Thursday, July 29, 2021

माह ए शाबान

 



माह ए शाबान


जिन दो रातों की फजीलत खास तौर से बयान की जाती है और उसमे सही और गलत की तमीज नहीं की जाती उनमें से एक शाबान की 15वी रात है जिसे आम तौर पर शब ए बरात कहा जाता है,

ये सही है के ये रात जिस महीने में आती है उसमे नबी ए करीम मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम रमजान को छोड़कर बाकी सब महीनों की बनिस्बत ज्यादा रोजे रखते थे,

और नबी ए करीम मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ये फरमाया करते थे के , " इस महीने में नेक अमाल ऊपर उठाए जाते हैं और मुझे ये बात पसंद है के मेरे अमाल रोजे की हालत में उठाए जाएं"

जो हुरमत वाले महीने कहलाते हैं और जिनमे जंग वा जदाल और खून करना हराम हो जाता है, तमाम मुफस्सिरीन वा मुहाद्दिसीन वा उलेमा का इत्तेफाक है के ये चार महीने जुल कादा, जुल हिज्जाह, मुहर्रम , और रजब के महीने हैं, शाबान को किसी मुफस्सिर ने इन चार महीनों में शुमार नहीं किया ,

इस पूरे महीने में नबी ए करीम मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने जिस इबादत का खास तौर कर एहतेमाम किया वह रोजा है, और इसका एहतमाम पूरे महीने किया , किसी एक दिन के साथ उसको खास नहीं किया , और ना ही इस महीने के किसी एक दिन के रोजे की कोई फजीलत बयान की,

शब ए बारात

जहां तक शाबान की 15वी रात का ताल्लुक है तो इसके बारे में नबी ए करीम मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम का ये इरशाद सही सनद के साथ रिवायत किया गया है, " अल्लाह ताला शाबान की 15वी रात को अपनी पूरी मखलूक की तरफ ( बा नज़र ए रहमत) देखता है, फिर मुशरिक और कीना करने वालों के सिवा सारी मखलूक की बख्शिश कर देता है "

(तिबरानी, इब्न हिब्बान, बैहेकी)

यही वो हदीस है जो शाबान 15वी रात की फजीलत में सही सनद के साथ रिवायत की गई है, इसके इलावा जितनी हदीस आम तौर पर बयान की जाती हैं, और जिन्हें अखबारात और महफिलों की ज़ीनत बनाया जाता है वह सब की सब सनादन इंतेहाई कमज़ोर बल्कि मनगडंत हैं,

और नबी ए करीम मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम की शरियत ऐसी खुराफात से पाक है, लिहाजा उलेमा ए सु के लिए ये ज़रूरी है के वह ऐसी रिवायत को बयान करने और उनकी नश्र वा ईशाअत से परहेज़ करें जो सनद के ऐतबार से साबित ना हो,

यकीनी तौर पर ये हदीस ए नवाबी की बहुत बड़ी खिदमत होगी, वह अगर किसी हदीस को बयान करने से पहले इसकी सनद के मुतल्लिक तहकीक कर लें, वरना नबी ए करीम मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम का ये इरशाद हमेेशा याद रखना चाहिए के ," जिसने जान बूझकर मेरी तरफ ऐसी बात मंसूब की जो मैने नहीं कही, उसे अपना ठिकाना जहन्नम में बना लेना चाहिए ,

शब ए बरात की निस्बत से जो कमजोर और मनगडंत हादिसे आम तौर पर बयान की जाती हैं उनमें से चंद एक ये हैं,

1 - शाबान मेरा महीना है और रमज़ान अल्लाह का ,

2- शाबान की 15वी रात को अल्लाह इतने लोगों को आजाद करता है जितने के फलां बकरी के बाल हैं,

3- इस रात को 14 रकात अदा करने से 20 हज्जो और 20 साल के मकबूल रोजों का सबाब मिलता है,

4- इस रात में 100 रकात नाफिल नमाज़ पढ़ी जाएं और हर रकात में सूराह इखलास पढ़ी जाएं और पढ़ने वाले के एक साल के गुनाह नहीं लिखे जाते ,

5- हसन बसरी का ये कौल के उन्होंने 30 सहाबा किराम से ये सुना के नबी ए करीम मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया के ," जो सख्स इस रात को नमाज़ पढ़े , अल्लाह ताला उसकी तरफ 70 नजरें फरमाते हैं,"

और हर नज़र के साथ 70 हाजतें पूरी फरमाते हैं,

इसी किस्म की और भी हदीस बिला इत्तेफ़ाक जईफ़ और मनगडंत हैं, एम्मा किराम मसलन इमाम शौकानी, इब्न जावजी, इब्न हिब्बान, कुर्तुबी, इमाम सुयुती ने इन रिवायतों को नाकाबिल ए ऐतबार क़रार दिया है,

लिहाजा इन को बयान करने से परहेज़ करना चाहिए, तफसीलात के लिए फवाइद अल मजमुआ, मौजुआत अल कुबरा, तफसीर अल कुर्तूबी वगेरह देखी जा सकती है,

जारी...

साभार: Umair Salafi Al Hindi
Blog: islamicleaks