DAWATUS SALAFIYYAH

DAWATUS SALAFIYYAH

Wednesday, October 22, 2014

CERVICAL CANCER KI WAJAH AUR ISLAMI ILAAJ






भारत मे गर्भाशय मुख कैंसर ( सर्वाइकल कैंसर ) से मर जाने वाली स्त्रियों की संख्या शेष विश्व के मुकाबले सर्वाधिक है , 

यानि इस क्षेत्र मे भी भारत की हालत विश्व मे सबसे बदहाल है
आंकड़ों के मुताबिक भारत मे हर वर्ष स्त्रियों मे गर्भाशय मुख कैंसर के 1,32,000 नए केस दर्ज किए जाते हैं, इनमें से 72,000 स्त्रियाँ इस रोग के कारण मर जाती हैं ... शेष स्त्रियों के आपरेशन कर के उन के गर्भाशय सफलतापूर्रक निकाल दिए जाते हैं .... 


अर्थात् वे स्त्रियाँ सदा के लिए औलाद की खुशी से हाथ धो बैठती हैं ।
वैसे महिलाओं मे सर्वाइकल कैंसर फैलने का एक कारण निजी अंगो की स्वच्छता के प्रति उन महिलाओं की लापरवाही भी होती है, लेकिन सर्वाइकल कैंसर मुख्य तौर पर सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज़ के रूप मे स्त्रियों को अपनी गिरफ्त मे लेता है....... 


महिलाओं में गर्भाशय मुख कैंसर का कारण ह्युमन पैपिलोमा वायरस होता है । यह वायरस पुरुष अंग की फोरस्किन के अन्दर पनपता है जो शारीरिक संबन्ध के दौरान महिलाओं में प्रेषित हो जाता है ,

जबकि खतने मे पुरुष की ये फोरस्किन ही शल्यक्रिया द्वारा निकाल दी जाती है जिस कारण पुरुष अंग पर ह्यूमन पैपिलोमा वायरस नहीं पैदा होता, क्योंकि वायरस को पनपने के लिए नमी का वातावरण नही मिल पाता ... 


और स्त्रियों मे उन के पुरुष साथी के द्वारा सर्वाइकल कैंसर पैदा होने की सम्भावना शून्य हो जाती है ॥
इसी कारण ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में अप्रेल 2002 में प्रकाशित एक आर्टिकल का सुझाव था कि पुरुषों द्वारा अपना खतना करा लेने से महिला गर्भाशय मुख कैंसर को बीस फीसदी तक कम किया जा सकता है,

सन् 2012 मे भारत मे "Cancer Mortality in India" नाम से एक सर्वे किया गया था इस सर्वे मे पाया गया कि भारत मे हिंदू महिलाओं के मुकाबले मुस्लिम महिलाओं मे सर्वाइकल कैंसर के केस बेहद कम पाए गए ... सर्वे मे जम्मू कश्मीर और असम जहाँ मुस्लिम आबादी बहु संख्यक यानि 75% और 40% है , मे महिलाओं मे सर्वाइकल कैंसर के रुझान का अध्ययन करने पर ये ज्ञात हुआ कि इन क्षेत्रों मे सर्वाइकल कैंसर के मामले राष्ट्रीय औसत के चौथाई से भी कहीं कम हैं ...
 

सर्वे से ये निष्कर्ष निकाला गया कि मुस्लिम महिलाओं मे गर्भाशय मुख कैंसर के मामले नगण्य पाए जाने का कारण मुस्लिम पुरुषों मे अनिवार्य रूप से किया जाने वाला खतना था
 

यह एक बड़ा प्रमाण था, इसके अतिरिक्त भी अन्य कई शोध और अनुसंधान यही सुझाते हैं कि जिन पुरुषों द्वारा खतने को अपनाया जाता है उन की स्त्रियों मे गर्भाशय मुख कैंसर का खतरा न के बराबर होता है ॥
सोचिए इस विषय मे भारत मे कितनी भयावह स्थिति है ..... 


क्या इस बात की जरूरत नहीं कि भारतीय पुरुषों द्वारा हर तरह की हिचक छोड़ के इस बेहद लाभकारी चिकित्सा अर्थात् खतना को अपना लिया जाए ........ क्योंकि ऐसा न किया गया तो पूरी एक नस्ल खत्म होने की कगार पर पहुंच रही है

Monday, October 20, 2014

HZ SAAD BIN MALIK KA WAQYA

Hz Saad Bin Malik (Ra) Ka Waqya

Hz Saad Bin Malik (Ra) Farmate Hain K


"Main Apni Maa Ki Bahut Khidmat Karta Tha Aur Unka Ita'at Ghuzar Tha, Jab Allah Ne Meri Islam Ki Taraf Hidayat Ki To Meri Walida ,Mujhpar Bahut Bigadi"

Aur Kahne Lagi

"Bacche Ye Naya Deen Kahan Se Nikal Liya H!

