Monday, July 13, 2020

TURKEY DRAMA DIRILIS ERTUGRUL KI QAYAMAT (PART 1)






तुर्की ड्रामा, डिरिलिस एर्तगुरुल की कयामत ( पहली किस्त)

सुनने में आ रहा है कि फुरसत के इन लम्हात में तुर्की ड्रामा ( Ertugrul Dirilis ) खूब देखा जा रहा है, नौजवान ए मिल्लत अपने कीमती वक़्त को इस ड्रामे में बर्बाद कर रहे हैं, इस्लामी तारिख और क़ुरआन वा हदीस की तशरीह के लिए कोई मुनासिब किताब पढ़ने की बजाए इसी ड्रामे के पीछे पढ़े हुए हैं, जिसके अंदर बहुत सारी सियासी, समाजी, ईखलाकी, तारीखी एकायेद और दीनी खामियां हैं, लिहाज़ा ज़रूरी समझा के इस ड्रामे पर कुछ लिखा जाए ताकि इससे नौजवान ए मिल्लत होशियार रहें, और अगर कहीं इस पोस्ट में कोई गलती देखें तो बिला झिझक आप रहनुमाई करें उसकी इसलाह की जाएगी, इसका वाहिद मकसद तारीख ए इस्लाम की गैरत है इसकी बुनियाद पर मैंने कलम उठाया है वरना मैं 6 साल से इस ड्रामे से वाकिफ हूं,

उस्मान नहीं Ertugrul क्यूं ??

सवाल ये है के तुर्क बादशाहत Ertugrul के बेटे उस्मान के नाम पर उस्मानी सल्तनत के नाम से मशहूर है, लेकिन बानी ( Founder) का नाम छोड़कर ऐसे सख्स का नाम क्यूं चुना गया जिसकी सख्शियत मझूल (छिपी हुई ) है , ना इसके दीन का सबूत है ना ही निसबत पता है, ना ही उस्मानी सल्तनत इसके ज़माने में वजूद में अाई थी ??

जवाब : चूंकि तुर्की अपने नाटो (NATO) इत्तेहाद यूरोप के खिलाफ इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकता था के जिस उस्मान ने यूरोपी सलीबीयों के छक्के छुड़ा दिए थे, कई इसाई इमारतों को खतम करके अनाजूल में रियासत काईम की थी, उसके नाम पर इतना मशहूर ड्रामा बना लिया जाए, ऐसा करके Erdugan यूरोपी यूनियन और नाटो से दुश्मनी मोल नहीं ले सकते थे,। इसलिए इस आलमी नफरत और कौमियत पर मबनी ड्रामे के लिए एक माझूल सख्स का नाम चूना गया जिसे तारीख में Ertugrul के नाम से जाना जाता है,

यही वजह है कि उस्मानी सल्तनत के मशहूर सलातीन के नाम पर ड्रामा ना बना कर पेश कर एक माझूल सख्स को लिया गया ताकि एक तरफ खयाली और तस्सुवूराती वा खुराफाती किरदारों से मुसलमान नौजवानों का ब्रेन वाश किया जाए, और दूसरी तरफ उसके इत्तेहाद परस्त नाटो यूरोपियन मुमालिक भी नाराज़ ना हों इन शख्सियत के नाम को लाने से जिन्होने यूरोप को रौंदा है, जैसे उस्मान अव्वल, बा यजीद अव्वल, मुहम्मद फातेह, सलीम अव्वल और सुलेमान कानूनी वगेरह

ड्रामे का सियासी मकसद ::

बार बार दरख्वास्त करने और यूरोप के हक में बहुत सारे फैसले लेने नेज़ नाटो की ख्वाहिश पर चलने के बावजूद भी यूरोपियन यूनियन में जगह नहीं मिली तो ड्रामे बाजी के जरिए तुरकों को मशहूर करना शुरू किया

2014 से लेकर 2019 तक 5 सीरीज पेश किए जा चुके हैं, हर सीरीज कई कई पार्ट में होते हैं, हर पार्ट को दिखाने के लिए तकरीबन 2 मिलियन लीरा की लागत आती है जिसे हुकूमत की तरफ से अदा किया जाता है, हर पार्ट का फौरी तौर पर तर्जुमा साथ में अरबी के अंदर भी किया जाता है, हालाकि फिल्मों और द्रामों में ऐसा नहीं होता है, जिससे पता चलता है के इस ड्रामे से अरब नौजवानों को ब्रेन वाश करना मकसद है, यही वजह है कि इस ड्रामे पर बाज़ अरब मुमालिक के अंदर पाबंदी लगा दी गई है

