए नस्बी पर होता है, लेकिन बा ऐतबार इस्तेमाल कोई फर्क नहीं होता, फर्द ए मुतलक़ वा नस्बी दोनो के लिए ” تفرد به فلان " (उसकी इन्फिरादियत) कहा जाता है,

तबका : हम असर रावी उम्र में या मसाइख से हदीस रिवायत करने में एक दूसरे के बराबर, या तकरीबन बराबर हो तो उसको तबका ( मावाफिक जमात) कहा जाता है जैसे :

इब्न उमर --- अबू हुरैरा ---अनस
नाफ़े --- अबू सिरीन --- कतादह
मालिक --- अय्यूब सख्तियानी --- शायबा

इसमें इब्न उमर, अबू हुरैरा, अनस बहैसियत ए सहाबी हम तबका हैं, इसी तरह नाफ़े, अबू सिरीन, कतादह हम तबका हैं , ऐसे ही मालिक , अय्यूब सख्तियानी, शायबा एक तबका के हैं,

खबर अहाद की बा ऐतबार क़ुबूल और अदम क़ुबूल दो किस्में होती हैं, एक को मकबूल (काबिल अमल) और दूसरी को मर्दुद (ना काबिल ए अमल) कहा जाता है,

मकबूल: इस हदीस को कहते हैं जिसमें खबर देने वाले की सच्चाई साबित हो,

मरदूद : उस हदीस को कहते हैं जिसमें खबर देने वाले की सच्चाई मजरूह हो (यानी साबित ना हो)

जारी...

इंशाल्लाह अगले किस्त में इसका बयान होगा

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com 

Friday, December 4, 2020

उसूल ए हदीस - किस्त 4


 


उसूल ए हदीस - किस्त 4

हदीस मुतावातीरा की किस्में

मुतावातिरा लफ्जी : जिस हदीस का लफ्ज़ और माने (Meaning) दोनो तवातीर से साबित हो उसे मुतावातिरा लफ्जी कहा जाता है,

मुतावातिरा मानवी : जिस हदीस का सिर्फ माना तवातुर से साबित हो तो उसको मुतावातिर मानवी कहा जाता है,

मुतावातिर की शर्त:

किसी हदीस के मुतावातिर होने के लिए चार शर्त होती हैं

1- रिवायत करने वालों कि तादाद जायदा हों जिससे इल्म हासिल हो,

2- ये ज्यादती इब्तिदा से लेकर इंतेहा तक हर तबका में हो,

3- झूट पर अकलन या आदतन इनका इत्तेफाक़ मुमकिन ना हो ,

4- इस खबर का दारोमदार इल्म पर हो,

अगर इसका ताल्लुक अक्ल से है तो मुतावातिर नहीं होगा , मसलन ऐसी चीज हो जिस पर अहले इल्म अपनी अकल से इस्तदलाल करके या तजुर्बे की बुनियाद पर सहमत हो जाएं तो उसको मुतावातिर नहीं कहा जायेगा चाहे उनकी तादाद लाखों में हो , इसलिए के अकल से जो चीज साबित कि जाती है उसके तब्दीली की गुंजाइश रहती है,

मसलन आज के वैज्ञानिक किसी चीज पर सहमत हो जाते हैं लेकिन बाद में आने वाले उसको गलत करार दे देते हैं जैसे ज़मीन का गर्दिश करना वगेरह

नोट: हदीस मुतावातिरा को मजीद समझने के लिए किस्त ३, २,१ को पढ़ने की गुज़ारिश है,

आइंदा किस्त में हदीस खबर अहाद की किस्मों का ज़िक्र होगा, इंशाअल्लाह

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Thursday, December 3, 2020

उसूल ए हदीस- किस्त 3

 



उसूल ए हदीस- किस्त 3

तहकीक: खबर ए आहाद ,

किस्त 2 में खबर आहाद के बारे में ज़िक्र हुआ था इस पोस्ट में खबर आहाद को तकवियत देने वाले कुछ सुराग ये हैं,

