Thursday, September 17, 2020

ALLAH KA HUQM





अल्लाह ने अज्ञानी को शिक्षित करने का आदेश दिया, उनसे बहस नहीं की। क्योंकि बहस करना एक मान्यता है कि उसे ज्ञान है (जो उसके पास नहीं है)।

और जब वह उसके बाद छोड़ देता है, तो वह महसूस करता है कि उसने तर्क जीत लिया है, और इस तरह वह अपनी अज्ञानता के लिए अधिक प्रतिबद्ध हो जाता है।

خُذِ الۡعَفۡوَ وَ اۡمُرۡ بِالۡعُرۡفِ وَ اَعۡرِضۡ عَنِ الۡجٰہِلِیۡنَ

"ऐ नबी ! नर्मी और माफ़ी का तरीक़ा अपनाओ, भलाई के लिए कहते जाओ और जाहिलों से न उलझो " ( अल आरा़फ आयात 199)

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Wednesday, September 16, 2020

KYA IBRAHEEM (AS) SHIA THEY ??





मुनकर ए हदीस कहते हैं कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम "शिया" थे ?? ( मुनकर ए हदीस का क़ुरआन समझने का फहम)
मैंने कहा कैसे ??
उसने कहा
: ”وَإِنَّ مِن شِيعَتِهِ لَإِبْرَاهِيمَ
[الصافات : 83]
तर्जुमा : " और बेशक इब्राहीम उसके शिया में से हैं " (क़ुरआन अल सफ्फात आयात 83)
जवाब :
👈”وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِي شِيَعِ الْأَوَّلِينَ، وَمَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
[11 الحجر]
तर्जुमा : " हमने आपसे पहले जितने भी शिया भेजे, और जो भी रसूल आता वह उनका मजाक उड़ाते " (क़ुरआन अल हिजर आयात 11)
👈 ”إِنَّ فِرْعَوْنَ عَلَا فِي الْأَرْضِ وَجَعَلَ أَهْلَهَا شِيَعًاً“ [القصص 4]
तर्जुमा : " बेशक फिरौन ने सरकशी कर रखी थी और वहां के लोगों को शिया बना रखा था " ( क़ुरआन अल कसस आयात 4)
👈 ”مِنَ الَّذِينَ فَرَّقُوا دِينَهُمْ وَكَانُوا شِيَعًا ۖ “
तर्जुमा : " उन लोगों में से जिन्होने दीन के टुकड़े टुकड़े कर दिए और खुद भी शिया हो गए " (क़ुरआन अल रूम आयात 32)
👈 ” إِنَّ الَّذِينَ فَرَّقُوا دِينَهُمْ وَكَانُوا شِيَعًا لَسْتَ مِنْهُمْ فِي شَيْءٍ ۚ ٍٕ“
तर्जुमा :" बेशक जिन लोगों ने दीन के टुकड़े टुकड़े कर दिए वह शिया थे, आपका उनसे कोई ताल्लुक नहीं " (क़ुरआन अल अनाम आयात 159)
इसीलिए कहा क़ुरआन उस तरह समझना चाहिए जिस तरह नबी ए अकरम मुहम्मद (Sws) ने उम्मत को समझाया है, अपनी अकल लगाओगे तो काला हो सफेद और सफेद को काला कर बैठोगे,
तर्जुमा : Umair Salafi Al Hindi

Tuesday, September 15, 2020

ALLAH PAR IMAAN





आप एक विमान पर आराम महसूस करते हैं, जबकि आप पायलट को नहीं जानते हैं ...

और आप एक पानी वाले जहाज पर आराम महसूस करते हैं, जबकि आप कप्तान को नहीं जानते हैं ...

फिर आपके जीवन में आराम क्यों नहीं है, यह जानते हुए कि अल्लाह इसे चला रहा है ?!

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com

Monday, September 14, 2020

AURAT- ISLAM AUR TAHZEEB KI KASHMAKASH ME (PART 2)





औरत - इस्लाम और तहजीब की कशमकश में (किस्त 2)