इस ड्रामे के अंदर आज से 8 सौ साल पहले की ज़बान और दीन को इस्तेमाल नहीं किया गया है, बल्कि जिस तरह यर्दुगान और इख्वनियों की दुहरी ज़बान और दीन के नाम पर एवान ए इक्तेदार तक पहुंचना मकसद होता है, इसमें वहीं किया गया है,

2016 के अंदर जो ड्रामाई इंकलाब (Arab Spring) जान बूझ कर करवाया गया था उस वक़्त जब की पूरी दुनिया और बिलखसूस आलम ए अरब के ईखवानी और बर ए सगीर के तहरीकी नजर रखे हुए थे, उस वक़्त इस ड्रामे की आवाज़ और तराने सुनवाए जा रहे थे

ताज्जुब और हैरत की बात ये है कि जो सख्स खुद मुगलों के डर से मारा मारा फिर रहा था उस ड्रामे के अंदर मुजाहिद ए इस्लाम और गाज़ी बना कर दिखाया गया है बल्कि मसीहा बना कर पेश किया गया है, जबकि Ertugrul के दौर में काई (Kai) कबीले ने इस्लाम के नाम पर तन्हा कोई लड़ाई नहीं लड़ी है, और ना की किसी सलीबी जंग में हिस्सा लिया है, बल्कि उस वक़्त सिर्फ माल ए गनीमत के लिए ही कबीला सलाजकह के साथ किराए के तौर पर लड़ता था, गाज़ी उस्मान के दौर में इस्लामी लड़ाई शुरू होती है जिसने उस्मानी सल्तनत की बुनियाद रखी थी,

Ertugrul को अरबों का मसीहा बना कर दिखाया गया है जबकि जिस वक़्त के बारे में ये अफसानवी हवादिस गढ़ कर दिखाए गए हैं उसी वक़्त आलम ए इस्लाम में उसी सर ज़मीन बिलाद ए शाम पर दो अज़ीम लड़ाइयां काफिरों से लड़ी गईं, एक लड़ाई हत्तिन (Hattin) में सलीबीयों के खिलाफ, दूसरी लड़ाई एन अल जलूत (ain al jalut ) तातारियों के खिलाफ , लेकिन इस ड्रामे में इन जंगों की तरफ कोई इशारा नहीं है, क्यूंकि इन जंगो में Ertugrul और उसके कबीले का कोई इशारा नहीं है, क्यूंकि इन जंगो में Ertugrul और उसके कबीले का कोई किरदार नहीं था, बल्कि इसमें सिर्फ अरबों, कुर्दों और अफ्रिकिओं का अज़ीम किरदार था,

सवाल ये है कि जब इतनी बड़ी जंगो में Ertugrul और उसके कबीले का कोई किरदार नहीं था तो आखिर उस वक़्त Ertugrul किस्से लड़ रहा था, और अरबों को किस्से बचाने आया था ?? अरबों ने तो खुद तातारियों और सलीबीयों को अरब मुमालिक से मार भगाया था ??

इसी तरह इस ड्रामे में दिखाया गया है के तकबीर के जरिए कैसे Ertugrul सलीबीयों पर हमला करता है और फलस्तीन का दीफा करता है जबकि उस वक़्त ये शाम के शुमाली हिस्से में थे और फलस्तीन का दिफा नूरुद्दीन जंगी और सलाहुद्दीन आय्यूबी सल्तनत कर रही थी जो शाम के मगरिबी हिस्से मिस्र तक फैली थी, तारीख की किसी भी किताब में सलीबीयों से लड़ते हुए काई कबीले को नहीं दिखाया गया है, ये उसी तरह है जैसे इस वक़्त सय्यद Erdugan मीडिया के अंदर फलस्तीन का दीफ़ा कर रहें हैं,

मकसद सिर्फ नौजवान ए मिल्लत के दिलों में इन वहमी और खयाली ड्रामो के जरिए अपना झूठा सियासी मकाम हासिल करना है,

