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Monday, February 21, 2022

ख्वारिज और रवाफिज का अहले सुन्नत वल जमात के साथ खूनी खेल,




 ख्वारिज और रवाफिज का अहले सुन्नत वल जमात के साथ खूनी खेल,


काजी अयाज़ रहमतुल्लाह अपनी किताब " तरतीब उल मदारिक 5/303 " में लिखते है,

राफज़ी हुकूमत बनी उबैद के ज़माने कैरवान के अहले सुन्नत वल जमात बहुत ही परेशान कुन हालात से गुज़र रहे थे, छुप छुप कर जिंदगी गुजारते थे, राफजियों ने हुसैन अल आमी नामी शख्स को इस बात के लिए मुकर्रर कर रखा था के वह भरे बाज़ार में सहाबा किराम रिजवानुल्लाह को गाली दे, कभी कभी वो नबी ए अकरम मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को भी गाली देता ,सहाबा के नाम शराब की दुकानों कर लटकाए जाते , अगर अहले सुन्नत वल जमात का कोई फर्द हरकत भी करता तो उसकी गर्दन मार दी जाती,

उस ज़माने में जेनाता नामी कबाइल में एक शख्स था जिसकी कुन्नियत अबू यजीद थी, आबिद वा जाहिद था लेकिन ख्वारिज़ के सबसे शदीद फिरका सफरियाह से ताल्लुक रखता था , उसने अपनी जमात को लेकर राफज़ियो के खिलाफ मुहाज खोल दिया ,जब अहले सुन्नत वल जमात ने देखा तो उन्होंने इस खारीजी का साथ दिया क्योंकि ख्वारिज़ अहले सुन्नत वल जमात के नजदीक मुसलमान थे जबकि रवाफिज़ बिल्खुसूस बनी उबैद के रवाफिज़ काफिर थे,

चुनाँचे कैरवान के फुकहा , सुलहा , ऐम्मा वगेरह सभी ने रवाफिज़ की हुकूमत के खात्में के लिए ख्वारिज़ का साथ दिया , जंग की तैयारी शुरू हो गई , अबू यजीद खारजी की कयादत में लोग रवाफिज़ से मुकाबले के लिए निकले , अहले सुन्नत वल जमात के उलेमा वा फुकहा जिहाद का झंडा संभाले हुए थे, अल्लाह रब्बुल इज्जत उन्हे कामयाबी देता रहा , और आखिर में जब महदविया नामी शहर में रवाफिज़ का मुहासिरा कर लिया गया तो अबू यजीद खारजी ने देखा के अब तो हमारी हुकूमत बन्नी तय है, चुनांचे उसने अपनी खारजियत का असली चेहरा जाहिर कर दिया ,

अपनी खास फौज के कहा के," जब तुम रवाफिज़ से मुकाबला आराई के लिए जाना तो उलेमा ए कैरवान का साथ छोड़कर वापस चले आना ताकि रवाफिज़ उनसे अच्छी तरह बदला ले सकें, और ऐसा ही हुआ , रवाफिज़ ने चुन चुनकर कैरवान के उलेमा वा फुकहा और अहले सुन्नत वल जमात के अफ़राद को कत्ल कर दिया और खारीज़ी खबीस बैठकर मज़े लेता रहा "

ये काज़ी अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह का बयान था जिसे मैंने निहायत ही इख्तेसार के साथ बयान किया है, आज के दौर में कोई सोचता है के खारजी राय रखने वाले रवाफिज़ के साथ मिलकर बैतुल मुकद्दस फतह कर लेंगे तो ये उनकी भूल है, बैतुल मुकद्दस ज्यों का त्यों रहेगा बस अहले सुन्नत का वहां से सफाया हो जाएगा ,

ख्वारिज़ और रवाफिज़ दोनों का इजातकरदा (Founder) एक ही है और वह अब्दुल्लाह बिन सबा है, इसलिए दोनों के दिल आपस में मिलते हैं

فاعتبروا يا أولى الأبصار

साभार: अबू अहमद कलीमुद्दीन यूसुफ ( जामिया इस्लामियां मदीना मुनाववारा)
हिंदी तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Wednesday, February 9, 2022

मैं अरबों को चकनाचूर कर दूंगा !! ( ईरान के बादशाह यजदगर्द की धमकी)

 



मैं अरबों को चकनाचूर कर दूंगा !! ( ईरान के बादशाह यजदगर्द की धमकी)

