Tuesday, October 27, 2020

मुंकरीन ए हदीस और ईरानी साजिश का बदबूदार अफसाना:

 


मुंकरीन ए हदीस और ईरानी साजिश का बदबूदार अफसाना:


मूंकरीन ए हदीस अपने यहूदी , सालीबी उस्ताद की तकलीद में बोलते आए हैं कि

" वफात ए नबवी के सैकड़ों बरस बाद कुछ ईरानियों ने इधर उधर की सुनी सुनाई अटकल पच्चू बातों को जमा करके उन्हें सही हदीस का नाम दे दिया"

जिनकी बुनियाद पर मैं बोल सकता हूं कि क़ुरआन कि ये आयात

" बड़ा बोल है जो उनके मुंह से निकल रहा है वह सरापा झूट बक रहें हैं " ( क़ुरआन अल काहफ)

मूंकरीन के इस बोल का खुलासा ये है के हदीस ए रसूल का ज़ख़ीरा दरहकीकत ईरानियों की साजिश और किस्सा गोइयान , वाज़ों और दास्तान सराओं की मनगढ़ंत हिकायत का मजमुआ है

मुनकर ए हदीस के इस दावे का पर्दा फाश करने से पहले में आपसे पूछना चाहता हूं के इस अजमी साजिश और दास्तान की गड़त का पता आपने किस तरह लगाया ??

आपने किस जरिए से मालूमात हासिल किया ??

और आपके पुरशोर दावा की क्या दलील है ??

मुनकर हदीस पर हैरत होती है के दावा तो करते हैं इस कदर ज़ोर शोर से और ऐसे ऊंचे हंगामे के साथ, और दलील के नाम पर एक हरफ नहीं, क्या इसी का नाम तदबबुर फिल क़ुरआन है ??

मुनकर हदीस फरमाते हैं

" वफात ए नबवी के सैकड़ों बरस बाद कुछ ईरानियों ने इधर उधर की सुनी सुनाई अटकल पच्चू बातों को जमा करके उन्हें सही हदीस का नाम दे दिया"

मैं कहता हूं आइए मैं सबसे पहले यही देख लें के उन मजमुआ ए हदीस को जमा करने वाले ईरानी है भी या नहीं ??

सन् वार तरतीब के लिहाज से दौर ए अव्वल के रावाह हदीस में सर फेहरिस्त इब्न शाहब ज़ुहरी, सईद बिन मुसय्यब, उर्वाह बिन ज़ुबैर,और उमर बिन अब्दुल अज़ीज़, के नाम नामी आते हैं, ये सब के सब मुअज्जिज अरबी खानदान कुराईश से ताल्लुक रखते हैं, और उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ को तो इस्लामी तारीख के पांचवे खलीफा राशिद की हैसियत से मारूफ हैं,

इसी तरह दौर ए अव्वल मुद्व्वीन ए हदीस में सर फेहरिस्त इमाम मालिक हैं, फिर इमाम शाफई, और उनके बाद इमाम अहमद बिन हम्बल हैं, इन तीनों एम्मा के माजमुआ ए हदीस पूरी उम्मत में मकबूल है,

ये तीनों खालिस अरबी नसल से हैं इमाम मालिक कबीला जी सबाह से, इमाम शाफई कुराईश की सबसे मुअज्जिज शाख बनू हाशिम से , और इमाम अहमद कबीला बनू शैबा से ,

ये भी बतला दूं के बनू शाईबा वही हैं जिनकी शमशीर ने खुर्शीद इस्लाम के तुलु होने से पहले ही खुशरू परवेज़ की ईरानी फौज को जिफार की जंग में इब्रतनाक शिकस्त दी थी, और जिन्होने हज़रत अबू बक्र के दौर में ईरानी साजिश के तहत बरपा किए गए हंगामा इर्टेदाद के दौरान ना सिर्फ साबित कदमी का सबूत दिया था बल्कि मश्रीकी अरब से इस फ़ितने को कुचलने में फैसलाकुन रोल अदा करके अरबी इस्लामी खिलाफत को नुमाया ताकत अता किया था,

और फिर जिसके शह पर मुसन्ना बिन हारिसा शैबानी की शमशीर ने कारवां ए हिजाज़ के लिए फतह ईरान का दरवाजा खोल दिया था,

आखिर आप बता सकते हैं के है ये कैसी ईरानी साजिश थी जिसको बागडोर अरबों के हाथ में थी ??

जिसका सरपरस्त अरबी खलीफा था और जिसको कामयाबी से हमकीनार करने के लिए ऐसी ऐसी नुमायां तरीन अरबी शख्सियतों ने अपनी ज़िंदगियां खपा दी जिनमें से बाज़ बाज़ अफ़राद के कबीलों की ईरान दुश्मनी दशकों तक आलम में मारूफ थी ??