Suno ! Main Tumhe Huqm Deti Hun K Is Deen Se Dast'bardar Ho Jao Warna Main Na Khaungi Na Piyungi Bhooki Mar Jaungi"

Maine Islam Ko Na Chhoda, Meri Maa Ne Khana Peena Tark Kar Diya Aur Charon Taraf Se Log Mujh Par Awaazen Kasne Lage K Ye Apni Maa Ka Qaatil Hai,

Mera Dil Bahut Tang Hua, Maine Apne Waalidah ki Khidmat Me Baar Baar Arz Kiya, Khushamaden Ki Aur Samjhaya Ki Allah Ke Liye Apni Zidd Se Baaz Aa Jao, Ye Toh Na Mumkin Hai Ke Main Nabi (Sws) KO Chhod Dun,,

Isi Bahes Me Meri Walidah Par 3 Din Ka Faaqa Ghuzar Gaya Aur Uski Haalat Bahut Kharaab Ho Gayi, Toh Main Uske Paas Gaya Aur Kaha

" Meri Acchi Ammi Jaan Suno ! Tum Mujhe Meri Jaan Se Zyada Azeez Ho, Lekin Mere Deen Se Zyada Aziz Nahin Ho
Wallah ! Ek Nahin Tumhari Ek Sau (100) Jaane Hon Aur Isi Bhook Pyaas Me Ek Ek Karke Sab Nikal Jaayen, Toh Bhi Main Aakhiri Lamhe Tak Is Sacche Deen E Islam Ko Nahin Chhodunga

Wallah ! Nahin Chhodunga"

Ab Meri Maa Mayoos Ho Gayi Aur Khana Peena Shuru Kar Diya

(Tasfeer Ibn Kathir Jild 4, Sahih Islami Waqeyaat Page 61-62)

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Saturday, October 18, 2014

KYA ALLAH NE FARISHTON KO DHOKA DIYA ???





 आर्य समाज के कुछ भाईयों द्वारा अक्सर ये आक्षेप किया जाता है कि कुरान मे लिखा है कि अल्लाह ने फरिश्तों के सामने कुछ वस्तुएं ला के उन्हें चैलेन्ज दिया कि इन चीजों के नाम बताओ.... लेकिन फरिश्ते नही बता पाए, तब अल्लाह ने आदम अ.स. से उन वस्तुओं के नाम पूछे और आदम अ.स. ने उन सभी वस्तुओं के नाम बता दिए ..... 

इस प्रकार अल्लाह ने फरिश्तों का धोखा दिया क्योंकि अल्लाह ने आदम अ.स. को पहले से ही उन सारी वस्तुओं के नाम सिखा दिए थे जबकि फरिश्तों को नहीं सिखाए थे

पर इसमे कौन सा धोखा हुआ? क्या अल्लाह ने फरिश्तो के समक्ष पहले से ये ऐलान नहीं किया हुआ था कि मै तुम सबसे श्रेष्ठ रचना बनाने वाला हूँ ???
 
बिल्कुल ऐलान किया था, पवित्र कुरान की सूरह 15:29 देखिए, यहाँ लिखा है अल्लाह ने फरिश्तों से कहा कि मै मनुष्य को बनाने जा रहा हूँ तो जब मै उसे बना के उसमें प्राण डाल दूं तुम सब उसको सजदा करना
जाहिर है सजदा निम्न श्रेणी वाले ही अपने से बड़ी श्रेणी वाले को करते हैं ।
 
जब अल्लाह ने सब फरिश्तो और जिन्नो से आदम को श्रेष्ठ बनाने का निर्णय किया तो आदम मे फरिश्तो और जिन्नो से अधिक अच्छा तो कुछ अल्लाह को बनाना था ही, सो उस ने आदम को सबसे अधिक ज्ञान दे दिया 

..... धोखा तो तब होता जब अल्लाह बिना किसी को ये बताए कि आदम उन सबसे श्रेष्ठ होन्गे , आदम अ.स. को बनाता और फिर सबसे कहता कि इस से ज्यादा जानकर दिखाओ ।

रहा सवाल फरिश्तों से वस्तुओं के नाम पूछने का, तो यहाँ भी अल्लाह ने यों ही नही फरिश्तों से वस्तुओं के नाम पूछे बल्कि आदम अ.स. किस प्रकार फरिश्तो से श्रेष्ठ होंगे इस विषय मे पहले फरिश्तों ने ही एक जिज्ञासा प्रकट की थी, जिसे शांत करने के लिए अल्लाह ने फरिश्तों से वस्तुओं के नाम पूछे ॥ इसे अल्लाह द्वारा फरिश्तों को चैलेन्ज दिया जाना समझना भी ठीक नहीं क्योंकि चैलेन्ज या चुनौती की नौबत तो बहस और लडाई झगड़े मे आती है .... 