दौर ए जिहालत में अरब कबायेल, बनू शायबां,बनू बक्र बिन वायल और बनू हनीफा ( आल ए सऊद का कबीला) ने जब मुआरका जिल्कार में फारस के मुकाबले में फतह हासिल की तो इन कबायल के हौसले बढ़ गए , और फिर जब बनू शायबान कबीले के मशहूर शुरखील नौजवान मुस्सन्ना बिन हारिश नौ हिजरी को मदीना में आकर अल्लाह के रसूल के हाथों मुसलमान होकर गए थे,

तो वह हज़रत अबू बक्र सिद्दीक के जमाना ए खिलाफत में मदीना हाजिर हुए और मस्जिद नबावी में अहले फारस के खिलाफ एक पुरजोर तकरीर की और सहाबा किराम से कहा के ," अब अहले फारस का गुरूर हमने खाक में मिला दिया है,अगर आप लोग हमें थोड़ी सी मदद करें तो मैं फारस की ईट से ईट बजा दूंगा"

उनकी तकरीर को सहाबा किराम ने एक जज़्बाती तकरीर समझा और मस्जिद नबावी में चिमगोइया शुरू हो गई, कहां सुपरपावर अहले फारस और कहां एक कबीले का सरदार मुसन्ना इब्न हारीश

इस मौके पर के जब तमाम मुसलमान खामोश थे तो उस वक्त हज़रत उमर फारूक ही थे जिन्होंने अहले फारस से टक्कर लेने की सोची,वह हज़रत अबू बक्र सिद्दीक से फरमाते हैं के आप इस नौजवान की मदद करें, और खालिद बिन वलीद को एक फ़ौज देकर उसके साथ भेजें,

चुनाँचे हज़रत अबू बक्र ने हज़रत खालिद बिन वलीद की इमारत में एक लश्कर हजरत मुसन्ना बिन हारिश के ताऊन के लिए भेजा जिन्होंने वहां जाकर अहले फारस के साथ तीन मशहूर जंगें की और फतह हासिल की,

अर्धशेर की वफात और यजदगर्द की ताजपोशी!!

ईरान का बादशाह अर्दशेर जब फौत हुआ तो नौ उम्र यजदगर्द उनका बादशाह बना उसने अपनी ताजपोशी के दौरान बाद मुसलमानों से टक्कर लेने की सोची क्योंकि मुसलमानों ने दक्षिणी इराक़ का एक मुकम्मल हिस्सा उससे छीन लिया था,

और यजदगर्द ने मुसलमानों को पैगाम भिजवाया के मैं तुमसे निपट लूंगा और तुम्हे चकनाचूर कर दूंगा, उसने दो लाख की तादाद में फौज इकट्ठी की जिसमे साठ हज़ार घुड़सवार, साठ हज़ार ऊंटसवार और अस्सी हजार पैदल फौज थी,और तीस या चालीस के बीच हाथी भी तैयार कर लिए , और अपने मुल्क के छह बहतरीन कमांडरों का इंतेखाब किया जिनमें , रुस्तम, हरमुजान, मेहरान, बहमन जूदेव, जानीलूस, वगेरह थे,

उस वक्त हज़रत अबू बक्र सिद्दीक मर्जुल मौत में मुब्तिला हो गए थे,
जारी

साभार: शैख अब्दुल खालिक भट्टी
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Tuesday, February 8, 2022

" तुम्हारा हश्र यजीद के साथ हो "




 " तुम्हारा हश्र यजीद के साथ हो "

एक तबका आपको ये कहते हुए नज़र आता है के अल्लाह तुम्हारा हश्र यजीद के साथ करे और हमारा हुसैन के साथ,
बंदा पूछे अगर कयामत के दिन यजीद भी हुसैन के साथ हुआ तो तुम्हारा क्या होगा ??
एक बड़े आलिम थे शेख अब्दुल मुगीस अल हंबली रहमतुल्लाह उन्होंने यजीद बिन मुआवियां के फजायेल पर किताब लिखी जिसका नाम था "فضل یزید" इस किताब के रद्द पर इमाम इब्न जौजी रहमतुल्लाह ने किताब लिखी "الرد المتعصب العنید المانع من ذم یزید " इन दोनों उलेमाओं का आपस में रद्द वा क़द आखिर वक्त तक चलता रहा ,
अब आप यूं समझ लें के इब्न जौजी आज के हालात में बन गए हुसैनी और शैख मुगीस बन गए यजीदी
तो उस यजीदी के बारे जिसने यजीद के फजाएल पर किताब लिखी इमाम इब्न जौजी रहमतुल्लाह अलैह आखिरकार फरमाते हैं ," मैं उम्मीद करता हूं के अब्दुल मुगीस और मैं जन्नत में एक साथ होंगे "
इमाम ज़ौजी रहमतुल्लाह एक यजीदी के जन्नत में अपने साथ होने की उम्मीद का इज़हार फरमा रहें हैं, जबकि आजके नाम निहाद हुसैनी जब जवाब देने से आजिज आ जाते हैं तो आखिरी हथियार ये इस्तेमाल करते हैं,
" अल्लाह तुम्हारा हश्र यजीद के साथ करे और हमारा हुसैन के साथ"
तो हम पूछते हैं के यजीद भी अगर सय्येदना हुसैन के साथ हुआ तो तुम लोग कहां होगे ??
साभार: डॉक्टर अजमल मंजूर मदनी
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Monday, February 7, 2022

