Al Tamur Traders

Friday, December 5, 2014

JIHAD KA SAHIH MATLAB


जिहाद के बारे मे लगातार दुष्प्रचार किया जाता है कि जिहाद का अर्थ मुस्लिमों द्वारा हथियारों से लैस होकर, गैर मुस्लिमों की हत्या करने को उनसे युद्ध करना होता है, पर ये सरासर गलत है
बल्कि जब आप जिहाद शब्द का अर्थ भी देखेंगे, तो उस अर्थ का हिंसा से कोई सम्बन्ध नही निकलता । जिहाद का अर्थ युद्ध अथवा जनसंहार कतई नही होता, बल्कि जिहाद शब्द अरबी के "जहद" से बना है जिसका अर्थ होता है कोशिश या प्रयास करना, जरा प्रयास शब्द मे हिंसा ढूंढ के दिखाइए ....
 
इस्लाम मे जिहाद का अर्थ है "किसी भी प्रकार की बुराई को मिटाने के लिए कोशिश करना"..... फिर चाहे कोई बुराई गैर मुस्लिम समाज मे हो, या मुस्लिम समाज मे कोई बुराई पनप गई हो, या खुद हमारे अन्दर ही कोई बुराई पैदा हो गई हो, हर बुराई का खात्मा करने के लिए मुसलमान को प्रतिबद्ध होना चाहिए...

वस्तुत: जिहाद का सम्बन्ध खून खराबे या हथियार उठाने से नही है ..... अब जैसे इस हदीस पर ध्यान दीजिए कि प्यारे नबी स. ने फरमाया सबसे उच्च श्रेणी का जिहाद वो है जो एक व्यक्ति खुद अपने चरित्र की बुराइयों के खिलाफ करता है .....(तिबरानी)
 
ज़ाहिर है कि कोई व्यक्ति जब सबसे उच्च श्रेणी का जिहाद करेगा, तो वो अपने चरित्र की बुराई के खिलाफ जिहाद करेगा तो इसमें हथियार उठाने या खून बहाने की कोई सम्भावना ही नही है, .... और जब वो व्यक्ति अपने चरित्र की बुराइयों को खत्म कर लेगा तो फिर आगे परिस्थितियोंवश अगर उसे कभी युद्ध भी करना पड़ जाए तो भी वो किसी पर अत्याचार करने की सोच भी नही सकता

इसी प्रकार एक और हदीस मे जिक्र है कि आप स.अ.व. ने फरमाया कि ये एक बेहतर जिहाद है कि अत्याचारी शासक के सामने शासक के विरुद्ध इन्साफ की कोई बात कह दी जाए (सुनन अल-निसाई)

और जैसी धारणा जिहाद का कुप्रचार करने वालों ने समाज की बना दी है कि जिहाद का अर्थ इस्लाम को फैलाने के लिए गैर मुस्लिमों से जबरन युद्ध करना है वैसा तो बिल्कुल भी नही है, इस्लाम कभी भी मुसलमान को खुद कोई भी युद्ध शुरू करने की इजाजत नही देता
 
प्यारे नबी स.अ.व. ने एक जंग के मौके पर लोगों को खिताब करते हुए फरमाया है
 
 " ऐ लोगों खुद कभी दुश्मन से लड़ाई भिड़ाई करने की चाहत न करो, बल्कि अल्लाह से दुआ किया करो कि वो दुश्मन के शर से तुम्हारी हिफाज़त करे ।
लेकिन जब बहुत मजबूरी मे तुम्हें दुश्मन के मुकाबले जंग करनी पड़ जाए तो न्याय पर कायम रहते हुए युद्ध लड़ो.. 
(सहीह मुस्लिम)

अर्थात् हथियार उठाना तो बहुत मजबूरी की बात है जबकि गैर मुस्लिम इस्लाम का खात्मा करने के लिए मुस्लिमों पर चढ़ाई कर दें तभी मुसलमान को आत्मरक्षा मे युद्ध करने की इजाजत है और इस युद्ध मे भी न्याय का पूरा ध्यान एक मुस्लिम को रखने के निर्देश दिए गए हैं ।
 
कुरान स्पष्ट रूप से और बार बार कहता है कि कोई मुसलमान से बुरा सुलूक करे तो भी मुसलमान उससे भला सुलूक करे, लड़ाई झगड़े को अपनी ओर से भरसक टालने की कोशिश की जाए, किसी भी निर्दोष की हत्या, चाहे वो मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम उसकी हत्या महापाप है, किसी भी स्त्री का बलात्कार चाहे वो दुश्मन की स्त्री क्यों न हो, महापाप है, और यदि युद्ध करना पड़े तो भी दुश्मन के स्त्रियों बच्चों और युद्ध मे भाग न लेने वाले शांतिप्रिय पुरुषों की सुरक्षा का ध्यान रखो

संक्षेप मे, जिहाद शान्तिप्रिय लोगों को कष्ट देने का नाम नहीं बल्कि जिहाद तो नाम है लोगों के कष्ट दूर करने को एक मुस्लिम द्वारा खुद कष्ट उठाने का ...
 
जिहाद हर वो भलाई का काम है जिसे करने मे एक मुस्लिम को थोड़ा भी कष्ट उठाना पड़े ,और वो अल्लाह की रज़ा के लिए कष्ट उठाकर भी वो काम कर जाए ... ये है जिहाद , और समाज से बुराई मिटाने का प्रयास अर्थात् जिहाद एक सत्कार्य है, न कि कोई पाप ये अब आपके सामने भी स्पष्ट हो गया है ..!!