1- रिवायत का सहिहैन या उनमें से किसी एक में होना , चूंकि उलेमा ने इन किताबों को अज़ रूए सेहत क़ुबूल किया है इसलिए ये मजीद करीना (condition) हो,

2- उस रिवायत का खबर मशहूर होना जो मुताद्दिद (कई) तरीके से वारिद हो

3- ऐम्मा वा सनद के वास्ते से आना बशर्ते वह घरीब ना हो,

इल्म ज़रूरी : उस इल्म को कहते हैं जिसके सबूत के लिए इस्तदलाल (अनुमान) की ज़रूरत ना हो,

इल्म नजरी : उस इल्म को कहते हैं जो बहस वा नजर और इस्तादलाल से साबित हो, नेज़ इसके इलावा उसकी सेहत के लिए मजीद करीना मौजूद हो,

इल्म जनी : उस इल्म को कहते हैं जो बहस वा नजर और इस्तादलाल से साबित हो, मगर सेहत के लिए मजीद करीना मौजूद ना हो, इसमें यकीन का पहलू राजेह (बहतर) और शुबाह का पहलू मरजूह होता है,

खबर आहाद जिनमें रिवायत हदीस की सिकाहियत (रावी का हाल) के इलावा दूसरा कोई करीना ना हो उनसे जो इल्म हासिल होता है वह भी इल्म यकीन होता है, इसलिए के उसकी भी सेहत के लिए रावी ए हदीस के हालात में बहस वा नजर के बाद ही इस्तादलाल करके हुक्म लगाया जाता है,

इसके इलावा अगर कोई करीना भी मौजूद हो तो उसकी वजह से उसकी सेहत का दर्जा बड़ जाता है, इसलिए मुहद्दिसीन ने उस फर्क की ताबीर के लिए एक को नजरी और दूसरे को ज़नी कह दिया , जिसमें लुग्वी माना से ज़्यादा इस्तेलाही माना का दखल है

ज़न का मतलब:

ज़न बदगुमानी के माना में इस्तेमाल होना है जैसे

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوا اجۡتَنِبُوۡا کَثِیۡرًا مِّنَ الظَّنِّ ۫ اِنَّ بَعۡضَ الظَّنِّ اِثۡمٌ

" ऐ ईमान वालों ! बहुत सी बदगुमानी से बचो, बाज़ गुमान गुनाह होते हैं " (क़ुरआन अल हुजरात आयत 12)

नेज़ यकीन के माने में भी इस्तेमाल होता है,

اِنِّیۡ ظَنَنۡتُ اَنِّیۡ مُلٰقٍ حِسَابِیَہۡ

" मैं पहले ही समझता था के मुझे अपने हिसाब का सामना करना होगा " (क़ुरआन अल हाक्का आयत 20)

الَّذِیۡنَ یَظُنُّوۡنَ اَنَّہُمۡ مُّلٰقُوۡا رَبِّہِمۡ

" जो इस बात का ख्याल रखते हैं के वह अपने परवरदिगार से मिलने वाले हैं " (क़ुरआन अल बकरा आयात 46)

وَّ ظَنَّ اَنَّہُ الۡفِرَاقُ

"और इनसान समझ जायेगा के जुदाई का वक्त आ गया " (कुरआन अल कियामा आयत 28)

وَ رَاَ الۡمُجۡرِمُوۡنَ النَّارَ فَظَنُّوۡۤا اَنَّہُمۡ مُّوَاقِعُوۡہَا

" और मुजरिम लोग आग को देखेंगे तो समझ जायेंगे के उन्हें उसी में गिरना है " (क़ुरआन अल कहफ आयत 53)

शक वा शुबह में भी इसका इस्तेमाल होता है,

وَ مَا لَہُمۡ بِہٖ مِنۡ عِلۡمٍ ؕ اِنۡ یَّتَّبِعُوۡنَ اِلَّا الظَّنَّ ۚ وَ اِنَّ الظَّنَّ لَا یُغۡنِیۡ مِنَ الۡحَقِّ شَیۡئًا ﴿ۚ۲۸﴾