यजीदी कौन ?? (किस्त 1)




 यजीदी कौन ?? (किस्त 1)

तहरीर ज़रा लम्बी है लेकिन पूरी पढ़ लीजिए , ये दरसअल मौलाना अताउल्लाह अल मुहसिन शाह बुखारी देवबंदी का खिताब है, मौसूफ अहले हदीस नहीं थे लेकिन ये तहरीर पढ़ें, क्या जानदार और शानदार खिताब था,
यजीद कौन ??
दलील के साथ इख्तेलाफ़ करेंगे ??
सय्येदना हुसैन (ra) के हादसे सहादत के जमन में हमारे मौकफ के मुतअल्लिक़ ये मशहूर किया जाता है कि ये तो यजीदी हैं, हत्ता के पाकिस्तान के एक ज़िद्दी मोलवी ने हमें यजीदी लिख भी दिया,
किसी के लिखने से क्या होता है ?? भाई यजीदी तो दरअसल वह है जिसने यजीद की बय्यत की, और बय्यत की सय्यदना हजरत हुसैन के भाई ( मुहम्मद बिन अली उर्फ मुहम्मद बिन हंफिया) ने, ये रिवायत मजबूत सनद के साथ तारीख में मौजूद है और इस मौलवी को नज़र नहीं आता जो हमें बतौर गाली यजीदी कहा जाता है,
अहद यजीद के जिन मारूफ सहाबा ने बगैर जब्र वा जबरदस्ती यजीद की बैयत की उनमें जनाब हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर, जनाब अब्दुल्लाह बिन अब्बास और सय्यदन हजरत नोमान बिन बशीर शामिल हैं, यजीदी ये हुए के मैं ??
हमनें ना तो यजीद की बायत की , ना उसका ज़माना पाया, ना उसके अमाल देखे, ना उसके अहवाल देखे, हमने तो तारीख लिखी हुई एक बात सुनाई, और जाहिल मौलवी के मुंह खुल गए के सहाबा यजीदी हैं, ये यजीदी हैं,
अब हमको बताओ यजीद की बायत हमने कि के हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर ने ?? अबदुल्लाह बिन अब्बास ने , सय्यदना हजरत हुसैन के भाईयों ने ?? हज़रत अकील के बेटों ने ? हज़रत जाफर तैय्यार के बेटे ने ? सय्यदना हुसैन के बहनोई ने ??
हमारा क्या कसूर है ??
ये बताना जुर्म है तो हम ये जुर्म करते रहेंगे , और ना ही ऐसा जुर्म है के उसके बताने से हम रुक जाएं, रुक नहीं सकते, ये काफिला बढ़ेगा, बहुत दूर तक जायेगा, और वो तुम्हारा दाम तज्वीर और ये लखनऊ मुल्तान के बदमाशों की बदमाशियां हम खतम करके दम लेंगे इंशाल्लाह,
हमारे बुजुर्गों ने हमें इसी रास्ते पर चलाया है, सही रास्ते पर चलाया है, इस्तेकामत अता फरमाई है, तुम्हारे जबर वा ज़ुल्म का हमें कोई डर है ना तुम्हारे पैसों की कोई लालच हमारा कोई ताल्लुक नहीं है इससे , इस बात से ताल्लुक है के बात कब पहुंचीं है ?? किसको पहुंची है ??और किस तरह पहुंचीं है ?? कौन पहुंचाता है ?? किस तरह पहुंचाता है??
तुम हमें यजीदी कहो, यहां हमारे सामने आकर कहो, हम तुम्हें आकर बताएंगे कि यजीदी कौन है ??
हजरत हुसैन राजियाल्लाहु ताला अनहु ने सफर कर्बला में 7 मर्तबा कहा के मैं यजीद के हाथ पर हाथ रखता हूं, मेरा रास्ता खाली करो मैं जाता हूं,
बताओ यजीदी कौन हुआ ??
जारी.....
तहरीर: मौलाना अताउल्लाह अल मोहसिन शाह बुखारी देवबंदी
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi

Friday, February 4, 2022

पता नहीं सैय्यदना हसन से शिया के नज़दीक ऐसा कौनसा जुर्म हुआ है के वह उन्हे इस क़दर याद नहीं करते जैसा सैय्यदना हजरत हुसैन को याद करते हैं,

 



पता नहीं सैय्यदना हसन से शिया के नज़दीक ऐसा कौनसा जुर्म हुआ है के वह उन्हे इस क़दर याद नहीं करते जैसा सैय्यदना हजरत हुसैन को याद करते हैं,

सैय्यदना हुसैन की सीरत खूब सुनाते हैं और सैय्यदना हसन की सीरत के बाब को बड़ी चालाकी से गोल कर जाते हैं,
आप उनके सोशल मीडिया पर जाकर पेज देख लें, ग्रुप देख लें, उनके जाकिरीन की महफिलें देख लें, अजादारी की मजलिसें देख लें , उनके इमाम बाड़ों में जाकर उनके प्रोग्राम सुन लें बस हज़रत हुसैन का तजकिरा मिलेगा , और हजरत हसन का ज्यादा से ज्यादा पंजतन पाक के तौर पर दीवारों, पोस्टरों, और बैनरों पर नाम लिख देंगे ,
लेकिन जिस जोश वा मुहब्बत और गुलु के साथ सैय्यदना हुसैन का तजकिरा करते हैं, उनके नाम के नारे लगाते हैं इस तरफ सैय्यदना हसन का तजकिरा नहीं करते और ना उनके नाम के नारे लगाते हैं,
पता नहीं उनके नज़र में सैय्यदना हसन का ऐसा कौनसा कसूर है जिसने उन्हे इस कदर नजर अंदाज करने पर मजबूर कर दिया ,
कहीं ये लोग सुलह हसन से तो खफा नहीं हैं ??
साभार: शैख कमालुद्दीन सनाबिली
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi
Blog: Islamicleaks

Wednesday, January 26, 2022

ख्वारिज के दिल में हज़रत अमीर मुआवीया का बुग्ज था तो हज़रत अली से भी बुग्ज में मुब्तिला हो गए और हज़रत अली को शहीद कर दिया ,

 



ख्वारिज के दिल में हज़रत अमीर मुआवीया का बुग्ज था तो हज़रत अली से भी बुग्ज में मुब्तिला हो गए और हज़रत अली को शहीद कर दिया ,

तो पता चला जिस तरह आग और पानी इकट्ठा नहीं हो सकते उसी तरह एक दिल में हज़रत मुआविया का बुग्ज और हजरत अली से मुहब्बत इकट्ठी नहीं हो सकती,

सबाइयों ने हज़रत मुआविया से बुग्ज रखा तो उन्ही सबाईयों ने हज़रत हसन को जहर देकर शहीद किया और हज़रत हुसैन को कूफा बुलाकर शहीद किया ,

तारीख गवाह है जिसके दिल में हज़रत मुआविया का बुग्ज रहा उसके दिल में हज़रत अली की मुहब्बत आ ही नहीं सकी,

Monday, November 23, 2020

मुहर्रम उल हराम - आज शिर्क और बिदात का गहवारा

 