और फरिश्तो मे अल्लाह से बहस करने की या उसकी बात काटने और अल्लाह के कथन की अवहेलना करने की सिफत (गुण) नहीं है ...

पवित्र कुरान की दूसरी सूरत की आयत नम्बर 30 से 33 तक के अनुसार ..... जब अल्लाह ने मनुष्य को धरती का उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा की तो कुछ फरिश्तो ने जिज्ञासा जाहिर की कि मनुष्य तो धरती मे बिगाड़ पैदा कर सकता है जबकि हम आपकी स्तुति किया करते हैं ..... उनका आशय था कि मनुष्य धरती के लिए उपयुक्त चुनाव नहीं है क्योंकि मनुष्य स्वतंत्र बुद्धि का होगा और अल्लाह की आज्ञा का मनुष्य द्वारा उल्लंघन किया जा सकता है ...
 
तब अल्लाह ने फरिश्तो से कहा कि मै तुमसे बेहतर जानता हूँ कि कौन उपयुक्त चुनाव है ..... और ये चुनाव कितना उपयुक्त है ये बताने के लिए कुछ चीजों के नाम बताने को फरिश्तो से कहा तो फरिश्तो ने कहा कि हमें तो सिर्फ उतना पता है जितना तूने हमें बताया है इन चीजों के नाम हम नही जानते ।
तब अल्लाह ने फरिश्तो को ये बताने के लिए कि फरिश्तो से ज्यादा ज्ञान अल्लाह ने आदम को दिया है आदम अ.स. को उन चीजों के नाम बताने को कहा, और आदम अ.स. ने उन चीजों के नाम बता दिए ।


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Thursday, October 16, 2014

HINDU DHARM ME MASAA'HAAR KI SHIKSHA

����आमतौर पर समझा जाता है कि हिंदू शुरू से ही पूरी तरह से शाकाहारी रहे हैं।
हिंदुओं ने विदेशियों के संपर्क में आकर मांसाहार शुरू किया। लेकिन इतिहास इस बात को पूरी तरह
झूठलाता है। हमारा इतिहास साफ-साफ बताता है कि हिंदुओं में मांस खाने का प्रचलन न सिर्फ शुरू से
रहा है, बल्कि वे गाय का मांस भी खाते थे और यहां तक कि घोड़े का भी। यह कोई आदिम काल की बात
नहीं है। यह उस समय तक कि बात है जब हिंदू सभ्यता का पूरा विकास हो चुका था।

सभी इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि बौद्ध धर्म के आगमन के पूर्व भारत में बलि प्रथा का प्रचलन
जोरों पर था। बिना बलि के कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता था। हिंदुओं के देवी देवता पशुओं का
रक्त व मांस के शौकीन थे। यहां तक कि देवी-देवताओं को खुश करने के लिए भेड़-बकरियों के अलावा भैंस का
बच्चा, भैंसा, बैल आदि की भी बलि दी जाती थी। देवी-देवता किसी भी धर्म के सर्वोच्च आदर्श होते हैं।
यह आसानी से समझा जा सकता है कि जिस धर्म के सर्वोच्च आदर्श भैंसा आदि के मांस के शौकीन हों, वे
धर्मावलंबी क्या मांस भक्षण से खुद को दूर रख सकते हैं? बलि प्रथा आज भी जीवित है। भारत में कई ऐसे
प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें आज भी प्रतिदिन बड़ी संख्या में पशुओं की बलि दी जाती है। अगर गांवों के देवी-
देवताओं को भी इनमें शामिल कर लिया जाए तो ऐसे असंख्य हिंदू देवी-देवता मिल जाएंगे, जिनका सबसे
प्रिय आहार पशुओं का मांस व रक्त है। इस पर हिंदू धर्माचार्यों का मौन एक तरह से उनकी सहमति को
ही प्रकट करता है।

विश्व में एकमात्र हिंदू राष्ट्र का दर्जा रखने वाले देश नेपाल में आज भी बलि प्रथा का खूब प्रचलन
है। वहां प्रतिवर्ष एक ऐसा धार्मिक उत्सव होता है, जिसमें भैंसों के हजारों बेजुबान बच्चों की बलि दे
दी जाती है। वहां जो दृश्य उत्पन्न होता है, उससे अच्छे दिल जिगर वाला व्यक्ति भी थर्रा जाता है।
शाकाहार के कथित प्रेमी हिंदुओं ने इसे रोकने का कभी प्रयास नहीं किया।
 