" हालांकि उन्हें इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं है, वह महज़ वहम वा गुमान के पीछे चल रहें हैं, और हकीकत ये है के वहम वा गुमान हक के मामले में बिल्कुल कारामद नहीं " ( क़ुरआन अल नजम आयत 28)

माना कि तहकीक के लिए सियाक वा सबाक (Context) और करीने की ज़रूरत पड़ती है अगर करीना कमजोर हो या ज़न इल्म वा यकीन और सदाकत के मुकाबले में , या मुजम्मत के लिए इस्तेमाल हो तो वह शक वा शुबहा के माने में होता है, और अगर करीना मजबूत हो या तारीफ के सियाक में हो तो वह यकीन के माने में होता है,

करीना मजबूत होने की सूरत में अमूमन "अन" (मैं) या "अन्ना"(वह) के साथ और करीना कमज़ोर होने की सूरत में "इन्ना" (वह) या "इन्नी" के साथ इस्तेमाल होता है,

नेज़ मकबूल राविओं के वास्ते से जो इल्म हासिल होता है यहां " ज़न" का इस्तेमाल तारीफ के सियाक (context) में है, लिहाज़ा यहां भी " ज़न" यकीन के माने में होगा और उनके वास्ते से जो इल्म हासिल होगा वह यकीन होगा,

मालूम हुआ के " ज़न " से मुराद अंदाजा लगाना और शक वा शुबह नहीं है बल्कि इससे इल्म यकीनी ही मुराद है, और इल्म की ये तीनों किस्मे ज़रूरी, नजरी, ज़नी, इनसे जो भी इल्म हासिल होता है वह यकीनी होता है, अलबत्ता उनके दरजात में फर्क होता है, इस्तेलाह में एक को जरूरी, दूसरी को नजरी, और तीसरे को ज़नी कहा जाता है, यानी इल्म यकीनी ज़रूरी, इल्म यकीनी नजरी, इल्म यकीनी ज़नी..

जारी....

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Wednesday, December 2, 2020

उसूल ए हदीस - किस्त 2

 



उसूल ए हदीस - किस्त 2


हदीस और उसकी किस्में

उसूल ए हदीस का असल मकसद हदीस ए रसूल की हिफाज़त करना है लिहाज़ा सबसे पहले हदीस और रसूल की तारीफ़ मालूम करना ज़रूरी है,

हदीस : अल्लाह के रसूल मुहम्मद (sws) के कौल (Quotes), फायेल (doing), तकरीरात (Speech), पैदाइश (Birth) और अखलाकी सिफात को हदीस कहते हैं,

कौल : आपका कुछ कहना जैसे " अमाल का दारोमदार नीयत पर है "

फायेल: आपका कुछ करना

तकरीर : आपकी बरक़रार रखी हुई चीज़ यानि किसी सहाबी ने आपके सामने कुछ किया या कहा, आपको इसकी खबर मिली फिर आपने उस काम को बुरा नहीं समझा ना मना किया बल्कि खामोशी इख्तियार कर ली, जैसे कि हज़रत खालिद का आपके सामने गोह (चिपकली) खाना

सिफात ए खिलकिया : पैदाइशी सिफात जैसे आपका गोरा, दरमियानी कद, भरी हुई दाढ़ी वगेरह वाला होना

सिफात ए खुलकियाह : अखलाकी सिफात मसलन आपका सादिक, आमीन, सखी, और साबिर होना, कभी कभी हदीस पर खबर और असर का भी इत्तेलाक होता है,

रसूल : इंसानों में से अल्लाह के वो मुंताखब या चुने हुए बन्दे जिनको अल्लाह ताला ने नई शरीयत देकर लोगों तक पहुंचाने का हुक्म दिया,

तकसीम हदीस अज़ रुए तादाद मुखबर (खबर देने वाला, रावी)

सबसे पहले हदीस की दो किस्में होती हैं, जैसा कि पहली किस्त में इसका बयान हुआ था, यहां दोबारा ज़िक्र करना मुनासिब मालूम होता है,

पहली किस्म अज़ रुए अदद मुखबर (यानी हदीस बयान करने वालों कि तादाद के ऐतबार से )