मुहर्रम उल हराम - आज शिर्क और बिदात का गहवारा

मुहर्रम उल हराम एक ऐसा मुकद्दस महीना जिसमें जमाना ए जाहिलियत में भी तमाम तरह की बुराइयां बन्द कर दी जाती थी, यहां तक कि लड़ाइयां भी मुल्तवी कर दी जाती थी लेकिन आज दुश्मन ए इस्लाम ने अपनी तखरीब कारी और गलीज हरकतों को उम्मत ए मुस्लिमा के अंदर घोल दिया और इसे एक शिर्क और बिदात का महीना बना दिया,
जिधर निकल जाओ नौहे और मर्सिया पढ़े जा रहें हैं, हर दूसरे घर में सोग मनाया जा रहा है, हर तरफ हाय हुसैन हाय हुसैन की आहो बाका है, कोई घर में बीवी फातिमा की कहानी पड़वा रहा है, कोई बीवी ज़ैनब की कहानी पड़वा रहा है,
एक तरफ मक्कारी और ढोंग के आंसू हैं और दूसरी तरफ मिठाई की दुकानें सजी हुई हैं,
एक तरफ सीनो और पीठों को मारा जा रहा है और काटा जा रहा है तो दूसरी तरफ फकीर , पैकी, अलम और ताज़िए बनाए जा रहें हैं,
हर तरफ अजीब हाल है, हर शक्ल पर बारह बजे हुए हैं,
वो जो करते हैं उन्हें करने दो मुसलमानों ये तो उन खबीसों और गलीज़ों पर अजाब है अल्लाह का जो कयामत तक जारी रहेगा, ये ऐसे ही अपना सीना पीटते रहेंगे क्यूंकि इसी सीने में अम्मी आयशा का बग्ज भरा है, हजरत अबू बक्र का बग्ज भरा है, हज़रत उमर फारूख, हज़रत उस्मान वा तमाम सहाबा रिजवानुल्लाह अलैहि अजमाइन का बुग्ज् भरा हुआ है, और सरों को इसलिए काटते हैं की इसी दिमाग में हज़रत हुसैन को शहीद करने और अहले बयेत को बदनाम करने के साजिश भरी हुई हैं,
फकीर:
ये फकीर बनने का सिस्टम ही नहीं समझ आया आजतक, ये फकीर क्यों बनाए जाते हैं बच्चे, अगर एक फ़कीर का बच्चा आ जाए तो बड़ी हिकारत से देखते हैं लेकिन इन 10 दिनों में तो बड़े बड़े अमीर और हैसियत, शोहरत और पैसे वाले अपने बच्चों को फकीर बनाते हैं,
ये फकीरी का तो पैसा हराम है इस्लाम में फिर ये कैसे आया इस मुकद्दस महीने में ??
पैंकी :
कुछ मुसलमान कमर में रस्सियां बांधे और घंटियां लटकाए बस दौड़ते रहते हैं नंगे पैर, कोई इधर भागा जा रहा है कोई उधर भागा जा रहा है, कुछ ग्रुप बनाकर इधर दौड़ते हैं कोई उधर दौड़ते हैं,
आज कल मॉडर्न हो गए तो बाइक पर तीन तीन - चार चार बैठे करतब दिखाते निकलते हैं, सुबह से लेकर शाम तक सिर्फ दौड़ना और सिर्फ दौड़ना ही है, ना नमाज़ की फिक्र होती है ना सुन्नतों की, फर्जियत का कहीं नाम नहीं सुन्नतों के जनाजे निकले हुए हैं और बस भाग रहें हैं,
अल्लाह जाने ये दीन के लिए भाग रहें हैं या दीन से भाग रहें हैं, ये भी कहीं से साबित नहीं है नबी ए अकरम मुहम्मद (sws) से तो मुमकिन ही नहीं और सहाबा किराम ने कभी किया नहीं, ना ताबाई से ना तबा ताबाई से , ना किसी औलिया अल्लाह से , फिर ये कहां से आया ???
साभार :Umair Salafi Al Hindi

Friday, November 20, 2020

हज़रत मुआविया का ऐतिहासिक खत रूमी बादशाह के नाम!!


 


हज़रत मुआविया का ऐतिहासिक खत रूमी बादशाह के नाम!!


हज़रत अली‌ؓ और मुआवियाؓ के बीच जंग बरपा थी के रोमन एम्परर ने दोनों के इख़्तिलाफ़ का फायदा उठाकर हज़रत अली के इलाके पर हमले का प्लान बनाया के हज़रत अमीरूल मोमिनीन सैय्यदना अली रज़ि, अमीरे मुआविया के साथ हालते जंग में है और कमज़ोर हैं, 2 फ्रंट पर लड़ाई नहीं कर सकेंगे और सोचा कि हज़रत मुआविया जंग की वजह से हज़रत अली का साथ न देंगे,लिहाजा मौक़ा अच्छा है।
फिर भी कन्फर्म करने के लिए हज़रत मुआविया को खत भेजा के हमें मालूम हुआ है कि "आपके साथी (अली) ने आप के साथ ज़्यादती की है" ....,,,, और फ़ौजकशी के इरादे से आगाह किया।

लेकिन क़ुरबान जाएं सैय्यदना मुआविया रज़ि. की गैरत ए ईमानी और इस्लामी उखुव्वत पर, जब आप को ईसाई बादशाह की इस नापाक हरकत और इरादों का पता चला तो फौरन उसके नाम एक मुख्तसर जामेअ तारीख़ी खत लिखा :