क्या कोई इंसान जिसका दिमागी तवाजुन सही हो एक लम्हा के लिए भी ऐसे बदबूदार अफसाना को मानने के लिए तैयार हो सकता है ??

दौर अव्वल के बाद दौर सानी के जामिइन हदीस पर निगाह डालें, उनमें सर फेहरिस्त इमाम बुखारी है जिनका मस्कन बुखारा था , बुखारा ईरान में नहीं बल्कि मावरनाहर (तुर्किस्तान) में वाक़ए है, दूसरे और तीसरे बुजुर्ग इमाम मुस्लिम और इमाम निसाई है इन दोनों का ताल्लुक नेशापुर के इलाके से था और नेशापुर ईरान का नहीं बल्कि खुरासान का जुज़ है, अगर उस पर ईरान का इक्तेदार रहा भी है तो अजनबी इक्तेदार की हैसियत से ,

चौथे और पांच वे बुजुर्ग इमाम अबू दावूद और इमाम तिरमिज़ी थे, इमाम अबू दावूद का ताल्लुक सजिस्तान (इराक़) से , इमाम तिरमिज़ी का ताल्लुक तिर्मिज (तुर्किस्तान) से रहा है,

छटे बुजुर्ग के बारे में इख्तेलाफ है, एक तबका इब्न माजा की सुनन को सिहाह सित्ता में शुमार करके उसे इस्तानाद का ये मकाम देता है,

दूसरा तबका सुनने दारीमी या मोत्ता इमाम मालिक को सिहा सित्ता में शुमार करता है, इमाम इब्न माजा यकीनन ईरानी है, लेकिन इनकी तस्नीफ सबसे नीचे दर्जे कि है, हत्ता के अक्सर मुहद्दिसीन इस लायक इस्तेनाद मानने को तैयार नहीं,

आखिर में ज़िक्र दोनों हजरात अरबी है, इमाम मुस्लिम, तिरमिज़ी , अबू दावूद और निसाई भी अरबी है,

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Monday, October 26, 2020

खो गए जाने कहां लोग पुराने वाले




खो गए जाने कहां लोग पुराने वाले

तूने देखे हैं कहां जान से जाने वाले।

फिर कहानी में वहीं मोड़ है आने वाला
मार देते हैं मुझे लोग ज़माने वाले।

मेरे गांव में तो बस एक यही खामी है
लौट कर आते नहीं शहर को जाने वाले।

उसके लहजे में मुकय्यद है बला की ठंडक
और अल्फ़ाज़ सभी दिल जलाने वाले।

तू हकीकत के तनाज़िर में कभी मिल मुझसे
ख्वाब होते हैं फकत नींद में आने वाले।

रहज़न का तो कोई खौफ नहीं था हमको

रास्ता भूल गए राह बताने वाले। 

Sunday, October 25, 2020

मुनकरीन ए हदीस कहते है के दीन में फिरके मुहम्मद (sws) की हदीस और फारामीन की वजह से हुए,

 


मुनकरीन ए हदीस कहते है के दीन में फिरके मुहम्मद (sws) की हदीस और फारामीन की वजह से हुए,


उनका अपना हाल देखें तो दर्जनों फिरको में बटे हुए है, बल्कि हर मूंकर अपनी जात में एक अलग फिरका है,

कोई नमाज़ को उठक बैठक कहता है, और तीन और कोई पांच नमाज़ का कायल,

किसी के नजदीक कुत्ता खाना हलाल, किसी के नजदीक मेंडक,

और तो और खतम नुबुव्वत का इनकार, कादयानियों से प्यार, नए नए नबियों के क़दमों में पड़े सख्शियत परस्त फिरके बाज़, फिर भी कहते हैं की हम फिरका नहीं

यही तो हैं जिनसे बच कर रहने का हमें हुकम दिया गया है۔

اِنَّ الَّذِيۡنَ فَرَّقُوۡا دِيۡنَهُمۡ وَكَانُوۡا شِيَـعًا لَّسۡتَ مِنۡهُمۡ فِىۡ شَىۡءٍ‌ ؕ اِنَّمَاۤ اَمۡرُهُمۡ اِلَى اللّٰهِ ثُمَّ يُنَـبِّـئُـهُمۡ بِمَا كَانُوۡا يَفۡعَلُوۡنَ ۞

" बेशक वह लोग जिन्होंने अपने दीन को जुदा जुदा कर लिया और कई गिरोह बन गए, तो किसी चीज में भी उनसे नहीं, उनका मामला तो अल्लाह ही के हवाले है, फिर वह उन्हें बताएगा जो कुछ वह किया करते थे"