अब्बासी खिलाफत : इस ड्रामे में सबसे बड़ा जुर्म ये किया गया है के खिलाफत अब्बासिया और दीगर अरब वा कुर्द इमारत का इस ड्रामे के अंदर कोई किरदार नहीं दिखाया गया हलांकी यही उस वक़्त हकीकी मानो में फलस्तीन और बीलाद ए हरमैन का दिफ़ा कर रहे थे, बल्कि ड्रामे के अंदर उल्टा तुर्कों का किरदार दिखाया गया है जबकि 12वी और 13वी सदी ईसवी में तूर्कों का कोई किरदार नहीं था, बिल खुसूस नूरुद्दीन जंगी, अमादुद्दीन जंगी, और सलाहुद्दीन अय्युबी और उसकी औलाद जो कि कुर्द मुसलमान थे, इन बहादुरों का कोई जिक्र नहीं है, और जो काई कबीला उस वक़्त मझूल था पूरी अय्यारी और मक्कारी से पूरा क्रेडिट उसी को दे दिया गया है,

क्या इसे तुर्क कौमियात का नारा और जाहिली अस्बियता का नाम देंगे या हालिया तुर्क और कुर्द लड़ाई को हवा देने के लिए Erdugan ने ये फरेब कारी की है ??

इस ड्रामे के अंदर अरबों को खाइं (चोर) बना कर दिखाया गया है जबकि इन मंगोलियों का कोई जिक्र नहीं है जिनके ज़ुल्म वा सितम की वजह से Ertugrul और अपना आबई वतन छोड़ कर सर ज़मीन शाम की तरफ भागना पड़ा ?? आखिर मंगोलियो से इस तारीखी अगमाज और फरेब से उर्दुगानी ड्रामा नौजवान ए मिल्लत को क्या पैग़ाम देना चाहता है, ??

इस ड्रामे के अंदर शामी शहेर हलब ( allepo) को तुर्क शहेर बना कर दिखाया गया है, आखिर इससे क्या पैग़ाम जाता है, यही ना के Erdogan ने रूस और ईरान के साथ मिलकर हलब वा इदलिब की बरबादी में जो हिस्सा लिया वह सब सही है, इसी तरह शुमाली शाम के इलाकों में सिकांदरिया और अफरीन वगेरह पर तुर्की ने जो जालिमाना कुर्दों के इलाकों पर कब्ज़ा किया है वो सब सही है ??

इसके लिए दरीदा दहनी का सबूत देते हुए इस ड्रामे के बाज़ अदाकारों ने बाकायदा ड्रामे के अंदर ये बयान दिया है के अफरीन का कब्ज़ा सही है, बल्कि एक अदाकार ने तो यहां तक कह दिया के माजी में जो हुआ था शाम के साथ वहीं अमल दोबारा दोहराया जाएगा, यानी टर्को का कब्ज़ा वापस मुल्क शाम पर आएगा !!

एक ख़ास बात ये के इस ड्रामे के अंदर काम करने वालों और किरदार अदा करने वालों से सूटिंग मकामो और स्टूडियोज़ के अंदर Erdogan कभी अपनी बीवी के साथ कभी पूरी फैमिली के साथ उनसे मिलकर उन्हें मुबारकबाद देते नजर आते हैं, तो कभी ड्रामे की शुरुआत में तो कभी आखिरी में दिखाई देते हैं, कभी बाकायदा इसके लिए पूरी महफ़िल सजाते है, हालांकि ऐसा आम तौर पर फिल्मों और ड्रामा में ऐसा नहीं होता है,

इस ड्रामे को इख्वनी मीडिया खासकर कतारी अल जजीरा ने खूब प्रचार किया और एक बार बाकायदा Ertugrul का किरदार अदा करने वाले अदाकार को लेकर Erdugan कतर गए अमीर कतर से मिलने के लिए, जिनकी शाही महमान नवाजी खूब हुई, इससे समझ में आ रहा होगा के इतने महंगे ड्रामे को फ्री में कई ज़बान के अंदर तर्जुमा के साथ चलाने वाला कौन है, और इसे किन मक़ासिद के लिए चलाया जा रहा है

जारी...


साभार : मौलाना अजमल मंजूर मदनी
तर्जुमा: UmairSalafiAlHindi

Sunday, July 12, 2020

RAAFZIYAT, SUFIYAT AR IKHWANIYAT MUQABLA SALAFIYAT





राफजियत, सूफियत और इख्वानियत बा मुकाबला सलफियत

सलाफियों को करम फरमाओ की तरफ से अलकबात !