" ए मलऊन! ख़ुदा की क़सम !
अगर तू अपने नापाक इरादे से बाज़ नहीं आया और वापस अपने मुल्क नहीं लौटा तो याद रख!! मैं अपने चचाज़ाद भाई (अली) से ज़रूर सुलेह कर लूंगा और फिर तेरे क़ब्ज़े के शहरों से तुझे उखाड़ फेंकूँगा और ज़मीन वुसअत के बावजूद तुझ पर तंग कर दूंगा।"

हज़रत मुआविया का यह खत पढ़कर रूमी बादशाह की हवा निकल गई और हमले का इरादा मुल्तवी कर दिया,और भाग खड़ा हुआ।
बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से निकले।

अल्लाहू अकबर क्या शान थी हज़रत मुआविया की।
رضي الله عنه

(अल बिदायह वन्निहायह : 11/400,
अयज़न इब्ने कसीर: बैरुत: 8/173,2010)

~ Mufti Siraj Sidat 

Thursday, November 19, 2020

MERA EK SAWAL HAI ?




मेरा एक सवाल है ??
जब 18000 कुफियों ने बैत किया मुस्लिम बिन अकील को हज़रत हुसैन रजीअल्लाहू अन्हु के दूत थे,
तो जब 17 घुड़सवार आए तब 18000 शियो ने मुंह क्यूं फेर लिया ??
ख़त में तो यजीद के खिलाफ जंग करने के वादे किए ...
18000 हज़ार 17 से डर गए ???
कौन है मुजरिम ??
शिया है ही गद्दार
हज़रत अली को हज़रत आयशा से लड़वाया ..
क्या हज़रत आयशा के खिलाफ जंग पर हज़रत अली को हम कसूरवार ठहराते हैं ??
भईयो तुम लोग मुहर्रम में सिर्फ चप्पो चलाना जानते हो,
सच्चाई को कभी नहीं अपनाना चाहते..
हज़रत उस्मान को शहीद किया किसने ??
कूफियो ने !!
हज़रत अली को शहीद किया किसने ?? कुफियों ने !!
हज़रत हसन को शहीद किया किसने ?? कूफियों ने
हज़रत हुसैन को भी कुफियों ने ही शहीद किया....
शिया समाज ये बात अच्छे से जानता है इसीलिए वह अपना मातम वा सीना पीटता है, और कहता है "
या हुसैन हम ना थे"
ताज्जुब तो सुन्नियों पर है जो उल्टा तीर अपनी तरफ लेने को उतावले रहते हैं और हज़रत हुसैन के खातिलों को अहले सुन्नत में खोजते रहते हैं
शिया को मुसलमान नहीं कह सकते
साभार : Umair Salafi Al Hindi