(क़ुरआन अल अनाम आयात 159)

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog:islamicleaks.com 

Saturday, October 24, 2020

उस्मानी हुकूमत और मूवाहेदा लोज़ान (Treaty Of Laussane)

 



उस्मानी हुकूमत और मूवाहेदा लोज़ान (Treaty Of Laussane)

तुर्की में जब हुकूमत खत्म करने की कोशिश जारी थी, उस वक़्त भी सबसे ज़्यादा दर्द हिन्दुस्तानियों के सीने में उठ रहा था , किस तरह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को ज़बरदस्ती बंद करवाया गया, अदालतों पर ताले डाले गए, इलेक्शन का बॉयकॉट किया गया,
मुहम्मद अली जौहर कि कयादत में वफद ने कैसे इंगलिश्तान , इटली और फ्रांस के दौरे किए, हिन्दुस्तान में तोड़ फोड की गई, हज़ारों की तादाद में हिन्दू मुसलमानों ने गिरफ्तारी दी, गांधी ,आज़ाद, जौहर वगेरह ने गिरफ्तारियां दी,
आखिर में हुकूमत का खात्मा खुद तुर्कियों के हाथो अंजाम पाया,
बेगानी शादी के दीवाने ठंडे होकर जेलों में बैठ गए,
हमारी अवाम को शायद समझ नहीं है के " उर्तुगुल जैसे ड्रामे के जरिए उनकी ऐसी ज़ेहन शाज़ी की जाती है के उनके दिमाग नकारा होकर सोचने समझने कि सलाहियत छोड़ जाते हैं,
नतीजे के तौर पर तुर्की, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर एक झूट फैलाया जा रहा है जिसे हम मूवाहेदा लोज़ान के तौर पर जानते हैं,
तुर्की के नकारा दिमाग़ सोचते हैं के 2023 में लोज़ान के खात्मे के बाद तुर्की एक अज़ीम सल्तनत के तौर पर उबरेगा और हिन्दुस्तान वा पाकिस्तान के नकारा दिमाग़ उस झूट को सच तस्लीम करके सोशल मीडिया पर हर तरफ फैलाना दीनी फारीजा समझ कर अंजाम देते हैं,
किताब या इल्म नामी किसी भी शए से कोसों दूर , मजहबी जमातों से ताल्लुक रखने वाले फातिरुल अक्ल अफ़राद इस झूट पर बिना सोचे समझे ईमान ले आते हैं के 2023 में मूवाहेदा लोज़ान एक्सपायर होने के बाद खिलाफत या हुकूमत की तर्ज पर एक सुपर पॉवर तुर्क हुकूमत कायम होगी,
मूवाहेदा लोज़ान ने जो तेल निकालने की पाबंदी आयद की है , उसके खत्म होते ही तुर्की तेल निकाल कर दुनिया भर को बेचकर सुपर पॉवर बन जाएगा,
मूवाहेदा लोज़ान की एक शर्त सेक्युलर निज़ाम का निफाज़ भी है, लिहाज़ा तुर्की सेक्युलरिज्म खत्म करके इस्लामी रियासत बन जाएगा जहां शराब खानो, क्लब, और न्यूड बीचेज (Nude Beaches) पर पाबंदी लगा दी जाएगी,
तुर्की अबनाय बास्फोरस (Strait Of Bosphorus) से गुजरने वाले जहाज़ों से भारी फीस वसूल करके अमीर तरीन होता जाएगा,
इस ज़हनी बीमार कौम को खुदा भी आकर नहीं समझा सकता के मूवाहेदा लोज़ान के पहले सफे से आखिरी सफे तक कहीं मामूली सा ज़िक्र भी नहीं है के मूवाहेदा लोज़ान कभी खत्म होगा,
मूवाहेदा सिर्फ एक ही सूरत में खत्म हो सकता है जब तुर्की मूवाहेदा लोज़ान से पीछे हटे और दूसरे फरीक बमबारी करके पूरे तुर्की को कब्रस्तान बना डालें,
अगर उर्दुगान ने कभी ये सोचा के वह मूवाहेदा लोज़ान से इन्हेराफ़ करेगा तो तुर्की पर वैसी ही जंग मुसल्लत हो सकती है जैसे हिटलर की मुवाहेदा वर्सा की खिलाफवर्जी करने पर जर्मनी पर मुसल्लत हुई थी,
ये बात तय है कि मुवाहेदे सिर्फ जंग की सूरत में खत्म होते हैं, मूवाहेदा लोज़ान भी एक अमन मूवाहेदा है जिसका खात्मा सिर्फ जंग की सूरत में हो सकता है,
मूवाहेदा सेवरे (Treaty Of Sevres) से जब तुर्की ने इंहेराफ किया तो उसके बाद के हालात सबको मालूम है , निहायत कलील अरसे में तुर्की को मूवाहेदा लोज़ान पर दस्तखत करने पड़े थे,