शेख उल इस्लाम इमाम इब्न तैमिय्या ने जब अपनी मरकतुल अला किताब ( मिन्हाज उस सुन्नह ) लिखी जिसमें राफजियात की धज्जियां उड़ाकर रख दिया तो राफजियो ने सलाफियों को नवासिब के लकब से नवाजा

जब शैख मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने मशहूर ज़माना किताब ( किताब उल तौहीद) लिखी जिसके अंदर सूफी बिदातों की धज्जियां उड़ा दी तो सूफी तुरको ने सलाफियों को वहाबियों के लकब से नवाजा,

और जब शेख रबी बिन हादी मदखली ने कमर तोड़ किताब "العواصم مما في كتب سيد قطب من القواصم" तालीफ की जिसने इख्वनियत की कब्र को खोद दी तो इख्वानियों ने सलफियों को मदखिल्यत के लकब से नवाजा

UmairSalafiAlHindi

Saturday, July 11, 2020

KYA KALMA PADH LENA HI SHIRK NA KARNE KI DALEEL HO SAKTI HAI





मुसलमानों ने ये समझ लिया है के बस कलमा पढ़ लिया है अब हम शिर्क कर ही नहीं सकते, हमारी सोच ये बन गई है के एक कलमा पढ़ने वाला इंसान कभी शिरक कर ही नहीं सकता है,

जबकि आज हम जहां नजर डालें हमें शिर्क नजर आएगा , लोग आज क्या क्या कर रहें हैं इतना तो मुश्रीकीन ए मक्का भी नहीं करते थे, बल्कि आज का मुशरिक मुश्रिकीन ए मक्का से बदतर मुशरिक है,

मुश्रिकीन ए मक्का भी अल्लाह को मानते थे अल्लाह ही को अपना रब तस्लीम करते थे, क़ुरआन में अल्लाह ताला ने इसका ज़िक्र किया है के जब मुश्किल आती थी तो वो खालिस अल्लाह को पुकारते थे,

पर उनका सबसे बड़ा गुनाह यही था के को मुश्किल दूर होने के बाद अपने बनाए हुए माबूदों की इबादत करते थे वा वसीला लगाते थे, और जो बुत उन लोगों ने बनाए थे वो नेक लोगों के थे,

मुश्रिकीन ए मक्का अपने बुजुर्गों को अल्लाह के यहां अपना सिफारिशी बनाते थे, आज हम देख लें जब हम किसी से कहते हैं के आप अल्लाह के साथ इन बुजुर्गों को क्यूं शरीक बना रहें हैं तो जवाब मिलेगा ,
" हम इनकी इबादत थोड़ी करते हैं हैं तो बस इन नेक लोगों का वसीला लगाते हैं "
बिल्कुल यही जुर्म तो मुश्रिकीन ए मक्का करते थे, आगे हम खुद सोच लें के ऐसा काम करने वाले को क्या कहा जाएगा ?

अल्लाह ताला ने मुश्रिकीन ए मक्का का अकीदा क़ुरआन में बयान किया है,

" आप कह दीजिए के वो कौन है जो तुमको आसमान और ज़मीन में से रिज्क पहुंचाता है, या वो कौन है जो कानों और आंखों पर पूरा अख़्तियार रखता है, और वो कौन है जो ज़िंदा को मुर्दा से निकलता है, और वह कौन है जो तमाम कामों कि तदबीर करता है ?? जरूर यही कहेंगे के अल्लाह, तो उनसे कहें के फिर क्यूं नहीं डरते ?? "

(क़ुरआन सूर युनूस 31)

यानी मुश्रिकीन ए मक्का ला इलाहा इल्लल्लाह का इकरार करते थे, लेकिन और लात , उज़्ज , मनात जैसे नेक बुर्जुगों का वसिला भी लगाते थे,
हम कह सकते हैं आज के मुशरिक , पहले के मुश्रिकीन ए मक्का से बदतर है, क्यूंकि मुश्रिकीन ए मक्का परेशानी में अल्लाह ही को पुकारते थे, लेकिन आज का मुशरिक खुश हाली और परेशानी में गैर अल्लाह को ही पुकारता है ..
जारी...

UmairSalafiAlHindi
IslamicLeaks

Friday, July 10, 2020

QABRPARST BADTAREEN LOG HAIN





बदतरीन लोगों के बारे में ?