हद तो यह कि जब नेपाल के पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र भारत आये थे, तो उन्होंने यहां के भी एक मंदिर में एक
पशु की बलि दी थी।आधुनिक काल का इतिहास भी गवाही देता है कि
हिंदुओं व मुसलमानों के बीच कई बार झटका और हलाल मांस को लेकर भी विवाद होता रहा है। दोनों के
बीच शाकाहार व मांसाहार के कारण विवाद होने का कभी कोई उदाहरण नहीं मिलता। हिंदुस्तान सोशलिस्ट
रिपब्लिकन आर्मी ने तो हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपनी रसोई में झटका व हलाल मांस एक साथ पकाने
की प्रथा शुरू की थी। समुद्रतटीय लोगों का मछली से रिश्ता आदि काल से अभी तक निरंतर रहा है, चाहे वो
जिस धर्म या जाति के हों।

"अल बिरूनी" ने यह तो साफ कर ही दिया है कि उस काल में पुरोहित वर्ग घोड़े का मांस खाते थे। संतों में
मांसाहार की परंपरा बाद में भी जारी रही है।

यहां तक कि आधुनिक काल के सर्वाधिक विद्वान व प्रभावशाली हिंदू संन्यासी स्वामी विवेकानंद भी
मांस खाते थे। उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उनके अंतिम आहार में मछली भी शामिल थी।

महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा "माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ" में एक जगह स्वीकार
किया है कि मांस खाना चाहिए। वहां ऐसा प्रतीत होता है कि गांधी अगर अपनी मां से किये गये वादे से बंधे
न होते तो निश्चित ही वे भी मांसाहार करते। गांधी अपने एक मित्र से कहते हैं, ‘मैं स्वीकार करता हूं
कि मांस खाना चाहिए, पर मैं अपनी प्रतिज्ञा का बंधन नहीं तोड़ सकता।

डा. भीमराव अंबेदकर ने ‘हू वेयर अनटचेबल्स’ में हिंदू धर्मग्रंथों से बड़ी संख्या में ऐसे प्रमाण दिये हैं,
जिनमें बताया गया है कि सनातनधर्मी भी आदि काल से ही मांसाहारी होते थे। अंबेदकर द्वारा दिये
गये कुछ उदाहरण देखिए। 


माधव गृहसूत्र के अनुसार, आर्यों में विशेष अतिथियों के स्वागत के लिए जो
सर्वश्रेष्ठ चीज परोसी जाती थी, उसका नाम मधुपर्व था। इस ग्रंथ के अनुसार, वेदों की आज्ञा है कि
मधुपर्व बिना मांस के नहीं होना चाहिए। शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य एक जगह जवाब देते हैं- ‘मगर
मैं मांस खा लेता हूं, अगर मुलायम हो तो।’ आपस्तंब धर्मसूत्र के अनुसार, ‘ गाय और बैल पवित्र हैं, इसलिए
खाये जाने चाहिए।’ 


ऋग्वेद में इंद्र का कथन है, ‘‘ वे मेरे लिए 15 बैल पकाते हैं, जिनका मैं वसा खाता हूं। इस
खाने से मेरा पेट भर जाता है।’’ 


मनु के अनुसार, "पंचनखियों में सेह, साही, शल्लक, गोह, गैंडा, कछुआ,
खरहा तथा एक और दांत में पशुओं में ऊंट को छोड़कर बकरे आदि पशु भक्ष्य हैं।’’


 इन कथनों के अलावा और
भी ढेरों श्लोकों का उदाहरण देकर अंबेदकर ने साबित किया है कि हिंदुओं के धर्मग्रंथ भी उनके मांसाहारी होने
का समर्थन करते हैं।ऐसे ढेरों प्रमाण भरे पड़े हैं जिससे पता चलता है कि तांत्रिक अपने अनुष्ठान के साथ-साथ
दैनिक आहार में भी मांस खाते हैं। 


यहां तक कि उनके द्वारा मानव मांस भी भक्षण करने और मानव रक्त पीने
की बात साबित हो चुकी है। अभी भी भारत में आनंद मार्ग आदि कई ऐसे हिंदू आध्यात्मिक संगठन हैं, जिनमें
संन्यासी मानव की खोपड़ी का इस्तेमाल साधना में करते हैं। मानव की खोपड़ी का इस्तेमाल करने वाले को
कितना शाकाहारी माना जा सकता है?


यह बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि हिंदुओं में
आदि काल से मांस खाने की परंपरा रही है। यह किसी भी दूसरे धर्मावलंबियों से कम नहीं रही।

स्वामी विवेकानन्द जी ने भी अपनी किताब में लिखा था कि हिन्दू भी वैदिक समय में
मांस खाते थे इसके बारे में सारी जानकारी आपको, उनके द्वारा लिखी गई किताब में मिल जाएगी,
जिसका शीर्षक है " दी कम्पलीट वर्कस वाई स्वामी विवेकानन्द जी "जिसका वोल्युम-3 है
ये पुस्तक " अदवेता आश्रम द्वारा प्रकाशित की गई थी,इस किताब के 174 पृष्ठ पर लिखा गया है,
कि वैदिक समय में हिन्दू भी मांस खाते थे,यद्यपि, सबसे शुद्ध मांस गाय का होता है,
इसलिए गाय का मांस प्रशाद के रुप में दिया जाता था,
 

