Tuesday, October 20, 2020

लोगों पर ऐसा ज़माना आएगा

 



आज के इस पुर फितन दौर में दीन पर चलना बड़ा मुश्किल हो गया है लेकिन जो आजके इस दौर में सहाबा किराम की तरह अपने अकीदे को खालिस करके ईमान को कामिल करके दुनिया वा दुनिया के फित्नो से उसके माल वा दौलत वा जायदाद के लालच से बेरगबती अपना कर दीन पर अमल करके सहाबा किराम की तरह दावत वा हिजरत वा जिहाद करेगा,

सहाबा किराम की तरह माली वा जानी कुर्बानी देगा, और तौहीद के लिए अपना खून बहाएगा तो वह अजर भी सहाबा किराम की तरह पाएगा,
يَأْتِي عَلَى النَّاسِ زَمَانٌ الصَّابِرُ فِيهِمْ عَلَى دِينِهِ كَالقَابِضِ عَلَى الجَمْرِ۔
नबी ए अकरम मुहम्मद (sws) का इरशाद है:
" लोगों पर ऐसा ज़माना आएगा के उसमे दीन पर सब्र वा इस्तेकामत के साथ जमने वाला ऐसा होगा जैसे अंगारे को मुट्ठी में लेने वाला "
(तिरमिज़ी हदीस 2260)
إِنَّ مِنْ وَرَائِكُمْ أَيَّامَ الصَّبْرِ، الْمُتَمَسِّكُ فِيهِنَّ يَوْمَئِذٍ بِمِثْلِ مَا أَنْتُمْ عَلَيْهِ لَهُ كَأَجْرِ خَمْسِينَ مِنْكُمْ» ، قَالُوا: يَا نَبِيَّ اللهِ، أَوَمِنْهُمْ؟ قَالَ: «بَلْ مِنْكُمْ» ، قَالُوا: يَا نَبِيَّ اللهِ، أَوَمِنْهُمْ؟ قَالَ: «لَا، بَلْ مِنْكُمْ» ثَلَاثُ مَرَّاتٍ أَوْ أَرْبَعًا۔
नबी ए अकरम मुहम्मद (sws) का इरशाद है:
" बेशक तुम्हारे बाद ऐसे सब्र वा तहम्मुल के दिन आ रहें हैं जिनमें उस वक़्त तुम्हारी तरह दीन को थामने वाला ऐसा अजर वा सवाब का मुस्तहिक होगा जैसे तुम में से 50 लोगों का अजर,
सहाबा किराम ने सवाल किया के हमारे पचास या उनके अपने दौर के पचास के बराबर ??
आपने इरशाद फरमाया:- " तुम में से 50 के बराबर, "
कई दफा तीन या चार मर्तबा यही सवाल किया गया, आप (sws) ने यही जवाब दिया "
(तिब रानी 289)
साभार: बहन शबाना रमज़ी
ब्लॉग: islamicleaks.com

Monday, October 19, 2020

पंडित जवाहरलाल नेहरू की दावत पर 4 दिसंबर 1955 में शाह सऊद भारत आए

 


पंडित जवाहरलाल नेहरू की दावत पर 4 दिसंबर 1955 में शाह सऊद भारत आए, बनारस आने का भी उनका प्रोग्राम था,


हुकूमत ए हिन्द ने उनके लिए खुसूसी रेलवे कोच तैयार कराया, बनारस की सरकारी वा गैर सरकारी इमारतों पर कालिमा तैयबा वाले झंडे नसब किए गए,

यहां महाराजा बनारस के वह महमान हुए, जिन रास्तों से वह गुजरने वाले थे वहां के बुत खाने पर्दे से ढक दिए गए थे,

उस मौके पर नज़ीर बनारसी ने एक अशआर कहा था जो अक्सर यहां अवाम वा ख़ास पर रहता है

" अदना सा गुलाम आ गुजरा था बनारस से
मुंह छुपाते थे काशी के सनम खाने "

(तारीख आसार ए बनारस में इस वाक्ए का ज़िक्र किया गया है )

तहरीर: अबू साईद
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks.com 

Sunday, October 18, 2020

शाह सऊद

 




लाखों लोगों को बंदी बनने वाला वा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 7 लाख इंसानों का कातिल रशिया का कम्युनिस्ट आतंकवादी स्टालिन