औरत !! लिबरल मुसलमान उर्फ मुनकर ए हदीस के नर्ग में

बेहिजाबी का नारा दरअसल यहूदियों का नारा है,

शुरुआती इस्लाम का वाकया है , अबू औन का बयान है

" अरब की एक औरत बनी कैनूकआ के मुहल्ले में माल बेचने के अाई, फिर थोड़ी देर के लिए एक सुनार के करीब बैठ गई, यहूदियों का एक जमघट उसकी नकाब उतरवाने पर तुल गया, मगर वह बराबर इनकार करती रही, इतने में सुनार चुपके से उसके कपड़े का किनारा उसकी पीठ से बांध दिया, जब वह औरत वहां से जाने के लिए उठ खड़ी हुई तो उसका सतर खुल गया, जिस पर यहूदी बहुत ज़ोर से हसने लगे, उस औरत ने एक ज़ोर को चीख लगाई, ये सूरत ए हाल देखकर पास के एक बगैरत मुसलमान ने उस सुनार का कतल कर दिया और यहूदियों ने उस मुसलमान का कतल कर दिया, फिर क्या था यहूदी और मुसलमान में तू तू मैं मैं शुरू हो गई "

उसके बाद से आज तक यहूदी बराबर औरतों को इस्लामी कानूनों से निकालने के लिए बहुत ही दिलकश और दिल शोज़ नाम देते आ रहें हैं,

ऐ खातून ए इस्लाम ! तू इन बदमाशों के चंगुल में ना फंस।
तू नौजवान मर्दों कि मां और होनहारों की दरगाह है।

यकीनन जिस चीज की ये नारेबाजी और हंगामा आराई ये लोग कर रहें हैं, निहायत ही खतरनाक हरकतें हैं,

किसी ने क्या खूब कहा है :

" कसम बाखुदा ! हया बाक़ी ना रहें तो ज़िन्दगी बेगार है, ऐसी ज़िन्दगी में कोई भलाई नहीं"

ए खातून ए इस्लाम ! हमें मालूम है के आज राज़ाईल वा फाजायेल पर ग़ालिब है, मगर अच्छे से समझ लो उमर जितनी भी हो बहरहाल कम ही है, एक ना एक दिन दुनिया को छोड़ना ही है,

जिस दिन औरत इस्लाम के अता करदा नेमतों को छोड़कर इन बदमाशों के फरेब में आ गई उस दिन से मर्दों के साथ बेझिझक अख्तलात (Mix Gathering) , मैदानों, कारखानों, कॉलेेज, साहीली इलाकों, पार्कों और सरे बाज़ार इतनी रुसवाईयां हुई के इंतेहा तक जा पहुंची...

इस बात का इजहार शोहरत याफ़्ता बहुत सी औरतों ने किया है के

" हम तहरीक आजादी औरत के चंगुल में ऐसे फंसे के ना शर्म बाक़ी रही ना कुछ हया ! हद तो ये हो गई के दीन ए इस्लाम से भी हाथ धो बैठे, ऐ मेरी बहनों ! तुम हमसे सबक हासिल करो बदमाशों और याहुद के फरेब में ना आओ"

अब हम सरसरी तौर पर उन औरतों के अकवाल का ज़िक्र करेंगे जो अखतालात मर्द और औरत और मॉडर्न तहजीब के लंबे तजुर्बे से गुजरने के बाद दूसरी औरतों को दरस ए सबक और एक पैग़ाम देना चाहती हैं के इस्लामी हिजाब हमेशा लाज़िम पकड़ें, इस्लामी ज़िन्दगी तहज़ीब पर बखुषी राज़ी हों,

एक मुस्लिम शाएराह ने कहा

"दुनिया की सबसे अच्छी औरत वह है जो घर के काम में मसरूफ रहे, जब घर में रहती है तो घर की मालकिन है जिसके हुकम को सर आंखों पर रखते हैं"

" सही मानो में औरत का वकार घर में है , बच्चो की तरबियत करने और शौहर का साथ देने में है "

असल में औरत पर ज़ुल्म वह लोग करते हैं जो औरतों को अर्श से फर्श पर का खड़ा किए हैं, जब जी चाहा उनके लुत्फ़ उठाया और जब जी चाहा उनको धुत्कार दिया।

अफसोस है अगर मुसलमान अब भी ना जागे तो......!

एक गैर मुस्लिम औरत लिखती है :

" हमारे बच्चों का घरों में खादिम बनकर रहना हज़ार दर्जा बेहतर है और कम नुकसान का जरिया है उससे के वह कारखानों में ऊंची ऊंची नौकरियों पर रहें, जहां लड़की उनका गुलाम होकर रहती है और आखिर में उसका जीना दूभर हो जाता है "