मूवाहेदा लोज़ान तो सिर्फ एक सदी पुराना है, तुर्की तो सफवी ईरानी सल्तनत और हुकूमत उस्मानी के दरमियान होने वाले 1639 ईसवी के मुवाहेदे को ना सिर्फ तस्लीम करता है बल्कि उस पर अमल पैरा भी है,
असल में मूवाहेदा लोज़ान के मंसूख होने का झूट तुर्की की मौजूदा हुकूमत की तरफ से फैलाया गया है, नरेंद्र मोदी की तरह तुर्क हुकूमत ने भी नए तुर्की का ख्वाब देख रखा है जो तुर्की की 100वे सालगिरह पर पूरा हो जाएगा, अलबत्ता नरेंद्र मोदी की तरह उन्हें भी मालूम नहीं के पूरा कैसे होगा,
सिर्फ यही नहीं एक हज़ार साल पहले 1071ईसवी में टर्कों ने बाजिंटिनी सल्तनत को बहुत बुरी शिकस्त दी थी लिहाज़ा 2071 ईसवी के लिए भी, हज़ार साला फतह के जश्न के तौर पर उर्दुगान ने कुछ टारगेट्स सेट करके अपने हामियों को पकड़ा दिए हैं,
मूवाहेदा लोज़ान तुर्की के तेल निकालने पर कोई पाबंदी आयद नहीं करता ये भी सिर्फ एक झूट ही है के तुर्की तेल निकाल रहा, तुर्की के पास वह वसायेल नहीं के वह खुद तेल निकाल सके, लेकिन छोटे पैमाने पर तुर्की कई सालों से तेल निकाल रहा है,
हकीकत ये है के इराक़, शाम और जॉर्डन जैसे तेल और कुदरती वसायेल से माला माल इलाके फ्रांस और ब्रिटेन ने अपने कब्जे में ले लिए थे जिन्हें बाद में आज़ाद मुल्क बना दिया गया,
उर्तगुरुल देखने वाले समझते हैं के 2023ईसवी में तुर्की दोबारा शाम और इराक़ , और यूरोप में थ्रेस (Thrace) और इटली वा यूनान (Greece) के कुछ टापू पर कब्ज़ा कर लेगा,
मूवाहेदा लोज़ान में तुर्की के असलहा बनाने पर भी कोई पाबंदी नहीं है,
मूवाहेदा लोज़ान में तुर्की को बावर काराया गया है के वह तुर्की में मौजूद गैर मुस्लिमो/गैर टर्कों को मुकम्मल सियासी, मजहबी, और समाजी आजादी फराहाम करेगा, बाद में तुर्की ने आइनी (Constitution) तौर पर ये तय कर दिया के रियासत का कोई मजहब नहीं होगा और हर सख्स को हर किस्म की मजहबी वा सियासी आज़ादी हासिल होगी,
इसलिए अक्सर लोगों का ख्याल ये है के मूवाहेदा लोज़ान से निकलने के बाद तुर्की पाबंद नहीं होगा के वह हर फर्द को आज़ादी दे, लिहाज़ा वहां उर्दुगान (ऊर्तगुरुल) की सरपरस्ती में इस्लाम नाफिज करके सबकी आज़ादी छीन ली जाएगी और शराब वा ज़िना वगेरह पर पाबंदी लगा दी जाएगी,
लेकिन मुजाहीदीन का उत्तगुरुल देखना सिर्फ इसलिए बर्बाद चला जाएगा क्यूंकि तुर्क रियासत का वजूद मूवाहेदा लोज़ान से जुड़ा है, अगर तुर्की मूवाहेदा लोज़ान को खत्म करेगा तो गोया वह अपने ही हाथों से तुर्क रियासत खत्म कर देगा, दुनिया तुर्की को सिर्फ एक जम्हूरी रियासत (Democratic State) के तौर पर सिर्फ उस वक़्त तक तस्लीम करेगी जब तक तुर्की इस मुवाहेदे पर पाबंद रहेगा,
क्या लॉर्ड कर्ज़न या अस्मत अनुनो (ismet inonu) ने ख्वाब में आकर उर्तुग्रुल देखने वालों को बताया के
" हम सिर्फ 100 साल के लिए सेक्युलरिज्म लाना चाहते हैं , 2023 में मूवाहेदा लोज़ान खतम हो जाएगा और तुम उर्तुग्रुल की कयादत में खिलाफत कायम कर लेना ??"
मूवाहेदा लोज़ान की ना तो कोई एक्सपायरी डेट है ना ही कोई सिक्रेट है, ये मूवाहेदा हमेशा हमेशा के लिए है, उर्दुगान या कोई हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी भक्त उठ कर तुर्की को दोबारा यूरोप का मर्द ए बीमार नहीं बना सकेगा,
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Friday, October 23, 2020