स्टालिन को तो जवाब दिया सऊदी अरब के ज़िद्दी शाह सऊद ने 1938 मे।

मालूम है 1938 मे जो रशिया एंबेसी जद्दाह मे शाह सऊद ने बंद किया तो फिर 1992 मे रेयाद मे खूला। जब के रूस से 1938 तक केरोसिन तेल आता था तो मक्का ओर मदीना मे या बादशाह के यहॉ चिराग जलता था।

यह भी बहुत कम लोग को मालूम होगा, भारत मे खास कर मुस्लिम बूद्धिजीवियो को।

तहरीर का अंश : सीमाब ज़मन
ब्लॉग: islamicleaks.com 

Saturday, October 17, 2020

KIRDAAR

 


सोचिए अगर आप चाय का कप हाथ में लेकर खड़े हैं और कोई आपको धक्का दे देता है, तो क्या होता है ?? आपके कप से चाय छलक जाती है, अगर आपसे पूछा जाए के आपके कप से चाय क्यूं छलकी ??


तो आपका जवाब होगा : क्यूंकि फलां ने मुझे धक्का दिया ,

गलत जवाब:

दुरुस्त जवाब ये है के आपके कप में चाय थी इसलिए छलकी , आपके कप से वही छलकेगा जो उसमे है,

इस तरह जब हमें ज़िन्दगी में धक्के लगते हैं लोगों के रवैए से , तो उस वक़्त हमारी असलियत ही छलकती है, आपका असल उस वक़्त तक सामने नहीं आता जब तक आपको धक्का ना लगे

तो देखना ये है के जब आपको धक्का लगा तो क्या छलका ??

सब्र, खामोशी, शुक्रगुजारी , रवादारी, सुकून, इंसानियत, वकार,

या

घुस्सा, कड़वाहट, जुनून, हसद, नफरत, हिकारत,

चुन लीजिए के हमें अपने किरदार को किस चीज़ से भरना है, फैसला हमारे इख्तियार में है

साभार: बहन उरवातुल वुस्का
ब्लॉग: islamicleaks.com 

Friday, October 16, 2020

इस्लाम- साइंसी नजरिए के पश ए मंज़र में

 


