Friday, November 27, 2020

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

 



मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

एक ऐसी सख्सीयत जिसने 27 सालों तक कुरआन को शब वा रोज़ अपनी फिक्र वा नजर के मौजू बनाया हो, उसकी एक एक सुरह , एक एक मकाम, एक एक आयत, एक एक लफ्ज़ पर वादियां तय की हों, ऐसा कैसे हो सकता है के वह सियासत के मामले में अपनी तिशनगी बुझाने के लिए कुरआन का साफ शफ्फाफ बहता ठंडा चश्मा नज़र अंदाज़ कर गलीज सियासत के गदले वा बदबूदार पानी से हलक तर करे ??
सही बात तो ये है कि आज़ाद ने दीगर शोबा हयात की तरह सियासत का तरीका भी कुरआन ही से तजवीज़ किया था, वह कहते हैं
" तमाम चीज़ों की तरह पॉलिटिक्स में भी यही दावत है के ना तो हुकूमत पर भरोसा कीजिए और ना हिन्दुओं के हल्का दरस में शरीक होइए , सिर्फ उसी पर चलिए जो इस्लाम की बतलाई हुई सिरात ए मुस्तकीम है "
दूसरी जगह कहते हैं
" हम इस्लाम को इससे बहुत बुलंद समझते हैं के इसकी पैरवी अपनी ज़िन्दगी के किसी शोबे में किसी दूसरी कौम की तकलीद पर मजबूर हो, वह दुनिया को अपने पीछे चलाने वाले हैं ना की खुद दूसरों के मुक़तदी बनने वाले , मुसलमान ए हिन्द को हिन्दुओं से नहीं बल्कि कुरआन से सीख कर अपना नस्बुल ऐन बनाना चाहिए, और जमूद की जगह हरकत, आहिस्तगी की जगह तेज़ी, बुजदिली की जगह हिम्मत, और हुकूमत पर एतमाद की बजाए अल्लाह और उसके बख्शे हुए दीन पर भरोसा रखना चाहिए, "
दरअसल मौलाना का अकीदा था इस्लाम एक मुकम्मल निज़ाम ए हयात है, हर मुश्किल का हल इसमें मौजूद है,
आज़ाद ने लिखा:
" इस्लाम अपनी तौहीद की तालीम में निहायत गैय्यूर है और कभी पसन्द नहीं करता के उसकी चौखट पर झुकने वाले किसी दूसरे दरवाजे के सायेल बने , मुसलमानों की अखलाकी ज़िन्दगी हो या इल्मी, सियासी, समाजी, दीनी, दुनियावी , हाकीमाना हो या महकूमाना , वह हर ज़िन्दगी के लिए एक मुकम्मल तरीन कानून अपने अन्दर रखता है, जिसने अल्लाह के हाथ पर हाथ रख दिया वह फिर किसी इंसानी दस्तगिरी का मोहताज नहीं रहा "
मौलाना ने मुसलमानों को दीनी तालीमात संग अपनी सियासत का ताजमहल तामीर करने का मशवरा दिया तो बहुत से लोगों ने उन्हें मज़हब को सियासत से दूर रखने का मशवरा दिया, इस बाबत मौलाना ने जवाब देते हुए कहा
" आप फरमाते हैं पॉलिटिकल मुबाहिस को मज़हबी रंग से अलग कर दीजिए, लेकिन अगर अलग कर दें तो हमारे पास बाक़ी क्या रह जाता है, हमारे अकीदे में हर वह ख्याल जो कुरआन के सिवा और किसी तालीमगाह से हासिल किया गया हो वह एक कुफ्र जैसा है, मुसलमानों के लिए इससे बढ़ कर शर्म एंगेज सवाल नहीं हो सकता के वह दूसरों के पॉलिटिकल तालीमों के आगे सर झुका कर रास्ता पैदा करे, उनको किसी जमात में शरीक होने की जरूरत नहीं, खुद दुनिया को जमात में शामिल करने वाले और अपनी राह पर चलाने वाले हैं, वह अल्लाह की जमात हैं, और अल्लाह की गैरत कभी गवारा नहीं कर सकती के उसके चौखट पर झुकने वालों के सर गैरों के आगे भी झुके, "