दूसरी किस्म अज़ रुए निस्बत (यानी बयान करदा कलाम की निस्बत कहां तक पहुंचती है, रसूल तक पहुंचती है या सहाबा तक, या तबाईं, या तबा तबाईं तक )

जो तकसीम अज़ रुए अदद मुखबर की जाती है उसमें ये देखा जाता है के मुखबरीन की तादाद मुताइयन (Fix) है या गैर मुताइयन , अगर मुताइयन है तो कितनी है ? तीन से कम है या उससे ज्यादा, अगर तीन या उससे कम हैं तो उसकी अदद क़लील और ज़्यादा है तो उसको अदद क़सीर कहा जाता है,

अदद क़लील वाली रिवायत को खबर आहाद और अदद कासीर वाली रिवायत को खबर मुतावातीर कहते हैं, जिसकी तारीफ ये है

" जिन लोगों ने मुतवातीर के लिए हर तबके में कमसे कम चार रावी होने की शर्त लगाई है उनके हिसाब से तारीफात (यानी गरीब, अज़ीज़ , मशहूर, मुतावातीर) में तसल्लुल बरकरार रहता है, लेकिन जिन लोगों ने कम से कम दस लोगों की शर्त रखी है जिसको सही भी कहा जाता है उनके ऐतबार से चार से नौ तक की तादाद वाली सनद को क्या कहेंगे ये खला बाकी रहता है, लिहाज़ा बेहतर ये है के चार से ऊपर तादाद होने पर मुतावतीर का फ़ैसला किया जाए "

खबर आहाद : उस हदीस को कहते हैं जिसमें रिवायत करने वालों कि तादाद कम हो ( जो हुदूद तवातीर को ना पहुंचे)

मुतावतीर से जो इल्म हासिल होता है उसको " इल्म जरूरी" कहा जाता है,

मकबूल खबर आहाद से जो इल्म हासिल होता है उसको " इल्म ज़नी" कहा जाता है, इल्ला ये के उसकी सेहत के लिए कोई और करीना (Condition) मौजूद हो तो उससे जो इल्म हासिल होता है उसको "इल्म नजरी " कहा जाता है,

जारी...

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog:islamicleaks.com 

Tuesday, December 1, 2020

उसूल ए हदीस का खाका (Road-Map) (किस्त 1)

 



उसूल ए हदीस का खाका (Road-Map) (किस्त 1)


बुनियादी तौर से इस इल्म का मकसद हदीस ए रसूल की हिफाज़त, सही और ज़ईफ़ में तमीज़ करना है, लिहाज़ा इस पर गुफ्तगू, हदीस पर गुफ्तगू से शुरू होती है, और शुरुआत में इसकी दो तरह की तकसीम की जाती है "बा ऐतबार मुखबर" और "बा ऐतबार निस्बत ",

मुखबर के ऐतबार से इसकी दो किस्में होती है, मुखबर की तादाद अगर ज़्यादा हैं तो उस हदीस को "मुतावातिर" और अगर कम हैं तो " आहाद" कहते हैं,

मुतावातिर पर गुफ्तगू उसकी तारीफ , शर्त, किस्में, और फायदा पर सिमट कर रह जाती है इसीलिए उसूल हदीस के बहस से उसका ताल्लुक नहीं क्यूंकि उसमे सेहत और ज़ईफ़ पर गुफ्तगू नहीं होती, उसकी सेहत मुसल्लम होती है,

फिर आहाद की तीन किस्में होती है, मशहूर, अज़ीज़, और गरीब, फिर यही तीनों किस्में मकबूल वा मरदूद में तकसीम हो जाती है,

मकबूल की दो किस्में होती है सही और हसन, यहां पर सही की किस्में , उसकी तारीफ, दरजात सही, क़ुतुब सीहाह वगेरह दीगर जुज्यात पर बाहेस होती है, जिसमें सहिहैन का खुसूसी ज़िक्र आता है,