इस्लाम- साइंसी नजरिए के पश ए मंज़र में

इस्लामी शरीयत का एक छोटा तालिब ए इल्म भी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है के इस्लाम अल्लाह का नाजिल करदा एक अफ़ाकी दीन है, ज़माना नुबुव्वत ही में
ٱلۡیَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِینَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَیۡكُمۡ نِعۡمَتِی وَرَضِیتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَـٰمَ دِینࣰاۚ"(مائدہ: ٣)
"आज मैंने तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया है और अपनी नेमत तुम पर पूरी कर दी है और तुम्हारे लिए दीन ए इस्लाम पर राज़ी हो गया हूं,"
के जरिए इस पर मोहर लग चुकी है और अब ये अपनी इसी शक्ल में रहती दुनिया तक, तमाम इंसानों के लिए राह ए निजात है, वफात ए नबवी के बाद अब इसमें किसी भी किस्म की कमी वा ज़्यादाती का इमकान नहीं,
जदीद मसाइल के हल के लिए अब सही इजतेहाद वा इस्तंबात ही सिर्फ एक रास्ता है, साइंस की तरक्की से इसमें किसी तरह की कमी वा ज़्यादाती होने वाली नहीं है,
और रहा मामला साइंस का तो ये एक ताजुरबाती इल्म है उसकी 2 साखें हैं
1- इल्मी
2- नज़रयाती
साइंस की जो तहकीकात इल्मी है उन पर भरोसा वा एतमाद किया जा सकता है लेकिन इतना एतमाद भी नहीं के शरई कवानीन के लिए उसको ख़ास तस्लीम कर लिया जाए,
नज़रयाती साइंस में परिवर्तन एक मुसल्लम हकीकत है इस्लामी नुक्ता ए नजर से साइंसी नजरियात को हम तीन किस्मों में बांट सकते हैं,
1- साइंस की वह तहकीकात वा नजरियात जो इस्लामी तालिमात के मुताबिक है, साइंस की अक्सर वा बेशतर तहकीकात इसी जन-जाती की हैं, इस तरह के नजरियात के बारे में इस्लामी नुक्ता ए नजर से कहा जाएगा के इन तहकीकात में साइंस हक को पहुंच गई है, और इस्लाम की हक्कानियत को साबित करने के लिए साइंस की इन तहकीकात को तईद के तौर पर ज़िक्र किया जा सकता है,
2- साइंस की वह तहकीकात जो इस्लामी तालिमात के खिलाफ हैं दरहकीकत उनकी तादाद बहुत कम है लेकिन उसके वजूद का इनकार नहीं किया जा सकता, जैसे साइंस के मुताबिक अक्ल वा फहम् का महल दिमाग़ है, जबकि किताब वा सुन्नत में अक्ल वा फह्म का महल दिल की तरफ किया गया है जैसे
’’وَلَقَدۡ ذَرَأۡنَا لِجَهَنَّمَ كَثِیرࣰا مِّنَ ٱلۡجِنِّ وَٱلۡإِنسِۖ لَهُمۡ قُلُوبࣱ لَّا یَفۡقَهُونَ بِهَا‘‘، (اعراف: ١٧٩)
लेकिन जब जदीद दौर के कुछ साइंटिस्ट है जो दिल को खुशी वा गम और अक्ल वा फहम् का मुहल और दिमाग़ को दिल का गुलाम तस्लीम करते हैं (इस्लाम और साइंस, प्रोफेसर ताहिर क़ादरी)
इसी तरह साइंस जिंस में चार महीनों के बाद रूह फूंके जाने का मुनकर है, वह जिंस को जिरोशीमा की शक्ल से ही त-हायात मानती है लेकिन किताब वा सुन्नत में बेशुमार मकामात पर इसका ज़िक्र है के जीरोशीमा ( नुतफा) 40-40 दिन के वकफे से अलका, मुसघा, के मरहलों से गुजरकर चार माह में मुकम्मल इंसानी शक्ल इख्तियार कर जाता है, फिर उनमें रूह फूंकी जाती है,
इसी तरह डार्विन ने अपनी तहकीक में इंसानों को बंदरों की तरक्की याफ़्ता शक्ल करार दिया है जबकि किताब वा सुन्नत के ऐतबार से अल्लाह ने आदम अलैहिस्सलाम की तखलीक फरमाकर उन दोनों से इंसानी नसल को फैलाया, अल्लाह का इरशाद है
: یَـٰۤأَیُّهَا ٱلنَّاسُ ٱتَّقُوا۟ رَبَّكُمُ ٱلَّذِی خَلَقَكُم مِّن نَّفۡسࣲ وَ ٰ⁠حِدَةࣲ وَخَلَقَ مِنۡهَا زَوۡجَهَا وَبَثَّ مِنۡهُمَا رِجَالࣰا كَثِیرࣰا وَنِسَاۤءࣰۚ ﴾ [النساء ١]
तो क्या साइंस के गुलाम मुनकर ए हदीस साइंस की इन तहकीकात को तस्लीम करेंगे ??
इस्लामी नुक्ता ए नजर से हम इन तहकीकात को हरगिज़ तस्लीम नहीं करेंगे, इसलिए हम कहेंगे के साइंस अभी अपनी इन तहकीकात में हक तक नहीं पहुंची है और उसे इन मसाइल में अपनी तहकीक जारी रखनी चाहिए, उम्मीद है मुस्तकबिल करीब में इंशा अल्लाह ज़रूर हक तक रसाई हासिल होगी,
3- तीसरी किस्म उन तहकीकात की है जिनके बारे में इस्लाम खामोश है, हिमायत या मुखालिफत दोनों में कोई रहनुमाई नहीं करता,
इस किस्म कि तहकीकात के बारे में इस्लामी नुक्ता ए नजर से हमारा भी कोई हिम्मती फैसला नहीं होगा बल्कि परिवर्तन के अंदेशे के साथ हम उन्हें तस्लीम करेंगे, जैसा कि अभी हालिया दिनों में आलिमी इदारा सेहत WHO और अमेरिकी डॉक्टरों ने मलेरिया की मशहूर दवा Hydroxy choloroquine को कोविड के मरीजों के लिए इंतेहाई अहम बताया था, जिसकी वजह से अमेरिकी सदर डोनाल्ड ट्रंप ने हिन्दुस्तान से इंपोर्ट किया,
फिर कुछ ही दिनों बाद उन्ही डॉक्टर्स ने उसी दवा को हानिकारक और मर्ज को बढ़ाने वाला बता कर उसकी सप्लाई पर रोक लगाने की मांग की,
इससे साफ पता चलता है कि साइंसी तहकीकात क़ुरआन वा हदीस की तालिमात की तरह अटल नहीं है, यही मेडिकल साइंस जो आज मर्ज को संक्रामक (Contagious) वा गैर संक्रामक में तकसीम करती है हो सकता है कि कुछ दिनों बाद वह इस तकसीम से रूजू कर ले , जो की साइंस की दुनिया में होता रहता है,
तो साइंस की इस तकसीम से फख्र करके क़ुरआन वा सुन्नत की तालिमात की तावील करना कल हमारी जग हसाई की वजह बन सकती है,
साभार: डॉक्टर अब्दुल बारी फताहुल्लह मदनी के लेख का एक अंश
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi

Thursday, October 15, 2020

मंसूर हल्लाज -- एनल हक !! का नारा लगाने वाला ज़िंदीक का मुख्तसर तारूफ

 




मंसूर हल्लाज -- एनल हक !! का नारा लगाने वाला ज़िंदीक का मुख्तसर तारूफ

हल्लाज का नाम हुसैन बिन मंसूर हल्लाज और कुन्नियत अबू मुगीस है, एक कौल ये भी है के उसकी कुन्नियत अबू अब्दुल्लाह थी,
उसने वासित शहर में , एक कौल ये भी है के तुस्तर शहर में परवरिश पाई, और सफवियों की एक जमात के साथ मेल जोल रखा जिनमें सहल तुस्तरी और जुनैद और अबुल हसन नूरी वगेरह शामिल हैं,
उसने बहुत से मुल्कों के सफर किए जिन में मक्का, खुरासान शामिल हैं, और हिन्दुस्तान से जादू का इल्म हासिल किया और आखिर में बगदाद में रिहाइश हासिल की और वहीं पर कतल हुआ,
हिन्दुस्तान में जादू सीखा और ये बहुत ही हीले और धोके बाज़ था, लोगों को उनको जिहालत की बिना पर बहुत से लोगों को धोका दिया और उन्हें अपनी तरफ मायाल करने में कामयाब हो गया हत्ता के लोगों ने ये समझना शुरू कर दिया के ये अल्लाह ताला का बहुत बड़ा वली है,
आम मुस्ताशार्कीन Orientalist (वह काफ़िर जो मुसलमानों का लूबादा ओढ़े हुए हैं) के यहां ये बहुत मकबूल है और वह इसे बहुत मजलूम समझते हैं क्यूंकि उसे क़त्ल कर दिया गया,
और उसके क़त्ल की वजह ये था कि वो इसाई कलाम और तकरीबन उन्हीं का अकीदा में एतेकाद रखता था, उसके आकीडे का बयान आगे चल कर किया जाएगा,
बगदाद में उस ज़िंदीक और काफ़िर होने की वजह पर जिसने उसका खुद भी इकरार किया था 309 हिजरी में क़त्ल कर दिया गया,
और उस वक़्त के उलेमा किराम ने उसके क़त्ल पर इजमा कर लिया था के उसके काफ़िर वा ज़िंदीक होने की बिना पर ये वाजबुल क़त्ल है,
अब आपके सामने उसके बाज़ अकवाल पेश किए जाते हैं जिनकी बिना पर वह मुरतद होकर वाजिबुल क़त्ल ठहरा
1- नबी होने का दावा
उसने नबी होने का दावा किया हत्ता के वह इससे भी ऊपर चला गया और फिर वह ये दावा करने लगा के वहीं अल्लाह है, और वह ये कहा करता के मैं अल्लाह हूं, और उसने अपनी बहू को हुकम दिया के वह उसे सजदा करे, तो बहू ने जवाब दिया के क्या गैर अल्लाह को भी सजदा किया जाता है ??
इस पर मंसूर हल्लाज कहने लगा:
" एक अल्लाह आसमान में एक ज़मीन पर "
2- हुलूल और वहदत उल वजूद का अकीदा
मंसूर हल्लाज वहदत उल वजूद का अकीदा रखता था यानी अल्लाह ताला उसमे हुलूल कर गया है तो वह और अल्लाह ताला एक ही चीज बन गए है, अल्लाह ताला इस जैसी खुराफात से पाक और बुलंद वा बाला है,
और यही वह अकीदा और बात है जिसने हल्लाज को मुस्ताशार्कीन इसाइयों के यहां मकबूलियत से नवाजा, इसलिए की उसने उनके अकिदे हुलूल में मावाफिकत की, वह भी तो यही बात कहते हैं के अल्लाह ताला ईसा अलैहि्सलाम में हुलूल कर गया है,
और हल्लाज ने भी इसीलिए लाहूत और नासूत वाली बात कही है जिस तरह के इसाई कहते हैं हल्लाज अपने अशआर में कहता है,
" पाक है वह जिसने अपने नासूत को रोशन लाहूत के राज़ से ज़ाहिर किया फिर अपनी मखलूक में खाने और पीने वाला बनकर ज़ाहिर हुआ"
जब इब्न हफीफ रहमतुल्लाह ने ये अशआर सुने तो कहने लगे इन अशआर के कायल पर अल्लाह ताला की लानत बरसे, तो उनसे कहा गया के ये अशआर तो हल्लाज के है, तो उनका जवाब था के अगर उसका ये अकीदा था तो वह काफ़िर है,
3- क़ुरआन जैसी कलाम बनाने का दावा
हल्लाज ने एक कारी को क़ुरआन पढ़ते हुए सुना तो कहने लगा इस तरह की कलाम तो में भी सुना सकता हूं,
4- कुफ्रिया अशआर
उसके कुछ अशआर के तर्जुमा यें है,
"अल्लाह ताला के मुतालिक़ लोगों के बहुत सारे अकीदे है, में भी सब अकीदे रखता हूं जो पूरी दुनिया में लोगों ने अपना रखे हैं,"
ये उसका ऐसा कलाम है जिसमें उसने दुनिया में पाए जाने वाले गुमराह मजहब में पाए जाने वाले हर किस्म के कुफ्र का इकरार वा ऐतराफ किया है के उसका भी वही कुफ्रिया अकीदा है, लेकिन इसके बावजूद ये एक कलाम है जिसमें तनाकिज पाया जाता है जिसे सरीहन अक्ल भी तस्लीम नहीं करती, तो ये कैसे हो सकता है के एक ही वक़्त में तौहीद और शिर्के का अकीदा रखा जाए यानी वो तौहीद वाला भी हो और मुशरिक भी ??