दरअसल मौलाना मुसलमानों को सियासी ऐतबार से उस मकाम पर पहुंचाना चाहते थे जहां से वह फैसला सादिर कर सकते ना के मौजूदा अक्सरियत के फैसले के सामने सर झुकाने वा ज़ुबान खम करने वाले बनते, मौलाना का यही ख्वाब था जिससे फिरकापरस्त लीडर तिलमिला उठते थे और निजात पाने के लिए कोशा रहते थे,
अफसोस उजलत पसन्द पारसी, राफज़ी शिया जिन्नाह (जिन्नह की गन्दी सियासत पर एडवोकेट नूर मुहम्मद की " तू साहब ए मंजिल है के भटका हुआ राही" का मुताला काफी दिलचस्प है) मुल्क की तकसीम पर ब्रिटेन, नेहरू, गांधी और पटेल वगेरह का आसान मुहरा बन गया,
जिन्नह को खुद अपनी मजहबी हालत की कोई फिक्र ना थी मगर उसने इस्लामी मुल्क के कयाम नारह मस्ताना बुलंद कर दिया के
" पाकिस्तान के नाम पर माचिस की एक डिब्बी भी मिल जाए तो उसे वह भी क़ुबूल है "
आज़ाद के ना चाहने और तकसीम रोकने की तमाम तर कोशिशों के बावजूद मुल्क की तकसीम का वाकया पेश आया और उसकी कीमत अदा करने में 15 लाख मुसलमानों की जाने गई, 90 हज़ार औरतों और बच्चियों की इज़्ज़त तार तार हुई, अरबों की जायदाद बर्बाद हुई लेकिन इन सब के बावजूद मजहब के नाम पर एक चूं चूं के मुरब्बा नाकाम, फ्लॉप, मफलूज रियासत वजूद में अाई , जो सिर्फ 20 सालों में टूट फूट भी गई,
लेकिन मुसलमानों का इज्तेमाई सियासी शिराजाह मुंतशर हो जाने का सबसे बड़ा नुकसान भारत के मुसलमानों को झेलना पड़ा, राफज़ी जिनाह और उसके हमनवांओ की बदतरीन सियासी हिमाकत के बाद भारत में मसलकी गद्दी नशीन गुम्बादी मुल्लों की तंजीम जमीअत ए उलेमा की कांग्रेसी नवाजी का खामियाजा भारत के मुसलमान आज भी भुगत रहे हैं, तकसीम के बाद जमीअत ए उलेमा ने उम्मत को कांग्रेस की गुलामी पर लगा कर रही वही कसर पूरी कर दी,
ये दुरुस्त है और तकसीम के बाद वाकयात ने साबित भी किया है के मुल्क की तकसीम किसी मसले का हल नहीं था, बल्कि ये खुद एक बड़ा संगीन इंसानी, समाजी वा सियासी मसला था, लेकिन जिन्नाह और उसके हमनवाओ ने पूरे बर्रे सगीर को मज़हब की पसमांदा आग में झोंक दिया
तकसीम के बाद भी मौलाना आज़ाद ने भारत में रह जाने वाले मुसलमानों कि फलाह के लिए काफी बहतरीन कोशिशें की लेकिन मुल्क की तकसीम की वजह से मौलाना की सारी कोशिशों का दायरा बहुत महदूद हो चुका था,
साभार : Umair Salafi Al Hindi