BABRI NAMA



 बात ये नहीं के हम में कोई अय्यूबी नहीं बात ये है के हम में कोई नूरुद्दीन नहीं,

बात ये नहीं के हम में कोई तारिक नहीं बात ये है के हम लोगों में कोई मंसूर नहीं।
नूरुद्दीन होगा तो अय्यूबी पैदा होंगे, मंसूर होगा तो ही तारिक पैदा होंगे,
सारी ज़िन्दगी जुस्तजू काविशों के बाद इंसान इधर ही आकर रुक जाता है अब क्या करना चाहिए ??
क्या वजह बनी के अल्लाह रूठ गया ?? हम से क्यूं अल्लाह की महरबानी हमसे उठ गई ??
मुसलमानों के जवाल के बाद एक ही चीज सामने अाई वह था फलसफा
" जिहाद और अपने नफस का मुहास्बा वा अल्लाह के साथ गैर को शरीक करना, "
मुसलमानों कि पस्तियों का वाहिद जामिन है, मुसलमानों में जब तक ये खैर रही अल्लाह ताला मुसलमानों का हर जगह मुहाफिज रहा, जब यह खैर हमसे जाती रही अल्लाह भी दूर हो गया और हालात ये के अब हमारा क़िब्ला ए अव्वल को शहीद वा बाबरी मस्जिद पर मंदिर बनाया जा रहा है और हम तमाशाई की तरह चुप है,
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Thursday, October 22, 2020

मुहब्बत नामा .....!!!

 


मुहब्बत नामा .....!!!


मैं मुहब्बत कर बैठा।

मैं एक आम और बेबस वा लाचार इंसान हूं, ना अपनी मर्ज़ी से इस दुनिया में आया ना अपनी मर्ज़ी से इस दुनिया से जाऊंगा मगर इस आने जाने के दरमियान वाले वक़्त में मुझे मेरी मर्ज़ी की ज़िन्दगी जीने का इख्तियार दे दिया गया है,

मुझे इख्तियार है कि मुझे इस दुनिया में जिस तरह चाहूं जी सकता हूं, मुझे दो रास्ते दिखा दिए गए एक अच्छाई का और एक बुराई का , मुझे समझा दिया गया के बुराई के रास्ते पर चलने का ये नुकसान है और अच्छाई के रास्ते पर चलने का ये फायदा,

मगर मुझे एक चीज से मना कर दिया गया के दुनिया में किसी चीज की मुहब्बत में गिरफ्तार मत होना वरना दुनिया तुम्हारे लिए सजा बन जाएगी,

मगर क्या करूं मैं ठहरा आदम का बेटा नाफरमानी मेरी घुट्टी में है, जन्नत में आदम को सब चीजों का इख्तियार दे दिया गया, खाओ पियो जहां मर्ज़ी फिरो मगर खबरदार इस दरख़्त के पास मत जाना वरना रुसवा हो जाओगे,

हाय रे किस्मत ! इंसान की फितरत कुछ ऐसी बनाई गई है के जिस काम से उसको मना करो वही काम वो लाजमी करता है और वही फितरत बनाने वाला आदम को मना कर रहा था उस ख़ास किस्म के दरख़्त के पास जाने से , मगर फितरत कब बदलती है रही सही कसर शैतान ने पूरी कर दी और वह काम हो गया जिसके नतीजे में ये ज़मीन आबाद है, मगर यहां भी मुझे मना किया गया पर मैंने वहीं किया, मैं मुहब्बत कर बैठा।

मगर नहीं ! इसमें मेरा तो कुसूर नहीं था, मुहब्बत की तो नहीं जाती वह तो हो जाती है बस मुझे भी हो गई, मुझे दुनिया के बाद हूरें देने का वादा किया गया मगर उनके इंतज़ार का हौसला कहां था दुनिया की हूर से प्यार कर बैठा , मैंने कभी हूर देखी नहीं मगर अपनी मुहब्बत को हमेशा यही यकीन दिलाता हूं के तुम हूर से ज़्यादा खूबसूरत हो, और वह पगली मेरी मुहब्बत में शरशार ये भी नहीं पूछ पाती के तुमने हूर देखी भी है ??