जब भी कभी धार्मिक अनुष्ठान होता था,या फिर जब कभी भी कोई राजा या कोई
महन्त किसी के घर जाते थे, तब गाय का मांस ही सबसे पहले दिया जाता था,
पर जैसे-जैसे लोगों की आबादी बढनी शुरू हुई, तब खेतीबाड़ी उच्च स्तर पर की जाने लगी,
 

ओर खेतों को जोतने के लिए बैल इस्तेमाल किए जाने लगे, उसके बाद लोगों ने लगभग हर दैनिक काम के
लिए बैलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया, जैसे कि, बैलगाड़ी का इस्तेमाल, कुओं से पानी निकालने के लिए बैलों का इस्तेमाल,
 

गेहूं पिसने के लिए बैलों का इस्तेमाल किया जाने लगा, तब हिन्दुओं को ये महसूस हुआ, कि यदि
हम गउओं का मांस यूं ही खाते रहेंगे, तब हमारे पास बैलों की कमी हो जाएगी, क्योंकि, बैल तो
तभी बचेगें, जब गउएं बचेगीं, इसलिए उस वक्त गउओं के मांस खाने पे पाबन्दी लगाई गई, इसलिए,
उपरोक्त बातों से ये सिद्ध हो जाता है, कि हिन्दू भी गाय का मांसा खाते थे।
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Tuesday, October 14, 2014

HINDU MAZHAB ME PARDE KI TALEEM





हिंदू भाई अक्सर हमसे कहते हैं कि पर्दा प्रथा स्त्रियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय है, और ये अन्याय इस्लाम धर्म ने स्त्रियों पर किया है .... जबकि हिन्दू धर्म मे स्त्रियों पर ऐसा अन्याय कभी नहीं किया गया था ॥

एक और बात बोली जाती है कि हिन्दुओं मे आज अगर कहीं परदा प्रथा प्रचलित है तो वो सिर्फ मुस्लिम आक्रमणकारियों के डर से आई है, और ऐसी कोई प्रथा हिंदू धर्म के मूल मे नहीं थी ....
लेकिन ज़रा खुद देखिए रिग्वेद मे स्त्रियों को सम्बोधित करते हुए जो लिखा है ,

“ ishvar ne tumhe aurat banaya hai, isliye tum apni aankhe jhuki rakha karo, purusho ki taraf mat dekha karo .apne pair ek dusre se sataa ke rakho, aur apne vastr mat kholo , khud ko ghoonghat me chhupa ke rakha karo”
 [ Rigved, Book 8, hym 33, mantra 19 ]

इसी तरह रामकथा मे भी राम चन्द्र जी भी सीता जी से पराये आदमियों से परदा करने को कहते हैं :-

Jab Ram ji ne Parshuram ko aate dekha to Sita ji se kaha ''Sita apne aap ko ghoonghat me chhupa lo aur apni aankhen jhuka lo'' 
[ MahaveeraCharitra, Act 2, Page 71 ]

सीता जी अपने देवर लक्ष्मण जी से भी परदा करती थीं, आपको याद होगा कुछ समय पहले बीजेपी के वयोवृद्ध सदस्य "राम जेठमलानी" ने लक्ष्मण जी को राम जी से भी बुरा बताया था क्योंकि जब राम जी ने लक्ष्मण जी से माता सीता को जंगल से वापिस लाने को कहा तो लक्ष्मण जी ने जवाब दिया था कि मैं सीता जी को नही ला सकता क्योंकि मैंने माता सीता का चेहरा ही नही देखा इसलिए मै उन्हें नहीं पहचानता

खैर मित्रों । हमारा ये मानना है कि परदा प्रथा कोई अन्याय नहीं बल्कि ये तो नारी की मर्यादा और गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने का सबसे सरल और प्रभावशाली साधन है . और नारी मुक्ति का सम्बन्ध कपड़ों से मुक्ति से हरगिज़ नहीं बल्कि उन अत्याचारों से मुक्ति से है, जो दुनिया वाले उस पर करते आए हैं . और उन अत्याचारों मे मुख्य अत्याचार यही है हवस के भूखे लोगों ने हर दौर मे स्त्रियों को बेपर्दा कर के उन्हे बाजार मे बैठा दिया है, और स्त्री को जालिम रिवाज़ो से आजादी दिलाने का झांसा देकर उसके शरीर से खेला ही है ॥



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Sunday, October 12, 2014

CHAND KE 2 TUKDE (SPLIT OF MOON)






बहुत समय से गैर मुस्लिम भाईयों को मुस्लिमों के इस विश्वास का मजाक उडाते देख रहा हूँ कि नबी स. ने चांद के दो टुकड़े कर दिए थे ..
ये लोग कहते हैं कि मुसलमान बार बार इस्लाम धर्म को विज्ञान पर खरा उतरने वाला धर्म बताते हैं, पर इस्लाम मे वर्णित चांद के तोड़ने और नबी के द्वारा बिना किसी विमान के आकाश की सैर जैसी इन अवैज्ञानिक बातों के जरिए इस्लाम भी झूठ और अंधविश्वास ही फैलाता है ....