Thursday, November 26, 2020

मज़लूम मदीना - हज़रत उस्मान राजिल्लाहु ताला अन्हुमा


 


मज़लूम मदीना - हज़रत उस्मान राजिल्लाहु ताला अन्हुमा
मैं तारीख से लड़ना नहीं चाहता अगर तारीख कहे हज़रत हुसैन का पानी 10 दिन बंद रहा तब भी ठीक, अगर तारीख कहे हज़रत हुसैन का पानी 7 दिन बंद रहा तब भी ठीक ,लेकिन तारीख को छेड़ने की बजाए तारीख का मुताला करता हूं तो मुझे नज़र आता है इस्लाम की तारीख में सिर्फ हज़रत हुसैन की ही शहादत मजलूमाना या दर्दनाक नहीं, बल्कि अगर हम 10 मुहर्रम की तरफ जाते हुए रास्ते में 18 जुल हिज्जह की तारीख पढ़ें तो एक ऐसी शहादत दिखाई देती है जिसमे शहीद होने वाले का नाम हज़रत उस्मान है
जी हां ! वही उस्मान जिसे हम जुल नुरैन (दो नूर वाला) कहते है।
वही उस्मान जिसे हम दामाद ए मुस्तफा कहते हैं।
वही उस्मान जिसे हम नाशिर ए कुरआन कहते हैं।
वही उस्मान जिसे हम खलीफा सोम कहते है।
वही उस्मान जो हज़रत अली की शादी का पूरा खर्चा उठाते हैं।
वही उस्मान जिसकी हिफाज़त के लिए हज़रत अली अपने बेटे हुसैन को भेजते हैं,।
वही उस्मान जिसे जनाब मुहम्मद रसूल अल्लाह का दोहरा दामाद कहते हैं,।
खैर ये बातें तो आपको तकरीरों में खतीब हजरात बताते रहते हैं क्योंकि हज़रत उस्मान की शान तो बयान की जाती है,
हज़रत उस्मान की सीरत तो बयान की जाती है।
हज़रत उस्मान की शर्म वा हया के तज़किरे तो बयान किए जाते हैं। उनके इस्लाम से पहले और इस्लाम के बाद के वाकयात सुनाए जाते हैं लेकिन बदकिस्मती ये के उनकी मजलूमियत को बयान नहीं किया जाता, उनकी दर्दनाक शहादत के किस्से को अवाम के सामने नहीं लाया जाता।
तारीख की चीखें निकल जायेगी अगर हज़रत उस्मान की मजलूमियत का ज़िक्र किया जाए। मैं कोई आलिम या खतीब नहीं लेकिन मैं इतना जानता हूं के उस्मान वह मजलूम था।
जिसका 40 दिन पानी बंद रखा गया, आज वह उस्मान पानी को तरस रहा है जो कभी उम्मत के लिए पानी के कुएं खरीदा करता था,
हज़रत उस्मान जब कैद में थे तो प्यास की शिद्दत से जब निढाल हुए तो आवाज़ लगाई है कोई जो मुझे पानी पिलाएं ??
हज़रत अली को जब पता चला तो मशकीजा लेकर अली उस्मान का साकी बनकर पानी पिलाने आ रहें हैं,
हाय ...! आज करबला में अली असगर पर बरसने वाले तीरों का ज़िक्र होता है लेकिन हज़रत अली के मशकीजे पर बरसने वाले तीरों का जिक्र नहीं होता, बागियों ने हज़रत अली के मशकीज़े पर तीर बरसाने शुरू किए तो अली ने अपना अमामा हवा में उछाला ताकि उस्मान की नज़र पड़े और कल कयामत के रोज़ उस्मान अल्लाह को शिकायत ना लगा सकें के अल्लाह मेरे होंट जब प्यासे थे तो तेरी मखलूक से मुझे कोई पानी पिलाने ना आया,
करबला में हज़रत हुसैन का साकी अगर अब्बास था
तो मदीना में हज़रत उस्मान का साकी अली था।
उस उस्मान को 40 दिन हो गए एक घर में बन्द किए हुए जो उस्मान मस्जिद नब्वी के लिए जगह खरीदा करता था,
आज वह उस्मान किसी से मुलाकात नहीं कर सकता जिसकी महफिल में बैठने के लिए साहबा जूक दर जूक आया करते थे,
40 दिन गुजर गए और उस्मान को खाना नहीं मिला जो अनाज से भरे ऊंट नबी की खिदमत में पेश कर दिया करता था,
आज उस उस्मान की दाढ़ी खींची जा रही है जिस उस्मान से आसमान के फरिश्ते भी हया करते थे,
आज उस उस्मान पर ज़ुल्म किया जा रहा है जो कभी गज़वा उहूद में हुज़ूर नबी करीम का मुहाफिज था,
आज उस उस्मान का हाथ काट दिया गया जिस हाथ से नबी करीम मुहम्मद (sws) की बैय्यत की थी,
हाय उस्मान ...! मैं नुक्ता दां नहीं मैं आलिम नहीं जो तेरी शहादत को बयान करूं और दिल फट जाएं आंखें नम हो जाएं,
आज उस उस्मान के जिस्म पर बरछी मार कर लहूलुहान कर दिया गया जिस उस्मान ने बीमारी की हालत में भी बेगैर कपड़ों के कभी गुस्ल ना किया था,
आज नबी ए करीम मुहम्मद (sws) की दो बेटियों के शौहर को ठोकरें मारी जा रही हैं,
18 जुल हिज्जाह 35 हिजरी है जुमा का दिन है हज़रत उस्मान रोज़ा की हालत में हैं बागी दीवार फलांग कर आते हैं और हज़रत उस्मान की दाढ़ी खींचते हैं, बुरा भला कहते हैं एक बागी पीठ पर बरछी मारता है एक बागी लोहे का आहिनि हथयार सर पर मारता है एक तलवार निकालता है हज़रत उस्मान का हाथ काट देता है, वही हाथ जिस हाथ से आपकी बैय्यत की थी, कुरआन सामने पड़ा था खून कुरआन पर गिरता है तो कुरआन भी उस्मान की शहादत का गवाह बन गया, उस्मान जमीन पर गिर पड़े तो उस्मान को ठोकरें मारने लगे जिससे आपकी पसलियां तक टूट गईं, हज़रत उस्मान बागियों के जुल्म से शहीद हो गए,
इस्लाम वह शजर नहीं जिसने पानी से गिजा पायी,
दिया खून सहाबा ने फिर उसमे बहार आई।
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Wednesday, November 25, 2020