एक अमेरिकी अख़बार की नुमाया औरत का बयान है

" मर्द और औरत के अख्तालात से अब बचो और आजादी औरत के नारों को छोड़ दो, पर्दा के उस दौर कि तरफ फिर से पलट जाओ जिसमें औरतों के जरिए कौमों को उरूज हासिल हुआ, ये तुम्हारे लिए अमेरिकी, यहूदी और ईसाई तहज़ीब और तंद्दुन से बहुत बेहतर है, क्युकी हमने बहुत तजुर्बा करके देख लिया, अमेरिकी समाज अबाहियत और फहश के रंग बिरंगे मनाजिरा पेश करने में अपना सानी नहीं रखता,"

" बिला शक वा शूबाह अज़ादी औरत और अखतलात मर्द वा औरत ने कारखानों , साहिलि मकामात, कॉलेज, क्लब में ऐसी घिनौनी सूरत ए हाल इख्तियार कर ली है जिसके तसव्वुर से कलेजा मुंह को आ जाता है, और में हवास बाखता हो जाती हूं "

एक मशहूर सिंगार निगार " फाबियान " नामी खातून ने बयान दिया के :

" अगर मुखपर अल्लाह का फजल वा करम ना होता तो मेरी ज़िन्दगी वीरान हो जाती, क्यूंकि मौजूदा दौर में इंसान ख्वाहिशात का गुलाम है "

फ्रांस की एक जर्नलिस्ट खातून ने बयान दिया के

"मैंने अरब कि औरतों को बा इज्जत और काबिल ए एहतेराम पाया है मुकाबले यूरोपी खवातीन के, और मैं अरब कि औरतों को बड़ा खुश नसीब समझती हूं और मैं उन्हें नसीहत करती हूं के वह ज़ुल्मत परस्त और फहशकारी के मरकज यूरोप की तरफ हरगिज़ हरगिज़ ना देखें "

अमेरिका की एक फिल्मी अदाकारा लंबी मायूसी की ज़िन्दगी गुजारने के बाद खुदकुशी करते वक़्त उन औरतों के नाम जो सिनेमा में अमल या दखल या किसी किस्म का पेशा अख़्तियार करने की ख्वाहिशमंद हैं ये पैग़ाम देते हुए लिखती है,

" घरेलू और आइली ज़िन्दगी हाकीकी साआदत मंदी का जरिया है और औरतें दुनियां की जाहिरी चमक वा दमक पर खुश ना हों, सिनेमा में अमल वा दखल निहायत ही बद बख्ती का काम है, लिहाज़ा कोई औरत सिनेमा में ना छोटा काम की ख्वाहिशमंद हो और ना अदाकारी की "

ये मश्रिक वा मगरिब की औरतों के कुछ काबिल ए इब्रत बयानात थे, जो तहरीक आजादी अौरत का शिकार हुई, ये औरतें दूसरी औरतों के लिए सबक है,

तो ऐ खवातीन ए इस्लाम !! फ़ितना वा खतरा में मुब्तिला होने से पहले होशियार हो जाएं।

अल्लाह ताला भूले भटके मर्द वा औरतों को अक्ल और सही राह से हमकिनार करे और हम सबको जाहीरी और बातिनी साजिशों से महफूज़ रखे.... आमीन

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com

Sunday, September 13, 2020

AURAT- ISLAM AUR TAHZEEB KI KASHMAKASH ME (PART 1)




औरत - इस्लाम और तहज़ीब की कशमकश में (किस्त १)

अल्लाह ताला ने तमाम बनू ए इंसान को अशरफुल मखलूक बनाया उसमें भी औरत को नाकाबिले फरामोश हुकूक दिए,

इस हैसियत से के इस्लाम से पहले औरत कमजोर समझी जाती थी मजलूम थी और समाज में उसका कुछ वजन न था जिंदा दफन कर दी जाती थी

इस्लाम ने औरतों को बुलंद मकाम वा मर्तबा अता किया फिर उसके साथ अदल ओ इंसाफ का हुकम और उसके हुकूक बताएं और अमल पैरा ना होने पर सख्त अजाब की वाईद (सजा) सुनाई गई , फितरी कमजोरी का लिहाज करते हुए उसके काम का दायरा तय किया,

मौजूदा दौर का तजुर्बा करे तो मालूम होगा की औरत के गोशे और पर्दे का क्या हाल है , ना हुकूक उल जवजियत (Rights Of Husband) की कुछ परवाह है और ना हिजाब का कुछ एहितीमाम और तो यह है कि बेपर्दगी और बेहयाई से घूमने फिरने को तहज़ीब का नाम दिया जा रहा है,

और ऊपर से यह नारेबाजी के

"औरतों को गुलामी की जंजीरों से बाहर निकालो औरत के साथ इंसाफ करो औरत की सलाहियत से फायदा उठाओ वगैरह "

