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Thursday, October 16, 2014

HINDU DHARM ME MASAA'HAAR KI SHIKSHA

🚦🚦आमतौर पर समझा जाता है कि हिंदू शुरू से ही पूरी तरह से शाकाहारी रहे हैं।
हिंदुओं ने विदेशियों के संपर्क में आकर मांसाहार शुरू किया। लेकिन इतिहास इस बात को पूरी तरह
झूठलाता है। हमारा इतिहास साफ-साफ बताता है कि हिंदुओं में मांस खाने का प्रचलन न सिर्फ शुरू से
रहा है, बल्कि वे गाय का मांस भी खाते थे और यहां तक कि घोड़े का भी। यह कोई आदिम काल की बात
नहीं है। यह उस समय तक कि बात है जब हिंदू सभ्यता का पूरा विकास हो चुका था।

सभी इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि बौद्ध धर्म के आगमन के पूर्व भारत में बलि प्रथा का प्रचलन
जोरों पर था। बिना बलि के कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता था। हिंदुओं के देवी देवता पशुओं का
रक्त व मांस के शौकीन थे। यहां तक कि देवी-देवताओं को खुश करने के लिए भेड़-बकरियों के अलावा भैंस का
बच्चा, भैंसा, बैल आदि की भी बलि दी जाती थी। देवी-देवता किसी भी धर्म के सर्वोच्च आदर्श होते हैं।
यह आसानी से समझा जा सकता है कि जिस धर्म के सर्वोच्च आदर्श भैंसा आदि के मांस के शौकीन हों, वे
धर्मावलंबी क्या मांस भक्षण से खुद को दूर रख सकते हैं? बलि प्रथा आज भी जीवित है। भारत में कई ऐसे
प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें आज भी प्रतिदिन बड़ी संख्या में पशुओं की बलि दी जाती है। अगर गांवों के देवी-
देवताओं को भी इनमें शामिल कर लिया जाए तो ऐसे असंख्य हिंदू देवी-देवता मिल जाएंगे, जिनका सबसे
प्रिय आहार पशुओं का मांस व रक्त है। इस पर हिंदू धर्माचार्यों का मौन एक तरह से उनकी सहमति को
ही प्रकट करता है।

विश्व में एकमात्र हिंदू राष्ट्र का दर्जा रखने वाले देश नेपाल में आज भी बलि प्रथा का खूब प्रचलन
है। वहां प्रतिवर्ष एक ऐसा धार्मिक उत्सव होता है, जिसमें भैंसों के हजारों बेजुबान बच्चों की बलि दे
दी जाती है। वहां जो दृश्य उत्पन्न होता है, उससे अच्छे दिल जिगर वाला व्यक्ति भी थर्रा जाता है।
शाकाहार के कथित प्रेमी हिंदुओं ने इसे रोकने का कभी प्रयास नहीं किया।
 


हद तो यह कि जब नेपाल के पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र भारत आये थे, तो उन्होंने यहां के भी एक मंदिर में एक
पशु की बलि दी थी।आधुनिक काल का इतिहास भी गवाही देता है कि
हिंदुओं व मुसलमानों के बीच कई बार झटका और हलाल मांस को लेकर भी विवाद होता रहा है। दोनों के
बीच शाकाहार व मांसाहार के कारण विवाद होने का कभी कोई उदाहरण नहीं मिलता। हिंदुस्तान सोशलिस्ट
रिपब्लिकन आर्मी ने तो हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपनी रसोई में झटका व हलाल मांस एक साथ पकाने
की प्रथा शुरू की थी। समुद्रतटीय लोगों का मछली से रिश्ता आदि काल से अभी तक निरंतर रहा है, चाहे वो
जिस धर्म या जाति के हों।

"अल बिरूनी" ने यह तो साफ कर ही दिया है कि उस काल में पुरोहित वर्ग घोड़े का मांस खाते थे। संतों में
मांसाहार की परंपरा बाद में भी जारी रही है।

यहां तक कि आधुनिक काल के सर्वाधिक विद्वान व प्रभावशाली हिंदू संन्यासी स्वामी विवेकानंद भी
मांस खाते थे। उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उनके अंतिम आहार में मछली भी शामिल थी।

महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा "माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ" में एक जगह स्वीकार
किया है कि मांस खाना चाहिए। वहां ऐसा प्रतीत होता है कि गांधी अगर अपनी मां से किये गये वादे से बंधे
न होते तो निश्चित ही वे भी मांसाहार करते। गांधी अपने एक मित्र से कहते हैं, ‘मैं स्वीकार करता हूं
कि मांस खाना चाहिए, पर मैं अपनी प्रतिज्ञा का बंधन नहीं तोड़ सकता।