मुहर्रम उल हराम का महीना और शहादत ए हजरत हुसैन राजियल्लाहु ताला अन्हु से क्या ताल्लुक इस महीने का ??

 



मुहर्रम उल हराम का महीना और शहादत ए हजरत हुसैन राजियल्लाहु ताला अन्हु से क्या ताल्लुक इस महीने का ??

मुहर्रम उल हराम - इस्लामी हिजरी की शुरुआत
माह ए मुहर्रम इस्लामी हिजरी का पहला महीना है जिसकी बुनियाद नबी ए अकरम मुहम्मद (sws) की हिजरत के वाक्ए पर है,
लेकिन इस इस्लाम सन हिजरी की शुरुआत 17 हिजरी में हज़रत उमर फारूख के दौर में हुआ,
बयान किया जाता है कि हजरत अबू मूसा अशरी यमन के गवर्नर थे उनके पास हजरत उमर के फरमान आते थे जिन पर तारीख नहीं होती थी, 17 हिजरी में हज़रत अबू मूसा के ध्यान दिलाने पर हजरत उमर ने सहाबा को अपने यहां जमा किया और उनके सामने यह मसला रखा, आपसी मशवरे के बाद यह तय पाया गया कि अपने सन तारीख की बुनियाद हिजरत के वाक्ए को बनाया जाए और इसकी शुरुआत मोहर्रम के महीने में किया जाए क्योंकि 11 नुबुव्वत के जुल हिज्जा के बिल्कुल आखिर में मदीना मुनव्वरा की तरफ हिजरत हुई और उसके बाद जो चांद हुआ वह मोहर्रम का था
(फथ उल बारी )
मुसलमानों का यह इस्लामी सन भी अपने मायने की ऐतबार से बड़ी अहमियत रखता है,
दुनिया के मजहबों में इस वक्त जितने साल मशहूर हैं वह आम तौर पर या तो किसी मशहूर इंसान की पैदाइश की याद दिलाते हैं या किसी कौमी खुशी की याद से जु़ड़े हैं जिससे नस्ल ए इंसानी को कोई फायदा नहीं,
जैसे मसीही साल की बुनियाद हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश है, यहूदी साल फलस्तीन पर हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम की तख्त नशीन के वाक्ए से जुड़ा है, विक्रमी साल राजा विक्रमादित्य की पैदाइश की यादगार है, रूमी साल सिकंदर की पैदाइश से ताल्लुक रखता है,
लेकिन इस्लामी साल हिजरी नुबुव्वत दौर कि ऐसे वाकए से जुड़ा है जिसमे यह इल्म छुपा हैं कि अगर मुसलमान सच के ऐलान के नतीजे में हर तरफ से परेशानी में घिर जाएं, बस्ती के तमाम लोग उसके दुश्मन हो जाएं, करीबी रिश्तेदार और दोस्त भी उसको खतम करने का इरादा कर लें, उसके दोस्त भी इसी तरह तकलीफ का शिकार कर दिए जाएं, शहर के तमाम बड़े लोग उसे कतल करने की योजना बना लें, उसकी जिंदगी तंग कर दी जाए तो उस वक्त मुसलमान क्या करें ??
उसका हल इस्लाम ने यह नहीं बताया कि कुफ्र वा झूट के साथ समझौता कर लिया जाए, दीन के प्रचार में समझौता कर लिया जाए और अपने अकायेद वा नज़रिया में लचक पैदा करके उनमें घुल मिल जाएं ताकि दुश्मनों का जोर टूट जाए,