बात सिर्फ मेरी मुहब्बत की नहीं है ये एक अलग ही जज्बा है जो सब पर अपना जादू चलाता है, ये मुहब्बत की जादूगरी है , इंसान अपना नहीं होता उसका हो जाता है, ये बहुत मीठा अहसास है जिस किसी को मुहब्बत हो जाती है वह बादलों में उड़ता है, ज़मीन पर पाओं नहीं पड़ते, मुहब्बत अपना असर लाज़मी छोड़ती है कभी तो ये एक दम से हो जाती है और कभी हल्की मगर मुसलसल बरसती बारिश की तरह इंसान पर असरंदाज होकर उसको अपने बस में कर लेती है,

आपको जिसके बेगैर अपनी ज़िन्दगी गुजारनी मुश्किल लगे समझो आपको उससे मुहब्बत है, वह कोई भी हो सकता है, मर्द का परेशानी में और औरत का आटा गूंधते वक़्त किसी को सोचना उससे मुहब्बत की निशानी है,

मुहब्बत एक पाकीज़ा जज़्बा है ये उसी पर अपना असर छोड़ता है जिसको उसकी हर्मत का ख्याल होता है, मुहब्बत तो वह खुशबू है जो छुपाई नहीं छुपती और अपनी महक से हर उस शख्स को महकाती है जो उसके साए में अपनी ज़िन्दगी बसर करने आता है,

फी ज़माना मुहब्बत के माने बदल चुके हैं अब मुहब्बत सिर्फ ख्वाहिशात की तकमील का नाम बन चुकी है, मुहब्बत की बातें सिर्फ किताबों में रह गई है, ज़माने के साथ हर चीज के रंग ढंग बदल जाते हैं, यही मामला मुहब्बत के साथ हुआ है,

आज की नई नसल ने इस पाकीज़ा जज्बे पे बदनामी का दाग़ लगा कर उसको मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा, मैं ये नहीं कहता कि आज की मुहब्बत सबको बदनाम कर देती है, मगर आज की अक्सरियत मुहब्बत को बदनाम कर रही है, जैसा कि किसी शायर ने क्या खूब कहा है आज कि मुहब्बत के बारे में

" मुहब्बत हो चुकी पूरी
चलो कपड़े पहनते हैं "

ये अशआर तर्जुमानी है आज की नसल की मुहब्बत की, हमें ज़रूरत है अपनी नई नसल को उसकी हकीकत बताने की वरना ये समाज तबाही के उस दहाने पर पहुंच जाएगा जहां खून के रिश्ते एक दूसरे से नजरें मिलाने के काबिल नहीं रहते, मगरिब से अाई मॉडर्न लहर ने हमारे ज़हनों को उस रास्ते पर डाल दिया है जो सिर्फ और सिर्फ तबाही का रास्ता है,

बात सिर्फ लड़के और लड़की की मुहबबत की नहीं है, दुनिया की किसी चीज की मुहब्बत में भी जब इंसान गिरफ्तार होता है तो वह अपने हकीकी मकसद से भटक जाता है, मुहब्बत का मकसद ये नहीं के जो चाहा उसको हर हाल में अपना बनाना ही बनाना है बल्कि इसका मकसद तो ये है कि अपने आपको नफी करके उसकी रजा में खुश रहा जाए,

हर शक्श को इख्तियार हासिल है के वह मुहब्बत करे मगर मुहब्बत की शराएत के मुताबिक और मुहब्बत की सबसे पहली शर्त है इज्ज़त देना, आप चाहे जिससे भी मुहब्बत करते हो जब तक आप उसको इज्ज़त नहीं देंगे आप मुहब्बत की पहली सीढ़ी भी नहीं चढ़ पाएंगे, अगर किसी के दिल में अपने लिए मुहब्बत पैदा करना चाहते हैं तो सबसे पहले उसे इज़्ज़त देना सीखना पड़ेगा।

हमारे समाज कि यही सबसे बड़ी खराबी है के आप सबसे मुहब्बत का दावा तो करते हैं मगर जब इज़्ज़त देने की बात आती है तो आप खुद को दूसरों से अफजल करार देकर उसे इज्ज़त देने से इंकार कर देते हैं, इस दुनिया में मुहब्बत इतनी ज़रूरी नहीं जितना इज्ज़त देना ज़रूरी है, अगर आप मुहब्बत करके खुद को कामयाब इंसान समझते हैं और इज्ज़त देना नहीं जानते तो आप दुनिया के नाकाम तारीन इंसान हैं,