डा. भीमराव अंबेदकर ने ‘हू वेयर अनटचेबल्स’ में हिंदू धर्मग्रंथों से बड़ी संख्या में ऐसे प्रमाण दिये हैं,
जिनमें बताया गया है कि सनातनधर्मी भी आदि काल से ही मांसाहारी होते थे। अंबेदकर द्वारा दिये
गये कुछ उदाहरण देखिए। 


माधव गृहसूत्र के अनुसार, आर्यों में विशेष अतिथियों के स्वागत के लिए जो
सर्वश्रेष्ठ चीज परोसी जाती थी, उसका नाम मधुपर्व था। इस ग्रंथ के अनुसार, वेदों की आज्ञा है कि
मधुपर्व बिना मांस के नहीं होना चाहिए। शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य एक जगह जवाब देते हैं- ‘मगर
मैं मांस खा लेता हूं, अगर मुलायम हो तो।’ आपस्तंब धर्मसूत्र के अनुसार, ‘ गाय और बैल पवित्र हैं, इसलिए
खाये जाने चाहिए।’ 


ऋग्वेद में इंद्र का कथन है, ‘‘ वे मेरे लिए 15 बैल पकाते हैं, जिनका मैं वसा खाता हूं। इस
खाने से मेरा पेट भर जाता है।’’ 


मनु के अनुसार, "पंचनखियों में सेह, साही, शल्लक, गोह, गैंडा, कछुआ,
खरहा तथा एक और दांत में पशुओं में ऊंट को छोड़कर बकरे आदि पशु भक्ष्य हैं।’’


 इन कथनों के अलावा और
भी ढेरों श्लोकों का उदाहरण देकर अंबेदकर ने साबित किया है कि हिंदुओं के धर्मग्रंथ भी उनके मांसाहारी होने
का समर्थन करते हैं।ऐसे ढेरों प्रमाण भरे पड़े हैं जिससे पता चलता है कि तांत्रिक अपने अनुष्ठान के साथ-साथ
दैनिक आहार में भी मांस खाते हैं। 


यहां तक कि उनके द्वारा मानव मांस भी भक्षण करने और मानव रक्त पीने
की बात साबित हो चुकी है। अभी भी भारत में आनंद मार्ग आदि कई ऐसे हिंदू आध्यात्मिक संगठन हैं, जिनमें
संन्यासी मानव की खोपड़ी का इस्तेमाल साधना में करते हैं। मानव की खोपड़ी का इस्तेमाल करने वाले को
कितना शाकाहारी माना जा सकता है?


यह बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि हिंदुओं में
आदि काल से मांस खाने की परंपरा रही है। यह किसी भी दूसरे धर्मावलंबियों से कम नहीं रही।

स्वामी विवेकानन्द जी ने भी अपनी किताब में लिखा था कि हिन्दू भी वैदिक समय में
मांस खाते थे इसके बारे में सारी जानकारी आपको, उनके द्वारा लिखी गई किताब में मिल जाएगी,
जिसका शीर्षक है " दी कम्पलीट वर्कस वाई स्वामी विवेकानन्द जी "जिसका वोल्युम-3 है
ये पुस्तक " अदवेता आश्रम द्वारा प्रकाशित की गई थी,इस किताब के 174 पृष्ठ पर लिखा गया है,
कि वैदिक समय में हिन्दू भी मांस खाते थे,यद्यपि, सबसे शुद्ध मांस गाय का होता है,
इसलिए गाय का मांस प्रशाद के रुप में दिया जाता था,
 

जब भी कभी धार्मिक अनुष्ठान होता था,या फिर जब कभी भी कोई राजा या कोई
महन्त किसी के घर जाते थे, तब गाय का मांस ही सबसे पहले दिया जाता था,
पर जैसे-जैसे लोगों की आबादी बढनी शुरू हुई, तब खेतीबाड़ी उच्च स्तर पर की जाने लगी,
 

ओर खेतों को जोतने के लिए बैल इस्तेमाल किए जाने लगे, उसके बाद लोगों ने लगभग हर दैनिक काम के
लिए बैलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया, जैसे कि, बैलगाड़ी का इस्तेमाल, कुओं से पानी निकालने के लिए बैलों का इस्तेमाल,
 

गेहूं पिसने के लिए बैलों का इस्तेमाल किया जाने लगा, तब हिन्दुओं को ये महसूस हुआ, कि यदि
हम गउओं का मांस यूं ही खाते रहेंगे, तब हमारे पास बैलों की कमी हो जाएगी, क्योंकि, बैल तो
तभी बचेगें, जब गउएं बचेगीं, इसलिए उस वक्त गउओं के मांस खाने पे पाबन्दी लगाई गई, इसलिए,
उपरोक्त बातों से ये सिद्ध हो जाता है, कि हिन्दू भी गाय का मांसा खाते थे।
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