बल्कि इस्लाम ने इसका हल ये निकाला है कि ऐसी बस्ती और शहर पर बात पूरी करके वहां से हिजरत की जाए,
उसी हिजरत ए नब्वी के वाक्ए पर हिजरी साल की बुनियाद रखी गई है जो ना शान ओ शौकत की किसी वाक्ए की, बल्कि यह हिजरत के महान वाक्ए मजलूमी और बेकसी की एक ऐसी यादगार है कि जो हिम्मत ना हारना और अल्लाह के राज़ी होने की एक बड़ी भारी मिसाल अपने अंदर रखती है,
यह हिजरत का वाकया बतलाती है कि एक मजलूम वा बेकस इंसान किस तरह अपने मिशन में कामयाबी हासिल कर सकता है और मुसीबत से निकल कर किस तरह कामयाबी वा शादमानी का शानदार ताज अपने सर पर रखता है और गुमनामी से निकल कर ऊंचा दर्जा वा मशहूरियत और इज़्जत वा महानता के ऊंचे रुतबे पर पहुंच सकता है,
इसके इलावा यह महीना हुरमत वाला है और इस महीने में नवाफिल रोज़े अल्लाह को बहुत पसन्द हैं जैसा कि हदीस ए नबावी में मौजूद है,
यह भी ध्यान रहे कि इस महीने की हुरमत का सय्यदना हज़रत हुसैन राजियल्लाह की शहादत से कोई ताल्लुक नहीं है,
अक्सर लोग समझते हैं कि यह महीना इसलिए हुरमत वाला है कि इसमें हज़रत हुसैन राजियल्लाह की शहादत हुई थी यह सोचना भी बिल्कुल गलत है,
यह शहादत का वाकया तो नबी ए अकरम मुहम्मद (sws) की वफात से 50 साल बाद पेश आया और मुकम्मल दीन तो नबी ए अकरम मुहम्मद (sws) की ज़िन्दगी में ही पूरा हो गया, जैसा कि सुरा मायदा आयत 3 में मौजूद है,
इसलिए मुहर्रम उल हराम की हुरमत को शहादत ए हुसैन से जोड़ना इस कुरआनी आयत के खिलाफ है फिर खुद इसी महीने में इससे बड़कर एक और शहादत का वाकया पेश आया था यानी हज़रत उमर बिन खत्ताब की शहादत का वाकया,
अगर बाद में होने वाले वाली इन शहादतों की शरई कोई हैसियत होती तो हज़रत उमर की शहादत इस ऐतबार से थी के अहले इस्लाम इसका भरोसा करते,
हज़रत उस्मान की शहादत ऐसी थी कि उसकी यादगार मनायी जाती और इन शहादतों की बिना पर अगर इस्लाम में मातम वा सोग की इजाज़त होती तो बेशक ही तारीख ए इस्लाम की ये दोनो शहादतें ऐसी थी के मुसलमान इन पर जितना भी सोग या मलाल ज़ाहिर करते और मातम वा रोना धोना करते , कम होता,
लेकिन एक तो इस्लाम में इस मातम वा रोना धोना की इजाज़त नहीं , दूसरी ये सारे वाक्ए दीन मुकम्मल होने के बाद पेश आएं हैं, इसलिए उनकी याद में रोना वा मातमी मजलिस करना दीन में नया काम है जिसके हम किसी हाल में पाबंद नहीं,
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Tuesday, November 24, 2020

तौहीद की कद्र पूछनी है तो उनसे पूछो


 