5- अरकान और मुबादियात इस्लाम के मुखालिफ कलाम:
हल्लाज ने ऐसी कलाम की जो की अरकान और मुबादियात इस्लाम को बातिल करके रख देती है यानी नमाज़, रोज़ा, हज, और जकात को खत्म करके रख देती है,
6- मरने के बाद अंबिया की रूहों का मसला:
उसका कहना था के अंबिया के मरने के बाद उनकी रूहें उनके सहाबा और शार्गिदों के जिस्म ने लौटा दी जाती है, वह किसी को कहता था के तुम नूह अलैहिस्सलाम और दूसरे को मूसा अलैहिस्सलाम करार देता था और किसी और शख्स को मुहम्मद सल्लाल्लहो अलैहि वसल्लम,
7- जब उसे क़त्ल के लिए ले जाया जा रहा था तो अपने दोस्त वा अहबाब को कहने लगा तुम इससे खौफ महसूस ना करो, बिलाशुबह मैं 30 रोज़ बाद तुम्हारे पास वापस आ जाऊंगा, उसे कतल कर दिया गया तो वह कभी वापस ना आ सका,
तो उन और उस जैसे दूसरे कौल की बिना पर उस वक़्त के उलेमा ने इजमा से उसके कुफ्र और ज़िंदीक होने का फतवा सादिर किया, और उस फतवे की वजह से उसे 309 हिजरी में बगदाद के अंदर क़त्ल कर दिया गया,
और इस तरह अक्सर सूूफी भी उसकी मुजममत करते और ये कहते हैं के वह सूफियों में से नहीं, मुजम्मत करने वालों में जुनैद , और अबुल कासिम शामिल हैं, और अबुल कासिम ने उन्हें जिस रिसाला जिसमें सूफिया के अक्सर मसईख का ज़िक्र किया है हल्लाज का ज़िक्र नहीं किया है,
उसके क़त्ल की कोशिश करने वालों में काज़ी अबू उमर मुहम्मद बिन युसुफ मालिकी शामिल हैं उन्हीं की कोशिशों से मजलिस तलब की गई और उसमे उस क़त्ल का मुस्तहिक क़रार दिया गया,
इमाम इब्न कसीर रहमतुल्लाह ने अल बिदाया वन निहाया में अबू उमर मालिकी को खिराज ए तहसीन पेश करते हुए कहा है के
" उनके फैसले बहुत ही ज़्यादा दुरुस्त होते और उन्होने ही हुसैन बिन मंसूर हल्लाज को क़त्ल किया"
(अल बिदाया वन निहाया 11/172)
शेख उल इस्लाम इमाम इब्न ताइमिया रहमतुल्लाह का कहना है:
" जिसने भी हल्लाज के उन मकालात जैसा अकीदा रखा जिनपर वह क़त्ल हुआ तो वह शख्स बिला इत्तेफाक़ काफ़िर और मुरतद है, इसलिए के हल्लाज को मुसलमानों ने हुलूल और इत्तेहाद वगेरह का अकीदा रखने कि बिना कर क़त्ल किया था "
जिस तरह ज़िंदीक और इत्तेहादी लोग कहते हैं, मसलन हल्लाज ये कहता है:
" मैं अल्लाह हूं"
और उसका ये भी कौल है
" एक अल्लाह आसमान में है और एक ज़मीन में है"
और हल्लाज कुछ खराक ए आदत चीज़ों और जादू की कई एक किस्म का मालिक था और उसकी तरफ मंसूब कई एक जादू की किताब भी पाई जाती हैं, तो इजमाली तौर तो उम्मत मुसलमां में इसके अंदर कोई इख़तेलाफ नहीं के जिसने भी ये कहा के अल्लाह ताला बशर में हुलूल कर जाता और उसमे मिल जाता है और ये के इंसान अल्लाह हो सकता है, और ये माबुदों में से है तो वह काफ़िर है और उसका क़त्ल करना मुबाह है, और इसी बात पर हल्लाज को भी क़त्ल किया गया था
(मजमुआ अल फतवा 2/480)
और एक जगह पर शेख उल इस्लाम रहमतुल्लाह ने ये कहा है के :
" हम मुसलमान उलेमा में से किसी एक आलिम और ना ही मशाईख में से किसी एक मशाईख को भी नहीं जानते जिसने हल्लाज का ज़िक्र ए खैर किया हो, लेकिन कुछ लोग उसके मुतालिक् खामोशी इख्तियार करते है , इसलिए के उन्हें हल्लाज के मामले का इल्म ही नहीं "
(मजमुआ फतवा 2/483)
मालूमात में मजीद इस्टेफादा के लिए दर्ज ज़ेल किताब का मुताला करें
खतीब बगदादी रहमतुल्लाह की, तारीख ए बगदाद 8/112-141
इब्न जवज़ी रहमतुल्लाह की अल्मुंताजिम 13/201-206
इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह की सियार आलाम उन नुबुला 14/313-354
हाफ़िज़ इब्न कसीर रहमतुल्लाह की अल बिदाया वन निहाया 11/132-144
साभार: Umair Salafi Al Hindi