पहली बात तो मै इन भाईयों से यही कहून्गा कि इस्लाम को फैलाने के लिए के लिए अल्लाह और रसूल स. ने चमत्कार दिखाने का सहारा नही लिया बल्कि इस्लाम फैला अपने उच्च नैतिक नियमों के कारण .... लेकिन आप कुरान और हदीस पढ़ेन्गे तो पाएंगे कि नबी स. का चमत्कार न दिखाना भी कुफ्फार की नजरों मे नबी स. के झूठे होने का प्रमाण था और ये कुफ्फार लोगों को ये कह कहकर भड़काया करते थे कि ये कैसा नबी है जो साधारण आदमियों की तरह बाजारों मे घूमता फिरता है, यदि ये वास्तव मे नबी होता तो अल्लाह ने इसके साथ एक फरिश्ता रखा होता और ये चमत्कार दिखाता होता
इस कारण , कुछ एक चमत्कार जो अल्लाह के हुक्म से नबी सल्ल. ने दिखाए, वे एक तो इसलिए ताकि कुफ्फार के आरोपों को झुठलाया जा सके,
और दूसरा कारण ये कि वे गैर मुस्लिम जो चमत्कार को ही ईश्वर की निशानी मानते थे और सम्मोहन करने वाले जादूगरो के जादू के कारण ही उन्हें ईश्वर का साथी मानने लगे थे , वे लोग भी अल्लाह के द्वारा किए गए सच्चे चमत्कार को देखकर ये जान लें कि मोहम्मद सल्ल. को ईश्वर का सच्चा साथ प्राप्त है ...

चांद के दो टुकड़े करने के लिए भी कुफ्फारे मक्का ने प्यारे नबी स. को बहुत उकसाया और ये वादे किए कि अगर मोहम्मद स. सच्चे हैं और सचमुच अल्लाह के रसूल हैं, तो वे चांद को तोड़कर दिखा दें, फिर हम इनका नबी होना तस्लीम कर लेंगे और मुसलमान हो जाएंगे ....

अल्लाह और उसका नबी जानते थे कि कुफ्फार के ये दावे और वादे सिर्फ नबी स. को झूठा साबित करने की नीयत से किए गए हैं, इस्लाम कुबूल करने की नीयत से नहीं .... लेकिन यहाँ नबी स. की सच्चाई को दांव पर लगाया गया था सो अल्लाह की मर्ज़ी से नबी स. ने चांद के दो टुकड़े कर के अपनी सच्चाई का सबूत भी कुफ्फार को दिया, और कुफ्फार का ये झूठ भी दुनिया के सामने ले आए कि चांद के टूटते ही वो मोहम्मद स. का नबी होना तस्लीम कर के ईमान ले आएंगे .... कुफ्फारे मक्का चांद के तोड़े जाने को जादू कहकर इस सच से इनकार करने लगे,और न नबी स. को उन्होंने नबी तस्लीम किया, न मुसलमानों को यातनाएँ देनी बंद कीं...

बहरहाल ... चांद के दो टुकड़े होने का ये वाकया सच्चा था ये हम आज भी पूरे दावे से कहते हैं ... नबी स. द्वारा चन्द्रमा के तोड़े जाने की इस घटना ने कई वैज्ञानिक तथ्यों को भी स्पष्ट कर दिया जिनकी पुष्टि आज भी अंतरिक्ष विज्ञानी करते हैं

1- चांद को देखकर दुनिया मे पहले की आबादियां उसे एक ठण्डी रौशनी का पुन्ज समझती थीं जैसे सूरज एक गर्म प्रकाश पुंज है, और रौशनी को न छुआ जा सकता है न ही तोड़ा जा सकता है , इस्लाम से पहले चांद को कोई भी व्यक्ति ऐसी ठोस वस्तु नहीं मानता था जिसे स्पर्श किया जा सकता हो .... ये खयाल बीसवीं शताब्दी तक लोगों मे बना रहा जब तक नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर उतर कर ये साबित न किया कि चांद मिट्टी और चट्टानों से बना एक विशाल उपग्रह है ... लेकिन चांद के तोड़े जाने के वाकये से इस्लाम ने 1400 साल पहले ही ये सिद्ध कर दिया कि चांद एक ठोस आकाशीय संरचना है ...