तौहीद की कद्र पूछनी है तो उनसे पूछो ! जो शिर्क की बस्तियों से निकल कर तौहीद की बुलंदियों पर आए,
काबा के रब की कसम ! तुम ज़िन्दगी के आखिरी लम्हात तक खुदा का शुक्र करते रहो, तो उसके किये हुए इनाम का शुक्र अदा नहीं कर सकते के अल्लाह ने तुम्हे अपनी तौहीद का अलंबरदार बनाया है,
खता कारों ! एक दिन आयेगा के तौहीद वाले को अपनी तौहीद की गैरत आयेगी,
कहेगा अपने फरिश्तों को के जाओ, मुझसे अपने बंदों का जहन्नुम में जलते हुए देखना गवारा नहीं किया जाता, जिन्होंने मेरे साथ कभी शिर्क नहीं किया,
फरिश्ते कहेंगे अल्लाह ये बड़े गुनाहगार थे, इन्होंने बड़े जुर्म किए,
अल्लाह फरमाएगा बड़े बड़े जुर्म किए मगर मेरे साथ शिर्क तो नहीं किया था !!
फरिश्ते कहेंगे अल्लाह ये जलकर खाक हो चुके उनकी हड्डियां कोयला हो गई है, उनके चमड़े जल गए हैं, उनके चेहरे बदल गए हैं, उनके जिस्मों में बाल नहीं रहा !!
अल्लाह इनको जहन्नुम से निकाल कर किया करेंगे !!
अल्लाह पाक फरमाएगा :- मुझे मेरी खुदावंदी कि कसम ! मैं इनको जन्नत की नहरों में गोते दे दे कर इस तरह कर दूंगा जिस तरह माँ के पेट से आज ही फूंलो की तरह पैदा हुए हैं,
इन्होंने मेरे साथ किसी को शरीक नहीं किया और मैंने इनको रुसवा ना करने का फैसला कर रखा है,
आज जितनी बीमारियां हैं हमारे मुल्क की, हमारे अफ़राद की, हमारी कौम की , हमारी मिल्लत की,
इन सारी बीमारियों की असल जड़ शिर्क है,
(अल्लामा एहसान इलाही ज़हीर , कुरआन वा सुन्नत कांफ्रेंस सियालकोट 29 फरवरी 1987)
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Monday, November 23, 2020

मुहर्रम उल हराम - आज शिर्क और बिदात का गहवारा

 



मुहर्रम उल हराम - आज शिर्क और बिदात का गहवारा

मुहर्रम उल हराम एक ऐसा मुकद्दस महीना जिसमें जमाना ए जाहिलियत में भी तमाम तरह की बुराइयां बन्द कर दी जाती थी, यहां तक कि लड़ाइयां भी मुल्तवी कर दी जाती थी लेकिन आज दुश्मन ए इस्लाम ने अपनी तखरीब कारी और गलीज हरकतों को उम्मत ए मुस्लिमा के अंदर घोल दिया और इसे एक शिर्क और बिदात का महीना बना दिया,
जिधर निकल जाओ नौहे और मर्सिया पढ़े जा रहें हैं, हर दूसरे घर में सोग मनाया जा रहा है, हर तरफ हाय हुसैन हाय हुसैन की आहो बाका है, कोई घर में बीवी फातिमा की कहानी पड़वा रहा है, कोई बीवी ज़ैनब की कहानी पड़वा रहा है,
एक तरफ मक्कारी और ढोंग के आंसू हैं और दूसरी तरफ मिठाई की दुकानें सजी हुई हैं,
एक तरफ सीनो और पीठों को मारा जा रहा है और काटा जा रहा है तो दूसरी तरफ फकीर , पैकी, अलम और ताज़िए बनाए जा रहें हैं,
हर तरफ अजीब हाल है, हर शक्ल पर बारह बजे हुए हैं,
वो जो करते हैं उन्हें करने दो मुसलमानों ये तो उन खबीसों और गलीज़ों पर अजाब है अल्लाह का जो कयामत तक जारी रहेगा, ये ऐसे ही अपना सीना पीटते रहेंगे क्यूंकि इसी सीने में अम्मी आयशा का बग्ज भरा है, हजरत अबू बक्र का बग्ज भरा है, हज़रत उमर फारूख, हज़रत उस्मान वा तमाम सहाबा रिजवानुल्लाह अलैहि अजमाइन का बुग्ज् भरा हुआ है, और सरों को इसलिए काटते हैं की इसी दिमाग में हज़रत हुसैन को शहीद करने और अहले बयेत को बदनाम करने के साजिश भरी हुई हैं,
फकीर:
ये फकीर बनने का सिस्टम ही नहीं समझ आया आजतक, ये फकीर क्यों बनाए जाते हैं बच्चे, अगर एक फ़कीर का बच्चा आ जाए तो बड़ी हिकारत से देखते हैं लेकिन इन 10 दिनों में तो बड़े बड़े अमीर और हैसियत, शोहरत और पैसे वाले अपने बच्चों को फकीर बनाते हैं,
ये फकीरी का तो पैसा हराम है इस्लाम में फिर ये कैसे आया इस मुकद्दस महीने में ??
पैंकी :
कुछ मुसलमान कमर में रस्सियां बांधे और घंटियां लटकाए बस दौड़ते रहते हैं नंगे पैर, कोई इधर भागा जा रहा है कोई उधर भागा जा रहा है, कुछ ग्रुप बनाकर इधर दौड़ते हैं कोई उधर दौड़ते हैं,
आज कल मॉडर्न हो गए तो बाइक पर तीन तीन - चार चार बैठे करतब दिखाते निकलते हैं, सुबह से लेकर शाम तक सिर्फ दौड़ना और सिर्फ दौड़ना ही है, ना नमाज़ की फिक्र होती है ना सुन्नतों की, फर्जियत का कहीं नाम नहीं सुन्नतों के जनाजे निकले हुए हैं और बस भाग रहें हैं,
अल्लाह जाने ये दीन के लिए भाग रहें हैं या दीन से भाग रहें हैं, ये भी कहीं से साबित नहीं है नबी ए अकरम मुहम्मद (sws) से तो मुमकिन ही नहीं और सहाबा किराम ने कभी किया नहीं, ना ताबाई से ना तबा ताबाई से , ना किसी औलिया अल्लाह से , फिर ये कहां से आया ???
साभार :Umair Salafi Al Hindi