फिर हसन कि तारीफ, किस्में, वजूद की जगह, हसन सही, का इजतेमा और उससे मुतालिक जुज्यात (Sources) ज़िक्र किए जाते हैं यहां मकबूल की बहस मुकम्मल हो जाती है,

उसके बाद मरदूद (ज़ईफ़) पर गुफ्तगू की जाती है जिसमें अदालत वा ज़ब्त से मुताल्लिक बातें होती है, ज़ईफ़ होने की वजह बताई जाती है, जिनकी दो किस्में होती है

1- मरदूद अज़ रुए अदालत वा ज़ब्त
2- मरदूद अज़ रुए सुकूत (खामोशी)

अगर मरदूद अज़ रुए सुकूत (खामोशी) है तो उसकी मुख्तलिफ शक्लें होती है जिनके नाम, मुअल्लक, मुअज्जल , मुन कताआ , , ,मुरसल और मुदाल्लिस है,

इनमें हर एक कि जुज्यात ,मसाइल वा मिसालें वगेरह बयान की जाती है,

और अगर मरदूद अज़ रुए अदालत वा ज़ब्त है तो उसकी कैफियत को देखा जाता है जो जुमला दस कैफियत पर मुन्हसर होता है उनको असबाब रद कहा जाता है, पांच का ताल्लुक अदालत से है, और पांच का ज़ब्त से जो हसब तरतीब इस तरह है,

1- रावी का झूठा होना
2- रावी का मुहतमम बिल कज्जब होना,
3- रावी से कसरत से गलती होना,
4- उसका इंटेहाई लापरवाह होना
5- उसका फासिक होना ( यानी गुनाह कबीरा करना)
6- रावी का शक्की होना यानी बा कसरत वहम होना
7- मुखालिफ उल शिकात, जिसमें अज़ रुए मुखालिफत : मुदर्रिज, मकलूब, मजीद, मुस्तरब, वगेरह पर गुफ्तगू की जाती है,
8- रावी का मझहूल (Doubtful) होना,
9- रावी का बीदाती होना,
10- सु ए हिफ्ज़ : यहां पर हर एक कि तारीफ, मिसालें, जुज्यात, हुक्म वगेरह हसब वगेरह बयान की जाती है,

फिर इन ज़ईफ़ रिवायत को तकवियत देने के लिए जो रिवायतें बतौर शाहिद और मुताबे तलाश की जाती हैं, उनका जिक्र होता है और अगर ये मकबूल रिवायतें मुता आरिज़ होती है तो क्या करना है उसकी वज़ाहत होती है, यहां पर हदीस की पहली तकसीम अज़ रुए मुखबर पर गुफ्तगू तकरीबन खत्म हो जाती है,

इसके बाद हदीस की दूसरी किस्म अज़ रुए निसबत का ज़िक्र आता है जिसमें हदीस ए कुदसी, मर्फु, मर्कू, मौकूफ, मक्तू, वगेरह पर गुफ्तगू होती है,

असबाब ए सेहत वा कमजोरी मालूम करने के लिए रावियों की मुआरिफत ज़रूरी होती है लिहाजा यहां पर रावियो की किस्में उनके तबकात जिरह वा तादील और उनके कलिमात, अहकामात, कवायद वा जावाबित पर बहेस। होती है, साथ साथ रावियों के आम हालात नाम वा निस्बत , कुन्नियत , अल्काब, वतन , कबायेल, तारीख वफात, मुताशबेह असमा वा दीगर मुतालिकात की मुआरिफत हासिल की जाती है,

फिर रिवायत की मुआरिफत की बारी आती है जिसमें पढ़ने पढ़ाने के आदाब, कैफियत रिवायत, हदीस लिखने का तरीका , तस्नीफ हदीस पर गुफ्तगू की जाती है और इस तरह से ये इल्म मुकम्मल होता है,

ये फन उसूल हदीस का बुनियादी और मुख्तसर खाका है जो अपने अनवा वा अक्साम के साथ हदीस रसूल की मुआरिफत और उसकी हिफाज़त के लिए हर वक़्त सीना सपर रहता है और ता कयामत इन शाए अल्लाह बाक़ी रहेगा

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog:islamicleaks.com