Tuesday, November 17, 2020

TAREKH FIQAH JAFARIYA

 तारीख फिकाह जाफरिया

1- नफरत ए सहाबा रखने वालों ने अपनी तारीख का नाम
"फिकाह जाफरिया " रखा है, और हज़रत इमाम जाफर सादिक रजियलाहू अन्हु से इसको मंसूब किया है, किसी दोस्त ने सवाल किया के फिकाह जाफरिया कब वजूद में अाई, तहकीक करने पर ये बात सामने अाई के इन किताबों को फिकाह जाफरिया की बुनियादी किताबें कहा जाता है,
1- "अल काफी " - अबू जाफर कुलैनी 330 हिजरी यानी हज़रत इमाम जाफर से तकरीबन 180 साल बाद,
2- "मन ला याहजरह अल फ़िका "- मुहम्मद बिन अली इब्न यायूयह कैमी 380 हिजरी यानी 230 साल बाद
3- " तहज़ीब उल अहकाम"
4- इस्तबसार , मुहम्मद बिन हसन अल तूसी 460 हिजरी तकरीबन 310 साल बाद,
2- उसूल काफ़ी नंबर 2 में लिखा है:-
" फिर इमाम बाकिर आए उनसे पहले तो शिया हज के मनासिक और हलाल वा हराम से भी वाकिफ ना थे, इमाम बाकिर ने शिया के लिए हज के अहकाम बयान किए और हलाल वा हराम में तमीज़ का दरवाजा खोला, यहां तक के दूसरे लोग इन मसाइल में शिया के मोहताज होने लगे जबकि उससे पहले शिया इन मसाइल में दूसरों के मोहताज थे, "
इस ऐतराफ से ज़ाहिर है के इमाम बाकिर से पहले शिया हलाल वा हराम से वाकिफ ही ना थे, पहली सदी हिजरी में फिकाह जाफरिया का वजूद ही नहीं था ,
3- हालांकि नबी ए अकरम मुहम्मद (sws) ने हलाल वा हराम की निशानदेही अपने दौर में फरमा दी थी, लेकिन अहले शिया हजरात के नज़दीक ये क़ुरआन मोतबर नहीं है और उनके नजदीक कुछ सहाबा के इलावा नौजुबिल्लह सब मुरतद हो गए,
इमाम बाकिर रजियलाहू अन्हु के बाद इमाम जाफर रजीअल्लाहू अन्हु का दौर है मगर इमाम जाफर ने अपने दौर में कोई फिकाह तदवीन की ही नहीं, इसका कोई भी सबूत नहीं मिलता,
फिकाह जाफरिया के ऐम्मा ए किराम:
1- मशहूर शिया मुजतहिद मुल्ला बाकिर मजलिसी " हक उल यकीन " पेज 371 पर लिखते हैं :-
" इस पर भी कोई शक नहीं के अहले हिजाज़ वा इराक़ , खुरासान वा फारस वगेरह से फुजला की एक जमात कसीर हज़रत बाकिर और हज़रत सादिक नेंज तमाम ऐम्मा अशहाब से थी, मुफस्सिल जरारह, मुहम्मद बिन मुस्लिम, अबू बरीदह, अबू बसीर, शाहीन, हमरान, जेकर मोमिन ताक , अम्मा बिन तिगलब, और मुंआविया बिन अम्मार के और इनके इलावा और कसीर जमात भी थी जिनका शुमार नहीं कर सकते "
अब जिनके नाम दिए गए हैं उनके बारे में शिया उलेमा ने क्या कहा :
जुराराह : इन अशहाब को इमाम जाफर के हम पाया तसव्वुर किया जाता है
”قال اصحاب زرارہ من ادرک زرارہ بن اعین فقد ادرک ابا عبداللہ (رجال کشی صفحہ 95)
लेकिन दूसरी जगह शिया किताब " हक उल यकीन " उर्दू पेज 722 पर लिखा जाता है कि
" ये हुकम ऐसी जमात के हक में है जिनकी ज़लालत पर सहाबा का इजमा है जैसा के जुरारह और अबू बसीर यानी जुरारह और अबू बसीर बिल इजमा गुमराह हैं "
अब सवाल ये है के जो खुद गुमराह है वह दूसरों की रहनुमाई क्या करेगा ,
इसी तरह रिजाल अल काशी पेज 107 पर लिखा है के इमाम जाफर ने फरमाया:
"जुराराह तो याहुद और नसारी और तस्लीन के कायलीन से भी बुरा है"
इमाम जाफर ने तीन मर्तबा फरमाया के अल्लाह की लानत हो जुराराह पर (रिजाल अल काशी पेज 100)
इसी किताब रिजाल अल काशी के पेज 106 पर है के जुरारह ने कहा :-
" जब मैं बाहर निकला तो मैंने इमाम की दाढ़ी में पाद मारा और मैंने कहा कि इमाम कभी निजात नहीं पाएगा "
इमाम जाफर ने लानत की जुरारह पर और जुरारह दाढ़ी में पाद मार रहा है, क्या ये दीन सिखाएंगे ??
अबू बसीर : फिकाह जाफरिया के मसाइल में ये शख्स भी सरदारों में शामिल है, अलबत्ता इमाम जाफर को रिजाल काशी पेज 116 पर लालची कह रहे हैं,