2- पूरी दुनिया के लोगों मे चांद को देवता या दैवीय शक्ति आदि मानने का भी चलन था इस्लाम से पूर्व ... लेकिन चांद को तोड़कर नबी स. ने ये सिद्ध किया कि चांद एक ठोस निर्जीव आकाशीय पिण्ड से अधिक कुछ नहीं और उसमें कोई दैवीय शक्ति नहीं, और न ही वो कोई देवता है.... दुनिया भर के अनेक गैर मुस्लिम अब तक चांद मे दैवीय शक्तियों का वास समझते थे, लेकिन अपने इतिहास से लेकर आज तक मुस्लिमों ने ऐसा अंधविश्वास चांद के विषय मे कभी नहीं रखा ॥

3- चांद के तोड़ने के मुस्लिमो के इस दावे ने इस सम्भावना को भी दुनिया के सामने रखा कि यदि 1400 वर्ष पहले चांद को तोड़कर जोड़ा गया था, तो इस बात के चिन्ह आज भी चांद की सतह पर मिलने चाहिए,
आज हमारे पास NASA द्वारा लिये गये चांद की सतह के कुछ चित्र हैं, जिनमें चांद की सतह पर एक विशाल दरार दिखाई पड़ रही है .... जैसे किसी टूटी हुई चीज़ दोबारा जोड़कर रखने पर बन जाती है ..... मैं जानता हूँ कि विरोधी इस दरार के चन्द्रमा की सतह पर होने के भी अलग अलग कयास निकालेंगे पर चांद के टूटने की बात नहीं मानेंगे... पर इस्लाम मे चांद के टूटने के विश्वास का मजाक ये लोग तब उड़ा सकते थे जब चांद पर ऐसी कोई दरार न मिली होती ..... इस दरार के पाये जाने के बावजूद यदि लोग चांद के टूटने की सम्भावना पर विचार न करें तो इसे उन लोगों के पूर्वाग्रह का ही परिणाम कहा जाएगा...

बहरहाल जो लोग चांद के टूटने को इस्लाम का अंधविश्वास साबित करना चाहते हैं, वे अपनी इस बात कि चांद कभी नहीं टूटा था को सिद्ध करने का कोई प्रमाण नहीं दे सकते .... लेकिन चांद टूटा था इस बात का एक बड़ा प्रमाण मुस्लिमों के पास अवश्य है !!


Friday, October 10, 2014

SILENT DEATH (ABORTION)









बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि एक नए अनुसंधान के मुताबिक भारत में पिछले 30 सालों में कम से कम 40 लाख बच्चियों की भ्रूण हत्या की गई है.
 

अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका 'द लैन्सेट' में छपे इस शोध में दावा किया गया है कि ये अनुमान ज़्यादा से ज़्यादा 1 करोड़ 20 लाख भी हो सकता है.
 

सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च के साथ किए गए इस शोध में वर्ष 1991 से 2011 तक के जनगणना आंकड़ों को नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के साथ जोड़कर ये निष्कर्ष निकाले गए हैं.
शोध में ये पाया गया है कि जिन परिवारों में पहली सन्तान लड़की होती है उनमें से ज़्यादातर परिवार पैदा होने से पहले दूसरे बच्चे की लिंग जांच करवा लेते हैं और लड़की होने पर उसे मरवा देते हैं. लेकिन अगर पहली सन्तान बेटा है तो दूसरी सन्तान के लिंग अनुपात में गिरावट नहीं देखी गई.शिक्षित और समृद्ध परिवारों में कन्या भ्रूण हत्या की दर निर्धन और अशिक्षित परिवारों से कहीं ज्यादा पाई गई ।

कन्या शिशु हत्या के इतिहास की ओर हम ध्यान करें तो पाते हैं कि पहले तो समाज ने स्त्री को हवस पूर्ति का सुलभ साधन बनाया, दहेज लेकर स्त्री और उसके अभिभावकों का आर्थिक शोषण किया और मां-बाप के लिए बेटी के ससुराल का पानी तक पीना पाप बनाकर लड़की को उसके माता पिता के सानिध्य के सुख से भी वंचित कर दिया ताकि ससुराल मे लड़की से मनचाहा फायदा उठाया जाए और लड़की का पक्ष लेने वाला और उसे अन्याय से बचाने वाला कोई न हो ....
 

