Thursday, February 25, 2021

EK BAHEN KI TARAF SE YE SAWAL AAYA HAI ??

 



अस्सलामू अलैकुम वारहमतुल्लाही वाबरकातहु

अभी एक बहन की तरफ से ये सवाल आया है ??
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम
आपकी खिदमत में तीन सवाल करना चाहती हूं, मगर सवाल करने से पहले मैं अपने बारे में कुछ बताना चाहती हूं जो इस तरह है:
मै एक तलाकशुदा मुस्लिम औरत हूं मेरी उम्र तकरीबन चौबीस या पच्चीस साल है, मैं एक बच्ची की मां भी हूं, बच्ची की उम्र तकरीबन पांच या छह साल है फिलहाल मां बाप के घर पर रहती हूं
अकीदे के ऐतबार से सलफी मन्हज पर हूं, अलहम्दुलिल्लाह बा हया, बा पर्दा और नेक सीरत वा मां बाप की इंतेहाई दर्जा फर्माबरदार हूं, दुनियावी तालीम बीएससी तक और जामिया उर्दू अलीगढ़ से मुअल्लिम तक है, दीनी तालीम सिर्फ जाती मुताले के ज़रिए हासिल की है, आगे मजीद दुनियावी वा दीनी तालीम हासिल करके खवातीन के शोबे में दीनी ख़िदमात अंजाम देने की दिल में बेइंतेहा तड़प रखती हूं,
मैं अपने खानदान में अकेली अहले हदीस हूं, मेरे घर के सभी लोग हनाफी देवबंदी है और मेरे अहले हदीस होने के सबब मेरे वालीदैन मुझसे बहुत नाराज़ रहते है खुसूसी तौर से मेरी मां मुहतरमा तो मुझसे इस क़दर नाराज़ रहती है के वो मुझको यहां तक कह देती है के:- " जा ! तू कहीं जाकर ज़हर खा कर मर जा "
मैंने दीनी ऐतबार से तमाम हुज्जत के तौर पर अपने मां बाप के अकीदे को दुरुस्त करने की तमामतर कोशिशें कर के देख लिया मगर इसके बावजूद भी मेरे मां बाप के अकीदे को दुरुस्त नहीं करा सकी हूं, इस पर मुझे अफसोस भी होता है और दिल गमगीन भी रहता है, मेरे मां बाप का ये कहना के :-
" तुम अपना अकीदा बदलो, अपना इस्लामी तौर तरीका बदलो, और मजीद इल्म हासिल करने की आरजू को खतम करके हमारी मर्ज़ी के मुताबिक खामोशी के साथ निकाह करके इस घर से चली जाओ, और अगर अपना अकीदा नहीं बदल रही हो तो, तुम्हारा अकीदा तुम्हारे साथ तुम जानो मगर अपनी तालीम सीखने की ज़िद छोड़कर हमारी मर्ज़ी के मुताबिक शादी करके इस घर से चली जाओ, अगर तुम ऐसा नहीं करती हो कहीं जाकर ज़हर खाकर मर जाओ , या अगर तुम अपनी ज़िद नहीं छोड़ोगी तो मैं ज़हर खाकर मर जाऊंगी, गर्ज़ ये के ना तुमको अपनी मर्ज़ी के मुताबिक निकाह की इजाज़त है और ना आगे मजीद पढ़ने की इजाज़त दी जाएगी"
मेरे मां बाप मुझसे एक बात और कहते हैं के :- जाओ तुम अपनी मर्ज़ी का लड़का तलाश करके निकाह कर लो, हम निकाह तो कर देंगे मगर हमारी बद्दुआ से कैसे बचोगी ?? अपनी मर्ज़ी से निकाह करके , हमारे दिल को चोट पहुंचा कर जाओगी, जाओ ज़िन्दगी में कभी कामयाब नहीं हो सकती, हम भी देखेंगे के :- तुम और पढ़ लिख कर क्या उखाड़ लोगी "
मेरा कहना है के :- " मैं अपना अकीदा , अपना इस्लामी तौर तरीका, अपनी नमाज़ का तरीका नहीं बदलूंगी, और ना ही अपना दीन का इल्म हासिल करने की आरज़ू को छोडूंगी और ना ही खुदकुशी करके मरूंगी, और आपको भी खुदकुशी करके नहीं मरने दूंगी, रही बात निकाह की तो मैं किसी मुशरिक वा बिदती मुकल्लिद (धार्मिक अंध भक्त) से निकाह नहीं करूंगी, अगर मेरा निकाह होगा तो सिर्फ मुवाहहिद आदमी के साथ जो मुझे मेरी मर्ज़ी के मुताबिक दीन और दुनिया दोनों का इल्म सीखने में मेरी भरपूर मदद करे और ये निकाह भी मैं आप दोनों की मर्ज़ी से ही करूंगी, मुझे मेरा मनहज भी महबूब है और आप दोनों भी ??
में आप दोनों को अपनी नज़र मे हकीर नहीं समझ रही हूं और ना है मैं आपको चोट पहुंचाना चाहती हूं,?? बस मैं तो यही चाहती हूं के आप मुझे मेरी मर्ज़ी के लड़के के साथ निकाह करके खुशी खुशी अपनी दुआएं देते हुए इस घर से रुखसत कीजिए , और अगर आप मेरा निकाह मेरी मर्ज़ी से नहीं करना चाहते हैं तो मैं निकाह ही नहीं करूंगी, बस आप लोग मुझे मजीद तालीम सीखने की इजाज़त तो कमसे कम दे दीजिए ??"
सवाल-1
क्या मैं अपने मां बाप को खुश करने के खातिर अपने मनहज को छोड़कर मनहज अहनाफ वा बिदात को कुबूल करते हुए उनकी मर्जी के मुताबिक किसी भी बिदाती वा मुशरिक मुकल्लीद के साथ निकाह कर लूं तो मुझपर कोई।गुनाह तो नहीं होगा ??
सवाल -2
क़ुरआन वा हदीस की रोशनी में कौन हक पर है ?? मैं या मेरे मां बाप ?? मै अपनी मां को ऐसी बातें सुनकर डर जाती हूं के कहीं मैं उनकी नाफरमानी तो नहीं कर रही हूं ??
सवाल -3
मेरे मां बाप का ये कहना के :- " जाओ तुम अपनी मर्ज़ी का लड़का तलाश करके निकाह कर लो, हम निकाह तो कर देंगे मगर कभी हमारी तरफ पलट कर भी मत आना और हमारी बद्दुआ से कैसे बचोगी ?? अपनी मर्ज़ी से निकाह करके हमारे दिल को चोट पहुंचा कर जाओगी, जाओ ज़िन्दगी में कभी कामयाब नहीं हो सकती, हम भी देखेंगे के :-" तुम और पढ़ लिख कर क्या उखाड़ लोगी ??"
तो अगर मैं अपने वालिद की इजाज़त के साथ इस तरह का निकाह कर लूं तो क्या मेरा ये निकाह करना दुरुस्त होगा, क्या मुझे मेरे मां बाप की बद्दुआ तो नहीं लगेगी ??
नोट: मेरा पहला निकाह भी बिदत और शीर्क करने वाले घर में हुआ था,
मेरे इस मसले का हल कुरआन वा हदीस की रोशनी में बयान करके मेरी रहनुमाई फरमाएं, नवाजिश होगी
वालैकुम अस सलाम वारहमतुल्लही वा बरकताहू
अल्लाह की बंदी,
साभार: शेख मकबूल अहमद सलफी
तर्जुमा: Umair Salafi Al Hindi