इस तरह के नारे दिल को भा जाने वाले नारे दरअसल अपने पीछे एक ही मकसद रखते हैं औरतों के लिए इस्लाम ने जो दायरा बनाया गया है उसको उस दायरे से बाहर निकाले इसमें कुछ शक नहीं कि दुश्मन ए इस्लाम ने इस दरवाजे से अच्छी खासी कामयाबी हासिल कर ली है,

इसमें कुछ अजीब नहीं के इस्लाम के दुश्मनों की इन कार्यवाहीओं के शिकार गैर मुस्लिम समाज हो,

ताज्जुब और अफसोस तो इस बात पर है कि हमारे वह समाज जहां "काल अल्लाह"और " काल ए रसूल" की सदाएं हो उनके इस फरेब में आ जाएं,

तारीख इस्लाम से यह बात बिल्कुल साफ वजह है कि औरत ने इस्लाम के अता करदा दायरे में रहते हुए ऐसे ऐसे कारनामे अंजाम दिए कि उसे देखकर तहजीब परस्तो के यह मत वाले भी नहीं कर सकते हैं

आज भी ममलकत अरब में खवातीन का इस्लाम के अता करदा दायरे को लाज़िम पकड़ने की मुमानियत हो या मुआशरीयत हर जगह अच्छे नतीजे सामने आ रहें हैं, लिहाज़ा औरतों के हक में इस्लामी हुकूक फायदेमंद है, इस्लामी हुकूक औरतों को शान ओ शौकत की वजह है,

इसमें कोई शक नहीं के हक वा बातिल की कशमकश से अजल वा अब्द तक जारी रहेगी, हक के आलंबरदार हमेशा से इस्लाम के खिलाफ उठने वाले आग का मुकाबला करते आए हैं और कर रहें हैं, उसके बावजूद दुश्मन ए इस्लाम ऐसे घात लगाए बैठें है के कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते,

बदकिस्मती से हमारे बहुत से लिबरल और मुनकर ए हदीस एहबाब उनके फरेब में आ गए हैं,

" यूरोप की गुलामी पे रजामंद हो तो मुझको गिला तुझसे है यूरोप से नहीं "

प्यारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम क्या ही सच फरमा गए

" तुम जरूर अपने से पहले लोगों के तौर तरीके और चाल चलन पर बगैर किसी तरदीद के चलोगे, हत्ता कि अगर वह किसी गोह के सुराख में दाखिल हो तो तुम भी दाखिल हो जाओगे, सहाबा ए किराम ने अर्ज किया:- क्या यह यहूदी और नसरानी है ?? आपने फरमाया:- हां !"

दिल को गमगीन कर देने वाली बात यह है कि इस्लाम के नाम लेवा और कलमा गो हजरात औरतों को सरे बाजार ला खड़ा करने वालों, बेहयाई बेपर्दगी की नुमाइश करने वालों , और औरतों को फैशन की आड़ में खाज़ीब नजर बनाकर उसके मटक मटक कर चलने को मॉडर्न तहज़ीब का नाम देने वालों कि पुरजोर ताईद करने में मस्त और मगन नज़र आते हैं,

इसमें दो राय नहीं के इसके नताइज़ किस कदर भयानक है के रोज़ाना कितनी अस्मतें लुट रही हैं, गांव हो या शहर हर जगह बलात्कार के रोज़ वाकयात का जहूर रोज़ का मामूल बन चुके हैं,

इसके अलावा इस आजादी निस्वां की तहरीक से जो जुर्म, फाहिशात वा हादसात होते जा रहें हैं जो एक अलग मौजू की हैसियत रखते हैं,

अब घिनौनी सूरत ए हाल का तद्राक यही है के इस्लाम ने जो दायरा खवातीन को अता किया है उस दायरे में उसको रखते हुए हर वह काम इसमें लिए जाएं जो उसकी तबीयत के मुताबिक हों, वरना अपनी आंखों के सामने अपनी मां, बहनों और बच्चों की इज्जत का सरे बाज़ार नीलाम होते देखना लाजमी है,

इसको अल्लाह ताला ने सूरह ताहा आयात 124 में यूं वाज़ेह किया है

" और जो शख्स मेरी याद से रूगरदानी करेगा वह दुनिया में परेशान हाल रहेगा और कयामत के दिन हम उसे अंधा उठाएंगे "

सनद रहे तहरीक आजादी नीस्वां की तारीख सिर्फ 80 साल पुरानी है, दरअसल हकीकत में इसकी शुरुआत 20 मार्च 1919 को मिस्र में हुई, फिर देखते ही देखते ये मर्ज सारे आलम ए इस्लाम में फ़ैल गया,