रसूल अल्लाह सल्ल्लाहू अलैहि वसल्लम - बतौर ए शौहर

 



रसूल अल्लाह सल्ल्लाहू अलैहि वसल्लम - बतौर ए शौहर

हजरत आयशा से रिवायत है के वह एक सफर में रसूल अल्लाह सल्ल्लाहू अलैहि वसल्लम के साथ थीं, अभी वह कम उम्र थीं, रसूल अल्लाह सल्ल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा से कहा : आगे चले जाओ
(वह आगे चले गए ) फिर आपने फ़रमाया:-" आओ , दौड़ का मुकाबला करें "
मैंने मुकाबला किया तो तेज़ रफ्तारी की वजह से मैं आपसे जीत गई, फिर इसके बाद एक मौका आया और एक रिवायत में है: आप खामोश रहे, हत्ता के जब मुझ पर गोस्त चड़ गया और मैं भारी बदन वाली हो गई और मैं वो वाकया भूल चुकी थी,,
एक सफर में मैं आपके साथ चली, आपने अपने सहाबा से कहा : आगे चले जाओ ( वह चले गए ), फिर फरमाया :-" आओ दौड़ का मुकाबला करें"
मैं पिछला वाकया भूल चुकी थी और मुझ पर गोश्त भी चढ़ चुका था (यानी बदन भारी हो चुका था) , मैंने कहा:- " ऐ अल्लाह के रसूल ! मैं किस तरह आपका मुकाबला कर सकती हूं, मेरा ये हाल हो चुका है ??
रसूल अल्लाह सल्ल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:- "तुम्हे मुकाबला तो करना पड़ेगा "
मैंने आपसे मुकाबला किया, आप मुझसे सबकत ले गए (और हसने लगे) फरमाया:- " ये उस जीत का बदला है"
(अस सिलसिला तुस सहीहा हदीस 1945)
साभार: Umair Salafi Al Hindi