एक अच्छा मर्द हमेशा औरत को मुहब्बत से ज़्यादा इज्ज़त देता है और यकीनन औरत को मुहब्बत से ज़्यादा इज्ज़त की जरूरत होती है, मुहब्बत का इज़हार हर वक़्त नहीं किया जाता ये तो ख़ास ख़ास मौकों पर किया जाता है जबकि इज्जत हर वक़्त दी जाती है, इज्जत की जरूरत तो हर वक़्त महसूस कि जाती है, मुहब्बत के बेगैर औरत आधी ज़रूर होती है मगर इज्ज़त के बेगैर औरत औरत नहीं रहती, इसलिए औरत को भी मर्द की इज्ज़त का पासदार होना चाहिए तब ही मुहब्बत अपनी हकीकी मंज़िल को पहुंचती है,

यहां हमें इस बात का भी ख्याल रखना होगा के अगर अपनी सच्ची मुहब्बत को उसके हकीकी अंजाम तक पहुंचाना चाहते हों तो उस जात से लाज़िमी मुहब्बत करो जिसने तुम्हे अपनी मुहब्बत से रोशनाश करवाया है,

अगर तुम दुन्यावी मुहब्बत में गुम होकर अपने रब से मुहब्बत भूल जाओगे तो तुम्हे कभी दुनिया कि मुहब्बत में सुकून नहीं मिलेगा, दुनिया की मुहब्बत से रब नहीं मिलता मगर रब की मुहब्बत से दुनिया और आख़िरत दोनों मिल जाती है,

अगर समाज को महकता हुआ समाज बनाना है तो हमें इस समाज में पाकीज़ा मुहब्बत के बीज बोने होंगे, हमें दूसरों को मानना होगा, उसको सुनना होगा, सराहना होगा, उनको तस्लीम करना होगा ये असल मुहब्बत होगी,

ये वाली मुहब्बत वो मुहब्बत नहीं जो एक लड़का और लड़की के दरमियान होती है, इस मुहब्बत को इंसानियत कहते हैं, हमें इंसानियत की बेल को परवान चढ़ाना है, मुहब्बत के फूल खुदबखुद खिल जाएंगे, और अगर मेरी राय मुहब्बत के बारे में जाननी है तो मैं इतना कहूंगा के

मुहब्बत का सफर करके, बहुत दिल पे जबर करके।
बस इतना जान पाएं हैं, मुहब्बत मार देती है।

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Wednesday, October 21, 2020

ज़िन्दगी क्या है ....???

 



ज़िन्दगी क्या है ....???


ज़िन्दगी गुलज़ार नहीं, ज़िन्दगी को फिर क्या कहें ??

वफा का पैकर, एक कहानी, एक दास्तान, एक धीमी रोशनी, एक करिश्मा, एक नेमत, एक धुवां , एक राज़, एक जान, एक फूंक, एक नशा, एक आह या सिर्फ एक तमाशा !!

इंसान की पैदाइश से लेकर उसकी मौत तक का नाम ज़िन्दगी है, जिस दौरान उसकी ज़िन्दगी में मुख्तलिफ वाकयात रोनुमा होते हैं जिसमें हज़ारों खुशियों समेत हज़ारों गम भी शामिल होते हैं, इसी ज़िन्दगी के दौरान वह बहुत से इरादे और फैसले भी करता है, उन पर अमल भी करता है और कभी कभी फैसला करने के बावजूद उनसे भी पीछे हट जाता है,

इंसान खताओं का पुतला है और दर्द ए दिल इंसान भी, वह इतना तजुर्बे कार भी होता है के अपनी ज़िन्दगी में सामने वाले शख्स की परेशानियों को लम्हों में परख लेता है और कभी कभी वह दुनिया से बेगाना रह कर ही अपनी ज़िन्दगी बसर कर लेता है, जैसे जैसे उमर बढ़ती है इंसान को ये अंदाजा हो ही जाता है के ज़िन्दगी इतनी अच्छी नहीं जितनी उसे लगती थी, बहुत ही ऐसे लोग होते हैं जो परेशानियों से लड़ते लड़ते ही ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं जो गम सहते सहते इस दहलीज पर आ जाते हैं जहां वक़्त से पहले ही उनकी ताकत जवाब दे जाती है, वो गम तो क्या एक छोटा सा गम भी बर्दाश्त करने के काबिल नहीं रहते,