हज़रत आयशा से रिवायत है के हज़रत उम्मे सलमा ने नबी ए करीम मुहम्मद (Sws) से एक गिरजे का ज़िक्र किया जो उन्होंने मुल्क ए हब्शा (इथोपिया) में देखा था और उसमें जो तस्वीर थी उसके बारे में बयान किया,

नबी करीम मुहम्मद (Sws) ने इरशाद फरमाया :- " उन लोगों में ये रिवाज था के जब कोई नेक आदमी मर जाता तो वो उसकी क़ब्र के करीब मस्जिद बना लिया करते और मस्जिद में उस मरने वाले की तस्वीर टांग दिया करते, वो लोग जो ऐसा करते थे अल्लाह के नजदीक बदतरीन लोग थे उन्होंने दो फित्ने अंजाम दिए, एक तस्वीर साजी का दूसरा क़ब्रपरस्ती का "

(सही बुखारी हदीस 427)

क्या उम्मत ए मुहम्मदी में ये फित्ने आ नहीं गए ??
क्या ऐसा हमारे यहां मजारो और खानकाहों में नहीं होता ??

Thursday, July 9, 2020

IKHWANION KA DOGLAPAN AUR SAUDI ARAB







लोगो का दोगलापन देखिए जिस ईरान ने 1980 तक और तुर्की ने 2014 तक अमेरिका से घनिष्ठ मित्रता निभाई अपने मुल्क मे शराब, वैश्यावृत्ति नंगेपन को आधिकारिक तौर पर बढ़ावा दिया इतना की लोग ईरान के तेहरान यूनिवर्सिटी के बाहर 1978 की ठंडी में अपनी टांगे दिखाती बैठी मिनी स्कर्ट मे लड़कियों को देख कर अमेरिकी बोलते थे कि हमारे हा भी लडकिया कॉलेज मे ऐसे छोटे कपड़े पहन कर नही आ सकती

वही तुर्की दुनिया मे अय्याशी की टॉप पांच मे से एक देश रहा इस नंगे पन बेशर्मी अय्याशी के बदले मे ईरान और तुर्की को अमेरिका, ब्रिटैन कनाडा ने वो आधुनिक हथियार दिए कई दूसरी टेक्नोलॉजी बनान सिखाई वो सब दिया जो अरब वालो को तेल के बदले भी नही दिए जब कि अरब उसकी दुगनी कीमत चुकाने को तौयार थे वजह थी इज़राइल उनको मालूम था इज़राइल को इनसे खतरा है ।

आज भी तुर्की के हथियारो में बोइंग, लॉकहीड मार्टिन, रैयथोन ,नार्थथोर्प गनमैन, जनरल डायनामिक ये सारी अमेरिकी हथियार कंपनी तुर्की को हथियार बनाने चिप, इंजन, कंट्रोल सिस्टम बेचती है ।

लेकिन अरबो ने इस बेहयाई का सौदा नही किया वो जो भी अमेरिका से करवाते, जितना काम लेते अपनी शर्तों पर लेते साफ बोल कर लेते की हम दो चीज़ों से समझौता नही करते इस्लाम और हमारी हुक्मरानी लेकिन आज तुर्की मीडिया, अल जज़ीरा ,ईरान की प्रेस टीवी जो अपने आप को इस्लामिक बताते है और दूसरों को गैर इस्लामिक वो सऊदी अरब के खिलाफ अमेरिकी मीडिया के साथ मिल कर रिपोर्ट पब्लिश करते है अमेरिका ब्रिटैन कनाडा मे देखो यहा कोड़े मारे जाते है, यहा सरे आम सर कलम किया जाता है कैसे जाहिल किस्म के लोग है सऊदी और अरब वाले ताकि सऊदी वाले जो अपनी संस्कृति से बिना या कम से कम समझौता किये अमेरिका, ब्रिटैन से सारी आधुनिक टेक्नोलॉजी बनाना सीख कर 2030 आत्मनिर्भर और ताकतवर बनना चाहते है पश्चिम देश की जनता के दबाव मे न बने साथ ही ये मुसलमानो को अरब के खिलाफ भड़कते और तुर्की ईरान भक्त बनाना चाहते है ठीक उसी तरह मीडिया को खरीद के इस्तेमाल कर के जैसे भारत मे हो रहा है

और दोगले मुसलमान हमारे बीच के भक्त से एक कदम आगे की जहालत दिखाते है !