रावी कहता है के अबू बसीर इमाम जाफर के दरवाज़े पर बैठा था अंदर जाने की इजाज़त चाहता था मगर इमाम इजाज़त नहीं दे रहे थे अबू बसीर कहने लगा :-
" अगर मेरे पास कोई थाल होता तो इजाज़त मिल जाती फिर कुत्ता आया और उसके मुंह में पेशाब कर दिया "
कैसा आलिम है यह इमाम के पास जाने की इजाज़त भी नहीं मिलती और कुत्ता मुंह में पेशाब कर देता है,
मुहम्मद बिन मुस्लिम : इसका दावा है कि इमाम बाकिर से 30 हज़ार हदीसें सुनी और 16000 हदीसों की तालीम पाई (रिजाल अल काशी पेज 109)
अलबत्ता रिजाल काशी पेज 113 पर मुफस्सिल कहता है के मैंने इमाम जाफर से सुना फरमाते थे के मुहम्मद बिन मुस्लिम पर अल्लाह की लानत हो ये कहता है के जब तक कोई चीज वजूद में ना आए अल्लाह को उसका इल्म नहीं होता "
क्या अल्लामा मजलिसी ने जिन तीन आशहाब को सर फेहरिस्त रखा, क्या फिकाह जाफरिया इन जैसों की रिवायत की मरहूम ए मिन्नत है ?
जाबिर बिन यजीद : रिजाल काशी पेज 128 पर लिखा है के मैंने इमाम बाकिर से 70000 हदीस की तालीम पाई,
अब रिजाल काशी पेज 126 पर जुरारह कहता है मैंने इमाम जाफर से जाबिर की हदीस के मुतल्लिक पूछा तो फरमाया के ये मेरे वालिद साहब से सिर्फ एक बार मिला और मेरे पास तो कभी आया ही नहीं "
70000 हदीस की तालीम कैसे पाई ??
उसूल काफी पेज 496 में इमाम जाफर का बयान है :-
" ऐ अबू बसीर ! अगर तुम में से (जो शिया हो) तीन मोमिन मुझे मिल जाते जो मेरी हदीस ज़ाहिर ना करते तो मैं इनसे अपनी हदीसे ना छुपाता "
इसका मतलब हुआ के अल काफी, इस्तबसार , तहज़ीब और मना ला यहज़राह अल फकीहा की सूरत में हज़ारों हदीस जो इमाम जाफर से मंसूब हैं वह इनसे बेज़ारी का इजहार कर रहे हैं,
रिजाल काशी पेज 160 पर इमाम जाफर का कौल है के :
" मैंने कोई ऐसा आदमी नहीं पाया जो मेरी वसीयत कबूल करता और मेरी इताअत करता सिवाए अब्दुल्लाह बिन याफूर के "
तनबिया: इससे मालूम हुआ के 460 हिजरी तक फिकाह जाफरिया की कोई किताब नहीं थी और जो के चार किताब थी वह भी अल्लाह माफ़ करे झूठी होंगी, अहले शिया हजरात की किताबें जिनको आलिम कह रहें हैं उनको खुद गुमराह भी कह रहे हैं, इसके इलावा फिकाह जाफरिया के मसाइल बताए नहीं बल्कि छिपाए जाते थे जैसे के उसूल ए काफी पेज 340 पर लिखा है के इमाम अबू बाकिर ने फरमाया:
" अल्लाह ताला ने विलायत का राज़ जिबरील को राज़ में बताया, जिबरील ने ये बात मुहम्मद (sws) को खुफिया तौर पर बताया, हुज़ूर (sws) ने ये राज़ हज़रत अली को कान में बताया, फिर हज़रत अली ने जिसे चाहा बताया मगर तुम लोग इसे ज़ाहिर करते हो "
8वी सदी हिजरी में फिकाह जाफरिया की पहली किताब " लमघा दमिष्किया" जो मुहम्मद जमालुद्दीन मक्की ने लिखी मगर इसे वाजिबुल क़त्ल क़रार देकर क़त्ल कर दिया गया, इसे शहीद अव्वल का लकब भी दिया, फिकाह जाफरिया लिखने वालों के काम जेर ज़मीन ही होते हैं, इसके बाद अल्लामा जैनुल्दीन ने लमघा दमिश्किया की शराह " रोज़तुल बिहिया" के नाम से लिखी मगर उसको भी क़त्ल कर दिया गया,
नतीजा : अल्लामा मजलिसी ने अपनी किताब " हक उल यकीन" में लिखा के इन ऐम्मा ने जरारह, मुहम्मद बिन मुस्लिम, अबू बसीर ने फिकाह जाफरिया के लिए काम किया तो उन्होंने कोई किताब तसनीफ नहीं की, उनका ऐम्मा किराम से मिलना भी मुहाल नज़र आता है बल्कि ये ऐम्मा की तौहीन करते रहे हैं,
कानून : अहले सुन्नत का कानून बहुत अच्छा है के सहाबा किराम और अहले बैत रिज्वानुल्लह अलैहि अजमईन में से कोई भी मासूम नहीं था, इसलिए सहाबा और अहले बैत के मामलात में ज़बान बंद रखा जाए और सबको हक पर माना जाए ताकि कोई वस्वसा डाले तो ये कानून याद रखा जाए,
साभार: Umair Salafi Al Hindi
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