इस तरह स्वार्थी समाज ने दूसरों की बेटियों से तो खूब आनंद उठाया, पर जब उन्होंने अपनी बेटियों के साथ यही सब अन्याय होता देखा तो उनकी झूठी शान को बहुत ठेस पहुंची.... और अपनी तथाकथित शान और सम्मान बचाने के लिए उन दुष्ट लोगों ने अपनी नवजात बेटियों की हत्या करने का रास्ता निकाला बजाय इसके कि नग्नता, दहेज और विवाह से जुड़े गलत रिवाज़ो को खत्म करते ।
ये रिवाज़ वो लोग इसलिए मिटाना नहीं चाहते थे क्योंकि दूसरों की बेटियों के शरीर और सम्पत्ति से खेलने का लोभ तो वो संवरण कर ही नहीं सकते थे ॥

इस तरह भारत से लेकर प्राचीन अरब तक हर जगह अबोध, निर्दोष और निरीह कन्याओं को जन्म लेने ही मार डालने का दुर्दान्त खूनी रिवाज सदियों तक चलता रहा ...
अब से 1400 वर्ष पूर्व अरब मे तो इस्लाम आया, और नबी स. ने निर्दोष बेटियों की हत्या की कड़ी भर्त्सना की और आप स. ने बेटी को जीवित रखने और उसका अच्छा पालन पोषण करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करते हुए अनेक भली भली शिक्षाएं दीं .... आपने फरमाया-
 

"बेटी होने पर जो कोई उसे जिंदा नहीं दफनाएगा और उसे अपमानित नहीं करेगा और अपने बेटे को बेटी पर तरजीह नहीं देगा तो अल्लाह ऐसे शख्स को जन्नत में जगह देगा।"
(इब्ने हंबल)

इसी तरह हजऱत मुहम्मद सल्ल. ने ये भी फरमाया -
"जो कोई दो बेटियों को मोहब्बत और इनसाफ के सुलूक के साथ पाले, यहां तक कि वे बेटियां बालिग हो जाएं और उस शख्स की मोहताज न रहें ( यानि आत्म निर्भर हो जाएं ) तो वह व्यक्ति मेरे साथ स्वर्ग में इस प्रकार रहेगा (आप सल्ल. ने अपनी दो अंगुलियों को एक साथ मिलाकर बताया कि ऐसे )।"

और नबी करीम मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
 

"जिस शख्स के तीन बेटियां या तीन बहनें हों या दो बेटियां या दो बहनें हों (यानी जितनी भी लड़कियों के पालन पोषण का जिम्मा उस पर हो) और वह उन सबकी अच्छी परवरिश और देखभाल करे और उनके मामले में (अन्याय करने से) अल्लाह से डरे तो उस शख्स के लिए जन्नत है !"
 

(तिरमिजी)

इस्लाम ने बेटी के लिए ऐसे नियम बनाए जिनसे बेटी का जीवित रहना, इज्जत और सुख से जीवन जीना सम्भव हो सका.... पर बड़े दुख की बात है कि भारत मे आज तक बेटी की हत्या जारी है....

मासूम बच्चियों की हत्या करने वाले ऐसे लोगों से मेरी इतनी ही गुज़ारिश है , कि जीवन बड़ा अनमोल उपहार है ईश्वर का....

अपनी औलाद से जीवन का वरदान छीनने की बजाय अगर आप समाज मे व्याप्त कुरीतियों को मिटाने का प्रयास करें तो आपके साथ साथ समाज का भी बडा उपकार हो सकेगा
 

.... इस्लाम ने बेटी के जीने के लिए जो उपाय दिए, वो मैं बता देता हूँ, हो सके तो इन उपायों को अपनाने का प्रयास कीजिएगा

1- इज्जत के डर से लोग अपनी बच्चियों की जान सबसे ज्यादा लेते हैं लेकिन अगर वो अपनी बेटी को शालीन कपड़े पहनाएं , बेटियों को मजबूत चरित्र वाली बनाएं तो बेटियों का शील भंग होने का कोई भय नहीं रह जाएगा

2- इस्लाम मे दहेज प्रथा नही है, अन्य समाजो की देखादेखी आज भले ही भारत और आस पड़ोस के कुछ अशिक्षित मुस्लिम दहेज का लेनदेन करने लगें हों, पर गैरमुस्लिमों की तरह दहेज की मांग मुस्लिम समाज मे अब भी नहीं है ... इस्लाम के अनुसार वधू पक्ष का वर को दहेज देना आवश्यक नही, पर वर का वधू को दहेज (मेहर) देना नितान्त आवश्यक है, मेहर से बेटी का भविष्य सुरक्षित होता है, और दहेज की अनिवार्यता न होने से वर पक्ष वाले वधू का आर्थिक शोषण करने की बात भी नहीं सोच सकते ।

3- सम्भवत: इस्लाम ही एकमात्र ऐसा धर्म है जिसने पिता की सम्पत्ति मे बेटी को भी हिस्सेदार बनाया है .. क्योंकि ये सम्पत्ति दहेज की तरह हस्तांतरणीय नहीं होती जिसे हड़प के बहू को जला दिया जा सके बल्कि ये जायदाद जीवन भर लड़की का आर्थिक सम्बल बनी रहेगी और उसकी इच्छा के विरुद्ध इसका उपयोग कोई और न कर सकेगा... !!


Via- Zia Imtiyaaz