Hussain Akhtar

Wednesday, July 8, 2020

SAUDI ARAB AUR IKHWANI PROPAGANDA






सऊदी अरब ताकत दिखाकर पेट्रोल का दाम घटा दिया तो कहने लगे, रूस की चापलूसी में किया है,

रूस ने ओपेक प्लस की मीटिंग तलब की और कीमत पर बात चीत करने के लिए अपील की और सऊदी ने इनकार कर दिया, तो कहने लगे : बिन सलमान ज़िद्दी है ये अपने साथ सब को ले डूबेगा
अमेरिका ने कीमत घटने पर सऊदी अरब को चेतावनी दी तो कहने लगे : अब सऊदी कि खैर नहीं
आज अमेरिका खुद सऊदी से मीटिंग की अपील कर रहा है तो कहते नजर आ रहें हैं : अमेरिका की बात तो मानना ही है,

2016 में जब ट्रप सदर बना था तो का रहें थे : अब सऊदी कि खैर नहीं,
लेकिन जब उसने पहला दौरा सऊदी का किया तो कहने लगे : ट्रंप तो सऊदी को चूसने आया है,

सऊदी ने भारत की ऑयल कंपनी से 100 बिलियन डॉलर का मुआहेदा किया तो कहने लगे : सऊदी को कश्मीरियों की कोई फिक्र नहीं,
जब ये मुअहेदा खतम कर दिया तो कहने लगे : ये रियाकारी है,

जब सऊदी अरब ने पिछले साल सियाहती वीज़ा जारी करके 300 रियाल फीस लगाई तो कहने लगे : आल ए सऊद ने बिलाद ए हरमैन को कमाई का जरिया बना लिया है,
जब उमरे वीज़ा पर पाबंदी लगा दी तो कहने लगे : आल ए सऊद ने खाना काबा का तवाफ करने से मुसलमानों को महरूम कर दिया,

जब सऊदी अरब ने कोराना वबाई बीमारी की रोकथाम के लिए पूरे मुल्क में लॉक डाउन कर दिया तो कहने लगे : बिलाद ए मुकद्दस में आल ए सऊद ने सिनेमा खोला तो अल्लाह ने हरमैन को बंद कर दिया
लेकिन जब इसी वबाई बीमारी की वजह से पूरी दुनिया में लॉक डाउन लगा दिया गया तो कहने लगे : ये अल्लाह का अजाब है,

कुछ हफ्तों पहले जब सऊदी अरब ने G20 मुमालिक और दीगर आलमी तंजीम को कोराना वाबई बीमारी से निपटने के लिए एक वर्चुअल मीटिंग में हिस्सा लेने की दावत दी, जो के अपने अंदाज में दुनिया के अंदर पहली मीटिंग थी तो कहने लगे : ये भी छोटा मुंह और बड़ी बात कर रहा है,
लेकिन जब बाशमूल तहरीकी खलीफा साहब ने सऊदी अरब कि दावत पर लब्बैक कह कर इस नादर मीटिंग में हिस्सा लिया तो कहने लगे : इसका कोई फायदा नहीं है,

हुथियों ने रियाद पर मिसाइल फेंका तो कहने लगे : सऊदी कमजोर है,
जब सऊदी ने हुथिओं के ठिकानों पर हमला करके इनके असलहा ज़ख़ीरा को तबाह कर दिया तो बिलबिला कर कहने लगे : सऊदी येमेनी बच्चों को मारता है,

नोट : सऊदी अरब इसी लिए अपने दुश्मनों कि बातों कि परवाह किए बगैर शान से आगे की तरफ बढ़ रहा है, और दुश्मन ए ममलका दुनिया के सामने उसकी तरक्की को देख कर जल भुन रहें हैं
तर्जुमा : UmairSalafiAlHindi
IslamicLeaks

Tuesday, July 7, 2020

SAJDA E TAAZEEMI AUR TAUHEED





मेरे एक भाई ने जब मेरी कुछ पोस्ट देखी क़ब्र परस्ती को लेकर तो कहने लगे जनाब हम क़ब्र पर सजदा नहीं करते सिर्फ ताजीमी सजदा करते हैं यानी सर झुकाते है, मतलब वैसा सजदा नहीं होता जैसा नमाज़ में होता है,

तो इस सिलसिले में में बस इतना कहना चाहूंगा कि क्या कभी उन्होंने इसाई को ईसा वा उनकी मां मरयम की मूर्ति के आगे कभी सजदा करते देखा है ??

क्या कभी यहूदियों को माबद ए सुलेमानी में (हैकल) में सजदा करते देखा है ?? नहीं ना
या किसी हिन्दू को राम की मूर्ति के आगे सजदा करते देखा है ?? नहीं ना

बल्कि वो ताजीम में सर झुकाते हैं, जब वो ताज़ीमी सजदा करके मुशरिक हुए फिर आप वही ताजिमी सजदा क़ब्र पर करके मुस्लिम कैसे हो सकते हैं ??
UmairSalafiAlHindi
IslamicLeaks