इस तहरीक का हकीकी टारगेट ये हैं

1- बेहयाई को सारी दुनिया में आम करना

2- नौजवानों को इसके धोखे में उलझाए रखना

3- नई नसल के सामने तारीख ए इस्लाम और सलफ सालिहीन के हैरतअंगेज कारनामे पर पर्दा डालना,

4- आजादी निसवा के नारे से बेहयाई को मजबूत करना,

ताकि इस रास्ते से आलम ए इस्लाम की जासूसी के जरिए बा आसानी गुलामी की जंजीरों में जकड़ा जा सके और मुस्लिम आबादी को दीन से बेज़ार कर दें,

शेख अब्दुल अज़ीज़ बिन अबदुल्लाह बिन बाज़ फरमाते हैं :-

" बिला शक वा शूबह यहुद , मुसलमानों को बेदीन और बद अखलाक बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते, उनके बहुत से बड़े इदारे हैं जिनमें से कुछ में उनकी दखल हो चुकी है और कुछ की तकमील में हमेशा कमरबस्ता रहते हैं, ये लोग एक तरफ मुसलमानों से ताकत और असलहा से लैस होकर जंग करते हैं तो दूसरी तरफ उनके अफकार वा खयालात में बिगाड़ ,निहायत ही मक्कारी और चालाकी से करते हैं "

( मजल्लह जामिया तुल इस्लामिया 59/1403हिजरी)

यकीनन दुश्मन ए इस्लाम ने इस्लामी तहज़ीब वा तमद्दुन और मुहम्मदी इस्लाम के मुकाबले में मगरिबी तहज़ीब का वा तमद्दुन और सबाई इस्लाम को लाने के लिए तमाम आलम ए कुफ्र के आशीर्वाद के बाद आसान सा रास्ता तलाश कर लिया है,

वह है "औरत की जात" क्यूंकि दुश्मन ए इस्लाम ये बात खूब अच्छी तरह जानते हैं के औरतों की दुरुस्तगी में सारे समाज की दुरुस्तगी है और औरत के बिगाड़ में सारे समाज की तबाही है, और वैसे औरत फितरी तौर पर नई नई चीज को क़ुबूल करने की आदी है, अगर्चे वह उसके दीन वा आबरू के खिलाफ हो,

सही बात तो ये है के औरत दायरा ए इस्लाम में रहकर शान वा शौकत की मल्लिका और कौमों की इज्जत होती हैं, वैसे औरत का मौजूदा दौर में इस्लाम के अता करदा दायरा में रहना बहुत जरूरी है, सच कहा है जिसने भी कहा है,

" यकीनन औरतों की तरफ नज़र जमाए हुए मर्द उन भेंडियों की तरह हैं जो गोश्त के टुकड़े को पाने के लिए चक्कर लगा रहें हों।

अगर ये गोश्त उन दरिंदों से महफूज़ ना कर लिया जाए तो यकीनन बेगैर किसी चुं चरा के वह उसको हड़प कर जाएंगे ".....

जारी.....

ये पोस्ट दो किस्तों में होगा ,

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com

Saturday, September 12, 2020

PARDAH





वो आज़ादी के दावे पर कुफ्र, शिर्क और धर्मत्याग को स्वीकार करते हैं ...
वो आज़ादी के दावे पर LGBTQ का बचाव करते हैं ...
वो आज़ादी के दावे पर मूर्ति को प्रणाम करने वाले लोगों को स्वीकार करते हैं .....
फिर भी उन्होंने एक ही दावे पर हिजाब और नकाब को स्वीकार करने से इनकार कर दिया!
साभार : Umair Salafi Al Hindi

Friday, September 11, 2020

LIBRAL LOGON KE MUTAABIK!!





उदारवादी (लिबरल) लोगों के मुताबिक।

अगर आप हदीस की आलोचना करते हैं .. तो आप रोशन ख़्याल हैं!

अगर आप इस्लामी विरासत की आलोचना करते हैं .. तो आप आज़ाद हैं!

यदि आप इस्लामी रिवाजों और शरिया कानूनों की आलोचना करते हैं .. तो आप एक संत हैं!

लेकिन...

अगर आप पश्चिमी सरकशी पर आलोचना करते हैं .. तो आप एक इंतेहा पसंद (Extremist) हैं!

यदि आप बुराई और पाप की आलोचना करते हैं .. तो आप सख्तगीर (Hardliner) हैं!

साभार : Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks.com