Sunday, November 22, 2020

तकदीर पर अल्लामा इक़बाल का नजरिया

 तकदीर पर अल्लामा इक़बाल का नजरिया

अह्काम ए इलाही
पाबंदी, तकदीर के पाबंद ए अहकाम ??
ये मसला मुश्किल नहीं, ए मर्द ए खुर्दमन्द
एक आन में सौ बार बदल जाती है तकदीर,
है उसका मुकल्लिद नाखुश अभी खुर्दसंद
तकदीर के पाबंद नबातात वा जमादात
मोमिन फक्त एहकम इलाही का है पाबंद
(अल्लामा इकबाल)
अल्लामा इक़बाल के नजदीक कायनात की हर चीज तकदीर की पाबंद हैं
मगर अल्लाह ताला ने इंसान को अह्काम का पाबंद किया है, और अमल करने में आज़ादी दी है, और उसमे खैर वा शर के रास्ते बता दिए हैं, अब इंसान अल्लाह के अह्काम पूरे ना करे जैसे नमाज़, रोज़ा , जकात वगेरह और अपनी तकदीर के भरोसे बैठा रहे, ऐसा करना भी सही नहीं है
जैसे कि इंसान को तकदीर पर भरोसा करके बैठे नहीं रहना चाहिए, बल्कि अल्लाह के अह्काम को पूरा करते रहना चाहिए जैसा कि अल्लाह का फरमान है
اِنَّا ہَدَیۡنٰہُ السَّبِیۡلَ اِمَّا شَاکِرًا وَّ اِمَّا کَفُوۡرًا
तर्जुमा : " हमने उसे रास्ता दिखाया के वो या तो शुक्र गुज़ार हो, या ना शुक्रा बन जाए"
(कुरआन अल इंसान आयत 3)
साभार: Umair Salafi Al Hindi

Saturday, November 21, 2020

शहद और सिरका

 



शहद और सिरका


बाजार में साथ साथ दो दुकानें थी, एक शहद और दूसरी सिरका बेचने वालों कि, सिरका वाली दुकान का हमेशा भीड़ रहती, जबकि शहद वाली दुकान में कभी कभार की कोई नज़र आता,

शहद वाले ने सोचा के मेरा माल महंगा होने की वजह से कोई नहीं लेता,इसलिए उसने भाओ कम कर दिया,

लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा, कीमत कम करते करते उसने शहद की कीमत सिरके के बराबर कर दी, लेकिन सूरत ए हाल वैसी ही रही,

चुनांचे एक दिन वो सिरके वाले के पास गया और बोला,

"मेरा शहद खुसबूदार वा लजीज है, जबकि तुम्हारा सिरका कड़वा और बदबूदार, मैंने कीमत भी कम कर दी,लेकिन तुम्हारे पास हमेशा जमघटा रहता है और मैं खाली बैठा देखता हूं "

सिरका वाला मुस्कुराया और बोला के मैं सिरका बेचता हूं लेकिन मेरी जबां शहद जैसी है, और तुम्हारा माल बेशक बेहतर है, लेकिन तुम्हारी ज़बान सिरका जैसी है

(अरबी कहावत)

साभार: शेख शाहिद सनाबिली
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
ब्लॉग: islamicleaks.com