एक तरफ जहां वह बहुत बड़े फैसले साज होते हैं पर उनकी ज़िन्दगी में एक ऐसा भी वक़्त आता है जब वह एक छोटा सा फैसला करने के लिए 10 बार नहीं बल्कि हज़ार बार भी सोचते हैं, वह डरते हैं और खौफ खाते हैं, ज़िन्दगी उन्हें वक़्त से पहले ही थका देती है और ऐसी थकन जो ना किसी दवा , ना किसी की तसल्ली और ना ही रातों कि नींदों से जाती है, बचपन से जवानी, अधेड़ उमरी और फिर बुढापा इंसान को सब कुछ सिखा देता है , सब कुछ जो शायद वह कभी भी सीखना भी नहीं चाहता था, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनको मुख्तलिफ किस्म के सबक सीखने के लिए बुढ़ापे की जरूरत नहीं होती बल्कि दुनिया उन्हें जवानी ही में बुढापे की दहलीज पर ले आती है, तो सही कहा है शायर ने

" इरादे बांधता हूं, सोचता हूं , तोड़ देता हूं।
कहीं ऐसा ना हो जाए, कहीं वैसा ना हो। "

ज़िन्दगी बहुत सख्त लगती है जब अपने से नीचे लोगों कि तरफ निगाह डाली जाए

ज़िन्दगी कठिन लगती है जब एक मजदूर बेगैर दिहाड़ी के घर जाता है,

ज़िन्दगी और सख्त लगती हैं जब बेटियां घर पर बैठी रिश्तों का इंतजार करती हैं,

ज़िन्दगी बहुत सख्त लगती है जब मां बाप बेटी के दहेज के लिए हाथ पैर मारते नहीं थकते।

ज़िन्दगी में उस वक़्त आह निकलती है जब बेऔलाद जोड़ा किसी नन्हे कि पैदाइश पर फिर से उम्मीद बांधता है,

ज़िन्दगी बेचैन लगती है जब बाप डर और खौफ के साथ बेटी को रुखसत करता है और वह उसी घर वापस आ जाती है, जब उसकी ज़िन्दगी मुश्किल कर दी जाती है और ज़िन्दगी थम सी जाती है।

जब नन्हे नन्हे हाथ भीख मांगते हैं और दुआ भी देते हैं, तो ज़िन्दगी गुलज़ार ही नहीं !!

" ज़िन्दगी तेरे ताक्कुब में लोग,
इतने चलते है की मर जाते हैं। "

मैं बा जात ए खुद जब आस पास लोगों को देखता हूं तो एहसास होता है के जिस ज़िन्दगी को हम कोसते है, जिसे धुत्कारते हैं, जिसके अक्सर गुज़र जाने की चाह रखते हैं वह तो कई ज़िंदगियों से बेहतर है बल्कि बहुत बेहतर।

वह सिर्फ एक तमाशा नहीं बल्कि एक इसलाह है, एक सबक है, एक किताब है और हसीन सफर भी !!

ये सोच भी ज़ेहन में आती है के जिस ज़िन्दगी के हम मालिक है ये तो बहुत सारे लोगों की ज़िंदगी से बेहतर है, मुझ समेत हम हर वक़्त ये ही क्यूं सोचते हैं के ज़िन्दगी में ये नहीं किया, वह काम क्यूं किया , ऐसा नहीं होना चाहिए था, ये गलत हुए वगेरह,

जबकि दूसरी तरफ हम में से कुछ लोग ये भी कहते हैं के ये होना ही था, और इसी लिए हो गया (हाय ये नसीब ! अब पछतावे से क्या फायदा)

" हासिल ज़िन्दगी हसरतों के सिवा कुछ नहीं।
ये किया नहीं, वो हुआ नहीं, ये मिला नहीं, वह रहा नहीं। "

तो जनाब ! ज़िन्दगी में कुछ अच्छा हो तो हमारी वाह वाह बुरा हो तो नसीब पर डाल देना ठीक नहीं बल्कि उस ज़िन्दगी को बिगाड़ने और संवारने में खुद हमारा बहुत बड़ा हाथ होता है, ज़िन्दगी वह सबक है जिसे जितना जल्दी सीख लिया जाए उतना ही बेहतर है वरना वह खुद बहुत कुछ सिखा देती है, शायर ने ठीक कहा है के

" कौन किसी का गम खाता है,
कहने को गम ख्वार है दुनिया। "

ज़िन्दगी को बेहतर और बदतर बनाने वाले हम खुद होते हैं जहां छोटी छोटी गलतियां बाज़ औकात हमारे लिए बड़े बड़े पहाड़ खड़े कर देती है जिसे पार करने के लिए हमारी पूरी उम्र लग जाती है, तो हमें चाहिए के हम मुनासिब अंदाज़ में , ज़्यादा की चाह में, खुद की जात और खानदान को दूसरों से मवा ज़ाना करने में ना निकाल दें बल्कि हम इतने ही पैर फैलाएं जितनी हमारी चादर इजाज़त देती है तो ज़िन्दगी अजीरन होगी और ना ही बेसुकून ...

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com